कल ही रवीश कुमार के ज़िक्र के बाद मैने अरुण जेटली जी का ब्लॉग पढ़ा जो उन्होने संविधान दिवस पर लिखा था. उसमें वो कहते हैं कि किसी भी राज्य में अब पहले के जैसे पॉलिटिकल वेन्डेटा के लिए राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया जाता है. लेकिन अरुणांचल प्रदेश के बाद उत्तराखंड में ऐसा किया गया है. राष्ट्रपति शासन के बावजूद हरीश रावत हार मानने वाले नहीं दिखते। एक तरफ वे आज अपने 34 विधायकों के हस्ताक्षर वाली चिठ्ठी लेकर राज्यपाल केके पाल से मिलने जा पंहुचे, तो साथ ही कांग्रेस ने नैनीताल हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हरीश रावत ने क्या पहले सतपाल महाराज के बीजेपी में जाने और विजय बहुगुणा के बाहर होने को हल्के से लिया? पूर्व में मैं कई ऐसी स्थानीय खबरें पढ़ता रहा हूँ जिसमें कांग्रेस के अंदर खूब गुटबाजी होती थी. विजय बहुगुणा खेमा हमेशा से ही हरीश रावत खेमे से नाराज़ था. याद हो कि हरीश रावत गाँधी परिवार के नज़दीकी हैं.
दूसरी तरफ सवाल उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी ने राष्ट्रपति शासन लागू करने में जल्दबाजी कर डाली। एक दिन का और इंतजार क्या नहीं किया जा सकता था। राज्यपाल ने 28 तारीख तक का समय दिया था विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए या फिर उसे आभास हो चला था कि सत्ता के लिए विधायक डगमगा भी सकते हैं। स्टिंग पर एक दिन में जांच रिपोर्ट आ भी जाती है जबकि एफआईआर तक दाखिल नहीं होती है। लेकिन शायद कांग्रेस की नैतिकता का वार हरीश रावत के स्टिंग आने से हार गया? बीजेपी पर उसका सत्ता के अहंकार और विधायकों को खरीदने का आरोप उल्टा पड़ गया। स्पीकर का वायस वोट से बजट पास कराने का कदम पक्षपाती रहा। कई संविधान के जानकारों का मानना है कि विधानसभा स्पीकर का रवैया ठीक नहीं था. उसने ग़लतियाँ की हैं. जैसे कि बागी विधानसभा सदस्यों की सदस्यता रद्द करना. उसमें भी अभी गुंजाइश हो सकती थी. कांग्रेस पार्टी के 9 सदस्यों ने विधानसभा में विनियोग विधेयक के विरुद्ध मत देने का फैसला किया। 18 मार्च 2016 को 35 सदस्यों ने विनियोग विधेयक के विरुद्ध तथा 32 सदस्यों ने इसके पक्ष में मतदान किया। विधानसभा की लिखित कार्यवाही से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि सदस्यों ने मतविभाजन की मांग की थी लेकिन इसके बावजूद विनियोग विधेयक मतदान के बगैर पारित होने का दावा किया जा रहा है। इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि विनियोग विधेयक वास्तव में मत विभाजन में गिर गया था। एक अप्रैल 2016 से व्यय की मंज़ूरी देने वाले विनियोग विधेयक को मंज़ूरी नहीं मिली थी। अगर विनियोग विधेयक पारित नहीं हुआ था तो 18 मार्च 2016 के बाद सरकार का सत्ता में बने रहना असंवैधानिक है। आरोप तो यह है कि स्पीकर ने मत विभाजन की अनुमति नहीं दी। आरोप है कि स्पीकर ने ध्वनि मत से विनियोग विधेयक पास होने का ऐलान कर दिया। विनियोग विधेयक के पास या फेल होने के साथ-साथ मत विभाजन के नियम और स्पीकर के अधिकार को भी समझना होगा। क्या स्पीकर बाध्य है कि वह मत विभाजन की मांग को स्वीकार ही करेगा और बाध्य है तो स्पीकर मना कर देता है तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई के क्या प्रावधान हैं। स्पीकर ने ध्वनि मत से जो विधेयक पास किया है क्या उसे चुनौती दी जा सकती है। राज्यपाल ने खारिज कर दिया तो यहां क्या राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह स्पीकर के फैसले को पलट दे। अब सवाल ये उठता है कि क्या 18 मार्च को कथित रूप से ध्वनि मत से विनियोग विधेयक पास कराने के बाद स्पीकर या मुख्यमंत्री ने उसे राज्यपाल के पास भेजा था। क्या स्पीकर या मुख्यमंत्री ये तथ्य पेश कर सकते हैं कि भेजा था। वित्त मंत्री तो लिखते हैं कि नहीं भेजा था और आज तक नहीं भेजा है। लेकिन जिस विनियोग विधेयक को लेकर सरकार गिर गई और राष्ट्रपति शासन लग गया उसके बारे में राज्यपाल ने जानकारी क्यों नहीं मांगी या मांगी तो नहीं दी गई। क्या सारा फैसला विनियोग विधेयक की प्रमाणिक प्रति देखे बिना ही ले लिया गया या फैसला यूं हुआ कि विधेयक की प्रमाणित प्रति भेजी ही नहीं गई। 18 मार्च को पास किया गया विनियोग विधेयक स्पीकर ने तुरंत राज्यपाल को भेज दिया था। वित्त मंत्री कहते हैं कि आज तक विधेयक की प्रमाणित प्रति नहीं भेजी गई। हमारे सहयोगी दिनेश मानसेरा के सूत्रों के अनुसार आज यानी 28 मार्च को राजभवन को इसकी प्रमाणित प्रति भेजी गई है। चूंकि ये जानकारी सूत्र आधारित है इसलिए हम इस पर दावा नहीं कर सकते लेकिन अगर ये सही जानकारी है तो विनियोग विधेयक को प्रमाणिक प्रति अभी कैसे भेजी गई। किसी ने मांगा या स्पीकर को इसका ख्याल आया। मतविभाजन हुआ या नहीं, नहीं हुआ तो मतविभाजन में कैसे यह विधेयक गिर गया। विधेयक की प्रमाणिक प्रति राज्यपाल को भेजी गई या नहीं भेजी गई। स्पीकर ने विधेयक को प्रमाणित किया या नहीं किया। या तो विनियोग विधेयक पास हुआ या नहीं हुआ लेकिन यहां एक तीसरी स्थिति उभर रही है कि गंभीर आशंका है कि पास हुआ। जेटली ने लिखा है कि हर बात के प्रमाण के तौर पर दस्तावेज़ मौजूद हैं। आगे लिखते हैं कि 'अगर विधानसभा अध्यक्ष की बात सही मानें कि बागी विधायकों ने विनियोग विधेयक के पक्ष में मतदान किया इसलिए यह पारित हो गया है, तब बागी विधायकों को अयोग्य करार नहीं दिया जा सकता।'
स्पीकर और कांग्रेस ने कहा कि 9 सदस्य विरोधी दल के साथ राजभवन मतविभाजन की मांग करने गए थे इसलिए उनके वकीलों की दलील सुनने के बाद ही अयोग्य ठहराया गया। स्पीकर ने कहा कि उन्हें राष्ट्रपति शासन लगने की लिखित सूचना नहीं है। जबकि एक बार पूर्व में इंदिरा गाँधी के जमाने में ऐसा हो चुका है जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फ़ोन पर या अन्य माध्यम से राष्ट्रपति शासन की जानकारी मान्य नहीं होती है. यह लिखित होनी चाहिए. पता नहीं स्पीकर की इस बात में कितना दम है? मत विभाजन की स्थिति में स्पीकर के विशेषाधिकार बताता है। इसमें कहा गया है कि वॉइस वोट पर स्पीकर के फ़ैसले को बिना चुनौती दिए कोई सदस्य चाहे तो स्पीकर को अपना नाम रिकॉर्ड करने के लिए अनुरोध कर सकता है। स्पीकर चाहे तो अनुरोध को स्वीकार कर सकता है अगर उसे लगे तो मामला महत्वपूर्ण है और हाउस में इसके पक्ष में आम राय है। सदन के अंदर स्पीकर का अधिकार सर्वोच्च है और ये अधिकार उसकी पूर्ण निष्पक्षता के आधार पर उसे हासिल होता है। मंत्रालयों के सवाल पर स्पीकर को कई अधिकार हासिल हैं। हालांकि सवालों को स्वीकार करने को लेकर नियम बनाए गए हैं लेकिन उसकी व्याख्या का अधिकार स्पीकर के पास होता है।
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