दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल आज रोहतक में एक बड़ी रैली करने जा रहे है। उनके कार्यकर्ता और बड़े नेता जोश से भरे हुए एक ही नारा लगा रहे हैं "अभी तो शीला हारी हैं, अब हुड्डा की बारी है" इस्तीफे के बाद तो अब मोदी की बारी है, भी कह रहे थे। दिल्ली की सफलता के बाद लोकसभा चुनावों में जाने की जल्दी हर राजनैतिक दल को है। उसी का शिकार केजरीवाल भी हो रहे हैं। उन्होने पार्टी की तरफ से 20 लोकसभा उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। जिसमें सभी बड़े नेताओं के खिलाफ अपने बड़े नेताओं को खड़ा किया गया है। दूसरी लिस्ट भी आने को तैयार है. इसमें लखनउ से लाल बहादुर शास्त्री के पोते आदर्श शास्त्री, ज़िम्मी शेरगिल और भी कई बड़े नाम शामिल बताए जा रहे हैं। लेकिन इनमें से कुछ प्रत्याशियों के नामों पर कार्यकर्ता सवाल भी पूंछ रहे हैं। दिल्ली से आशुतोष, मुम्बई से मीरा सान्याल जैसे लोगों के नाम की घोषणा करकर्ताओं को उनकी मेहनत से उपर दिखाई दे रहे हैं। ज़िम्मी शेरगिल तो खैर पार्टी से बहुत पहले जुड़े थे। उन्होनें पार्टी के लिए कई प्रोग्राम दिल्ली में भी किए थे। खैर यह तो हर पार्टी में होता है। सभीको खुश करना भगवान के भी वश की बात नहीं होती है।
इस बीच अगर हम अरविन्द केजरीवाल की राजनीति को समझने की कोशिश करें तो पता चलता है, कि अंबानी ही एक मात्र तीर हैं। जिसे राहुल और मोदी दोनो पर चलाया जा सकता है। यह बात सही भी है कि आखिर अरविन्द केजारीवाल के पत्रों का जवाब किसी नेता की तरफ से क्यों नहीं आया। बीजेपी के एक प्रवक्ता टी.वी. पर कहते मिले कि ये सड़कछाप लोगों का जवाब मोदीजी नहीं दे सकते। अरे भई अगर आप केजरीवाल को जवाब नहीं दे सकते, तो हम कैसे मान लें कि आप जनता के सवालों का भी जवाब देंगे? मतलब अंबानी के मुद्दे पर दोनों ही बौखलाए तो हैं, लेकिन इस बौखलाहट में चिल्लाना उल्टा पड सकता है। आजकल मोदी और राहुल की रैलियों की तुलना हो रही है। राहुल गाँधी की रैली मोदी की तुलना में थॅकी हुई लगती है, वहीं मोदी की तुलना में केजरीवाल की शुरुआत और भी जोरदार दिख रही है। हालांकि जनता से संवाद मोदी की तुलना में राहुल गाँधी अच्छा कर रहे हैं। और राहुल की तुलना में केजरीवाल ज्यादा जमीनी नेता दिखाई दे रहे हैं। केजरीवाल को 2014 के चुनाव में यूपी और बिहार में जातिगत समीकरणों के कारण वोट तो मिलेंगे, लेकिन कितनी सीटों पर विजयी होंगे। यह कहना मुस्किल लगता है। इसी को देखते हुए मोदी भी पासवान और उदित राज से दलितों के लिए और सोनेलाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल से यूपी में गठजोड़ की कोशिशों में लगे हुए हैं। अब यह गठजोड़ हो पाएंगे या नहीं यह 4-5 दिन में साफ हो जाएगा।
खैर केजरीवाल ने किसी से गठजोड़ करने की बात का तो खण्डन कर दिया है। लेकिन चुनाव से पहले आम आदमी से जुड़े हुए मुद्दों को जोर से उठा रहे हैं। मोदी केवल कांग्रेस पर आरोप लगाकर प्रचार करते हैं, वहीं केजरीवाल सभी विरोधियों को घेर कर जनता के मन की बात कह जाते हैं। अभी जय जवान, जय किसान का नारा भी बहुत कारगर साबित होगा। हरियाणा में उन्होंने अपने प्रचार की शुरुआत से ही बता दिया कि मोदी से बेहतर साबित होने के लिए अभी वो और कौन से दांव खेलेंगे। हरियाणवी अंदाज में किसानों का दिल जीतने वाला भाषण दिया। जो लोग मोदी को जीता हुआ मानकर चल रहे थे, उनकी जानकारी के लिए यह भी बता दिया कि 200-235 सीटें देने वाले चैनल भी मोदी और अंबानी के हाथों बिके हुए हैं। सबसे अच्छी बात तो यह रही कि मोदी की रैलियों के महाआयोजन पर भी उन्होंने भ्रष्टाचार का आरोप लगा दिया। अपनी चाय वाले की छवि का फायदा मोदी ले रहे हैं, इसी को भाँपते हुए केजरीवाल ने सवाल दाग दिया क़ि चाय वाले के पास हेलिकॉप्टर कहाँ से आ गए। यह आलोचना बहुत अच्छी थी। आने वाले दिनों में मोदी के लिए और भी कठिनाइयाँ होने वाली हैं। उन्हें केजरीवाल के कठोर सवालों से निपटना पड़ेगा।
इस बीच अगर हम अरविन्द केजरीवाल की राजनीति को समझने की कोशिश करें तो पता चलता है, कि अंबानी ही एक मात्र तीर हैं। जिसे राहुल और मोदी दोनो पर चलाया जा सकता है। यह बात सही भी है कि आखिर अरविन्द केजारीवाल के पत्रों का जवाब किसी नेता की तरफ से क्यों नहीं आया। बीजेपी के एक प्रवक्ता टी.वी. पर कहते मिले कि ये सड़कछाप लोगों का जवाब मोदीजी नहीं दे सकते। अरे भई अगर आप केजरीवाल को जवाब नहीं दे सकते, तो हम कैसे मान लें कि आप जनता के सवालों का भी जवाब देंगे? मतलब अंबानी के मुद्दे पर दोनों ही बौखलाए तो हैं, लेकिन इस बौखलाहट में चिल्लाना उल्टा पड सकता है। आजकल मोदी और राहुल की रैलियों की तुलना हो रही है। राहुल गाँधी की रैली मोदी की तुलना में थॅकी हुई लगती है, वहीं मोदी की तुलना में केजरीवाल की शुरुआत और भी जोरदार दिख रही है। हालांकि जनता से संवाद मोदी की तुलना में राहुल गाँधी अच्छा कर रहे हैं। और राहुल की तुलना में केजरीवाल ज्यादा जमीनी नेता दिखाई दे रहे हैं। केजरीवाल को 2014 के चुनाव में यूपी और बिहार में जातिगत समीकरणों के कारण वोट तो मिलेंगे, लेकिन कितनी सीटों पर विजयी होंगे। यह कहना मुस्किल लगता है। इसी को देखते हुए मोदी भी पासवान और उदित राज से दलितों के लिए और सोनेलाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल से यूपी में गठजोड़ की कोशिशों में लगे हुए हैं। अब यह गठजोड़ हो पाएंगे या नहीं यह 4-5 दिन में साफ हो जाएगा।
खैर केजरीवाल ने किसी से गठजोड़ करने की बात का तो खण्डन कर दिया है। लेकिन चुनाव से पहले आम आदमी से जुड़े हुए मुद्दों को जोर से उठा रहे हैं। मोदी केवल कांग्रेस पर आरोप लगाकर प्रचार करते हैं, वहीं केजरीवाल सभी विरोधियों को घेर कर जनता के मन की बात कह जाते हैं। अभी जय जवान, जय किसान का नारा भी बहुत कारगर साबित होगा। हरियाणा में उन्होंने अपने प्रचार की शुरुआत से ही बता दिया कि मोदी से बेहतर साबित होने के लिए अभी वो और कौन से दांव खेलेंगे। हरियाणवी अंदाज में किसानों का दिल जीतने वाला भाषण दिया। जो लोग मोदी को जीता हुआ मानकर चल रहे थे, उनकी जानकारी के लिए यह भी बता दिया कि 200-235 सीटें देने वाले चैनल भी मोदी और अंबानी के हाथों बिके हुए हैं। सबसे अच्छी बात तो यह रही कि मोदी की रैलियों के महाआयोजन पर भी उन्होंने भ्रष्टाचार का आरोप लगा दिया। अपनी चाय वाले की छवि का फायदा मोदी ले रहे हैं, इसी को भाँपते हुए केजरीवाल ने सवाल दाग दिया क़ि चाय वाले के पास हेलिकॉप्टर कहाँ से आ गए। यह आलोचना बहुत अच्छी थी। आने वाले दिनों में मोदी के लिए और भी कठिनाइयाँ होने वाली हैं। उन्हें केजरीवाल के कठोर सवालों से निपटना पड़ेगा।
अगर हम जनता की एक मनोभावना को समझने की कोशिश करें तो केजरीवाल के इस्तीफे वाले एपिसोड से जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता बढी है। उसके बीच में अंबानी पर एफ.आई.आर. दर्ज करवाने के बाद से केजरीवाल की छवि एक संघर्षशील नेता की हुई है। केजारीवाल आज हर जगह चर्चा का विषय बने हुए हैं। लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या पार्टी को देश भर में लोकसभा चुनाव में कुछ मिल पाएगा। क्योंकि लोकसभा चुनाव में तो हर आदमी पार्टी की हैसियत को देखते हुए वोट देता है। लेकिन सच तो यही है क़ि 1989 के बाद से हर चुनाव में क्षेत्रीय दलों की हैसियत बढी है। अन्य क्षेत्रीय दलों को आप आम आदमी पार्टी के साथ नहीं जोड़ सकते हैं। क्योंकि यह एक आन्दोलन से निकली है, जिसका प्रभाव पूरे देश में खासकर शहरी क्षेत्रों में रहा है। इस पार्टी को सकारात्मक राजनीति के परिणाम स्वरूप लोकसभा में अच्छी तादाद में वोट मिलेगे। यह बात निश्चित तौर पर नहीं कही जा सकती कि ये वोट कितनी सीटों में परिवर्तित हो पाएंगे? हाँ हम यह जरूर कह सकते हैं कि जितनी भी सीटें मिलेंगी वो सरकार के खिलाफ मुख्य विपक्षी दल का काम करेंगे। और आने वाली 16वीं लोकसभा जो मिलीजुली सरकार लेकर आएगी, वो 2015-16 तक भंग भी हो जाएगी। इसके बाद होंने वाले चुनावों में आम आदमी पार्टी बहुत मजबूती के साथ दावा पेश करेगी। यह हो सकता है कि वह बहुमत पाने लायक पार्टी ना रहे लेकिन इस पार्टी के पास अगले दो-तीन साल में 150-170 सीटें पाने वाली ताकत तो आ ही जाएगी।
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