Thursday, May 1, 2014

साईनिंग इंडिया का मजदूर

आज मई दिवस है महाराष्ट्र में इसे महाराष्ट्र दिवस के रूप में भी मनाया जाता है इस वर्ष यूपी में अखिलेश यादव सरकार ने आज के दिन परशुराम जयंती के रूप में छुट्टी रखी है इसे तो वोटों के लिए उठाया कदम ही कहा जाएगा अगर मैं दिवस की बात करूं तो दो साल पहले तक मैं इसके बारे में कुछ भी नहीं जानता था क्योंकि हमारे उत्तर भारत की शिक्षा व्यवस्था में इस पर कुछ भी नहीं पढ़ाया जाता है खैर जब से कुछ समझदार हुआ और इसपर नजर डाली, तब से भारत के कम्युनिस्टों के इतिहास पर ध्यान देने का बहुत शौक हो गया इसी बहानें मजदूरों की समस्याओं पर भी ध्यान गया जो आज तक जैसी की तैसी बढ़ती ही जा रही हैं कोई भी समाधान नहीं हो पाया. आज मजदूरों की हालत इतनी खराब है कि बेचारे प्रवासी मजदूर 4-5 हजार रुपए की नौकरी में अपना परिवार किसी 10-10 के टूटे-फूटे कमरे में रखने को मजबूर हैं ठेकेदारी प्रथा इतनी प्रबल हो चुकी है कि मजदूरों को उनकी न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती है
इन समस्याओं को उठाने का ठेका या जिम्मा लेने वाले कम्युनिस्ट अब इन समस्याओं से भागते नजर आ रहे हैं आखिर क्यों इतने सालों बाद भी मजदूरों के यूनियन उनकी समस्याओं को सुलझा नहीं पाए क्या आज ये आन्दोलन उतनी उंची आवाज में आज भी चल रहे हैं? मुझे तो ऐसा नहीं लगता है यह आन्दोलन एक मात्र राजनैतिक रूप में सत्ता पक्ष के विरोध के रूप में ही होते रहे देश में जब कभी भी इन पार्टियों को मौका मिला तो ये बातें ट्रेड यूनियन के रजिस्टर तक ही बंद होकर रह गईं देश में वाम दल इतना ज्यादा लेफ्ट चले गए कि वो भारतीय राजनीति से ही लेफ्ट में पहुंच गएआज आम जनता ही इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने लगी विचारधारात्मक आधार पर भी मार्क्सवाद को वह प्रचार प्रसार नहीं मिल पाया जो भारत जैसे बड़े और असमानता भरे देश में मिलना चाहिए था जहाँ मजबूत हुए भी वहाँ अब इनकी धार भोथरी पड गई हैपूर्वोत्तर के कई राज्यो में इन्हें सत्ता में आने का भी मौका मिला लेकिन कुछ भी छाप नहीं छोड़ पाए प. बंगाल जैसे बड़े राज्य मे तो इन्हें लगभग 35 साल तक राज करने का मौका मिला लेकिन कोई भी विकास मॉडल नहीं मिल पायाजैसा आजकल मोदी गुजरात मॉडल देश को दिखा रहे हैं क्यों आज कम्युनिस्ट यह नहीं कहते हैं क़ि हम अपने बंगाल मॉडल के नाम पर वोट मांग रहे हैंहमेशा ही उस समय की बड़ी गलतियाँ छिपाने में लगे रहते हैं राजनीतिक रूप से नब्बे के दशक के अंत में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री ना बनाना भी इनकी एक बहुत बड़ी गलती रही है उसके बाद तो पूर्वोत्तर में भी यह कमजोर पड़ते गए. उसके पहले ये लोग कई दक्षिण भारत के राज्यों में अपनी ताकत खो चुके थे इस आन्दोलन को कमजोर पड़ने का कारण नक्सलवाद भी माना जा सकता है मुझे नहीं मालूम कि नक्सलियों और मार्क्सवादी पार्टियों में क्या सम्बंध हैं? लेकिन यह तो सबको पता है कि विचारधारा एक ही है, केवल ये सत्ता और आन्दोलन दोनो चाहते हैंवहीं नक्‍सलवादी केवल आन्दोलन में विश्वास रखते हैं उन्हें शासन व्यवस्था पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है इससे पूर्वोत्तर की आम जनता खासकर निर्दोष आदिवासियों को बहुत नुकसान उठाना पड़ा हैविचारधारा के अधार पर देश में विफलता का दोष इन्हीं का है खासकर इनकी कट्टरता पूरे विश्व में कम्युनिस्टों ने समय के हिसाब से अपने आपको बदला है लेकिन इनकी नीतियाँ आज तक वही रहीं जो 60 साल पहले थी हाल ही में मीडिया ने भी खासकर टी. वी. मीडिया ने इनके प्रति उदासीनता दिखाई है इसका कारण है कि इनके मालिक सबके सब उद्योगपति ही हैंकहते हैं कि 2011 में अन्ना आन्दोलन के समय ही एक बड़ा आन्दोलन राम लीला मैदान में कम्युनिस्टों ने भ्रष्टाचार और मंहगाई के विरोध में किया था लेकिन किसी ने भी उसे कवर तक नहीं किया था इसके साथ-साथ हमारे समाज का भी एक बड़ा तबका है जो अब तक सामन्तवादी विचारधारा या मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है फिर से हम आते हैं मजदूरों के मुद्दे पर. देश में चुनाव का समय है सभी प्रमुख दलों के घोषणा पत्रों को मैने ध्यान से पढ़ा है, जिसमें पाया कि किसी ने भी मजदूरों की समस्याओं को उठाने का जरा सा भी प्रयास नहीं किया कम्युनिस्टों का तो एक मात्र हथियार यही है. लेकिन आम आदमी पार्टी ने जरूर कुछ मुद्दों को उठाने की कोशिश की है लेकिन इस पार्टी पर भी विश्वास करना बहुत मुस्किल होगा क्योंकि शुरुआत तो सपा, बसपा, लालू और ना जाने कितने दलों ने भी इसी तरह की थीलेकिन सत्ता में आने के बाद सब कैसे बदले वह किसी से भी छुपा नहीं हैबाकी तो सबने केवल दो-दो लाइनों में मजदूरों के विकास की बात कह दी है 
आज देश का सबसे बड़ा मजदूर वर्ग जो सबका बोझ उठाता है, वह खुद बोझ समझा जा रहा है लेकिन इनकी तरफ़ मीडिया, सिविल सोसायटी और सरकारों की नजर नहीं जाती है राजनैतिक दलों का ध्यान  चुनावो के समय जाता  भी है, तो अपने मतलब के लिए देखते हैं कब भारत बदलेगा, स्मार्ट सिटी बनेंगी, साईनिंग इंडिया, स्वराज और हर हाथ शक्ति या तरक्की आएगी? फिर भी ध्यान से देखना पड़ेगा कि क्या मजदूर इस विकास में सामिल हैं या नहीं?

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