Tuesday, March 29, 2016

उत्तराखंड में संवैधानिक संकट

कल ही रवीश कुमार के ज़िक्र के बाद मैने अरुण जेटली जी का ब्लॉग पढ़ा जो उन्होने संविधान दिवस पर लिखा था. उसमें वो कहते हैं कि किसी भी राज्य में अब पहले के जैसे पॉलिटिकल वेन्डेटा के लिए राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया जाता है. लेकिन अरुणांचल प्रदेश के बाद उत्तराखंड में ऐसा किया गया है. राष्ट्रपति शासन के बावजूद हरीश रावत हार मानने वाले नहीं दिखते। एक तरफ वे आज अपने 34 विधायकों के हस्ताक्षर वाली चिठ्ठी लेकर राज्यपाल केके पाल से मिलने जा पंहुचे, तो साथ ही कांग्रेस ने नैनीताल हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हरीश रावत ने क्या पहले सतपाल महाराज के बीजेपी में जाने और विजय बहुगुणा के बाहर होने को हल्के से लिया? पूर्व में मैं कई ऐसी स्थानीय खबरें पढ़ता रहा हूँ जिसमें कांग्रेस के अंदर खूब गुटबाजी होती थी. विजय बहुगुणा खेमा हमेशा से ही हरीश रावत खेमे से नाराज़ था. याद हो कि हरीश रावत गाँधी परिवार के नज़दीकी हैं. 
दूसरी तरफ सवाल उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी ने राष्ट्रपति शासन लागू करने में जल्दबाजी कर डाली। एक दिन का और इंतजार क्या नहीं किया जा सकता था। राज्यपाल ने 28 तारीख तक का समय दिया था विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए या फिर उसे आभास हो चला था कि सत्ता के लिए विधायक डगमगा भी सकते हैं। स्टिंग पर एक दिन में जांच रिपोर्ट आ भी जाती है जबकि एफआईआर तक दाखिल नहीं होती है। लेकिन शायद कांग्रेस  की नैतिकता का वार हरीश रावत के स्टिंग आने से हार गया? बीजेपी पर उसका सत्ता के अहंकार और विधायकों को खरीदने का आरोप उल्टा पड़ गया। स्पीकर का वायस वोट से बजट पास कराने का कदम पक्षपाती रहा। कई संविधान के जानकारों का मानना है कि विधानसभा स्पीकर का रवैया ठीक नहीं था. उसने ग़लतियाँ की हैं. जैसे कि बागी विधानसभा सदस्यों की सदस्यता रद्द करना. उसमें भी अभी गुंजाइश हो सकती थी. कांग्रेस पार्टी के 9 सदस्यों ने विधानसभा में विनियोग विधेयक के विरुद्ध मत देने का फैसला किया। 18 मार्च 2016 को 35 सदस्यों ने विनियोग विधेयक के विरुद्ध तथा 32 सदस्यों ने इसके पक्ष में मतदान किया। विधानसभा की लिखित कार्यवाही से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि सदस्यों ने मतविभाजन की मांग की थी लेकिन इसके बावजूद विनियोग विधेयक मतदान के बगैर पारित होने का दावा किया जा रहा है। इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि विनियोग विधेयक वास्तव में मत विभाजन में गिर गया था। एक अप्रैल 2016 से व्यय की मंज़ूरी देने वाले विनियोग विधेयक को मंज़ूरी नहीं मिली थी। अगर विनियोग विधेयक पारित नहीं हुआ था तो 18 मार्च 2016 के बाद सरकार का सत्ता में बने रहना असंवैधानिक है। आरोप तो यह है कि स्पीकर ने मत विभाजन की अनुमति नहीं दी। आरोप है कि स्पीकर ने ध्वनि मत से विनियोग विधेयक पास होने का ऐलान कर दिया। विनियोग विधेयक के पास या फेल होने के साथ-साथ मत विभाजन के नियम और स्पीकर के अधिकार को भी समझना होगा। क्या स्पीकर बाध्य है कि वह मत विभाजन की मांग को स्वीकार ही करेगा और बाध्य है तो स्पीकर मना कर देता है तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई के क्या प्रावधान हैं। स्पीकर ने ध्वनि मत से जो विधेयक पास किया है क्या उसे चुनौती दी जा सकती है। राज्यपाल ने खारिज कर दिया तो यहां क्या राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह स्पीकर के फैसले को पलट दे। अब सवाल ये उठता है कि क्या 18 मार्च को कथित रूप से ध्वनि मत से विनियोग विधेयक पास कराने के बाद स्पीकर या मुख्यमंत्री ने उसे राज्यपाल के पास भेजा था। क्या स्पीकर या मुख्यमंत्री ये तथ्य पेश कर सकते हैं कि भेजा था। वित्त मंत्री तो लिखते हैं कि नहीं भेजा था और आज तक नहीं भेजा है। लेकिन जिस विनियोग विधेयक को लेकर सरकार गिर गई और राष्ट्रपति शासन लग गया उसके बारे में राज्यपाल ने जानकारी क्यों नहीं मांगी या मांगी तो नहीं दी गई। क्या सारा फैसला विनियोग विधेयक की प्रमाणिक प्रति देखे बिना ही ले लिया गया या फैसला यूं हुआ कि विधेयक की प्रमाणित प्रति भेजी ही नहीं गई। 18 मार्च को पास किया गया विनियोग विधेयक स्पीकर ने तुरंत राज्यपाल को भेज दिया था। वित्त मंत्री कहते हैं कि आज तक विधेयक की प्रमाणित प्रति नहीं भेजी गई। हमारे सहयोगी दिनेश मानसेरा के सूत्रों के अनुसार आज यानी 28 मार्च को राजभवन को इसकी प्रमाणित प्रति भेजी गई है। चूंकि ये जानकारी सूत्र आधारित है इसलिए हम इस पर दावा नहीं कर सकते लेकिन अगर ये सही जानकारी है तो विनियोग विधेयक को प्रमाणिक प्रति अभी कैसे भेजी गई। किसी ने मांगा या स्पीकर को इसका ख्याल आया। मतविभाजन हुआ या नहीं, नहीं हुआ तो मतविभाजन में कैसे यह विधेयक गिर गया। विधेयक की प्रमाणिक प्रति राज्यपाल को भेजी गई या नहीं भेजी गई। स्पीकर ने विधेयक को प्रमाणित किया या नहीं किया। या तो विनियोग विधेयक पास हुआ या नहीं हुआ लेकिन यहां एक तीसरी स्थिति उभर रही है कि गंभीर आशंका है कि पास हुआ। जेटली ने लिखा है कि हर बात के प्रमाण के तौर पर दस्तावेज़ मौजूद हैं। आगे लिखते हैं कि 'अगर विधानसभा अध्यक्ष की बात सही मानें कि बागी विधायकों ने विनियोग विधेयक के पक्ष में मतदान किया इसलिए यह पारित हो गया है, तब बागी विधायकों को अयोग्य करार नहीं दिया जा सकता।'
स्पीकर और कांग्रेस ने कहा कि 9 सदस्य विरोधी दल के साथ राजभवन मतविभाजन की मांग करने गए थे इसलिए उनके वकीलों की दलील सुनने के बाद ही अयोग्य ठहराया गया। स्पीकर ने कहा कि उन्हें राष्ट्रपति शासन लगने की लिखित सूचना नहीं है। जबकि एक बार पूर्व में इंदिरा गाँधी के जमाने में ऐसा हो चुका है जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फ़ोन पर या अन्य माध्यम से राष्ट्रपति शासन की जानकारी मान्य नहीं होती है. यह लिखित होनी चाहिए. पता नहीं स्पीकर की इस बात में कितना दम है?  मत विभाजन की स्थिति में स्पीकर के  विशेषाधिकार बताता है। इसमें कहा गया है कि वॉइस वोट पर स्पीकर के फ़ैसले को बिना चुनौती दिए कोई सदस्य चाहे तो स्पीकर को अपना नाम रिकॉर्ड करने के लिए अनुरोध कर सकता है। स्पीकर चाहे तो अनुरोध को स्वीकार कर सकता है अगर उसे लगे तो मामला महत्वपूर्ण है और हाउस में इसके पक्ष में आम राय है। सदन के अंदर स्पीकर का अधिकार सर्वोच्च है और ये अधिकार उसकी पूर्ण निष्पक्षता के आधार पर उसे हासिल होता है। मंत्रालयों के सवाल पर स्पीकर को कई अधिकार हासिल हैं। हालांकि सवालों को स्वीकार करने को लेकर नियम बनाए गए हैं लेकिन उसकी व्याख्या का अधिकार स्पीकर के पास होता है।

कट्टरपंथियों को चेतावनी

पाकिस्तान के एक तानाशाह के राज में आईएसआई के हाथों में पूरा शासन चला गया। आज सजा भुगत रहे हैं। कट्टरपंथ दो धारी तलवार है। नफरत बहुत खतरनाक है। जो लोग सेकुलरिज्म में विश्वास नहीं करते हैं, वे समझ लें कि दूसरे धर्मों के लोगों का खून पीने की आदत पड गई तो समझो खुद का भी खून बहने लगेगा। कम से कम यहां सेकुलरिज्म के साथ मिलकर रह तो सकते हैं, थोडा झगडा तो हर घर में होता है। हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए उत्साहित लोग पाकिस्तान से सीख सकते हैं। हमारा पडोसी नेपाल नए संविधान के अनुसार हिंदू राष्ट्र नहीं बना रहा है, वो सेकुलरिज्म के आधार पर ही है। एक तरफ तो हम अनेकता में एकता की बात करते हैं दूसरी ओर संविधान में किसी एक धर्म के आधार पर कैसे राष्ट्र की स्थापना हो सकती है। पूरे विश्व में आज अगर एक धर्म के आधार पर ही राष्ट्र है तो उसी धर्म में बहुत मतभेद और झगडे है। शिया सुन्नी के जैसे हमारे देश में तो हजारों जातियों के झगडे है। जो आरक्षण जैसे मुद्दों पर कई बार दिख जाता है। उसमें भी जातियों में छुआछूत ऊंचनीच मुंबई जैसे महानगरों में भी है, गांवो के तो हाल मत पूछो। जो ज्यादा ताकतवर है वही रहेगा बाकी को भगाने के प्रयास होगे।
कहां जाएगी संस्कृति, सभ्यता, परम्पराएँ और अनेकता? बहुत सोच समझ कर हमारे संविधान का निर्माण हुआ है, इसे बचाइए तभी देश बचेगा। यही असली देशभक्ति है।

Wednesday, March 23, 2016

शहीद-ए-आज़म की याद में

शहीद भगत सिंह साम्राज्यवाद के खिलाफ भारतीय जनता के संघर्ष के सबसे उज्जवल नायकों में से एक रहे हैं. तेईस वर्ष की छोटी उम्र में शहीद होने वाले इस नौजवान को भारतीय जनता एक ऐसे उत्साही देशप्रेमी नौजवान के रूप में याद करती है जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से समझौताविहीन लड़ाई लड़ी और अंत में अपने ध्येय के लिए शहीद हुआ. लेकिन अपेक्षाकृत कम ही लोग भगत सिंह एवं उनके क्रांतिकारी साथियों के विचारों से सही मायनों में परिचित हैं. भगत सिंह एवं उनके साथियों के लेख एवं दस्तावेजों का व्यापक रूप से उपलब्ध न होना इसकी एक बड़ी वजह रहा है और हमारे आज के शासकों के लिए भी यही मुफीद है कि भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों को जनता के सामने न आने दिया जाये. क्योंकि भगत सिंह के लेख एवं दस्तावेज मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण की व्यवस्था के बारें में सही और वैज्ञानिक समझ विकसित करते हैं और इसके खिलाफ जनता की लड़ाई को सही दिशा देते हैं. भगत सिंह उन विरले विचारकों में से थे जो उस समय ही यह बात जोर देकर कह रहे थे कि केवल अंग्रेजों के भारत से चले जाने से ही आम जनता की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा जब तक की इस शोषणकारी व्यवस्था को न बदला जाय. 
भगत सिंह की पुण्यतिथि  का महत्व इसी में है कि भारत की युवा पीढ़ी को भगत सिंह की उस तड़प से जोड़ा जाए जिसने उसे जिन्दगी के सब प्रलोभनों को ठोकर मारकर फांसी के फंदे को गले लगाने को मजबूर कर दिया था। क्या थी वह तड़प? क्या है भगत सिंह का इस शताब्दी वर्ष में राष्ट्र की युवा पीढ़ी के नाम सन्देश? एक धनी परिवार में विवाह के प्रलोभन को ठुकराते हुए क्या लिखा था 16 वर्षीय भगत सिंह ने अपने पिता को? यही न कि"मेरी जिन्दगी भारत की आजादी के लिए समर्पित हो चुकी है। इसलिए मेरी जिन्दगी में आराम और सांसारिक इच्छाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था तो दादा जी ने मेरे यज्ञोपवीत के समय घोषणा की थी कि मुझे देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया गया है। सो मैं उस समय की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूं।"  
7 अक्तूबर, 1930 को भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई। उसके दो दिन पहले उन्होंने "मै नास्तिक क्यों हूं?" लेख लिखा, जिसमें ईश्वर के खिलाफ बगावत की घोषणा की। किन्तु इस बगावत का कारण दार्शनिक नहीं बल्कि देश की गुलामी, शोषण और गरीबी ही थी। उसका एक ही सवाल था, "अगर कोई सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ ईश्वर है, जिसने इस पृथ्वी या दुनिया की सृष्टि की, तो कृपया यह बताइये कि उसने ऐसा क्यों किया? उसने ऐसी दुनिया क्यों बनाई जिसमें तमाम दु:ख है, तकलीफ है, जिसमें वास्तविक जीवन की त्रासदियों का एक अनन्त सिलसिला है, और जिसमें एक प्राणी पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं है।" अपने देश की दुरावस्था और गुलामी ने ही उन्हें आत्मबलिदान की प्रेरणा दी। इसी लेख में भगत सिंह ने लिखा, "किसी स्वार्थपूर्ण इरादे के बिना, ईशलोक या परलोक में कोई पुरस्कार पाने की इच्छा के बिना, बिल्कुल अनासक्त भाव से मैंने अपना जीवन आजादी के उद्देश्य के लिए अर्पित किया है, क्योंकि मैं ऐसा किये बिना रह नहीं सका। जिस दिन ऐसी मानसिकता वाले बहुत से लोग हो जाएंगे जो मानव-सेवा और पीड़ित मानवता की मुक्ति को हर चरित्र से ऊपर समझकर उसके लिए अपने आपको भेंट करेंगे, उसी दिन आजादी का युग शुरू होगा।"
घटनाचक्र बदलता रहता है, बदलते घटनाचक्र के अनुसार कर्म का स्वरूप भी बदलता है, कर्म के साथ-साथ विचार यात्रा भी आगे बढ़ती है। किन्तु इन सबके पीछे स्थायी भाव है, प्रेरणा है, तड़प है, उसे जगाना ही किसी शहीद के प्रति सच्ची श्रद्धाञ्जलि हो सकती है। वह तड़प अगर है तो वह बदली परिस्थितियों में कर्म की नई पगडंडिया स्वयं बना लेगी।किन्तु मुझे यह देखकर भारी धक्का लगा कि कुछ लोग भगत सिंह की शहादत की खूँटी  पर लटका कर अपनी मुर्दा विचारधारा को बेचने के लिए इस जन्म शताब्दी के दुरुपयोग की योजना बना रहे हैं।
 यदि भगत सिंह और उनके साथियों के वैचारिक पक्ष से पढ़े-लिखे लोगों का बहुलांश परिचित होता तो यह कदापि संभव नहीं होता कि भाजपा और आर.एस.एस.के धार्मिक कट्टरपंथी फासिस्ट भी उन्हें अपने नायक के रूप में प्रस्तुत करने की कुटिल कोशिश करते।"
अपनी फाँसी से पहले 3 मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था :
उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़ - ए - ज़फ़ा क्या है ?
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें.
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है ?
सारा जहाँ अदू सही, आओ ! मुक़ाबला करें.
अपनी बात मैं शहीद भगत सिंह के आख़िरी खत की कुछ लाइनों से ही करना चाहूँगा. 
 साथियों,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छुपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं, कि मैं कैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता।
(22 मार्च 1931 को लिखे भगत सिंह के आखिरी पत्र का अंश)
मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। ... दिलेराना ढंग से हंसते -हंसते मेरे फांसी पर चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि उस क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी। 
आपका साथी
भगत सिंह
फाँसी पर जाते समय वे तीनो क्रान्तिकारी यह पंक्तियाँ गुनगुना रहे थे -
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे.
मेरा रँग दे बसन्ती चोला. माय रँग दे बसन्ती चोला.
आज भी देश की जनता उन महान क्रान्तिकारी भगत सिंह को याद करती है जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी और जवानी भारत माँ के लिए कुर्बान कर दी. ऐसे महान राष्ट्र भक्त को हमारा सत-सत नमन.

Saturday, March 19, 2016

बचत के ब्याज पर गिरी गाज

केंद्र सरकार ने इस बज़ट में आम आदमी की बचत के इंटेरेस्ट को लेकर कई फ़ैसले किए हैं. ऐसे में मुझसे बिना कुछ कहे रहा नहीं जाता है क्योंकि मैं क़ानून, राजनीति के बाद एकाउन्ट्स में भी अनुभव रखता हूँ. सरकार ने छोटी बचत योजनाओं के साथ-साथ पीपीएफ की ब्याज दरों में भी कटौती की. एक अप्रैल से नई दरें लागू होंगी. फिलहाल तीन महीने के लिए दरें लागू होंगी. समीक्षा के बाद दरें फिर घट या बढ़ सकती हैं . पब्लिक प्रॉविडेंड फंड यानी PPF की मौजूदा 8.7 फीसदी सालाना ब्याज दर में सरकार ने कटौती कर दी है. 15 साल वाली इस जमा योजना पर एक अप्रैल से 8.1 फीसदी सालाना ब्याज मिलेगा. इसके अलावा अब राष्ट्रीय बचत योजना य़ानी NSC पर 8.1 फीसदी, सुकन्या समृद्धि योजना पर 8.6 फीसदी और किसान विकास पत्र पर 7.8 फीसदी सालाना ब्याज मिलेगा. बजट में EPF से निकासी पर टैक्स लगाने के प्रस्ताव को भारी विरोध के बाद सरकार को वापस लेना पड़ा था. ब्याज दरों में कटौती इसकी भरपाई मानी जा रही है. सरकार ने पीपीएफ तथा किसान विकास पत्र (केवीपी) समेत लघु बचत योजनाओं पर दी जाने वाली ब्याज दरें कम कर दी हैं. इसका मकसद इन बचत योजनाओं को बाजार दरों के समतुल्य लाना है. सरकार इस कदम से छोटी बचत योजनाओं में निवेश पर भरोसा करने वाले आम लोगों को झटका लगेगा. सरकार ने 16 फरवरी को छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर हर तिमाही में संशोधित करने का फैसला किया था. इसी के तहत कदम उठाते हुए लोक भविष्य निधि (पीपीएफ) पर ब्याज दर 8.7 प्रतिशत से घटाकर 8.1 प्रतिशत कर दी गयी है. नई दर एक अप्रैल से 30 जून तक के लिये है. वित्त मंत्रालय के आदेश के अनुसार केवीपी पर ब्याज दर 8.7 प्रतिशत से घटाकर 7.8 प्रतिशत कर दी गयी है. डाक घर बचत पर ब्याज दर 4.0 प्रतिशत पर बरकरार है. वहीं एक से पांच साल की मियादी जमाओं पर ब्याज दरें घटायी गयी हैं. लोकप्रिय पांच वर्षीय राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्रों पर ब्याज दर एक अप्रैल से 8.1 प्रतिशत होगी जो फिलहाल 8.5 प्रतिशत है. पांच वर्षीय मासिक आय खाता पर ब्याज अब 7.8 प्रतिशत मिलेगा जो फिलहाल 8.4 प्रतिशत है. बालिकों के लिये शुरू की गयी सुकन्या समृद्धि खाते पर ब्याज दर अब 8.6 प्रतिशत होगी जो फिलहाल 9.2 प्रतिशत है. पांच साल की वरिष्ठ नागरिक बचत योजना पर ब्याज 8.6 प्रतिशत मिलेगा जो फिलहाल 9.3 प्रतिशत है. वित्त वर्ष 2016-17 की पहली तिमाही के लिये ब्याज दरों की घोषणा करते हुए वित्त मंत्रालय ने कहा, ‘‘सरकार के निर्णय के आधार पर छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दरें तिमाही आधार पर अधिसूचित होंगी.’’ वित्त मंत्रालय के आदेश के अनुसार एक, दो और तीन साल की डाक घर मियादी जमाओं पर ब्याज दर फिलहाल 8.4 प्रतिशत है. लेकिन एक अप्रैल से एक साल की मियादी जमा पर 7.1 प्रतिशत, दो साल के लिये 7.2 प्रतिशत तथा तीन साल की मियादी जमा पर 7.4 प्रतिशत ब्याज मिलेगा. पांच साल के लिये मियादी जमा पर एक अप्रैल से 7.9 प्रतिशत ब्याज मिलेगा जो फिलहाल 8.5 प्रतिशत है. वहीं पांच साल के आरडी :रेकरिंग डिपोजिट: पर ब्याज दर 8.4 प्रतिशत से घटाकर 7.4 प्रतिशत कर दी गयी है. सरकार ने 16 फरवरी को छोटी बचत योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज को बाजार दरों के समरूप किये जाने की घोषणा की थी. उस दिन डाक घर बचत पर ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत की कटौती की गयी थी लेकिन पीपीएफ, एमआईएस (मासिक आय योजना), वरिष्ठ नागरिक बालिकाओं की योजनाओं जैसी दीर्घकालीन योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज में कोई बदलाव नहीं किया था. पीपीएफ औऱ सुकन्या समृद्धि जैसी योजनाओं की ब्याज दर कम होने पर आपको कितना नुकसान होगा, उदाहरण के तौर पर अगर आप बच्ची के जन्म के पहले साल से 14 साल तक हर महीने 1 हजार रुपये जमा करते हैं तो 21 साल की उम्र में पहले आपको मिलते 6 लाख 40 हजार 5 सौ 21 रुपये, जबकि नई ब्याज दर 8.6 फीसदी के मुताबिक मिलेंगे सिर्फ 5 लाख 86 हजार 9 सौ 45 रुपये …यानी करीब 53 हजार 576 रुपये कम मिलेंगे .
इसी तरह पीपीएफ में 15 साल तक हर महीने 1 हजार रुपये जमा करने पर अभी तक की ब्याज पर 8.7 फीसदी पर मिलते थे 3 लाख 74 हजार 71 रुपये मिलते जो अब ब्याज दर कम होकर 8.1 फीसदी होने पर 15 साल में मिलेंगे 3 लाख 42 हजार 779 रुपये, यानी नुकसान होगा 31 हजार 292 रुपये का
अब बात करते हैं किसान विकास पत्र की, अबतक 8.7 फीसदी ब्याज के हिसाब से रकम 8 साल 4 महीने में दोगुनी होती थी जो अब नई ब्याज दर 7.8 फीसदी में 9 साल 3 महीने में दोगुनी होगी . यानी करीब 11 महीने आपको ज्यादा इन्वेस्ट करना पड़ेगा . इसी तरह बाकी योजनाओं NSC औऱ पोस्ट ऑफिस सेविंग स्कीम्स में भी पहले से कम फायदा मिलेगा .

Thursday, March 17, 2016

कन्हैया के बयान पर बवाल क्यों?

मैं नहीं गारंटी लेता हूँ कन्हैया या किसी केजरीवाल कि हो सकता है वो आज सही हों और कल ग़लत हो जाएँ। इसलिए मैं उनको कल ग़लत ही कहूँगा। किसी का भक्त नहीं हूँ। अगर कन्हैया ने ग़लत कहा है, जो मुझे ग़लत नहीं दिखा हो सकता है कोर्ट में वो ग़लत साबित हो जाए। तो उसपर आरोप साबित करवाएँ। कल मैं अपनी ग़लती मानकर दृष्टि में सुधार करूँगा, जो किसी खराब इंसान को पहचान नहीं पाई। जब आप कन्हैया का पूरा भाषण सुनेगे तो पता चलेगा कि वो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर क्या बोल रहा था। वो बोला कि मैं सेना के जवानों का पूरा सम्मान करते हुए कहना चाहूँगा कि जम्मूकश्मीर और मणिपुर में सुरक्षाबलों द्वारा बलात्कार हुए हैं। पुलिस कस्टडी में महिलाओं के बहुत रेप हुए हैं। यह बात सही है। वो सबके सब पुलिस या सेना पर सवाल नहीं कर रहा है। जो ग़लत हैं उनको ही कहा है। अगर आपको यकीन नहीं है तो एक बार गूगल पर कोर्ट मार्शल टाइप करके देख लीजिए। देश में सैकड़ों सैनिकों के कोर्ट मार्शल हुए हैं महिलाओं से रेप के कारण। हर समाज में कुछ ग़लत हुए हैं तो सेना में भी कुछ ग़लत होंगे, उनको सुधारने के क़ानून की बात कन्हैया करता है। मणिपुर में जब महिलाएँ नंगी होकर प्रदर्शन करती हैं, सीआरपीएफ के द्वारा हुए बलात्कार के खिलाफ तो क्या पूरा सीआरपीएफ खराब हो जाता है वो आंदोलन रेप करने वालों के खिलाफ था। आप कोई भी आदिवासियों की लोकल मैगज़ीन उठाकर देख लो जिसमें पुलिस और सुरक्षा बलों के कई लोगों द्वारा उनकी महिलाओं के रेप केश आते हैं। जो ग़लत है वो तो ग़लत कहा ही जाएगा। हम लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं उसकी कमियों पर बातें करके। मजबूत पक्ष की तारीफ़ करते हैं। सेना में मेरे कई मित्र, रिश्तेदार हैं, जो अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा कर रहे हैं। कन्हैया के भी चचेरे भाई ने सेना में रहकर जान दी है देश के लिए। हम सेना को सलाम करते हैं, उनके लिए और उनके परिवार के लिए बेहतर सुविधाएँ चाहते हैं। लेकिन जो लोग ग़लत हैं उनको ग़लत कहकर सही करवाना चाहते हैं। अगर कोई कहे कि सेना में भ्रष्टाचार है तो क्या हम पूरी सेना पर सवाल उठा रहे हैं? ऐसा नहीं है हम सब जानते हैं कि 4-5 लाख ले देकर कितने अपात्रों को नौकरी दी जाती है। ऐसा सेना के ही बड़े ओफीसर करते हैं।सेना के असली दुश्मन तो वो लोग हैं जो सेना को पहले वन रैंक वन पेंशन के नाम पर सालों लटकाते हैं फिर उन्हें उल्लू बना देते हैं, उनकी राइफलें और बुनियादी ज़रूरतें नहीं दे पाते हैं। वो लोग जो उनको बुलेट प्रूफ़ जैकेट नहीं मुहैया करवा पाते हैं, और हमारे जवान शहीद हो जाते हैं। असली गद्दार तो वो लोग हैं। ये गद्दारी सालों से चल रही है, कांग्रेस भाजपा सबको देखा है, एक के बदले दश सिर लाने के केवल जुमले किए जाते हैं फिर लाहौर में बिरियानी(वेज) पार्टी होती है। अगर आपको सच में सेना के प्रति वफ़ादारी है तो उनको दीजिए वो सुविधाएँ, क्यों सुरक्षा बजट कम हो जाता है? क्यों उनके मरने के बाद छत्तीसगढ़ में उनकी वर्दियाँ कचरे में फेंक दी जाती हैं? या फिर सेना के असली दुश्मन वो लोग हैं जो व्यापारियों को सेना के जवानों से ज़्यादा जोखिम लेने वाला कहते हैं अमित शाह तो कहते हैं कि हम नेता शरहद पर शहीद होने से बड़ा काम कर रहे हैं मैं एक बार फिर से सेना के लोगों को सलाम करते हुए कहता हूँ कि हमारी और उनकी नौकरी में एक मात्रा का फ़र्क है," हम वेतन के लिए काम करते हैं, और हमारी सेना के जवान वतन के लिए काम करते हैं।" लेकिन जो अपराध सेना के कुछ लोगों द्वारा हुए हैं, जिनको सेना के ही कोर्ट ने सज़ा दी है, उसका भी हम सपोर्ट तो नहीं कर सकते हैं। 


ओवैसी और भारत माता

आजकल सोसलमीडिया पर एक मैसेज खूब घूम रहा है जिसमें ओवैसी कहते हैं कि  वह 'भारत माता की जय' नहीं बोलेंगे, भले ही उनकी गरदन पर चाकू रख दिया जाए। उन्होंने ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान के जवाब में कहा, जो संभवतः जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हाल ही में हुए देशद्रोह विवाद के कारण दिया गया, और जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालयों से 'राष्ट्रविरोधी ताकतों को हटाने' की ज़रूरत बताई थी, और कहा था कि विद्यार्थियों के मन में राष्ट्रीयता और देशभक्ति की भावना का संचार करने के लिए उन्हें 'भारत माता की जय' कहना सिखाया जाना चाहिए।
ओवैसी के भारत माता की जय ना कहने पर इतना हाहकार समझ में नहीं आता है। ओवैसी कहते हैं मादर ए वतन को सलाम और जय हिंद, कहता हूँ लेकिन भारत माता की जय नहीं कहूँगा। आख़िर दोनो का अर्थ तो एक ही है। फिर किसी कट्टर से जबरजस्ती बुलवाकर क्या मिलेगा? अगर यह देश या संविधान विरोधी है तो डाल दो जेल में। आख़िर बात यह है कि भार्ट माता है है क्या? ज़्यादातर लोगों को लगता है कि कैलेंडर में छपी हुई एक चमकती हुई साड़ी पहने महिला भारत माता है। लेकिन नहीं जवारलाल नेहरू से एक बार पूछा गया कि यह भारत माता की जय क्या है तो बोले कि अगर आप भारत माता को एक देश के रूप में देखते हैं तो देश के लोगों की जय ही देश की जय है, अगर आप भारत माता को एक महिलाशक्ति या मातृभूमि के रूप में देखते हैं तो भारत की माताओं बहनों की जय ही भारत माता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं में भारत माता कोयले की खानों में पत्थर तोड़ती हुई भारत माता थी, निराला की भारत माता खेतों में काम करती हुई भारत माता है, शाहिर लुधियानवी के अनुसार पनघट से पानी ले जाती हुई भारत माता है। अगर किसी गाँव के आदमी से पूछा जाए तो बकरी चराती हुई भारत माता बताएगा। यह हमारी जो भारत माता है वो एक इमाजिनैइशन है एक देश और मातृभूमि को लेकर। जो मुस्लिम अपने खुदा कि ही तस्वीर में विश्वास नहीं करते हैं तो वो भारत माता की भी तस्वीर को नहीं इमाजिन करते होंगे इसमें ऐसा क्या पहाड़ उलट गया। मैं मानता हूँ कि हम हिंदू हैं इसलिए हमारे लिए मातृभूमि, नदियाँ, गाय सब माँ हैं, दूसरे धर्म के लोग भी ऐसा ही माने ऐसा नहीं है। बस देश की इज़्ज़त करते हैं ना जय हिंद बोलकर। वो नहीं मानते हैं किसी देश के स्वरूप को।और ऊपर से बोलने वाले जो हैं वो कौन लोग हैं? गोलवलकर कहते हैं कि औरतों को वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए। संघ के लोग कहते हैं कि पाँचो अंगुली बराबर नहीं हो सकती हैं। संघ में महिलाओं की भागीदारी नहीं होती है। तोगाड़िया कहते हैं कि हर लड़की एक जिंदा बम है, जिन्हें घर में ही रखना चाहिए। सारे के सारे जींस और मोबाइल पर रोंक लगाना चाहते हैं। मोदी जी ने भी तो किन्हीं ना किन्ही कारणों की वजह से एक भारत माता को छोड़ा है। महिला से रेप के आरोपी मंत्री बना दिए जाते हैं। पूरी तरह से तालिबानी सोंच महिलाओं(भारत माता) के प्रति रखते हैं, अफ़सोस की यही सोंच कट्टरपंथी मुल्ले और ओवैसी जैसे लोग भी रखते हैं। 
ओवैसी ने कहा है कि भारत माता की जय बोलना जरुरी है ऐसा संविधान में नहीं लिखा है। मैं ओवैसी साहब को यह बताना चाहता हूँ कि संविधान में ये भी नहीं लिखा है कि अपनी माँ को माँ कहो, संविधान में ये भी नहीं लिखा है कि अपने बाप को बाप कहो, लेकिन फिर भी अपनी माँ को माँ और बाप को बाप कहा जाता है। और फिर कुछ लोग जबरदस्ती बुलवाकर रहेगे। बोले तो बोले नहीं बोले तो मरने दो। उसकी नैतिकता कि माँ को कैसी इज्जत करता है वो?
भारतीय इस्लाम दुनिया में सबसे ज़्यादा मिल-जुलकर चलने वाला रहा है, और विदेशी कट्टरपंथियों को शांति तथा सह-अस्तित्व के कई पाठ पढ़ा सकता है। भारत में आज़ादी की लड़ाई के दौरान हिन्दुओं, मुस्लिमों, सिखों और ईसाइयों ने मिलकर संघर्ष किया, और 'भारत माता की जय' के नारे लगाए। जहां तक मुझे याद है, किसी मुस्लिम नेता ने कभी भी इस नारे पर कोई आपत्ति नहीं की। हां, 'वन्दे मातरम्' को लेकर आपत्तियां रही हैं, जिसे कुछ लोग धर्मनिरपेक्ष नहीं मानते, लेकिन 'भारत माता की जय' को लेकर कभी आपत्ति नहीं रही है। बीते कुछ सालों में इसी तरह की मिलती-जुलती भूमिका जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने भी निभाई। अपनी राजनैतिक सहूलियतों के हिसाब से वह फतवे जारी करते रहे हैं, और हर राजनैतिक दल ने उन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिश की। वर्ष 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान इमाम ने फतवा दिया था कि मुस्लिमों को आम आदमी पार्टी (आप) को वोट देना चाहिए। 'आप' ने खुले तौर पर इस फतवे के लिए इमाम की निंदा की थी, और फिर पार्टी की अभूतपूर्व जीत ने भी इस भ्रम को तोड़ डाला कि धर्मगुरुओं के कुछ कहने भर से चुनावी नतीजे प्रभावित हो जाते हैं। 
जैसे मैं महाराष्ट्र को अपनी कर्मभूमि कहता हूँ हमेशा। जय महाराष्ट्र भी कहता हूँ। मित्रों के साथ मराठी ही बोलता हूँ, लेकिन अगर कोई जबर्दस्ती कहे कि जय महाराष्ट्र बोलो नहीं तो यूपी जाओ। हो सकता है कि मैं महाराष्ट्र का सम्मान करते हुए उस आदमी का विरोध करने के लिए जय महाराष्ट्र न बोलू और ग्रेट महाराष्ट्र कह दूँ। 
मेरे गांव के मुसलमान मेरे पिता जी को "राम राम" कहते हैं। जबर्दस्ती कहलवाने पर वो राम का नहीं मेरा विरोध करने के लिए न बोले। ठीक ऐसा ही भारत माता की जय के नारे के साथ हो रहा है। वो जय हिंद कहता है, तो क्या दिक्कत है? तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, बंगाल में जहां हिंदी नहीं आती है वो लोग अपनी भाषा में यही बात कहेंगे। अंग्रेजी में मदर इंडिया कह सकते हैं।
दरअसल नारे सही उद्देश्य और ढंग से लगवाए जाए तो ठीक है। आज कल तो ये नारे लोग युद्ध और दंगों में भी लगाते हैं। ध्यान है मुझे छत्तीसगढ का मामला जब बजरंग दल के सदस्यों ने चर्च की नन का बलात्कार किया और भारत माता की जय के नारे लगाते रहे। जय श्रीराम भी 90 के दशक के बाद ऐसे ही प्रयोग किया जाता रहा है।
मैं ये मानने को तैयार नहीं कि ओवैसी अपने बयानो का अर्थ नहीं समझते। उनके पास इस बात को समझने के लिए पर्याप्त राजनैतिक समझ है। फिर भी अगर वो ऐसा भड़काऊ बयान देते हैं तो फिर ये क्यों न माना जाये कि वो किसी बड़ी योजना पर काम कर रहे हैं, जिसका अभी उजागर होना बाक़ी है। इन ओवैसीयों के चक्कर में ग़रीब जनता के मुद्दे दब जाते हैं। हम बात कर रहे हैं, किसानों की आत्म हत्या की, हम बात कर रहे हैं मजदूरों की, हम बात कर रहे हैं, ग़रीबों की शिक्षा की, हम बात कर रहे हैं समानता की, दलितों के अधिकार की और जिनके वो मसीहा बनते हैं उन मुसलमानों के भी मुद्दों की। इन बुनियादी सवालों के बीच में ये चिल्लाने लगते हैं, ऐसे में इन भक्तों और सरकार को मुद्दा मिल जाता है हमारे सवालों से ध्यान भटकाने का। मैं ओवैसी से भी दरख्वास्त करता हूँ कि ख़ुदा के लिए वो देश भक्त मुसलमानों को बदनाम करने का काम न करें क्योंकि उनकी ऐसी बातों से उन ताक़तों को और मजबूती मिलती है जो मुसलमानों को बदनाम करना चाहते हैं। संविधान की 1 बात सुविधानुसार उठाकर ले ली और बयान का बचाव करते हैं, जैसे हर बयान संविधान के अनुसार ही देते आए हैं।

आधार बिल 2016

पहले तो आधार बिल 2016 को लोकसभा में वित्तविधेयक बनाकर पेश किया गया फिर कल राज्य सभा में लाया गया। जिसमें सदन के उपाध्यक्ष और विपक्ष के नेताओं केसी त्यागी, नरेश अग्रवाल और सीताराम येचुरी के बीच जबारजस्ट बहस देखने को मिली। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने आधार बिल को मनी बिल के रूप में पेश करने पर सवाल उठाया। कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच विचार कर रही है। बिल लाने की जल्दी क्या थी। मनी बिल का रूप देकर राज्यसभा के अधिकार को चुनौती दी गई है। वित्त मंत्री ने कहा कि तब भी जबकि मामला अदालत में है, संसद के पास कानून बनाने के अधिकार सुरक्षित हैं। अगर पैसा भारत के राजकोष से संबंधित है तो वो मनी बिल हो सकता है। सवाल ज़रूर उठे मगर सवाल को स्वीकार नहीं किया गया। बहस मनी बिल के रूप में ही हुई। मनी बिल के तहत राज्यसभा किसी बिल में संशोधन सुझा सकती है मगर 14 दिन से ज्यादा रोक नहीं सकती। 14 दिन बाद इसे पास मान लिया जाएगा। मगर आज विपक्ष ने अपने एतराज़ों से सरकार को ऐसे घेरा कि कई संशोधनों को स्वीकार करना पड़ गया और बिल को फिर से पास होने के लिए लोकसभा में भेजा गया। वित्त मंत्री ने अमेरिका का उदाहरण दिया कि 1935 में ही अमेरिका ने सोशल सिक्योरिटी नंबर बना लिया था। हम 80 साल पीछे हैं। अमेरिका अमेरिका में इसे कई बार चैलेंज किया गया। इनकम टैक्स के लिए ज़रूरी किया, कई नीतियों और आर्थिक गतिविधियों, हथियार रखने के लिए इसे कंपलसरी किया गया। इसने उनकी नेशनल सिक्योरिटी में उन्हें मदद की। इसे लगातार चैलेंज दिया गया और हर मामले में उनकी अदालतों ने कहा कि नेशनल सिक्योरिटी एक सही वजह है। रवीश कुमार के प्राइम टाइम में पता चला कि 1906 में दक्षिण अफ्रीका में एक कानून आया था कि सभी एशियाई पुरुष को रजिस्टर कराना होगा और मांगने पर एक पहचान पत्र दिखाना होगा जिस पर उसके अंगूठे के निशान होंगे। जिसके पास ऐसा नहीं है तो उसे वापस जहाज़ से वहां भेज दिया जाएगा जहां से आया है। इसके खिलाफ गांधी ने जनसभा बुलाकर इस कानून को काला कानून घोषित कर मानने से इंकार कर दिया। गांधी ने पूरे कानून का विरोध करते हुए अंगूठे के निशान को लेकर भी विरोध किया। अमेरिका के सोशल सिक्योरिटी नंबर और भारत के आधार नंबर में एक बुनियादी फर्क ये है कि सोशल सिक्योरिटी नंबर के लिए बायोमेट्रिक पहचान नहीं ली जाती है। अर्थात आपकी उंगलियों के निशान, आंखों की पुतली का स्कैन नहीं किया जाता है। आधार को लेकर विवाद का बड़ा हिस्सा बायोमेट्रिक पहचान को लेकर भी है। अगर अमेरिका में 1935 में सोशल सिक्योरिटी नंबर आ गया था तो उस देश में आधार क्यों नहीं आया या सोशल सिक्योरिटी नंबर में बायोमेट्रिक पहचान क्यों नहीं जोड़ दी गई। जबकि सपनों के उस मुल्क में भी ग़रीब हैं और सरकार उन्हें सब्सिडी देती है।
पहले लोक सभा में वित्तमंत्री ने दो क़ानूनों के बारे में कहा था। 1986 का जुवेनाइल जस्टिस बिल और 1983 का अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक बिल मनी बिल के रूप में पेश किया गया था। इसका काउंटर कल जयराम रमेश ने राज्य सभा में अच्छे तरीके से करते हुए कहा कि दोनों ही मनी बिल नहीं थे। ये एक नोट मुझे राज्यसभा सचिवालय से मिला है लेकिन मैं चाहता हूं कि सदन के नेता बतायें कि ये जानकारी क्या मैन्युफैक्चर हुई कि दोनों मनी बिल थे। जेटली को जवाब देना पड़ गया कि उन्हें ये जानकारी लोकसभा की वेबसाइट से मिली है। राज्यसभा के उप सभापति पी।जे। कूरियन ने कहा कि ये डाटा एंट्री का मसला हो सकता है। इसे सदन में अलग से निपटाया जाएगा। वित्त मंत्री ने अपना उदाहरण दिया कि जब वे अपनी कार के लिए डीज़ल ख़रीदते हैं तो उन्हें सब्सिडी मिलती है जबकि नहीं मिलनी चाहिए। यह बहस चलती भी है कि डीज़ल कार की बिक्री इसलिए बढ़ती है क्योंकि डीज़ल सब्सिडी के कारण सस्ती होती है। अब वित्त मंत्री के उदाहरण से साफ नहीं हुआ कि क्या आधार कार्ड के इस्तेमाल से सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि डीज़ल की सब्सिडी सिर्फ किसान को ही मिले। बड़ी गाड़ी वालों को न मिले। किसानों को आधार कार्ड के ज़रिये अलग दर पर डीज़ल दिया जा सकता है। एक और कहीं से पता चला कि भारत में हर साल 5 लाख करोड़ की सब्सिडी हर साल दे दी जाती है। अगर इसका 20-25% भी आधार ट्रांसफर के ज़रिए बच जाता है तो बहुत फायदा होगा सरकार का। यही कारण है कि जब मोदी जी खुद विपक्ष में थे तो लगातार आधार को फालतू बताकर ट्वीट  करते थे, और आज पीएम बनने के बाद समर्थन में आ गए हैं। 
आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना है कि आधार को लेकर जो डेटा जमा हुआ है उसमें कोई भी विदेशी एजेंसी शामिल नहीं है। जो भी डेटा है वो विदेश में नहीं बल्कि भारत के बेंगलुरू और मानेसर में सुरक्षित रखा गया है।  वित्तमंत्री ने कहा कि अदालत अगर डेटा मांग दे तो हम उसकी शक्ति को सीमित नहीं कर सकते हैं। इस बिल के अनुसार ज़िला जज से ऊपर का कोई भी जज डेटा मांग सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अगर कोई सूचना किसी खास उद्देश्य के लिए साझा की जानी है तो वो फैसला संयुक्त सचिव स्तर का कोई अधिकारी करेगा। अगर कोई प्राइवेट एजेंसी आधार नंबर ले भी ले तो वो इसे लीक नहीं करेगी। ये उससे उम्मीद की जाती है या वो नहीं कर पाएगी इसके लिए सख्त प्रावधान है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने इस बिल का अध्ययन करते हुए सवाल किया है कि अगर बिल का मकसद सिर्फ सब्सिडी को सही लोगों तक पहुंचाना है तो फिर प्राइवेट एजेंसी को आधार का डेटा देने का क्या मतलब है। अगर आधार कानून का मकसद सिर्फ सब्सिडी को ज़रूरतमंद तक पहुंचाना है तो इसके दायरे में उन्हें क्यों शामिल किया गया जो सब्सिडी नहीं लेते हैं। इसके कई सार सकारात्मक पहलू हैं और नकारात्मक भी। लेकिन सबसे प्रमुख तो मुझे बायोमेट्रिक डेटा को लेकर ही पता है। हालाँकि राज्यसभा में जयराम रमेश के 4 अमेंडमेंट को माना गया है। बाकी की बहुत सारी जानकारियाँ अभी आनी बाकी है, जो बिल की ओरिजनल कॉपी पढ़ने के बाद पता चलेंगी।

Saturday, March 12, 2016

रियल एस्टेट बिल 2016

कल राज्यसभा में रियल एस्टेट बिल पास हो गया। जिसमें वेंकैया नायडू ने अच्छा भाषण दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी आकडे के अनुसार हर साल दस लाख लोग फ्लैट खरीदते हैं। 13 लाख 800 करोड़ का निवेश है इस सेक्टर में, 76000 से अधिक कंपनियां काम कर रही हैं। लेकिन इसके बाद भी आपको कई ऐसे प्रोजेक्ट मिलेंगे जो कई वर्ष बीत जाने के बाद भी पूरे नहीं हुए हैं। खरीदार जो कि कर्ज़दार भी है, ईएमआई और किराया दोनों चुका रहा है और लाचार होकर कभी बिल्डर के पास जाता है, कभी कोर्ट के पास तो कभी मीडिया के पास। कुल मिलाकर हालात नहीं बदलते हैं। लेकिन क्या राज्यसभा में पास हुआ बिल RERA (Real Estate Regulation and Development)  उन सब समस्याओं का संपूर्ण समाधान है। 
प्रोजेक्ट बेचने के लिए डेवलपर अक्सर जिस तरह के सुनहरे ख़्वाब अपने विज्ञापनों में दिखाते थे, खरीदार उसके झांसे में आ जाते हैं। लेकिन बाद में इनमें से कई प्रावधानों को बिना बताए बदल दिया जाता है। खरीदार और डेवलपर के बीच जो बिल्डर बायर्स एग्रीमेंट होता था वह लगभग एकतरफा होता था और फ्लैट ख़रीदने की शर्तों को तय करने में खरीदार की कोई भूमिका नहीं होती थी। अगर खरीदार पैसे देने में देरी करे तो 18 से 24% के हिसाब से ब्याज लगाया जाता है लेकिन अगर बिल्डर प्रोजेक्ट देने में देरी करे 4% की दर से ब्याज देने की बात की जाती है। यही नहीं जो पैनल्टी या ब्याज देने की बात बिल्डर करता है वह भी देने को तैयार नहीं होता है। बिल्डर सुपर बिल्टअप एरिया के आधार पर फ्लैट बेचता है, जिसमें वह तमाम कॉमन स्पेस का पैसा भी ख़रीदार से ले लेता है, जबकि ख़रीदार को सिर्फ कारपेट एरिया यानि वही हिस्सा मिलता है जो उसके घर की चहारदीवारी के अंदर हो। घर सौंपने के नाम पर पूरा पैसा ले लिया जाता है लेकिन कई क्लीयरेंस नहीं मिलने का हवाला देकर घर देने में काफी देरी की जाती है। और अगर बिल्डर की मनमानी के खिलाफ़ ख़रीदार कोर्ट में जाता है तो उसे लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। देश की अदालतों में ऐसे हजारों केस इस समय चल रहे हैं।
तो क्या नया रियल एस्टेट बिल आपको इन तमाम दिक्कतों से मुक्ति दिला देगा। नए बिल के अनुसार सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रियल एस्टेट को नियमित करने के लिए रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी बनाई जाएगी। इस अथॉरिटी के तहत सभी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स और रियल एस्टेट एजेंट्स को अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा। यह बिल सभी रिहायशी और कमर्शियल रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स पर लागू होगा। यह बिल जिस दिन से लागू होगा उस दिन तक जितने भी प्रोजेक्ट्स पूरे नहीं हुए होंगे यानी कम्पलीशन सर्टिफिकेट नहीं मिला हुआ होगा, वह सब इसके तहत आ जाएंगे। किसी भी प्रोजेक्ट की बिक्री तब तक शुरू नहीं की जा सकती जब तक कि सभी जरूरी विभागों से मंजूरियां न मिल जाएं। बिल्डर अभी तक किसी भी प्रोजेक्ट में देरी के लिए यह बहाना बना देते थे कि उन्हें समय पर सभी मंजूरियां नहीं मिलीं। इसलिए बिल का यह प्रस्ताव भी काफी अहम है। मकान का कब्ज़ा देने में देरी पर बिल्डर पर लगने वाला ब्याज उस ब्याज से कम नहीं होगा जो बिल्डर देरी से पेमेंट देने पर ग्राहकों से वसूलता है। इस एक्ट के तहत दो तिहाई ग्राहकों की लिखित इजाजत के बिना मंजूर हुई योजना में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। इस एक्ट के तहत प्रोजेक्ट के पूरा होने की तिथि के बाद अधिकतम बारह महीने की देरी का ही प्रावधान है। यह बिल इस बात को सुनिश्चित करता है कि जो भी प्रचार सामग्री में दर्शाया गया होगा, अब दस्तावेज़ माना जाएगा। बिल्डर शर्तें लागू टाइप लिखकर नहीं बच सकते। यही नहीं अब उन दस्तावेजों का इस्तेमाल बिल्डर के खिलाफ सबूत के तौर पर किया जा सकेगा। अगर बिल्डर इस क्लॉज़ का उल्लंघन करता है तो उसे पैनल्टी और मुआवजा देने को बाध्य किया जा सकेगा।
किसी भी प्रोजेक्ट के लिए उसके ग्राहकों से वसूली गई रकम का सत्तर फीसदी किसी शेड्यूल्ड बैंक में एक एकाउंट में रखना होगा और इसे निर्माण पर ही खर्च किया जा सकेगा। अभी देरी की एक बड़ी वजह यह होती है कि बिल्डर एक प्रोजेक्ट का पैसा किसी दूसरे प्रोजेक्ट में लगा देते हैं। खास तौर पर लैंड बैंक बनाने में यह पैसा खर्च कर दिया जाता है जिससे बिल्डर के सामने तय प्रोजेक्ट के लिए पैसे की दिक्कत आ जाती है और उसमें देरी हो जाती है। बिल्डरों को अपने एकाउंट का ऑडिट भी कराना होगा ताकि एकाउंट से पैसे की निकासी पर निगरानी रखी जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह निर्माण के अलावा किसी और काम के लिए इस्तेमाल न हो सके। वैसे यह तो आसानी से होता रहेगा।  बिल्डरों को निर्धारित समय के अंदर रेगुलेटर की वेबसाइट पर निर्माण का स्टेटस अपडेट करते रहना होगा। वैसे इस बिल में कुछ कमियाँ भी बताई जा रही हैं, जिसमें सबसे प्रमुख यह कि कोई भी बिल्डर जेल नहीं जाएगा दूसरी कमी यह है कि  दूसरी बड़ी खामी यह बताई जा रही है कि इस बिल में रेगुलेटर बनाने का काम राज्य पर छोड़ दिया गया है। ऐसे में राज्य सरकारें अपनी इच्छा के मुताबिक रेगुलेटर की नियुक्ति कर सकती हैं। हो सकता है कई बार यह रेगुलेटर ख़रीदारों से ज्यादा उस लॉबी के दबाव में रहें जिसकी किसी सत्ता में चलती हो।  तीसरी खामी यह है कि जितनी भी डेवलपमेंट अथॉरिटी हैं जैसे डीडीए, जीडीए, नोएडा विकास प्राधिकरण वगैरह उनका इस बिल में ज़िक्र नहीं है। यह नहीं बताया गया है कि रेगुलेटर के साथ उन्हें कैसे काम करना है, जबकि इन प्राधिकरणों की बड़ी भूमिका होती है। यह बिल 500 वर्ग मीटर या उससे अधिक के प्लॉट पर ही लागू होगा, लेकिन इससे बॉम्बे जैसी जगहों पर असर पड़ेगा जहां 500 वर्ग मीटर के अंदर बिल्डर कई यूनिट बनाकर बेच देते हैं। वैसे इस बिल के बारें अब तक मीडिया में ही सुनते और पढ़ते रहा हूँ राज्य सभा में हुई बहस को भी बाद में  देखा था जिसमे उपरी तौर पर आई हुई बातों के बारे में लिख रहा हूँ. जब बिल की कॉपी हाथ में आएगी तो और खामियाँ या मजबूत पॉइंट बता पाऊँगा. वैसे यह सरकार का सराहनीय कदम है 

Tuesday, March 8, 2016

महिला दिवस विशेष टिप्पणी

आज इंडियन एक्सप्रेस में कन्नूर के एक कलाकार मुरली का इंटरव्यू पढ़ रहा था, जिसमें वो कहते हैं क़ि करथॅला नामक क्षेत्र की महिला नेंगाली ने ब्रेस्ट कवर टैक्स के खिलाफ आंदोलन किया था (in 1803 Year) । वहीं पर उसका बलिदान हुआ था, जिसे मलयालम में मूलाचिपा राम्बु (महिला के स्तन का स्थान) कहते हैं। वह महिला लगभग 29-30 साल की थी, वहाँ पर एक क़ानून था जिसमें महिलाओं के स्तन ढकने पर टैक्स होता था। जिस महिला के स्तन जीतने बड़े होते थे, उतना ही अधिक टैक्स देना पड़ता था। लेकिन इस बलिदान के बाद यह टैक्स हटा लिया गया था। 
फिर दूसरी बात का पता चलता है जब मैने महाराष्ट्र विधानसभा की वेबसाईट पर जाकर कुछ नए क़ानूनो के बारे में जानकारी लेनी चाही। दिसंबर में मैं मुंबई के ग्रांडरोड गया था, एक कोलकाता से आई रिसर्च फेलो के साथ। वो भारत के रेडलाइट एरिया की सामाजिक स्थितियों पर काम कर रही हैं। वो मेरे लिए काफी यादयादगार और अंदर से हिला देने वाला अनुभव था। इस दौरान महाराष्ट्र सरकार ने एक अच्छा कदम उठाया है। अब से महाराष्ट्र में डांस बार को लेकर अब राज्य सरकार नए कायदे लाने की कोशिश में है। महाराष्ट्र सरकार बार बालाओं के लिए तय वेतन और काम करने के तय घंटे जैसे नियम लाने की कोशिश में है। साथ ही बार में काम करने वाली महिलाओं को घर से लाने ले जाने की जिम्मेदारी बार मालिकों की होगी यह भी कहा गया है। गृह राज्यमंत्री रंजीत पाटिल ने कहा कि बार बालाओं का शोषण रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है। होटल और बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रवीण अग्रवाल का कहना है कि बार मालिक हमेशा से बार में काम करने वाली लड़कियों की सुरक्षा का खास ख्याल रखते आए हैं। नए नियमों के मामले में सरकार को पहले बार मालिकों से बात करनी चाहिए थी और उनका भी सुझाव लेना चाहिए था। फिलहाल सरकार कुछ और नियमों के साथ डांस बार पर कानून का दायरा बढ़ाने की कोशिश में है।
फिर गूगल करते करते एक अजीब आकड़ा सामने आया। अंतररास्ट्रीय महिला दिवस पर ब्लाग की रिसर्च के लिए एक मित्र से मिली मैगजीन पढी। जिसमें एक सच्चाई से रूबरू हुआ। सचाई यह कि हमारा देश संसार के उन दस देशों में शामिल है जहां की आबादी में पुरुषों की तुलना में महिलाओं का प्रतिशत न्यूनतम है। इन चुनिन्दा दस देशों में सबसे ऊपर है कतर जहाँ मात्र 23.4 प्रतिशत महिलायें है यानी एक चौथाई से भी कम… और सबसे नीचे है सामोआ जहाँ 48.4 प्रतिशत महिलायें है। बाकी के आठ देश क्रमानुसार इस प्रकार है।
2:UAE
3: ओमान
4: बहरीन
5: कुवैत
6: सउदी अरब
7: भूटान
8: चायना.......... इस सूची में भारत नवें नंबर पर है। परन्तु सबसे अधिक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस सूची में पाकिस्तान शामिल नहीं है यानी महिला पुरुष अनुपात के मामले में हम पाकिस्तान से भी गये बीते हैं। लिंगानुपात के मामले में गुजरात 22वें नंबर पर आता है। हरियाणा और राजस्थान के हाल तो और भी खतरनाक हो रहे हैं। मोदी जी की बेटी बचाओ, बेटी पढाओ योजना बहुत अच्छी है, उम्मीद है कि वो महिला आरक्षण बिल पास कराने की कोशिश करेंगे। जिससे महिला शक्ति मुंबई दिल्ली के बाहर भी स्थापित हो सके। जैसा कि आपने देखा कि कैसे स्त्रियों की संख्या से लेकर उनके अधिकारों तक में आसमानताएँ नज़र आती हैं। ऐसे में सामाजिक असमानता को देखते हुए महिला आरक्षण होना आवश्यक है। आरक्षण का अर्थ ही होता है, सामाजिक पिछड़े समाज को आगे बढ़ाना। यह बिल लोकसभा में पास होना है। मोदी जी के पास बहुमत है, अगर वो सच में बेटी को पढ़ना और बचाना चाहते हैं तो पास करें यह बिल। जिन राज्यों में पंचायतों में महिला आरक्षण दिया है, वो सराहनीय है। और जो लोग महिला आरक्षण का विरोध करते हैं वो मनुवादी सोंच के समर्थक हैं। वही मनुवाद जो कहता है क़ि महिलाओं को घर में शोभा बनाकर ही रखा जाए। वही मनुवादी सोंच जब संघ के संस्थापक और मोदी जी के गुरु गोलवलकर कहते हैं कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए। तभी तो आर एस एस में महिलाओं को एंट्री नहीं है। वही मनुवादी सोंच जब तोगड़िया महिलाओं को जिंदा बम बताते हैं। जिन्हे घर से बाहर ना निकालने दिया जाए। एक ही नहीं न जाने कितने मुल्ला मौलानाओं की सोंच भी तालिबानी है तो फ़तवे देते हैं महिला अधिकारों के खिलाफ। आप सोँचकर देखिए कि अगर महिलाओं के आरक्षित लोकल ट्रेन के डब्बे और बस की सीटें। बंद हो गए तो क्या होगा? यह भी आरक्षण ही है। हम तो बात मैरीटल रेप को भी क़ानूनी अधिकार बनाने की बात करते हैंआख़िर क्यों शादी के बाद सेक्सुअल रिलेशनशिप केवल पुरुष के हिसाब से ही चलती है देश के सरकारी सर्वे के अनुसार 76% महिलाओं की आज़ादी नहीं चलती है, सेक्सुअल रिलेशंस में शादी के बाद. जब शादी दोनो करते है, दोनो के अधिकार बराबर हैं तो महिला को भी हाँ या ना कहने का अधिकार है। हम तो ऐसे कानून की बात करते हैं जिसमें औरतों के पीरियड्स में उन्हें सरकारी या प्राइवेट जाॅब में छुट्टी मिले। उन्हें इस दौरान अशुद्ध न कहा जाए। भगवान के मंदिर,  पूजाघर या रसोई में जाने से न रोका जाए। क्योंकि उन्हें भागवत ने ही यह सब दिया है। बातें तो बहुत हैं जिससे सरकारों पर ही हमला कर सकता हूँ लेकिन राजनैतिक के साथ साथ सामाजिक ज़िम्मेदारी होती है। बहुत लंबी लड़ाई है, क़ानूनी, राजनैतिक और सामाजिक तौर पर लड़ना है, यह केवल महिलाएँ ही नहीं समानता की बात करने वाले हम जैसे पुरुषों को भी लड़ना है।  निकलना है उस मानसिकता से जो कॉलेज में लड़कियों को देखकर माल या आइटम जैसे बाजारू शब्दों से ऊपर सोचना होगा 
अब आता हूँ महिला दिवस पर। महिला-दिवस सुनकर बड़ा अजीब लगता है। क्या हर दिन सिर्फ पुरुषों का है, महिलाओं का नहीं? पर हर दिन कुछ कहता है, सो इस महिला दिवस के मनाने की भी अपनी कहानी है। कभी महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई से आरंभ हुआ यह दिवस बहुत दूर तक चला आया है, पर इक सवाल सदैव उठता है कि क्या महिलाएं आज हर क्षेत्र में बखूबी निर्णय ले रही हैं। मात्र कुर्सियों पर नारी को बिठाने से काम नहीं चलने वाला, उन्हें शक्ति व अधिकार चाहिए ताकि वे स्व-विवेक से निर्णय ले सकें। आज नारी राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है, यहाँ तक कि आज महिला आर्मी, एयरफोर्स, पुलिस, आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे क्षेत्र में नित नई नजीर स्थापित कर रही हैं। यही नहीं शमशान में जाकर आग देने से लेकर पुरोहिती जैसे क्षेत्रों में भी महिलाएं आगे आ रही हैं। रुढियों को धता बताकर महिलाएं हर क्षेत्र मेंपरचम फैलाना चाहती हैं। वर्तमान दौर में नारी का चेहरा बदला है। नारी पूज्या नहीं समानता के स्तर पर व्यवहार चाहती है। सदियों से समाज ने नारी को पूज्या बनाकर उसकी देह को आभूषणों से लाद कर एवं आदर्शों की परंपरागत घुट्टी पिलाकर उसके दिमाग को कुंद करने का कार्य किया, पर नारी आज कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, पीटी उषा, किरण बेदी, कंचन चैधरी भट्टाचार्य, इंदिरा नूई, शिखा शर्मा, किरण मजूमदार शाॅ, वंदना शिवा, चंदा कोचर, ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन, फ्लाइंग आॅफिसर सुषमा मुखोपाध्याय, कैप्टन दुर्गा बैनर्जी, ले.जनरल पुनीता अरोड़ा, सायना नेहवाल, संतोष यादव, निरुपमा राव, कृष्णा पूनिया, कुंजारानी देवी, इरोम शर्मिला, मेघा पाटेकर, अरुणा राय, जैसी शक्ति बनकर समाज को नई राह दिखा रही है और वैश्विक स्तर पर नाम रोशन कर रही हैं। नारी की शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व विकास के क्षितिज दिनों-ब-दिन खुलते जा रहे हैं, जिससे तमाम नए-नए क्षेत्रों का विस्तार हो रहा हैं। कभी अरस्तू ने कहा कि -“स्त्रियाँ कुछ निश्चित गुणों के अभाव के कारण स्त्रियाँ हैं” तो संत थाॅमस ने स्त्रियों को “अपूर्ण पुरूष” की संज्ञा दी थी, पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसे तमाम सतही सिद्वान्तों का कोई अर्थ नहीं रह गया एवं नारी अपनी जीवटता के दम पर स्वयं को विशुद्ध चित्त (Being-for- itself : स्वयं में सत् ) के रूप में देख रही है। आज यदि नारी आगे बढ़ना चाहती है तो उसके स्वाभाविक अधिकारों का दमन क्यों? पर इन सबके बावजूद आज भी समाज में बेटी के पैदा होने पर नाक-भौंह सिकोड़ी जाती है, कुछ ही माता-पिता अब बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं समझते हैं....आखिर क्यों ? क्या सिर्फ उसे यह अहसास करने के लिए कि वहनारी है। वही नारी जिसे अबला सेलेकर ताड़ना का अधिकारी तक बताया गया है। सीता के सतीत्व को चुनौती दी गई, द्रौपदी की इज्जत को सरेआम तार-तार किया गया तो आधुनिक समाज में ऐसी घटनाएँ रोज घटित होती हैं। तो क्या बेटी के रूप में जन्म लेना ही अपराध है। मुझे लगता हैकि जब तक समाज इस दोहरे चरित्र से ऊपर नहीं उठेगा, तब तक नारी की स्वतंत्रता अधूरी है। सही मायने में महिला दिवस की सार्थकता तभी पूरी होगी जब महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, वैचारिक रूप से संपूर्ण आज़ादी मिलेगी, जहाँ उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा, जहाँ कन्या भ्रूण हत्या नहीं की जाएगी, जहाँ बलात्कार नहीं किया जाएगा, जहाँ दहेज के लोभ में नारी को सरेआम जिन्दा नहीं जलाया जाएगा, जहाँ उसे बेचा नहीं जाएगा। समाज के हर महत्वपूर्ण फैसलों में उनके नज़रिए को समझा जाएगा और क्रियान्वित भी किया जायेगा। जरुरत समाज में वह जज्बा पैदा करने का है जहाँ सिर उठा कर हर महिला अपने महिला होने पर गर्व करे, न कि पश्चाताप कि काश मैं लड़का के रूप में पैदा होती। 

Monday, March 7, 2016

कन्हैया मांगे आजादी

कुछ लोगों को भारत के बारे में ज़रा सी भी जानकारी नहीं है, खुद तो कुछ लिख नहीं सकते हैं, इसलिए किसी के भी फर्जी तरीके से बनाए गए फोटोसोप की चीज़ को शेयर कर देते हैं. असल में ऐसे लोग बड़े पूंजीवादी और सामंतवादी हैं. अगर वो ऐसे नहीं हैं तो उनको पता ही नहीं होगा कि उनके माँ बाप घर कैसे चला रहे हैं इस मंहगाई के दौर में. उन्हें देशभक्ति का मतलब ही नहीं पता है.केवल इंडिया इंडिया चिल्ला देना और किसी को फेसबुक पर गाली देना देशभक्ति लगती है.
गाँव में एक कहावत है अंडे में भाटा (जोड़ना)......किसी भी चीज़ को किसी जगह जोड़ देते हैं. फेसबुक पर कहीं की चीज़ों को कहीं पर फोटोशॉप से एड करके कुछ गैरतार्किक वाक्य लिखना उन्हें बड़ा क्रांतिकारी लगता है. 2 मिनट नहीं टिक पाएँगे कहीं बौद्धिक विमर्श में. भला एक इंजीनियर और लेखक या पीएचडी स्टूडेंट को एक दूसरे से कमपेयर करने का क्या मतला होगा? इंजीनियर का काम इंजीनियरिंग करना है, वो कर रहा है, देश उसको सलाम करता है. लेखक का काम लिखना है, वो लिखता है. समाज वैज्ञानिक अपना काम करता है, वैज्ञानिक अपना काम करता है. भारत एक शरीर है, उसका हर एक नागरिक एक अंग है, भला कोई कह सकता है कि आँखे ज़्यादा ठीक हैं, हाथ तो बेकार है, या फिर हाथ के आगे पैर की क्या औकात?
अगर कोई ऐसा बोलता है तो शरीर(देश) का सबसे बड़ा दुश्मन वही इंसान है. किसान भी हमारे ही पिता हैं, और सेना में भी हम गाँव वालों और ग़रीबों के भाई लड़ते हैं, ये मुंबई में बैठे फर्जी राष्ट्रवादी किसी और का चुराया हुआ फोटोशॉप पोस्ट शेयर करके देशभक्ति दिखाते हैं. भला होता क़ि ये लोग कभी राष्ट्रगान के रचायता रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी पढ़ लेते. लेकिन पढ़ना लिखना नहीं जो भी मिले भड़काऊ उसे जल्दी से जल्दी शेयर करो....... वही बात हुई कि नाख़ून काट के शहीद बनना चाहते हैं. उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है जनाब. यही कन्हैया है जिसका भाई सीआरपीएफ में था और नक्सली हिंसा में मारा गया था. लेकिन कुछ लोग बिना सोचे समझे हनुमनथप्पा को उसके सामने फोटोशॉप से खड़ा करके चिल्लाने लगते हैं. जबकि हनुमनथप्पा को वो हर भाषण में सलाम करता रहा है.  क्योंकि खुद तो उसके सामने टिक नहीं सकते हैं, इसलिए किसी और को खड़ा कर देंगे, हो सकता है कि वो सामने वाला इंसान भी उसका ही समर्थक हो. हिम्मत है तो करो ऐसी तार्किक बहस. लेकिन नहीं गाली दे सकते हैं और बिना किसी सबूत और तर्क के कह देंगे तुम आतंकवादी के समर्थक हो. जबकि अपने काका से नहीं पुंछ रहे हैं कि वो क्यों महबूबा के साथ सरकार बनाए हैं. इनकी बात में दम ही नहीं है, अगर सच में विचारों की बहस करनी पड़ जाए तो 2 मिनट में भाग जाएँगे. हम किसी से मतभेद रखते हैं मनभेद नहीं. कल रात को जैसे ही पता चला हमने स्मृति ईरानी के एक्सीडेंट पर उनकी सेफ्टी के लिए शुभकामनाओं और प्रार्थना का ट्विट किया. लेकिन ये नफ़रत फैलाने वाले लोगों को कोई बात पता ही नही है सुनी सुनाई बातों पर कुछ भी बक देते हैं. मैं मोदी जी और राजनाथ के भाषणों की कला का बड़ा फ़ैन रहा हूँ, जब कभी भी अगर उनकी आलोचना की है तो किसी भी भाषण को 2-3 बार सुनने के बाद, उसमें हुई कमियों पर पड़ताल करके. अगर कोई मुझे उसपर ग़लत साबित करता है तो हमेशा ही देश खुद को सुधारा है. लेकिन कन्हैया के आलोचकों के क्या हाल हैं? आजतक किसी भी सबूत को पेश नहीं किया जा सका है जिसमें कन्हैया ने देशद्रोही नारे लगाए हों. 11 फ़रवरी और 3 मार्च के भाषण में वो कहीं भी देश के खिलाफ नहीं बोला केवल और केवल एक नफ़रत की विचारधारा का विरोध करता है जिसने गाँधी को मारा था. 2-3 दिन से मीडिया में उसके 20-15 इंटरव्यू हो चुके हैं वो हर जगह नेहरू, गाँधी, अंबेडकर के सपने के भारत की बात करता है, हर काम वो संविधान के दायरे में रहकर करना चाहता है. फिर भी किस आधार पर आप उसे गोली मारने की बात कह रहे हैं. उसे किस आधार पर देशद्रोही कह सकते हैं? कम से कम उसकी बात सुन लो फिर उसकी आलोचना करो. बिना किसी के विचार सुने और समझे उसपर चिल्लाना आपको मानसिक रूप से बीमार कर सकता है. आपको चाहिए कि आप खुद का ईगो छोड़कर उसे एक बार सुने, मुझे पूरी उम्मीद है कि वो विचारों से आपको जीत लेगा. क्योंकि वो ग़रीबों, मजदूरों, पिछड़ों, दलितों, महिलाओं, आदिवासियों और हर तरह के अल्पसंख्यकों की बात करता है. अगर आपको लगता है कि ये मुद्दे ग़लत हैं तो आप उसे गोली मार सकते हैं. लेकिन भगवान  के लिए एक बार सुनकर ही गाली दो.
विचारों की लड़ाई विचारों से होती है. किसी को गोली मारकर ख़त्म किया जा सकता है यह सोंच तो गाँधी के खिलाफ नाकाम हो चुकी है, जिसने मारा था उसके ही चेले चपाटे आजकल गाँधी के नाम से हज़ारों करोड़ फूँक कर अपना प्रचार करने में लगे हैं. विदेशों में जाकर वही गाँधी याद आते हैं. मतलब जब उनके दिलों में जिंदा हैं तो बाकी  उनके फालोवर्स के लिए तो बात ही अलग है. भाजपाइयों ने सवाल किया है कि देश का पेड मीडिया जिसने मोदी को बनाया, आज कन्हैया कुमार का समर्थन करने के लिए उठ खड़ा हुआ है इसका पेमेंट कौन कर रहा है? क्या आपको भी लगता है कि कन्हैया का प्रचार धन लेकर किया जा रहा है?

Thursday, March 3, 2016

क्या गाँवो के अच्छे दिन आएँगे?

मौजूदा हालात में गरीब के घर को गांव पुकारा जाने लगा है। किसानों के लिए इस बजट में सरकार द्वारा बहुत बड़े बड़े वायदे किए गए हैं। सबसे पहला और क्रांतिकारी वायदा है, 2022 तक हर किसान की आय दुगुनी हो जाएगी। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के अनुसार देश में 17 राज्यों में 70% से भी अधिक किसानों की वार्षिक आय बीस हज़ार रुपये हैं। इसे आप महीने में बांटेंगे तो करोड़ों किसानों की मासिक औसत आय 1662 रुपये होती है। हमारा किसान इतने कम पैसे में कैसे जीता होगा यह सोचना बंद ही कर दीजिये तो ठीक रहेगा। यह आकड़ा बेहद भयावह है, क्या होगा ऐसे देश में किसानों का? हमारे देश में 70% से अधिक जनसंख्या गाँवो रहती है, उसमें भी अगर 70% की यह हालत है तो क्या अर्थ हुआ? अब अगर प्रधानमंत्री अपने वादे में सफल रहे तो साल 2022 में यही दुगनी होकर 3332 रुपये हो जाएगी। मुद्रास्फीति को शामिल कर लें तो इस रक़म की भी कोई हैसियत नहीं रहेगी। यह आँकड़ा देश के एवरेज में देखने पर भी कोई 3000 तक ही रह जाता है। ऐसे में हम कैसे खुश हो सकते हैं कि हमारे किसान 5-6 साल बाद 3-4 हज़ार रुपए महीने के कमाने लगेंगे। देश के ज्यादातर गरीब, किसान और खेतिहर मजदूर ही हैं।  इस बजट में इन उम्मीदों के पूरे होने का प्रबंध कहां दिखता है....?  न्यूनतम समर्थन मूल्य तक का कहीं जिक्र नहीं आया। उसे बैंक से कर्ज लेने के लिए नौ लाख करोड़ के आंकड़े के जिक्र की तुक क्या है। सबको पता है किसानों की अब और कर्ज लेने की हैसियत चुक गई है। इन सवालों के जवाब बजट के शब्दों से नहीं, बल्कि वस्तुनिष्ठ आंकड़ों से मिल सकते है। एक बात को लेकर मैं निजी तौर पर असमंजस में हूँ क़ि अभी तक यह भी साफ नहीं हो पा रहा है कि सरकार खेती की आमदनी को डबल कर देगी या ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों की आमदनी डबल कर देगी। प्रधानमंत्री तो किसान का ही नाम ले रहे हैं मगर गांव में सिर्फ किसान नहीं रहता है।
अगर सरकार किसानों की आमदनी डबल ही करना चाहती है तो फ़सलों की लागत का पचास फीसदी जोड़ कर दाम देने की बात क्यों नहीं करती? बीजेपी ने अपने घोषणापत्र के "पेज 44" पर लिखा है कि सुनिश्चित किया जाएगा कि लागत का पचास फीसदी लाभ हो। सरकार बताये कि इसे सुनिश्चित करने के लिए क्या कर रही है? समर्थन मूल्यों में वृद्धि की हालत देखकर तो नहीं लगता न ही लागत में कोई कमी आई है। अभी जो समर्थन मूल्य मिलता है उससे बहुत मुश्किल से लागत निकल पाता है। क्या सरकार ने कोई नया फ़ार्मूला खोज लिया है जिसके दम पर इनकम डबल करने का दावा कर रही है। अगर ऐसा है तो यही बात साफ साफ कही जानी चाहिए। सरकार एकीकृत बाज़ार की बात करने लगी है। बाज़ार के सिस्टम में बिल्कुल सुधार होना चाहिए लेकिन यह अभी साफ नहीं है कि इससे क़ीमतों में उछाल ही आ जाएगा। अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा ने टीवी पर एक उदाहरण दिया कि कर्नाटक में दो सौ मंडियों को एकीकृत किया गया है फिर भी टमाटर के दाम लागत से कम है। चुनावी चर्चाओं के दौरान किसानों के लिए आय आयोग की बात चली थी वो बात भी नए नए सपनों में खो चुकी है। रही बात इस बार के बजट में गांवों की तरफ ध्यान देने की तो वो स्वागत योग्य है। लेकिन हर मद में चंद हजार करोड़ की वृद्धि कर देने से ही मंज़िल आसान नहीं होने वाली। गांवों में बुनियादी ढांचे के विकास से रोज़गार व्यापार के अवसर बढ़ेंगे लेकिन सबके लिए बढ़ेंगे कोई ज़रूरी नहीं। उन जगहों पर जाकर देखना चाहिए जहां सड़कें अच्छी हैं और सिंचाई के साधन बेहतर। पंजाब एक उदाहरण हो सकता है। वहां खेती और किसान की हालत ख़स्ता है। बुंदेलखंड, तेलंगाना और विदर्भ के सूखाग्रस्त इलाक़ों के लिए सरकार क्या योजना ला रही है जिससे किसान आत्महत्या ना करें? ऐसा कोई रोडमैप अबतक सामने आया नहीं है। स्मार्टसिटी और डिजिटल इंडिया बनाने की बात की जाती है, लेकिन मुझे समझ में नहीं आता है क़ि शहरों की 6.5 करोड़ आबादी जो स्लॅम में रहती है, (एनएसएस की रिपोर्ट के अनुसार) वो रातो रात स्मार्ट कैसे हो जाएगी। बुनियादी चीज़ों की ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं और बातें आसमान में उड़ने की। सपने बड़े कर दो लोग भूल जाएँगे। एक बार का उदाहरण है, कि उत्तराखंड में बाढ़ आ गई, तो अधिकारियों ने मंत्रीजी से कहा क़ि पानी ख़तरे के निशान से ऊपर जा रहा है क्या किया जाए? तो वो बोले ख़तरे का निशान 2 फुट ऊपर कर दिया जाए। इसी तरह पहले 32 रुपए रोज कमाने वाला ग़रीब था, अब दो साल पहले उसे 25 रुपए कर दिया। सब ग़रीब पेपर्स पर ग़रीबी रेखा से ऊपर हो गए। क्या भद्दा मज़ाक है यह ग़रीबी के साथ? इसी तरह लोग कहते हैं कि देश में बहुत लोगों को दूध नहीं पीने को मिलता है तो छास का नाम बदलकर दूध कर दो, तो सब पीने वालों की गिनती में आ जाएँगे। यह तो वही हो गया कि शियार को पीट पीट कर कबूल करवा लो कि वही शेर है, अन्यथा शेर की परिभाषा ही बदल दी जाए, जिससे हमारे देश में शेरों की संख्या बदल जाए। यह जुमलों का देश है भाई, हरिजन (मंदिर में घुसने ना देना और हरिजन कहना कितना बड़ा मज़ाक था) और दिव्यांग शब्द ऐसे ही हैं, जबकि गुजरात के भरोट जिले में विकलांगों की बैसाखी और साइकिल में भी भ्रष्टाचार हुआ है। ऐसा पहले कांग्रेस के जमाने में सलमान खुर्शीद कर चुके हैं। खैर कांग्रेस की सरकारों से तो अच्छा ही किसानों के लिए दिया गया बजट कहा जा सकता है। बस ऐसा ना हो कि कहीं यह भी बिहार के पैकेज जैसे ना निकल जाए. क्योंकि अभी 4-5 राज्यों के चुनाव आने वाले हैं।

Wednesday, March 2, 2016

दुविधा भरे सपने दिखता बजट

कल बजट का दिन था, जो अंदेशा था, वही हुआ। बजट में शब्द ही शब्द भरे हैं, आंकड़े ढके-छिपे हैं। साफ-साफ पता नहीं चला कि सरकार ने खेती-किसानी पर ज्यादा गौर किया या उद्योग-व्यापार पर। इस बात का सबूत यह है कि सरकारी दावा भी संतुलित बजट के प्रचार का है। हालांकि कुछ दिनों से माहौल बनाया जा रहा था कि इस बार सरकार का ध्यान गांव, किसान और गरीबी पर होगा, और बजट देखकर यह बात भी सिर्फ कथनी साबित हुई। करनी में उद्योग-व्यापार बचाने पर ही ध्यान लगा दिखा। सरकार को संतुलित बजट का प्रचार करना पड़ा। ऐसे प्रचार के चक्कर में अब अंदेशा है कि मझोले तबके वाला उद्योग जगत भी मुंह फुलाकर बैठेगा। उनके निवेशक बजट भाषण के बीच में ही शेयर बेचने पर उतारू हो गए थे। वह तो बजट के सरकारी पक्ष वाले विश्लेषकों ने शेयर बाजार को जमीन से उपर उठाया। इधर किसान को तो बजट समझ में आने की कोई स्थिति है ही नहीं। वह तो सिर्फ अपने कर्जो की माफी के इंतजार में था। खेतिहर मजदूरों पर तरस खाने वालों को मनरेगा की रकम कम से कम दोगुनी होने की उम्मीद थी। दोनों ही निराश हुए।
वैसे, इसमें भी कोई शक नहीं कि देश की माली हालत उतनी अच्छी नहीं थी कि उद्योग-व्यापार जगत को छप्पर फाड़कर कुछ दिया जा सके। हां, इस बजट की सबसे बड़ी खासियत यह जरूर है कि बजट आश्वासनों और बहुत दूर के सपनों से भरा हुआ है। यानी अच्छे दिनों की उम्मीद को एक और साल आगे टिकाकर रखा गया है। किसानों को हाल के हाल कुछ मिलता नहीं दिखता। उसे यह आश्वासन थमाया गया है कि अगले पांच साल में उनकी आमदनी दोगुनी करने के लिए कुछ किया जाएगा।
सिर्फ अपने देश में नहीं, पूरी दुनिया में सरकारों ने आर्थिक वृद्धि को ही अपने प्रदर्शन का आधार बना रखा है। अपने देश के मामले में अभी पक्का नहीं है, सिर्फ अनुमानित दावा है कि पिछले साल की आर्थिक वृद्धि दर सात से साढ़े सात फीसदी बैठेगी। इस अनुमान के आधार पर आगे का अनुमान यह लगाकर बताया गया है कि इस साल के बजट से यह बढ़कर अगले साल आठ फीसदी हो जाएगी। अगर यह सही भी निकल आए तो इस आंकड़े से खुशफहमी पैदा करते समय क्या जनता को यह भुला दिया जाएगा कि अभी चार साल पहले ही इससे ज्यादा आर्थिक वृद्धि दर की आलोचना हमने जोर-शोर से की थी। यह कहते हुए यूपीए सरकार की आलोचना की थी कि यह आर्थिक वृद्धि जॉबलैस, यानी रोजगारविहीन आर्थिक वृद्धि है। उस दौर में किसानों के कर्जे माफ करने, मनरेगा, कौशल विकास और सिंचाई परियोजनाओं पर ज्यादा खर्च किया गया था। सबसे ज्यादा आस मनरेगा की रकम दोगुनी बढ़ने की थी, लेकिन वह सिर्फ 34 से बढ़कर 38 हजार करोड़ ही की गई। इसे नगण्य ही माना जाएगा। बजट पेश होने के ऐन पहले तक सबसे बड़ी जिज्ञासा बजट के आकार को लेकर थी। गैर-सरकारी अर्थशास्त्रियों का तर्कपूर्ण अनुमान था कि इस बार बजट का आकार बढ़कर कम से कम डेढ़ गुना हो जाएगा। उनका तर्क था कि टूजी-थ्रीजी जैसे आवंटनों, कोयला खदानों की भ्रष्टाचारमुक्त नीलामियों से पांच-सात लाख करोड़ की आमदनी बढ़ेगी, लेकिन यह आमदनी बढ़ी नहीं दिखी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम एक चौथाई रह जाने से सरकार का खर्चा खूब कम होने से कई लाख की बचत अलग से हुई, लेकिन बजट आकार में बढ़ोतरी नहीं दिखने को हैरत ही माना जा रहा है। बजट आकार न के बराबर बढ़ना यह बताता है कि सरकार अपने सुशासन से आमदनी नहीं बढ़ा पाई। आमदनी न बढ़ पाने के पीछे क्या कारण बताए जाएंगे, इस रहस्य को जांचने-समझने में अभी समय लगेगा।
एक करोड़ से ज्यादा कमाने वालों पर 15 प्रतिशत का सरचार्ज लगेगा। पांच लाख तक के आय वालों को 5000 रुपये की कर छूट दी गई है। किराये पर कर छूट की राशि को 20,000 से 60,000 कर दिया गया है। टैक्स विवाद की स्थिति में जुर्माना लगाने और देने की प्रक्रिया को सरल किया जाएगा।
एक लाख रुपये की स्वास्थ्य बीमा का एलान हुआ है और हर ज़िले में डायलिसिस की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए पीपीपी मॉडल पर एक रुपरेखा तैयार की गई है। वित्त मंत्री के साथ प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद एक बड़े अधिकारी ने कहा कि सरकार अपनी घोषणाओं को पूरा करने के लिए बाज़ार से पैसा उठाएगी मगर इस बात का ख़्याल रखेगी कि बाज़ार में संसाधनों की कमी न हो और निजी क्षेत्र के लिए समस्या न पैदा हो जाए।
काला धन लाने वाले लोग उसे सफेद करवाने में जुट गए. क्या किसी चोर को कई मौके दिए जाते हैं क़ि आप फिर से चोरी मत करना, अभी जाओ. जिसने कालाधन बनाया है, वो चोर है तो है। उसके लिए क़ानून बनाओ।लेकिन सबको पता है क़ि किसके पास कालाधन है, और उनसे आपके क्या संबंध हैं?
इस बजट के तथ्यों से अभी यह साफ नहीं हो पाया है कि गांव-किसान और गरीबी के मोर्चे पर काम करने के लिए पैसे का टोटा क्यों पड़ गया। साथ ही बेरोजगारी मिटाने का सबसे बड़ा काम फिर क्यों टल गया। किसान को सिंचाई के इंतजाम की उम्मीद थी। अगले साल पूरे देश में सिंचाई के इंतजाम के लिए सिर्फ 19,000 करोड़ का जिक्र है। छह लाख गांवों के खेतों तक यह सुविधा बढ़ाने के लिए कम से कम दो लाख करोड़ का खर्चा बताया जाता है। सिंचाई की मंजूरशुदा परियोजनाओं पर ही काम शुरू करने के लिए एक लाख करोड़ रुपये कम बैठते हैं।
ऐसा नहीं है कि बजट भाषण की चतुराइयां पकड़ी न जा पाएं। मसलन, गांव-किसान और गरीबों को बजट के जरिये मदद पहुंचाने के लिए जो कुछ किए जाने का दावा है, वह रकम क्या सीधे-सीधे गांव, किसान, गरीबों को नहीं पहुंचाई जा सकती थी। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुधार के नाम पर निजी क्षेत्र और पीपीपी के रास्ते से रकम खर्च करने का तरीका क्या सरकार की चतुराई की तरफ इशारा नहीं कर रहा है। आधारभूत ढांचे और खासतौर पर हाईवे के लिए और दूसरे शहरी कामों के लिए कोई छह लाख करोड़ का खर्चा होगा। भले ही भाषण में इसका प्रचार जरा दबी जुबान से किया गया। छह लाख गांवों में, यानी ग्रामीण विकास के लिए सिर्फ 85,000 करोड़ सुनकर विश्लेषकों को चौंककर पूछना चाहिए कि यह बजट किस तरह गांव पर जोर देने वाला बजट साबित किया जा सकता है। इन आंकड़ों को तफसील से समझाने में विशेषज्ञों को अभी कई घंटे लगेंगे। पुराने वित्तमंत्रियों, शिक्षित-प्रशिक्षित सांसदों और मीडिया के जागरूक तबके पर यह बड़ी जिम्मेदारी है कि हर बार की तरह हिसाब लगाकर समझाएं कि गांव, किसान और गरीब को वाकई क्या मिला।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...