पत्रकार समाज का आइना होता
है। यह
कहावत किसी
ने बहुत
सोंचकर आज
के कई
साल पहले
कही होगी।
लेकिन आज
के पत्रकार
जिसतरह से
पत्रकारिता करते हैं। उससे तो
डर ही
लगता है।
हमारे देश
में पत्रकारों
या मीडिया
की तरफ
चुनावों के
समय ही
ध्यान से
देखा जाता
है। खासकर
टीवी मीडिया
के आगे
प्रिंट मीडिया
की तो
कोई तारीफ
ही नही
करता है।
उसमें भी
जितने टीवी
पत्रकार हैं
वो सबके
सब सनसनी
खेज या
ट्वेंटी-20 टाइप पत्रकारिता करते हैं।
पता चला
किसी भूकंप
के समय
मर रहे
लोगों से
भी पूंछते
हैं कि
उस समय
का नजारा
कैसा था?
कुछ तो
किसी भी
घटना को
इंडियन मुजाहिद्दीन
से जोड़
देते हैं।
हमारे दिमाग
में मीडिया
के प्रति
एक खास
तरह की
छवि बन
गई है।
इसके उलट
प्रिंट मीडिया
में बहुत
सारे ईमानदार
और काबिल
पत्रकार हुए
हैं। मैने
टीवी पत्रकारिता
को तीन
साल पहले
से ही
देखना शुरु
किया था।
बहुत दिनों
बाद कोई
अच्छा पत्रकार
मिला। उसका
नाम है
रवीश कुमार।
ठेठ हिन्दी
बोलने वाला
बिहारी युवक।
आज के
ग्लैमर और चकाचौंध से
बिल्कुल दूर। जो
मुझे प्राइम
टाइम बहस
में दीपक
चौरसिया या
अर्नब गोस्वामी
की बनाई
गाइडलाइन्स से अलग दिखा। मैने
इन्टरनेट पर
रवीश के
बारे में
बहुत सर्च
किया। बहुत
सारी पुरानी
रिपोर्ट देखी।
उनका ब्लॉग
कस्बा लगभग
पूरा ही
पढ डाला।
बस फिर
क्या था
मैं रवीश
कुमार का
फैन बन
गया। नौ
बजते ही
NDTV खोलकर बैठ
जाता, रवीश नही आते
तो खाना
नहीं अच्छा
लगता था।
इसमें NDTV का
कोई बड़ा
योगदान सिवाय
इसके कि
वो रवीश
को पूरी
आजादी देते
हैं, के
कुछ भी
नही है।
क्योंकि NDTV के अन्य पत्रकारों की पत्रकारिता भी
हमने बहुत
देखी है,
जो सबसे
कुछ ही
हटकर कही
जा सकती
है। चुनाव
कवरेज के
समय सभी
टीवी पत्रकार
किसी मशहूर
शहर, राष्ट्रीय पार्टी के कार्यालय या
किसी बड़ी
जगह जाकर
लोगों की
रायशुमारी करते हैं। कुछ तो
जनता के
बीच में
नेताओं की
खुली बहस
भी कराते
हैं। रवीश
कुमार ने
मोदी बनाम
राहुल की
जंग से
निकलकर पूरे
उत्तर भारत
का दौरा
किया। कई
छोटी-बड़ी
सीटों पर
जाकर अदभुत
रिपोर्टिंग की। इसका सफर चालू
हुआ, गाज़ियाबाद
की साठा-चौरासी की
हिन्दू-मुस्लिम
संस्कृति से।
अलीगढ़ मुस्लिम
यूनिवर्सिटी के मुस्लिम युवाओ से
बात की।
हर समय
मध्यम वर्ग
से लेकर,
मजदूर और
गरीब तबके
के बीच
मे जाकर
उनकी समस्याएं
उठा। गाज़ियाबाद
और नोएडा
में मज़दूरो
के अस्पताल
और घरो
मे जाकर
रिपोर्टिंग की। जिसे देखकर आम
आदमी पार्टी
ने कुछ
मुद्दों को
अपने घोषणापात्र
में सामिल
भी किया।
पंजाब की
विरासत में
दलित राजनीति,
नशे का
प्रभाव और
ना जाने
कितने अहम मुद्दे
उठाये। हरियाणा
मे योगेन्द्र यादव की सीट गुड़गाँव के साथ-साथ किसानो
और खाप
पंचायतों पर
भी सकारात्मक
रिपोर्टिंग की। लुधियाना, चण्डीगढ़ और अमृतसर में
राजनीति के
साथ-साथ
स्थानीय मुद्दो
को दिखाया।
जिसमे प्रवासियों
पर की
गई रिपोर्टिंग
बेस्ट थी।
उत्तर प्रदेश
की राजनीति
को समझटने
और देश
(जिसे मोदी
लहर या
सुनामी दिखती
है) को
दिखाने के
लिये मैनपुरी,
पश्चिमी उत्तर
प्रदेश और
इलाहाबाद की
तरफ कई गावों मे
जाकर रिपोर्टिंग
की। दलितों के गावों मे मायावती
का आधार
दिखाना, यादवो
में मुलायम
सिंह, और
ब्रम्हानो के गांव मे भाजपा
के समर्थन
को समझाया।
कुशवाहा, दलित,
कुर्मी, मुस्लिम
गांव में
जाकर हर
जगह उनकी
बाते सुनना। गावों की
अनपढ औरतों
के बीच
में बात-चीत
करना भी
बहुत अच्छी
बात थी।
मथुरा मे किसानों के
मुद्दो पर
बहुत अच्छी
चौपाल लगाई।
जिस समय
मे देश
का सारा
मीडिया केवल
बनारस मे
पड़ा है।
उस समय
रवीश कुमार
कैसे बच
सकते थे।
लेकिन वो
बाकी सबकी
तरह केवल
अस्सी घाट, BHU (बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी) और पान की
दुकानो पर
ही नही
पड़े रहे।
रवीश ने गावों का
दौरा किया,
जिसमे उन पिछड़े गावों
को दिखाया,
जो बनारस
का हिस्सा
होते हुए
भी अलग-थलग पड़े
हैं। उन
जगहों पर
लोग मोदी और केजरीवाल
का नाम
तक नही
जानते थे। BHU में
लेफ्ट, दक्षिणपंथी और समाजवादी
विचारधाराओ के बीच सार्थक बहस
कराई। मेरा
सबसे प्रिय
एपिसोड तो
वह था
जब उन्होने
मेरे प्रिय
लेखक मुंशी
प्रेमचन्द
के गाँव
लमही को
राजनीति से
उपर उपर
उठकर ऐतिहासिक और साहित्यिक
रूप से
दिखाया। मुंशी प्रेमचन्द जी
के भक्त
दुबे जी
की पीड़ा
देखकर मेरा
भी दिल
रो पड़ा।
इसके बाद
एसिया के
सबसे बड़े गाँव गहमर
(ग़ाज़ीपुर) मे रिपोर्टिंग की। जहा
से हर
साल 3-4 सौ
लोग फ़ौज
मे भरती
होते है।
पूरे गाँव में हर एक
घर से
एक-दो
आदमी फ़ौज
मे होगे।
वहा की संस्कृति, इतिहास और
युवाओ का
देश के
प्रति जोश व समर्पण
देखकर दिल
खुश हो
गया।
फिर प्रवेश
किया अपने
गृह राज्य
बिहार मे।
जहा लालू
प्रसाद यादव
और नीतीश
कुमार की
रैलियों को
कवर किया।
इसके पहले
भी रवीश
ने मोदी,
राहुल, मुलायम,
अखिलेश और
मायावती की
रैलियों को
कवर किया
था। लेकिन
यहा की
रैलियाँ मोदी
और राहुल
की रैली
से बिल्कुल
अलग थी।
या कहें तो देशी ठेंठपन था।रवीश ने उन रैलियों से अलग इन्हें दिखाया, जिनपर करोड़ो रुपए खर्च किए जा रहे हैं। जिनमें हजारों पीएसी और पुलिस के जवान होंते हैं। बयाया कि
यहा पर
नेताओं के
मंच पर
जाना कितना
आसान है।
कितने कम
खर्च मे रैलियाँ हो
रही हैं।
कितना कम
मीडिया कवरेज
मिल रहा
है। और
कितनी शांत
भीड़ होती
है, जो
मोदी या
राहुल की
भीड़ से
अलग होती
है। इन
रैलियों में
गरीब आदमी
अपना काम
करके आता
है। खाना
भी साथ
लाता है।
जिसे कैमरे
के सामने
बोलने मे
शर्म आती
है। ऐसा
ही मायावती
के साथ
भी था।
फिर रवीश
वापस आते
हैं बनारस
की जंग
में जहा
वो केजरीवाल
और मोदी
के प्रचार
को ठीक
से समझते
हैं। खास
कर केजरीवाल
के साथ
रोडशो कवर
करना। एक
दिन योगेन्द्र
यादव (AAP), रामेश्वर चौरसिया (BJP)
और SP, कांग्रेस अन्य
दलों के
नेताओं से
अलग तरह
की बहस
भी करते
हैं। जिसमे कई विचारधारात्मक
और अत्यंत
शांतिपूर्ण बाते होती हैं।
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