Thursday, February 6, 2014

क्या आरक्षण पर हो रही बहस सार्थक है?

पिछले दो-तीन दिन में कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी जी टी. वी. की बहसों में छाए हुए हैं। कारण है उनका जातिगत आरक्षण का विरोध करना। यह बहस कोई पहली बार नहीं शुरु हुई है। इसके पहले भी कई तरह के आन्दोलन इस बात के पक्ष में होते रहे हैं। कई तरह के आरक्षण विरोधी संगठन (यूथ फॉर इक्वालिटी, आरक्षण खत्म करो, Ant-Reservation) जन्‍तर-मन्‍तर और रामलीला में दिखाई देते रहे हैं। लेकिन आरक्षण को लेकर पिछले दो-तीन दशक में आरक्षण पर इतनी बहस तो केवल मंडल कमीशन के समय ही हुई थी। इस बहस में एक बात अक्सर सामने आ रही है जो द्विवदी जी ने खुद कही थी कि बाबा साहब अम्बेडकर ने ही संविधान में लिखा था कि दस साल बाद आरक्षण खत्म कर दिया जाना चाहिए। लेकिन वो लोग बिना संविधान पढ़े ही बोल रहे हैं। क्योंकि बाबा साहब ने अनुच्छेद 334 में यह लिखा था कि अगर दस वर्ष में अनसूचित जातियों-जनजातियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल जाए तो राजनैतिक आरक्षण को खत्म कर दिया जाएगा। अब सवाल है क़ि क्या राजनीति में इन जातियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया गया है? बिल्कुल नहीं। आज लोकसभा की 121 सीटों में कितने ऐसे सांसद हैं जो अपने समाज की आवाज को संसद में उठा सके हैं। अगर मायावती, जगजीवन राम जैसे कुछ उदाहरण छोड़ दिए जाएँ। जब तक उनके आका कुछ नहीं बोलते तब तक उनके मुंह से आवाज तक नहीं निकलती है। प्रमोशन में आरक्षण बिल में ही समाज वादी पार्टी के दलित सांसद ने ही बिल को फाड़ दिया था। अब आप ही बताइए क्या यह काम उसने अपने दिल से किया होगा? क्या सपा के मुखिया के कहने पर यह नहीं हुआ होगा। (हालांकि मैं व्यक्तिगत तौर पर प्रमोशन में आरक्षण पर एक स्टैंड नहीं ले पाया हूँ। मुझे सही तरह से इसपर और ज्यादा  पढ़ने और बहस करने की जरूरत है।)
अब अगर हम इस आरक्षण पर होने वाली बहस के दूसरे पहलू पर जाएँ तो, ज्यादातर लोंगों का मानना है कि देश में आर्थिक आधार पर आरक्षण होना चाहिए। आप इतने नासमझ कैसे हो सकते हैं कि गरीबी उन्मूलन को आरक्षण से जोड़ रहे हैं। आरक्षण देने का मकसद इन जातियों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का नहीं था। आरक्षण तो उनको  इस लिए दिया गया क्यों कि उनको जातिवाद के आधार पर हजारों हजार वषों से जीवन के अनेको आयामों से यथा - सत्ता, शिक्षा, उत्पादन, न्याय, संचार वयवसाय, स्व्यंसेवी संघटनों में प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया जिसेस कि वह राष्ट्र निर्माण कि प्रक्रिया में हिस्सा ले सके। ये तथाकथित लोग (जनार्दन द्विवेदी और बाबा राम देव) मनु के जमाने से, शम्भूख और एकलव्य का इतिहास क्यों भूल रहे हैं। आर्थिक रूप से गरीबी 10-20 या 50 वर्ष की हो सकती है। परन्तु दलितों कि वंचना, तिरष्कार, अनादर, अस्पृष्यता, बहिष्कार  हजारों  साल पुराना है। अब आप ही फैसला कीजिये कि आरक्षण का असली हक़दार कौन है? अगर आपको कुछ और जातियाँ इस तरह की कष्टों को झेले हुए दिखती हैं तो कृपा करके उन्हें भी आरक्षण का लाभ दीजिए। अगर आपको यह कार्यक्रम चलाना है कि किसी भी जाति के गरीब की मदद की जाए, तो आप ब्राम्हण, क्षत्रिय या किसी भी उच्च या निम्न वर्ग के लिए एक दो नहीं 10 कार्यक्रम चलाइए। किसने रोका था आपको? आप ही बताइए कि आज भी गावों में कितने प्रतिशत ब्राम्हण, क्षत्रिय, बनिए या उत्तर प्रदेश के यादव और पश्चिमी यूपी-हरियाणा के जाट गरीब होते हैं। आप देखेंगे कि ज्यादातर गरीबों की संख्या भी पिछड़ी जातियों में ही होती है. फिर जो लोग असली भारतीय समाज या गाँवों को जानते हैं, उन्हें पता है कि कोई भी दलित कितना भी पैसे वाला क्यों ना हो। उसके घर में कितने भी लोग आई.ए.एस. हो गए हों, लेकिन उनकी सामाजिक स्थिति में कुछ विशेष बदलाव नहीं हुआ है। कोई भी गरीब ब्राम्हण भी उन अमीर दलितों को उसी गिरी हुई नजर से देखता है.जिस वाक्य "भारतीय संविधान के आधार किसी के साथ जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा" के आधार पर बाबा साहब ने आरक्षण दिया था। आज विरोधी लोग इसी लाइन को आधार बनाकर विरोध कर रहे हैं। क्या यह कुतर्क सही है। इस वाक्य को नकारात्मक रूप से देखा जा रहा है। अब अगर हम सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बात करें तो क्या इन जातियों की जनसंख्या के अनुपात में उनको प्रतिनिधित्व मिल सका है? क्या अल्पसंख्यक कही जाने वाली जातियों को सामाजिक परिकल्प में वो जगह मिली है, जो बाबा साहब अम्बेडकर ने आरक्षण के उद्देश्य के रूप में देखी थी? अगर सही उत्तर देंगे तो नहीं। आज अगर आपको आरक्षण पर ही बहस करनी है तो  मंडल कमीशन के बाद ओ.बी.सी. में सामिल हुई कुछ जातियों की बात की जाए। मैं खुद ओबीसी से आता हूँ, और इस आरक्षण का विरोंध नहीं कर रहा हूँ। लेकिन सामाजिक स्थिति पर मिलने वाले इस आरक्षण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। आप देश में एक शोध करवा कर पता कर सकते हैं कि किन ओबीसी जातियों की स्थिति उपर हुई है। ओबीसी में मिलने वाला आरक्षण पूरा का पूरा यादव और कुछ तथाकथित जातियों को ही मिल जाता है। जो यह बात कहते हैं कि जिसको एक बार आरक्षण मिल जाए तो उसे दोबारा ना मिले। इसका प्रावधान तो संविधान में भी है कि किसी की भी तीसरी पीढी को आरक्षण नहीं मिलेगा। हालांकि इसपर सही ढंग से अबतक अमल नहीं हो पाया है। मेरी इस बात पर सहमति है कि जिन जातियों में या जिन परिवारों में पर्याप्त आरक्षण मिल चुका है, उन्हें कम आरक्षण देकर अन्य उसी श्रेणी की जातियों को अधिक मौके दिए जाने चाहिए। लेकिन मेरी बात के जवाब में जे. एन. यू. के प्रोफेसर विवेक कुमार एक जवाब देते हैं। उनकी रिसर्च में उन्होनें 60 आई.ए.एस. की लिस्ट बनाई जिनमें से केवल 2 के बच्चे ही आई.ए.एस. बन पाए। और 60 प्रोफेसरों की लिस्ट में केवल 1 ऐसे थे, जिनके बाप हाईस्कूल में मास्टर और बाकी केवल तीन के ही 10वीं तक पढ़े थे। इस तरह से आप पूरे विश्वास के साथ आप यह भी नहीं कह सकते हैं कि जो आदमी आरक्षण से नौकरी पाया है, तो उसका बेटा या बेटी भी आरक्षण पाकर नौकरी पा जाएंगे।
इस चल रही बहस को लोग अलग-अलग ढंग से देख रहे हैं। मुझे नहीं लगता है कि जनार्दन द्विवेदी जैसा परिपक्व नेता इस तरह के बयान देगा। यह कांग्रेस पार्टी की एक चाल हो सकती है। जनार्दन द्विवेदी वर्तमान समय में कांग्रेस के चाणक्य माने जाते हैं। सोनिया और राहुल से उनकी करीबी जगजाहिर है। उन्होनें ऐसा कहा फिर सोनिया गाँधी ने इस बात का खण्डन किया। अब मोदी या भाजपा को भी इस बात पर अपनी प्रतिक्रिया देनी ही पड़ेगी। अगर भाजपा कोई भी स्पष्ट स्टैंड लेती है, तो वह फंस सकती है। भाजपा को तो यह बात समझ में आ गई। लेकिन मोदी को पी.एम. बनाने के लिए हरिद्वार छोड़ चुके बाबा राम देव इस चाल में फंस गए। कांग्रेस को पता था कि मोदी को पसंद करने वाला तबका अपर-कास्ट ही है। इसलिए अपर-कास्ट (मोदी समर्थकों) और पिछड़ा+दलित (जो कांग्रेस से नाखुश हो चुके हैं) में एक लकीर खींच दी जाए।
अगर मोदी जी कहेंगे कि जातिगत आरक्षण खत्म हो तो पिछड़ी और दलित जातियाँ जिनका अपने साथ आने का मोदी और उनके समर्थक दावा कर रहे हैं, वो उनके खिलाफ हो जाएंगी। अगर उन्होने जनार्दन द्विवेदी के बयान को सोनिया की तरह बकवास बता दिया तो शायद सवर्ण युवा जो उनसे 21वीं सदी के भारत के नवनिर्माण की आस लगाए बैठा है, वो अपना बोरिया बिस्तर कहीं और टिका देगा। इसीलिए हार के कगार पर खड़ी कांग्रेस के द्विवेदी का यह बयान मास्टर स्ट्रोक है । दुधारी तलवार की तरह । वैसे कांग्रेस का स्टॅंड भी मुझे समझ में नहीं आ रहा है। यह वही कांग्रेस है, जिसके नेता राजीव गाँधी नें मंडल के समय हो रही हिंसा पर संसद में बोलते हुए कहा था कि "कांग्रेस पार्टी जातिगत आरक्षण की जगह आर्थिक आरक्षण का समर्थन करती है।" बल्कि एक प्रस्ताव भी पास हुआ था। आज उसी कांग्रेस ने इसे बकवास टाइप बता दिया है। भाजपा को अंदेशा था कि इसपर राहुल गाँधी का बयान आ सकता है, तभी वो इसे भी मोदी को रोंकने की चाल बता रही है। 
अगर बाबा रामदेव मोदी से इस बात को कहेंगे, तो मुझे नहीं लगता है कि मोदी में इतना साहस है कि वो सार्वजनिक मंच पर आकर इस बात का स्पष्टीकरण दे  सकते हैं। वो बाबा को इस बार भी पिछले टैक्स वाले मुद्दे के जैसे ही "विचार करने" का झुनझुना थमा देंगे। बाबा रामदेव ने भाजपा और मोदी को एक गहरे संकट में डाल दिया है। अब देखना होगा कि इस पर भाजपा या मोदी किस तरह से स्पष्टीकरण देंगे। देंगे या भी नहीं।
आरक्षण राष्ट्र निर्माण कि प्रक्रिया है जिसके माध्यम से  सामाजिक असमानता और अस्थिरता को दूर किया जा सके। मैं तो कहता हूँ कि आप ओ.बी.सी. से कुछ जातियाँ कम करके आरक्षण का प्रतिशत भी कम कर दीजिए। ताकि सामान्य लोगों के कम्पटीशन को और जगह मिल सके। अल्प-संख्यकों को भी आरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन एक रिषर्च के आधार पर। अगर मुस्लिम ओ.बी.सी. में आरक्षण पा रहे हैं, तो उनको इससे हटाकर अन्य अल्पसंख्यकों को मिलना चाहिए। आप आर्थिक आरक्षण की बात तो कर रहे हैं, अगर मान लिया जाए कि यह हो गया तो जिस तरह से देश में जाति-प्रमाणपत्रों का फर्जीवाड़ा और बिक्री सामने आ रही है। उससे कैसे मान लिया जाए कि गरीबों के साथ न्याय होगा। कितने असली पात्रों को सरकार बी.पी.एल. कार्ड दे पाती है। क्या यह सवर्णों और अमीरों को नहीं मिल रहे हैं। कितने गरीब और दलित इस प्रक्रिया से वंचित रखे जाते हैं। मैनें एक व्यापक मुद्दे पर अपनी चोटी सी राय रख दी है। अब आप भी बहस करते रहिए, लेकिन जिन्दबाद! मुर्दाबाद टाइप नहीं! बाकी जउन है, वो तो चलिबे करी।

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