Thursday, May 29, 2014

क्या अनुच्छेद 370 पर हो रही बहस जायज है?

मोदी सरकार ने पहले दिन ही एक विवादास्पद मुद्दे अनुच्छेद 370 पर बहस छेड दी है। इसपर हर राजनैतिक पार्टी और नेता अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन आम जनता में बहुत ही कम लोग होंगे जिनको इसके बारे में कुछ पता होगा। इसके पहले भी यह मुद्दा बहुत बार गर्म बहस करवाता रहा है। लेकिन भाजपा अपने सहयोगियों के डर से कुछ नहीं कर पाई लेकिन इस बार पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद इसपर कुछ ना करना जनता के बीच एक गलत संदेश लेकर जाएगा। अगर हम इसके ऊपर कुछ सार्थक बहस करने की कोशिश करें तो पता चलता है कि राजनैतिक दल खासकर भाजपा और नेसनल कान्फ़्रेंस हमेशा ही इसपर राजनैतिक रोटियाँ सेंकते रहे हैं। गौरतलब है कि अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर को एक अलग राज्य का दर्जा देती है। इसे समझने के लिए हमें जम्मू कश्मीर के इतिहास की ओर जाना होगा। सन् 1947 ई। में जब भारत आज़ाद हुआ तब जम्मू कश्मीर के महाराजा हरीसिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे। जम्मू कश्मीर के निवासी (हिन्दू+मुस्लिम) वो लोग थे जो जिन्ना के पाकिस्तान में नहीं जाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर के भारत में विलय की सन्धि (एक अधिमिलन पत्र) पर हस्ताक्षर किए। जम्मू कश्मीर की पहली अंतरिम सरकार (नेशनल कांफ़्रेस) के सेख अब्दुल्ला ने भारतीय संविधान सभा से बाहर रहने का प्रस्ताव रखा था। तब गोपालास्वामी आयंगर ने संविधान सभा के सामने 17 अक्टूबर 1949 जम्मू कश्मीर के लिए एक अलग कानून (जो जम्मू कश्मीर को विशेषाधिकार देता है) प्रस्तुत किया। फिर 1951 में राज्य को अलग से संविधान सभा बुलाने की अनुमति दी गई। 1956 में इस संविधान का काम पूरा हुआ और 26 जनवरी सन् 1957 को यह विशेष संविधान लागू कर दिया गया। यह कानून तो भाजपा (जनसंघ) के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौजूदगी में हुआ था, जिन्होंने इसका समर्थन भी किया था, जो उस समय की अंतरिम सरकार के कैबिनेट मंत्री भी थे। मुखर्जी ही क्या एक व्यक्ति (हसरत नोवानी साहब) को छोड़कर सभी ने इसका समर्थन किया था। मुखर्जी का पूरा का पूरा विरोध प्रजा परिषद आन्दोलन की वजह से हुआ था, जब सेख अब्दुल्ला सरकार ने 1952-53 में भूमि सुधार कानून शुरु किए थे। अनुच्छेद 370 की वजह से राज्य की जनता का फायदा हुआ या नुकसान यह आप (भाजपा या संघ ) कैसे तय कर सकते हैं। यह तो वहाँ की जनता ही बताएगी ना ?
इस संविधान के प्रावधानों के मुताबिक भारतीय संसद जम्मू-कश्मीर के लिए रक्षा, विदेश और संचार से जुड़े मामले पर कानून पास कर सकती है। लेकिन इसके अलावा कोई भी कानून जम्मू-कश्मीर सरकार की अनुमति के बिना पास नहीं हो सकता है। इस कानून के तहत जम्मू-कश्मीर पर अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) नहीं लागू की जा सकती है। भाजपा इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा 1976 के शहरी भूमि कानून लागू नहीं होने का आरोप लगाती है। अर्थात् कोई भी नागरिक सभी विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों की तरह यहाँ भी जमीन नहीं खरीद सकते हैं। लेकिन यह अनुच्छेद 370 का ही एक निर्णय नहीं है। जम्मू-कश्मीर के हिन्दू राजा हरी सिंह ने जब सन्धि (एग्रीमेन्ट) पर हस्ताक्षर किए थे तभी यह बात उसमें लिखी थी कि इस राज्य में कोई भी बाहरी व्यक्ति जमीन नहीं खरीद सकेगा, आज भी यह कानून डोमिनीयन एक्ट के रूप में मौजूद है, जो जमीन-जायदाद से जुड़े मामले हल करता है। कुछ लोग इस कानून को 100 साल पुराना मानते हैं, जब अनुच्छेद 370 नाम की कोई चीज भी मौजूद नहीं थी। इसे डोगरा महाराजाओं के वक्त लागू किया गया था। तभी तो अनुच्छेद 370 में भी यह प्रावधान किया था। अगर भाजपा इसे ही मुद्दा बना रही है तो ऐसे विशेष कानून तो कई अन्य राज्यों नागालैंड, मणिपुर यहाँ तक क़ि गुजरात महाराष्ट्र और गोवा आदि में भी मौजूद हैं। वैसे जमीन खरीदने को लेकर छत्तीसगढ़, हिमांचल प्रदेश और अंडमान निकोबार में ऐसे कानून हैं, जिनके अनुसार किसी बाहरी राज्य का व्यक्ति वहाँ जमीन नहीं खरीद सकता है। वैसे तो आप हमेशा ही भारत की एकता में अनेकता की बात तो करते हैं। जैसे भाषा, जाति, धर्म, रहन-सहन, संस्कृति, मौसम, जंगल और प्राकृतिक दशाएँ, तो क्या ऐसे देश में एक जैसा कानून थोपा जा सकता है। यह बात तो बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने कही थी कि, "हमारा देश बहुत असमानता भरा है ऐसे में भाषा जाति और संस्कृति के अनुकूल विधि होना अवश्यक है।"
अब अगर हम फिर से अनुच्छेद 370 पर वापस आ जाएँ तो अस्सी के दशक के बाद इसमें कोई बड़ा मुद्दा नहीं दिखाई देता है। यह अनुच्छेद केवल वहाँ के लोगों, सरकार और केन्द्र रिश्ते पर केवल एक लकीर मात्र रह गई है। इसका वजूद पिछले सालों में बहुत कम हो गया है। 1953 में गुलमर्ग में सेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के बाद शुरु इस अनुच्छेद को समेटने का सिलसिला चलता रहा। जम्मू-कश्मीर सरकार के सलाहकार रहे हसीब ड्रबू तो इसे भूसा बताते हैं, जिसका बीज पूरी तरह से निकाल लिया गया है। उनके एक लेख से पता चलता है कि इसकी 395 अनुच्छेदओं में से 260 अनुच्छेदएँ ऐसी हैं जो भारतीय संविधान की अनुच्छेदओं ने पूरी तरह से खत्म कर दिया है। बाकी बची 135 अनुच्छेदएँ भी भारतीय संविधान से ही मेल खाती हैं। इस संविधान के विषय में 1975 में जारी हुआ दूसरा संसोधन ही वह तीर था जिसने अनुच्छेद 370 के अस्तित्व को बहुत हद तक नष्ट कर दिया है। इसके द्वारा बहुत से विशेषाधिकार जम्मू-कश्मीर से छीन लिए गए। जैसे जम्मू-कश्मीर के विधानमंडल द्वारा राष्टपति की तर्ज पर राज्यपाल की नियुक्ति। पहले इसे राष्ट्रपति ही कहा भी जाता था। मुख्यमंत्री को भी पहले प्रधानमंत्री (सदर ए रियासत) कहा जाता था। जो अब बदलकर अन्य राज्यों की तरह हो गया है। पहले जम्मू-कश्मीर विधानमंडल ही चुनाव आयोग की नियुक्ति करते थे। अब उनका वो अधिकार भी समाप्त हो गया है। अब जम्मू-कश्मीर विधानमंडल इस संविधान में कुछ भी संसोधन नहीं कर सकते हैं। इसमें सबसे ज्यादा हिन्दुत्ववादी एक मुद्दा भी तक उठाते हैं, वो है यहाँ का अपना राष्ट्र ध्‍वज जो अब नहीं है। अब सरकारी झंडा ही जम्मू-कश्मीर का भी राष्‍ट्रीय ध्‍वज है। पहले जम्मू-कश्मीर के लोग भारत के नागरिक नहीं थे, लेकिन अब वो हैं। पहले देश के अन्य हिस्सों के नागरिकों को जम्मू-कश्मीर जाने के लिए परमिट की जरूरत होती थी, और उनका सामान कस्टम बैरियर से होकर जाता था। अब यह व्यवस्था पूरी तरह से खत्म कर दी गई है। जम्मू-कश्मीर के लोगों को अब देश की एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए अनिवार्य रूप से आदेश दिए गए हैं। पहले जम्मू-कश्मीर के लिए संसद केवल केन्द्र सूची के विषयों पर ही कानून बना सकती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। पहले उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार सिर्फ अनुच्छेद 131 (केन्द्र और राज्य विवाद) तक ही सीमित था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ना केवल राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए हर कानून की समीक्षा कर सकती है, बल्कि राज्य सरकार द्वारा उठाए गए किसी भी प्रशासनिक कदम की न्यायिक समीक्षा भी कर सकती है।
इस विषय पर वहाँ की सिविल सोसाइटी और अलगाववादी तो मानते हैं कि इसे रखने या ना रखने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि अगर यह अनुच्छेद खत्म होती है तो केन्द्र और राज्य के सम्बंधों के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को लेकर एक नई बहस करानी होगी। उनका कहना बिल्कुल सही और संवैधानिक है। लेकिन हिन्दी मीडिया उनकी बात का अनुवाद गलत तरीके से कर रहा है। मीडिया कहता है कि उमर अब्दुल्ला कह रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रह जाएगा। जबकि वो एक संवैधानिक बात कह रहे हैं। मुझे ही नहीं कई बड़े संविधान विद्वानों को ऐसा लगता है क़ि इसके लिए फिर से एक अलग संविधान सभा बिठाई जाए, तभी कुछ निर्णय निकल सकता है। यह कहना भी बिल्कुल गलत होगा कि इस अनुच्छेद में जम्मू-कश्मीर के लिए कुछ नहीं बचा है। यह अनुच्छेद अब भी कुछ अर्थों में जम्मू-कश्मीर को अलग राज्य का दर्जा देती है। यह राज्य और केन्द्र के सम्बंधों के लिए अति-आवश्यक है। इसके होते हुए कोई भी केन्द्र सरकार अपने मनमाने ढंग से कोई परिवर्तन नहीं कर सकती है। लेकिन अगर कोई संसोधन राज्य/ देश हित में करना आवश्यक ही हो जाए तो इसके लिए बहुत आसान प्रक्रिया राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से होती है। भाजपा इस मुद्दे पर एक बात कह रही है कि इसकी वजह से राज्य का विकास रुका हुआ है। लेकिन यह कहना गलत होगा। इसकी वजह से ही कई कानून इस राज्य में सबसे पहले बनाए गए। जैसे जवाबदेही कमीशन जो केन्द्र के आर टी आई से बाद में पास हुआ और कई मामलों में केन्द्र के कानून से बेहतर है। इसके डायरे में राज्य का मुख्यमंत्री भी आता है। राज्य में भूमि-सुधार को लेकर बहुत सारे कानून पास हुए। यही कारण है कि पूरे देश से किसानों की आत्महत्या की खबरें तो आती हैं लेकिन जम्मू-कश्मीर से नहीं। यह सब इन्हीं कानूनों जरिए हुआ है। अनुच्छेद 370 की वजह से ही जम्मू कश्मीर के बड़े काश्तकारों की जमीने लेकर सरकार ने भूमिहीनों को बांटी. जम्मू कश्मीर एक मात्र राज्य है, जहाँ भूमिहीन मात्र 2% ही हैं। पूरे देश में गरीबी लगभग 26-27% है लेकिन जम्मू कश्मीर में मात्र 3-4 % ही है. इसके पीछे अनुच्छेद 370 का ही तर्क दिया जाता है। भाजपा और संघ इस मामले में आरक्षण का मामला उठाती है। इनका कहना है कि अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू कश्मीर में अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी आरक्षण लागू नहीं होता है। लेकिन हकीकत यह है कि यहाँ भी अनुसूचित जाति जनजाति आरक्षण 8% है, जो कि अन्य राज्यों के 22.5% से बहुत कम है। लेकिन राज्य सरकार का तर्क है कि यह आरक्षण अनुसूचित जातियों की जनसंख्या के प्रतिशत के अनुपात में है। ओबीसी आरक्षण एक मुद्दा है लेकिन यह भी 2% तो लागू ही होता है। इसके लिए उमर अब्दुल्ला सरकार ने 2012 में इसे 27% करने की सिफारिस की थी। जो राष्ट्रपति ने नहीं पारित किया था. अभी भी इसके लिए एक आयोग जाँच और काम कर रहा है। लेकिन इसमें कहीं भी यह नहीं दिखता है या सामने आया कि यह आरक्षण अनुच्छेद 370 की वजह से नहीं पारित हो पाया। मोदी जी ने महिला अधिकारों की बात भी की थी इस मुद्दे पर। लेकिन उन्हें अक्टूबर 2012 का सुप्रीम कोर्ट का वह निर्णय पढ़ना चाहिए जो कहता है क़ि राज्य से बाहर शादी करने के बाद भी किसी लड़की की राज्य की नागरिकता समाप्त नहीं होती है। अगर नागरिकता बनी रहती है तो बाकी के भी अधिकार तो सुरक्षित ही हुए ना? लेकिन इसके पहले भी बहुत रिसर्च करने पर यह नहीं पता चला कि इसका सम्बंध अनुच्छेद 370 से भी कुछ है। यह राज्य सरकार के एक ओर्डर पास करने के कारण था जो कि अब खत्म हो चुका है। अब इसमें एक और नई बहस हो रही है कि क्या इसे खत्म किया जा सकता है। तो इसके जवाब के लिए हमने संविधान और गूगल पर बहुत कुछ देखा लेकिन कुछ नहीं मिला। कुछ लोग कहते हैं कि राष्ट्रपति के द्वारा इसे खत्म किया जा सकता है। कुछ कहते हैं कि जम्मू कश्मीर सरकार की भी इसमें सहमति होगी।   कुछ लोगों (उमर अब्दुल्ला सहित) का कहना है कि इसे संविधान सभा ही खत्म कर सकती है। लेकिन वो तो कब की भंग हो चुकी है। अगर आपको इसपर फिर से चर्चा करनी है तो फिर से एक संविधान सभा भी बनानी पड़ेगी. क्योंकि पूरे देश के हर राज्य के लिए एक संविधान सभा थी, वहीं जम्मू कश्मीर के लिए एक अलग संविधान सभा बनाई गई थी। कुछ लोग इसे एक कानून तक नहीं देखते हैं इसके लिए इसके अस्तित्व पर भी नजर डालनी चाहिए। जो कि 1952 में हुआ सेख अब्दुल्ला और जवाहर लाल नेहरू के एग्रीमेन्ट की ओर ध्यान ले जाता है। प्रचार कैसे लोगों को गुमराह करता है ये अनुच्छेद 370 की परिघटना से समझा जा सकता है। बीजेपी ने हमेशा से जिस तरह इस मुद्दे को उठाया है, उसने तमाम लोगों को भ्रमित किया है। जबकि तमाम दूसरे प्रदेशों को भी संवैधानिक विशेषाधिकार हासिल हैं जिनके खिलाफ कभी आंदोलन नहीं होता। "'जम्मू-कश्मीर में तो आप बेरोक-टोक घूम सकते हैं, लेकिन अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और नगालैंड में अन्य राज्यों के भारतीय नागरिक 'इनर लाइन परमिट' के बिना प्रवेश भी नहीं कर सकते। पर्यटन या अन्य किसी कार्य के लिए वहाँ जानेवाले लोगों को यह परमिट प्रायः सात दिनों की अवधि के लिए मिलता है, जिसकी अवधि सात दिनों के लिए और बढ़ायी जा सकती है। सम्पत्ति आप वहाँ भी नहीं ख़रीद सकते। व्यवसाय या नौकरी के कारण वहाँ रहने के लिए 'वर्क परमिट' लेना पड़ता है। मणिपुर की भी माँग थी कि उन्हें अपने यहाँ भी इनर लाइन परमिट की व्यवस्था लागू करने दी जाय ताकि बाहरी लोगों के वहाँ आने-जाने पर नियंत्रण रखा जा सके। केन्द्र सरकार ने उसे स्वीकार नहीं किया। मेघालय में भी अभी हाल में इसी मुद्दे पर आन्दोलन भी हुआ था।" अगर आप सभी विशेष कानूनो पर कुछ बात करने को तैयार हैं तो करिए। लेकिन बीजेपी के इस मुद्दे पर हस्तक्षेप से एक बात ही साबित होती दिख रही है कि या तो वो पूरे देश में साम्प्रदायिकता फैलाना चाहते हैं जिसका फायदा उन्हें मिल चुका है,  या फिर सच में वो इसे बदलने के लिए इस मुद्दे पर बहस कर रहे हैं। जिससे आर.एस.एस. का एजेंडा गलत ना साबित हो। या फिर हो सकता है कि कुछ कारपोरेट्स का उनपर दबाव हो कि इतने अच्छे टूरिज्‍म वाले इलाके में उन्हें फाइव स्टार होटल क्यों नहीं बनाने को मिल रहे हैं. अगर आपको इस तरह से पुराने कानूनों को समय के हिसाब से बदलना है तो दलित आरक्षण खत्म करिए जो लोकसभा या विधानसभा के लिए 10 वर्षों तक के लिए दिया गया था। क्या इतनी हिम्मत है, जो यह कर सकें। जबकि आता तो  यह भी संघ के एजेंडे में है। देखते हैं आगे क्या क्या होता है लेकिन इसपर स्पष्ट राय बनाने से पहले हम जैसे कानून के युवा छात्रों को और भी अधिक पढने की जरूरत है।

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