आजकल हम लोग जिधर भी सड़क पर निकलते हैं, तो हर चौराहे, ब्रिज, स्कैईवाक आदि पर कोई ना कोई अपंग बैठा या पड़ा हुआ भीख मांगते हुए दिखाई देता है। भीख देने के मामले में मैं बहुत कट्टर हूँ। इसपर मैने तहलका में प्रियंका दुबे की रिपोर्ट पढी थी। उसमें हमारी आंखे खुल जाती हैं। इस क्राइम को लेकर। लेकिन आज छोटे बच्चे और बूढ़े लोग जो अपंग हैं, उन्हे भी ये गिरोह के लोग खरीद लेते हैं। मैने ऐसे ही एक बच्चे से बात की। वो सान्ताक्रुज में एक ब्रिज पर बैठता है। उसके हाथ कटे हुए थे, या जन्म से नहीं हैं। यह समझ में कम आया। मैने उसे पूछा," बेटा तुम कहाँ रहते हो? तुम्हारे मम्मी-पापा कहाँ हैं? तुम्हारा नाम क्या है?" उसने कुछ भी जवाब नहीं दिया। बहुत प्रयास करने पर भी नहीं बोला. मैं रोज वहाँ से निकलते समय एक-दो रुपए देनें लगा। एक दिन रविवार की दोपहर को जब रास्ता खाली था, तब उसे 5 रुपए देकर वही बाते पूंछी तो वो गुस्सा होकर बोला," मेरे मम्मी-पापा नहीं हैं." मैने पूछा तो कहाँ रहते हो? उसने जवाब दिया," "जावेद भाई के पास" मैंने नाम पूछा तो बताया,"छोटे" मैने पूछा कब से रहते हो यहाँ तो बोला," जब से ध्यान है, तब से" पूछने पर बताया कि वाकोला में एक रूम में हम सब बच्चे लोग रहते हैं। जावेद भाई वहाँ नहीं रुकते हैं। " तब तक एक आदमी आया और उसे देखकर वो बच्चा बोला," आप जाओ यहाँ से" मैं चल दिया। मुड़कर देखा तो उस आदमी ने बच्चे को बहुत डांटा। मैं कुछ नहीं बोला वहाँ से चला आया। कई दिन तक वो बच्चा नहीं दिखा। जब दो-तीन महीने बाद दूसरे ब्रिज से निकला तो वो मिल गया। मैने पूछा," कैसे हो?" बच्चा बोला," आप जाओ उस दिन आपकी वजह से मैनें बहुत मार खाया था। " मैं वहां से चला गया।
पूरा दिन सोंचता रहा क़ि वो कौन होगा? कैसे आया होगा? फिर अपने थोड़े से दिमाग का प्रयोग कर सोंचा क़ि शायद यह जन्म से ऐसा होगा या कुछ दिन बाद हो गया होगा। तभी इसके मां-बाप ने इसे फेंक दिया होगा। कोई नहीं मानेगा क़ि कोई माँ-बाप अपने बच्चे को कैसे फेंक सकते हैं? लेकिन हकीकत हो सकती है। कौन ऐसे बेकार या बोझ बच्चे को रखना चाहेगा? शायद उन्होंने यही सोंचा होगा। तभी यह बच्चा इस गिरोह को मिल गया होगा। अब यही लोग इस बच्चे की मजबूरी से पैसा कमाते हैं। और भी कई तरह के विचार आए, जैसे किडनैप हुआ होगा या खो गया होगा। कुछ क्लियर नहीं हो सका। मैं रात को भी यही सोंचकर काफी चिंतित रहा। आज हमारे सभ्य समाज को इस बात पर हंसी आ सकती है। कोई घिन भी लग सकता है। लेकिन अगर चिंतन करके देखा जाए तो क्या हमारे महान देश की यह हकीकत नहीं है। आपके बच्चे कितने ही बड़े स्कूल में पढ़ते हों. लेकिन देश में यह भी एक हकीकत है। अपने साथ या अपने बच्चों के साथ ऐसा होने का सोचते हो रोएँ खड़े हो जाते हैं। समझ में नहीं आता है. क्या होता या क्या होगा?
हमारा समाज किताबों, मैसेज, वाट्सएप, फ़ेसबुक पर हमेशा ही माँ-बाप की इज्जत बातें करता रहता है। स्कूलों में भी बच्चों को इसपर बहुत कुछ सिखाया जाता है। हम अपने बच्चों को माँ-बाप की इज्जत करने की बात करते हैं। लेकिन अपने बुजुर्गों के साथ क्या करते हैं? अगर कोई ध्यान भी दिला दे तो गुस्सा आ जाता है। एक औरत अपने माँ-बाप से हर महीने मायके जाने की बात करेगी। लेकिन अपने पति के माँ-बाप को भिखारी की तरह व्यवहारित करने लगती है। किसी भी बुजुर्ग की इज्जत तभी तक होती है जब तक उसके हाथ से कुछ लेने का लालच होता है। आप अपना उदाहरण सोंच सकते हैं कि मैं ऐसा नहीं करता हूँ। लेकिन अपने व्यवहार को दूसरे की नजर से देखो तो पता चलेगा? इस मुद्दे पर हाल ही का मेरे साथ हुआ एक उदाहरण पेश करना चाहूंगा।
मेरे घर और ओफ़िस के बीच में में एक चौराहे पर एक 70-80 साल का बुढ्ढा ब्रिज की सीढियों के नीचे सोता हुआ या बैठा हुआ मिलता था। मैं उसे रोज देखता ना वो किसी से पैसे माँगता और ना ही कोई उसे कुछ देता। धीरे-धीरे उसकी स्थिति का अंदाजा मुझे होने लगा था. लेकिन पता नहीं किसी डर से मैं उसकी मदद नही करता था। एक दिन मेरे आगे एक चल रही थी. उसने उसने उस बुढ्ढे को 10 रुपए दे दिए। मैंने भी उस दिन के बाद उसे रोजाना 10-20 रुपए देने शुरु कर दिए। वो पैसे देकर मुझे कुछ खुशी मिलती। एक बार बारिश हो रही थी। वो ब्रिज पर जाना चाहता था। लेकिन सीढियाँ नहीं चढ पारहा था। उस दिन मैने उसकी मदद की और उपर तक उसे सहारा देकर चढ़ा दिया। उसके पास कुछ सामान नहीं था. मैने उसकी जानकारी के लिए कुछ पूछा तो उसने बताया कि वो पूना का रहने वाला है। उसका एक बेटा है. रोते हुए बताने लगा कि मेरी पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। बेटे को मजदूरी करके पढ़ाया था। बैंक में नौकरी लग गई. बैंक में ही काम करने वाली एक लड़की से लव-मैरिज कर ली थी। मैं भी इमोशनल हो गया. आगे उसने बताया कि बहू मुझे कुत्ते की तरह डाँटती थी। बाथरूम जानें नहीं देती थी। खाना नहीं मिलता था तो दवाइयों की क्या बात। कई बार उसके ही कहने पर बेटे ने मारा। तो मैं भाग आया. आगे बताया कि सामने एक छोटा सा रेस्टोरेन्ट वाला ही कुछ खाने को दे देता है। फिर तो एक सिलसिला चालू हो गया। मैने हर दिन 10-20 के अलावा कभी कभी 100-200 देने भी शुरु कर दिए। एक दिन सेलरी वाले दिन 500 दिए. तो अगले दिन देखा तो थोड़े से अच्छे कपड़े और चप्पल कहीं से लाकर पहने हुए था। सच बताउ तो उसके पास 2-4 मिनट से ज्यादा रुकने में शर्म आती थी कि कोई पहचान वाला देख न ले। कुछ ही दिन हुए होंगे. मैं 4-5 दिन के लिए गाँव चला गया। लौटकर आया तो वो मुझे नहीं दिखा। दो-तीन दिन बाद सामने रेस्टोरेन्ट वाले से पूंछा जो उसे खाना देता था। तो उसने बताया अरे वो बुढ्ढा तो एक दिन बीमार हुआ। वहीं पर टट्टी-पेशाब करके पड़ा रहा। मैंने बी.एम.सी. वालों को बोला तो वो लोग अस्पताल ले गए। बाद में वहीं से एक आदमी उसका पता या कोई पहचान वाला पूछने आया था। मैंने कहा नहीं पता तो बताया कि वो मर गया था। फिर बी.एम.सी. वालों ने ही जला दिया होगा। सुनकर मैं बहुत चिंतित हो गया। ओफ़िस तो गया लेकिन मन नहीं लगा तो दोपहर से वापस आ गया। पूरा दिन सोंचता रहा। रात को बहुत कोशिश की तब जाकर 3 बजे नींद आई। दो-तीन दिन वहाँ से निकलते हुए सब सुना लगा। फिर धीरे-धीरे मन से उसकी तस्वीर भी ओझल हो गई। आखिर वो कौन था मेरा. बाकी घिसी-पिटी पुरानी बातें और प्रवचन देकर क्या फायदा?
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