ये 2014 के चुनाव
बहुत दिलचस्प
हो रहे
हैं। पूरा देश इसका
दो साल
पहले से
इन्तेजार कर
रहा था। पूरा
मीडिया इस
लड़ाई को
मोदी बनाम
राहुल बता
रहा था। लेकिन
मुझे तो
उम्मीद के
मुताबिक कुछ
कम मजा
आ रहा
है। अगर अरविन्द केजरीवाल
इसमें ना
कूदे होते
तो और
भी बोरिग लड़ाई
होती। यह कैसा युद्ध
है कि
एक सेना
ने दूसरी
सेना के
116 सिपाही अपनी सेना मे शामिल
कर लिए। इस लड़ाई के
कमजोर होने
के कुछ
और भी
कारण हो
सकते हैं। पहला
तो यह
कि यह
लड़ाई भाजपा
माफ करिए
मोदी बनाम
अन्य दल
है। कोई मुख्य विपक्षी
दल नही
है। कांग्रेस
तो बिल्कुल
मरी हुई
नजर आ
रही है। अन्य
दलों के
पास जनता
के सरकार
बनाने के
सवाल का
कोई मजबूत
जवाब नहीं
है। तीसरा मोर्चा भी
बना या
नहीं कहा
नहीं जा
सकता है। अर्थात
भाजपा अकेले
ही सरकार
बनाने का
दवा पेश
कर रही
है। आम जनता भी
यही मान
कर चल
रही है। मीडिया
भी मोदी
से इंटरव्यू
के दौरान
ऐसे ही
सवाल पूंछ
रहा है
की जैसे
वो भारत
के भविष्य
के प्रधानमंत्री
से बात
कर रहे
हैं।
यहाँ तक कि
निराश कांग्रेसी
नेता भी
ऑफ द
रिकॉर्ड यह
बात मानने
को तैयार
हैं। दरअसल शुरु से
ही भाजपा
की रण
नीति अधिकतम लाभ
और कांग्रेस
की न्यूनतम
हानि की
ही थी। कांग्रेस
से अच्छा
तो कुछ
क्षेत्रीय दल लड रहे हैं। जैसे
आम आदमी
पार्टी या
जेडीयू ने
अपनी पूरी
प्रतिष्टा दांव पर लगा दी
है। लोग इन दलों
के बारे
मे कह
रहे हैं
की शायद
16 मई के
बाद इनकी
जगह राजनीति
में नहीं
बचेगी अर्थात इनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। खैर 16
मई तक
इन्तेजार कर
लेते हैं।
सात
चरणो के
चुनाव हो
चुके हैं
और केवल
दो के
ही बचे
हैं। जिनमें यूपी और
बिहार की
कुछ महत्वपूर्ण
सीटें बची
हैं।
ऐसे में कांग्रेस
के अलावा
गैर NDA
सहयोगी दल
अपनी पूरी
ताकत लगा
रहे हैं। उन्हे
अब सबसे
पहले से
ज्यादा यकीन
हो गया
है की
मोदी लहर
नही है।
मुलायम
सिंह और
लालू प्रसाद
यादव खुलकर
इन्टव्यू दे
रहे हैं। खूब
रैलियाँ हो
रही हैं। इसी
के साथ
भाजपा के
भी कुछ
नेताओ को
लगने लगा
है की
तथाकथित मोदी
लहर नही
है। उन्हें
अपने मिशन
272+ की हकीकत पता चल रही है। तभी
तो राजनाथ
सिंह और
अरुण जेटली NDA के
सहयोगी तलाशने
मे जुट
गये हैं। अब
आडवाणी को
भी अपनी बड़ी
भूमिका नज़र
आने लगी
है। एक तरफ मोदी
ममता बनर्जी
पर हमला
करते है,
वही राजनाथ
उन पर डोरे
डालते नजर
आते हैं। इस
मौसम में कुछ छोटे दल (एक
दो सांसद
वाले) या
नेता बरसाती
मेंढकों की
तरह अपने
लिये इस
सरकार में
कोई मंत्री पद भी
तलाश रहे
हैं।
ध्यान देने वाली
बात है
की मोदी
भी अब
अपनी रणनीति को
बदलने लगे
हैं। अब वो विकाश
के नारे
के साथ-साथ हिन्दुत्व
कार्ड भी
खेल रहे
हैं। असम में बंगालदेशियों
पर दिये
गये बयान
के बाद
हिंसा भड़कना
इसी रणनीति का
हिस्सा हो
सकता है। आज
ही फ़ैज़ाबाद
की रैली
में मंच
पर भगवान
राम की
तस्वीर लगाना
और फिर
राम राज्य
की बात
करना भी
यही है। उनका यूपी बिहार
में पिंक रिवोल्यूशन के जरिये सरकार पर
हमला भी
इमोशनल हिन्दुत्व
का एजेंडा
ही था। ऐसे
में अमित शाह का आजमगढ में
आतंकवाद पर
दिया गया
बयान भी
वहां के
हिन्दुओ को
एकजुट करने
के लिए
ही था। सभी
दल अंतिम
समय में
अपने –अपने
प्रचार में
पूरी उर्जा
लगा रहे
हैं। वहीं मोदी अमेठी
जाकर पिछड़ी जाति का कार्ड खेल रहे हैं। इसमे
मजे की
बात है क़ि कांग्रेस
भी केवल
अमेठी ही
जीतकर विपक्ष
की तैयारी
करने लगी
है। पिछले
एक हफ्ते से बनारस
की लड़ाई
कांटे की
होती जा
रही है। अब यह
कोई नही कह सकता है क़ि मोदी 2-3 लाख वोटों से जीत रहे हैं। मैच 50-50 हो चुका है। भाजपा को भी अब कुछ डर सता रहा है, तभी तो उसके बड़े
नेता और संघ का कैडर अब काशी में डेरा डाले हुए है। मुख़्तार आंसारी के समर्थन के बाद भी मुस्लिम अजय राय (कांग्रेस) के नही केजरीवाल के साथ है।
अपना दल के कुर्मी वोटर और सपा
के यादव वोटर का एक बड़ा तबका केजरीवाल से जुड़ गया है। अतः यह नही कहा जा सकता है क़ि मोदी जीत चुके हैं
या केजरीवाल की जमानत जब्त है। 16 मई आते-आते
अभी लड़ाई और भी टक्कर की होगी। बनारस ही नही
पूरे देश में। सुना तो यहाँ तक है की अब मोदी
जी बनारस में 4-5 दिन तक रुकने वेल हैं। अगर
ऐसा होगा तो यह केजरीवाल का प्रभाव या डर ही होगा।
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