पिछले एक साल में मोदी की ब्रांडिग गुजरात विकास को लेकर की जा रही थी। अचानक क्या हुआ कि उन्हें अपनी पुरानी छवि यानि (हिन्दुत्व) याद आने लगी। अगर हम मोदी के राजनैतिक इतिहास को उठकर देखें तो पता चलता है कि उनके अंदर संघ की कट्टर सोंच कूट-कूट कर भरी हुई है। लेकिन उनकी मैनेजमेंट टीम को इस बात का आभास था, कि देश में कोई भी नेता कट्टरता के नाम पर सफल नहीं हुआ है। तभी तो भाजपा की एक मात्र सरकार अटल जैसे उदारवादी नेता के नेतृत्व में बनी थी। मोदी की मैनेजमेंट टीम ने इसी बात को ध्यान में रखकर मोदी की छवि एक विकासपुरुष के रूप में करनी शुरु कर दी। मोदी का समर्थक वर्ग कई प्रकार का है, इस बात का जिक्र मैं कई बार कर चुका हूँ। कट्टरवादी विचारधारा का वर्ग उनकी छवि को जानता है, और उनका पक्का वोटर है। लेकिन उनकी ओर बढ़ा मध्यमवर्गीय और युवावर्ग उनकी विकासपुरुस की छवि के आधार पर ही जुड़ा है। इसको जोड़ने के लिए उनकी मैनेजमेंट टीम नें मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक्स मीडिया और सोसल मीडिया पर एक हवा बनाई। इस हवा में कितना दम है, यह बहस का विषय है। जिन्होनें गुजरात देखा है वो ऐसा नहीं बताते हैं, जैसे मोदी ने प्रचार किया।
मेरे कई मित्र अक्सर यह कहते दिखाई दे जाते हैं कि मोदी की लहर है। अगर मैं पूंछता हूँ कि लहर में कितनी सीटें मिलेंगी तो कहते हैं 200-225 तक। बड़ी हंसी आती है इस लहर को सुनकर। लहर तो तब मानी जाती है जब 300 से अधिक सीटें लाइए। यहाँ तो बहुमत भी हांसिल नहीं हो पा रहा है। क्यों मोदी की लहर एक हवा नजर आती है? और इस हवा में भी ब्लोअर का इस्तेमाल किया जा रहा है। कांग्रेस के पास ऐसा को नेतृत्व नहीं है जो मोदी की इस तथाकथिक लहर को चुनौती दे सके। कांग्रेस के पास इस अंतिम समय राहुल नाम का एक तीर बचा है, लेकिन यूपीए के दस सालों के काम से वो भी भोथरा हो चुका है। मोदी हर समय अपने सामने राहुल को दिखाना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस को इस हार का अंदाजा हो चला था।
अचानक से 8 दिसंबर से देश की राजनीति में एक बदलाव आ गया। 3 राज्यों में भाजपा, 1 में कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन पिछले 2-3 महीने से लगातार मीडिया और सिविल सोसयटी में केजरीवाल ही चर्चा का केंद्रबिंदु बने हुए हैं। मैं नहीं कहता कि इसमें केजरीवाल से कुछ गलतियाँ नहीं हुई होंगी। ऐसा कोई कार्य नहीं होगा जिसमें इंसान से गलती ना हुई हो। आपको एक बात सफल लग सकती है, वही बात मुझे गलत। लेकिन कुल मिलाकर अरविन्द की छवि पर इस्तीफे से कोई फर्क नहीं पड़ा है। उनकी छवि नायक फिल्म के अनिल कपूर जैसी हो गई है। आज अरविन्द केजरीवाल की चर्चा हर जगह हो रही है। एक बड़ा वर्ग खासकर युवा है जो पहले कांग्रेस के मुकाबले मोदी को देखना चाहता था। लेकिन अब वो अरविन्द केजरीवाल का फैन हो गया है। और यह बात मोदी या भाजपा को रास नहीं आ रही है। क्योंकि उन्हें पता है कि केजरीवाल के सामने मोदी की यह हवा धीमी पड जाएगी। तभी तो भाजपा के प्रवक्ता आम आदमी पार्टी को कांग्रेस की बी टीम बताने में जुटे हुए हैं। आखिर क्यों शहजादे को ललकारने वाले मोदी अरविन्द जैसे आम आदमी से डर रहे हैं? क्यों नाम लेकर हमला नहीं करते हैं? क्योंकि उनके सामने उनकी ब्रांडिग की हवा निकालने वाला आदमी आ गया है। जो मोदी से बेहतर वक्ता और जनता के मुद्दों को जानने वाला है। उसे मीडिया का संचालन भी मोदी से बेहतर आता है। और उसके पास मोदी से अधिक ज्ञान भी है। क्यों मोदी केजरीवाल से खुली बहस करने से कतराते हैं।
ऐसे में केजरीवाल ने भी मोदी की कमजोरियों को जान लिया है। उन्होंने गुजरात के विकास की पोल खोलनी शुरु कर दी है, जो कांग्रेस नहीं कर पाई। उसने अंबानी पर एफ आई आर करवा कर मोदी+राहुल=अंबानी का नारा देकर जनता को समझना शुरु कर दिया है। जनता को मोदी की पूंजीवादी विचारधारा बतानी शुरु कर दी है। आखिर क्यों मोदी केजरीवाल के पत्रकार का जवाब देने की बजाय बैकफुट पर आ गए हैं।
अब मोदी ने भी अपना आडवाणी और संघ द्वारा दिया गया गुरुमंत्र प्रयोग करना शुरु कर दिया है। मोदी हिन्दुत्व पर वापस आ गए हैं। उन्होंने कल ही अरुणाचल प्रदेश में चीन पर हमला बोला, वहीं असम में बांग्लादेशी प्रवासियों पर। वो भी बांग्लादेश के प्रवासियों में केवल मुस्लिम ही उनके निशाने पर थे। उन्होने क्यों कहा कि हम बांग्लादेश, नेपाल या पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को बर्दास्त नहीं करेंगे? प्रवासियों में हिन्दू-मुस्लिम की बात कहाँ से आ गई? अब उन्हें समझ में आ गया है कि विकास के साथ-साथ अपने पुराने वोटबैंक को हिन्दुत्व के जरिए भी पक्का करना होगा। कहीं वो भी रुष्ट ना हो जाए। अभी चुनाव के 2-3 महीने बाकी हैं, तब तक मोदी की राजनीति कैसे चलेगी? इसपर सभी की नजर रहेगी। मोदी अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को पूरे जोर से उठाने की कोशिश खुद ना करके अपने कार्यकर्ताओं या अन्य नेताओं से करवा सकते हैं। वहीं अन्य विरोधी दल कांग्रेस, सपा, बसपा, जडयू सभी मोदी (साम्प्रदायिकता) बनाम स्वयम् (धर्म-निरपेक्षता) की लड़ाई दिखाना चाहते हैं। इससे देश के बहुसंख्यक समुदाय में मोदी को कुछ हद तक फायदा भी मिल सकता है। मोदी पूरी तरह से हिन्दुत्व पर ना रहकर विकासपूरुष की छवि भी रखना चाहेंगे, लेकिन उसका काउनटर अटैक अरविन्द केजरीवाल से बेहतर शायद ही कोई कर पाएगा। आने वाले समय में क्या कुछ होगा वो तो नहीं पता। लेकिन जो भी होगा, दिलचस्प होगा।
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