Sunday, May 11, 2014

क्या मोदी लहर को सहयोगियों की जरूरत पड़ेगी?

आजकल जहाँ भी देखो एक ही बात हो रही है की क्या मोदी की लहर है? जहाँ तक मेरा मानना है की देश में लहर तो है, लेकिन मोदी की नहीं, कांग्रेस विरोधी लहर है।  जिस तरह से पिछले 5 साल मे (मैं  UPA की 10 साल की सरकार को गलत नही मानता, नही तो 2009 मे जीतते क्यों?) भ्रष्टाचार, मंगाई और दामिनी जैसे केश हुये, उससे कांग्रेस, मनमोहन और गाँधी परिवार के विरोध में एक बड़ा माहोल बना।  मोदी जी की जगह अगर कोई और  भी नेता मजबूती से सरकार बनाने का मजबूत दावा  पेश करता तो, उसकी भी ऐसी लहर हो सकती थी।  दरअसल कांग्रेस के खिलाफ मोदी ने तो अभी 6-7 महीने पहले मोर्चा खोला था।  उसके पहले तो अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल ने सरकार के खिलाफ पूरे देश मे माहोल बना दिया था। मैं मोदी लहर में अन्ना आन्दोलन का भी एक बड़ा हाथ मानता हूँ।  क्योंक़ि  कांग्रेस सरकार के खिलाफ उठी इस बड़ी आवाज में संघ ने भी कुछ फायदा उठाया था।  इसके बाद BJP (मोदी) और RSS ने मिलकर पूरे देश में मोदी को विकल्प के रूप में पेश किया।  लेकिन ऐसा भी नही है की मोदी ही एक मात्र विकल्प हैं, अगर ऐसा है तो पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत मे मोदी की कोई लहर क्यों नहीं दिखती। कई जगह क्षेत्रीय क्षत्रप भी अपनी-अपनी लड़ाई मजबूती से देश के उन्ही मुद्दों के साथ लड रहे हैं, जिनके साथ मोदी।  इसमे सबसे बड़ा सवाल यह उठता है क़ि  क्या मोदी लहर को इन क्षेत्रिया ताकतो  की जरूरत पड़ेगी?
तो इस सवाल के जवाब के लिये, कई मीडिया घराने (न्यूज चैनल और अखबार) और  राजनैतिक विश्लेषक अपने-अपने हिसाब से अनुमान लगा रहे हैं।  कोई NDA को 275, तो कोई 250 तो कोई 210-230 तक सीटें दे रहा है।  मैने भी एक अनुमान लगाया था, और RSS भी एक सर्वे कर चुका है, जो BJP को 190-200 और NDA को 220 तक सीटें दे रहा है।  मेरे हिसाब से यह तो बहुत पहले तय हो चुका  था की देश की जनता ने BJP के लिये अपना जनादेश दे दिया है।  अब यह जनादेश मोदी के लिये होगा इसके लिये तो सीटों की संख्या  पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।  इसी लिये आज BJP और RSS के नेताओं की मीटिंग दिल्ली मे हुई।  अब 5-6 दिन तक BJP के बड़े नेताओ की भाग-दौड़ अन्य दलों के नेताओं के घर की तरफ बढ जायेगी।  अगर NDA के सीटें मेरे, संघ और ज्यादातर चैनलों के अनुमान के हिसाब से 200-220 तक रह गई तो उसे 2-3 बड़े नेताओ के साथ की जरूरत पड़ेगी।  जैसा की सभी राजनैतिक पण्डित अनुमान लगा रहे हैं, उसके उलट ममता, मुलायम, मायावती, नीतीश कुमार मे से तो मुझे कोई नेता NDA मे जाता नही दिख रहा है।  ऐसे मे BJD, AIDM, ADMK, YRSC, TRS पर बहुत कुछ निर्भर करेगा।  अगर हम नवीन पटनायक की बात करें तो उन्होने NDA मे जाने के कोई संकेत नही दिये हैं, फिर भी एक उम्मीद है क़ि  वो सरकार मे सामिल हो सकते हैं।  लेकिन अगर विधानसभा मे अकेले ही उनकी सरकार बन गई तो BJP के लिये मुस्किल हो जायेगी।  जिस तरह से शारदा चिटफण्ड मामले को लेकर BJP और BJD के नेताओ मे आज-कल बहस हो रही है, उससे तो यही लगता है, क़ि पटनायक भाजपा से कोई समझौता नही करेंगे।  पहले ममता बनर्जी से लोगो को बहुत उम्मीदें थी, लेकिन हाल ही मे उनके और मोदी के बीच हुई जुबानी जंग से तो मामला साफ  हो गया है, क़ि ममता भाजपा को कोई समर्थन नही करेगी।  इसमे एक बात और ममता के ध्यान मे होगी, क़ि  2015 में बंगाल के विधान सभा चुनाव हैं, जिसमें उन्हें  मुस्लिम वोटों की जरूरत पड़ेगी।  तमिलनाडु से जयललिता और करुणानिधि पर स्थिति साफ नही है, मेरे हिसाब से इनमे से कोई भी एक नेता किसी बड़े मन्त्रीपद के साथ सरकार मे सामिल होना पसंद करेगा।  जिसमे जयललिता की उम्मीदें ज्यादा हैं।  सीमान्ध्रा मे YSR कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी, चंद्रबाबू के साथ सरकार में सामिल होना नहीं पसंद करेंगे। अगर उनकी विधान सभा मे सरकार बन जाये तो बाहर से सपोर्ट कर सकते हैं।  अगर उन्हे विधान सभा मे कांग्रेस या ओवसी की पार्टी  का समर्थन लेना पड़ा तो वो सरकार को सपोर्ट नही करेगे।  BJP के साथ जाने में उनकी स्थिति  चंद्राबाबू नाइडू के साथ-साथ विधान सभा चुनावों के नतीजों पर भी निर्भर करेगी।  इनमे से एक ही सरकार मे रह सकता है।  जिसमे चंद्राबाबू  के चान्स ज्यादा हैं।तेलंगाना में भी विधान सभा चुनाओं पर बहुत ज्यादा निर्भरता होगी।  अगर चंद्रशेखर राव  (TRS) की सरकार बन गई, तो वो NDA के साथ जाना चाहेगे।  क्योंकि उन्हे तेलंगाना के लिये विशेष पैकेज की जरूरत पड़ेगी।  अगर उनकी सरकार नही बनी तो, अगर BJP के कुछ विधायक  जीते तो उनसे सपोर्ट ले सकते हैं. लेकिन यहाँ मुझे नही लगता कि भाजपा को समर्थन करने में TDP से कुछ दिक्कत होगी। क्योंकि यहाँ मुख्य दल कांग्रेस और TRS ही बचे हैं।  अतः राव का मोदी सरकार मे जाना लगभग तय माना जा  सकता हैं।  अगर इस हिसाब से देखा जाये तो NDA को 20-30 सीटों वाले ही नेता मिल पायेगे। फिर देखने लायक़ होगा कि बाकी सांसदों  के लिये कैसे जोड़-तोड होगा। आगे  बहुत मज़ा आने वाला है, लोकसभा के मेरा पहला चुनाव है, इसी में बहुत कुछ सीखने को मिलने वाला है।  इन्तेजार करो और आगे की राजनीति का  मजा लेते रहो।

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