राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश और बिहार का नाम एक साथ लिया जाता है, "यूपी-बिहार" मतलब भाई-भाई जैसा ही माना जाता रहा है। हालांकि मैं अभीतक एक बार भी बिहार नहीं गया हूँ। या जहानाबाद तक ही देखा है। फिर भी मैनें पूरे बिहार को बहुत अच्छे से देखा है, पढ़ा है और सुना है। मेरे कई मित्र बिहार के रहे हैं। मैं मुम्बई में रहता हूँ और उत्तरप्रदेश का हूँ इसलिए जब कभी भी कोई बिहार का आदमी मिल जाता है तो एक अपनापन दिखता है। हर बिहारी घर का ही या पड़ोसी लगता है।
अब मैं आता हूँ अपनी मुद्दे की बात पर तो आपको बताना चाहूंगा कि हमारे उत्तर प्रदेश के यादवों, पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा के जाटों में लड़कियों की कमी दिन पर दिन घटती ही जा रही है। वैसे तो पूरे देश और हर समाज में यह समस्या है लेकिन इन तथाकथित समुदायों में यह समस्या सबसे उपर है। इसके कारण बहुत हो सकते हैं। फिलहाल मैं इस वक्त उन चीजों का जिक्र करना उचित नहीं समझता हूँ। सभी को पता है कि भगवान ने आदमी और औरत को लगभग 50-50 प्रतिशत के अनुपात में रखा है। जिससे सभी के जोड़ियाँ बनाना आसान हो। लेकिन समाज की तथाकथित बुराइयों या कुरीतियों की वजह से लोगों को समयस्याएं होती हैं। अक्सर यह अंतर गावों में और भी देखने को मिलता है। 1000 पुरुषों पर 991 स्त्रियों के अनुपात का आंकड़ा शहरों और आदिवासियों का मिलकर है, जहाँ लड़कियों की संख्या ठीक-ठाक होती है। इन हिस्सों में आप होने वाले महिलाओं के विरुध्द अपराधों (बलात्कार आदि) का एक कारण इसे भी मान सकते हैं।
उपर्युक्त कारणों की वजह से उत्तरप्रदेश की कुछ तथाकथित जातियों में आजकल शादियाँ होना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। मेरे आपने गाँव में लगभग 50 फीसदी आबादी यादवों की है। और इनमें से लगभग 60 प्रतिशत युवक (30 वर्ष से अधिक उम्र के) होंगे जिनकी शादी अभीतक नहीं हुई है। मेरे गाँव के आस-पास (कानपुर ज़िले का मशहूर कस्बा बिठूर, लवकुश के जन्म, वाल्मीकि के रामायण लिखने के स्थान और रानीलक्ष्मी बाई के जन्म स्थान के लिए प्रसिद्ध है।) के पास किशुनपुर, पटकापुर, भाउपुर, डिंगरपुर आदि) कई सारे गाँव यादव बहुल हैं। इन सब गांवों में एक बात बहुत कॉमन हो गई है कि अगर किसी युवा की सरकारी नौकरी नहीं लगी तो शादी होना मुस्किल हो जाता है। यह बात भी है कि औसतन इस जाति के ल़ोग सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे, सरकारी नौकरी वाले, खेती वाले, पैसे वाले और ठाकुरों जैसे वर्चस्व वाले होते हैं। इस लिए इस समाज में अगर एक आम या मध्यमवर्गीय परिवार हुआ और उसकी सरकारी नौकरी नहीं है तो कोई अपनी लड़की को देना ही नहीं चाहता है। उपर्युक्त बातों से आप समझ सकते हैं कि इस जाति में दहेज का प्रचलन बहुत कम हो गया है। लड़के वाला लेने की कोई बात नहीं तय करता है और लड़की वाले के पास भी अच्छा खासा पैसा होता है। तो वो अपनी खुशी से ही लड़की को देता है। क्योंकि उसके अपने लड़कों पर भी वही बात लागू होती है। पिछले कुछ सालों से बहुओं की कमी को दूर करने के लिए इन लोगों ने एक नया उपाय सोंचा। एक दो दलाल होते हैं जिनका बिहार के कुछ गावों में अच्छा खासा व्यवहार और पहचान होती है। ये लोग इन दलालों से मिलकर बिहार जाते हैं और 20-25 हजार से लेकर 1-1.5 लाख में मनपसंद लड़की के साथ शादी करवा लाते हैं। ज्यादा खर्च भी नहीं होता है। जैसे दाम होगा वैसी ही लड़की मिलेगी। पहले मेरे मन में भी आप ही की तरह एक बात घूमा करती थी कि ये लड़कियां खरीद कर लाई जाती हैं। तो आप गलत भी हो सकते हैं। क्योंकि मैनें कई अपने निकट के लोगों और एक-दो उन औरतों से जो वहां से ब्याह कर आई हैं, उनसे इस विषय पर बात की तो पता चला कि केवल दलाल ही 10-15 हजार या लड़की के हिसाब से पैसे लेता है। बाकी पैसे वहीं पर शादी की रशमों में खर्च हो जाते हैं। मतलब लड़के की तरफ से केवल 4-5 लोग ही जाते हैं और लड़की की तरफ़ से पूरे गाँव और रिश्तेदारों को निमंत्रण देकर पूरे रीति-रिवाज के साथ शादी करवाई जाती है। उन लड़कियों के घर वाले बहुत गरीब होते हैं। आप बिहार के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर इसका अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि लड़कियों के माँ-बाप शादी के बाद लड़की को भूल जाते हैं। वो दूरी और अपनी आर्थिक स्थिति को देखते हुए साल-छह महीने में अपनी बेटी से मिलने या बड़े त्योहारों पर मिलने आते रहते हैं। वो अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से बेटियों की शादी करते हैं। मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता लेकिन इनमें से ज्यादतर लोग गरीब होने के साथ-साथ दलित या पिछड़ी जातियों के होते हैं। मैं यह भी मानता हूँ कि यूपी के इन यादवों को बिहार के यादवों की लड़कियां भी मिल जाती होंगी क्योंकि बिहार के यादवों और उत्तरप्रदेश के यादवों में आर्थिक और सामजिक विकास का बहुत अंतर है। उत्तरप्रदेश के यादव तो केवल संविधान में मिले आरक्षण के आधार पर ही पिछड़े हैं। लेकिन बिहार के यादवों की स्थिति अभी भी बहुत कमजोर है। पश्चिमी यूपी और हरियाणा के जाटों की भी लगभग यही हालत है। यह सब भी बिहार या झारखण्ड से ही लड़कियां लाकर शादी कर रहे हैं।
इस सब में कुछ सामाजिक पहलू भी अहम होते हैं। जैसे पुराने रीति-रिवाज (अंतरजातीय विवाह) आदि खत्म से होते दिख रहे हैं। भले ही अब तक सबसे कट्टर समाज इन्हीं का रहा हो लेकिन खाप पंचायतों ने भी इन शादियों को माना है। मानेंगे नहीं तो क्या करेंगे वंश तो आगे बढाना ही है। आज मैं देखता हूँ बड़े समाज और रीतियों की दुहाई देने वाले तथाकथित समाजों ने अब इन शादियों के बाद दी जाने वाली रिसेप्शन पार्टियों को स्वीकार किया है। मैनें उन लोगों को भी देखा है जो लोग दलितों को कीडे-मकोडे के समान मानते थे, आज उन्हीं के घर में बिहार से बहू आई है। पता भी नहीं है, कौन सी जाति की होगी? आज पूरा का पूरा समाज इसे स्वीकार कर रहा है। मेरे गाँव में एक दलित की औरत की मृत्यु हो गई थी। दो-तीन साल बाद बिहार से ही उसने शादी कर ली। अब पता चलता है कि उसकी यह बीवी बढई जाति की है। जो मेरे गाँव में उस दलित जाति की परछाई भी नहीं बर्दास्त करते थे। आज उन सबकी सोंच में बदलाव आया है। इस पूरी प्रक्रिया में हमें और भी कुछ सामाजिक सुधारों का ज्ञान होता है। जैसे यह तथाकथिक जातियाँ लड़की बचाओ आन्दोलन का एक मजबूत और अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। इन्हें उस बिहार के आगे हाथ फैलाते और ताकते शर्म आती होगी, जिसे ये लोग ना जाने कैसी-कैसी बातें कहते रहे हैं? इन्हें बिहार के उस साहस की दाद देनी चाहिए, जो गरीब और पिछड़ा होते हुए भी लड़कियों को जिंदा रखता है। ऐसा भी नहीं है कि केवल जिंदा रखता है, इनमें से कई बहुएँ पढी-लिखी भी होती हैं। आज वह उत्तर प्रदेश अपने छोटे भाई काहे जाने वाले बिहार से सबक लेने को तैयार दिखता है।
अगर हम पूरे समाज और बदलाव की समीक्षा करें तो पाते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे कट्टर और सामाजिक कुरीतियों से बंधे प्रदेश में एक नई सोंच आई है। वो किसी भी जाति की शादियों को मंजूर कर रहे हैं। आज जाति-पाति भूल रहे हैं। पिछले दशक में हुए पापों (अपनी बेटियों की हत्याओ) का पश्चाताप कर रहे हैं। अब लड़कियों को समाज का हिस्सा मानकर उन्हें पाल रहे हैं। उन्हें भी किसी ना किसी नजर से अपने बराबर का हिस्सा मान रहे हैं। उन्हें पता चल रहा है कि अगर यह आधी आबादी भी नहीं रहेगी तो बाकी आधी आबादी (मर्द) भी जल्द ही समाप्त हो जाएंगे। एक बार फिर से मैं बिहार के इस जज्बे और प्रयास को सलाल करता हूँ। इसमें एक बात उत्तरप्रदेशियों की भी दाद देने लायक है कि ये लोग इन बहुओं के साथ दहेज-हत्या या महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा जैसे जघन्य अपराध नहीं करते हैं। बहुत प्यार से परिवार संग शामिल कर लेते हैं। आप इसे एक आधुनिक बाजारीकरण या प्रवासीकरण के दौर में एक नए कदम की तरह देख या प्रस्तुत कर सकते हैंइसमें एक बात उत्तरप्रदेशियों की भी दाद देने लायक है कि ये लोग इन बहुओं के साथ दहेज-हत्या या महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा जैसे जघन्य अपराध नहीं करते हैं। बहुत प्यार से परिवार संग शामिल कर लेते हैं।
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