Saturday, March 12, 2016

रियल एस्टेट बिल 2016

कल राज्यसभा में रियल एस्टेट बिल पास हो गया। जिसमें वेंकैया नायडू ने अच्छा भाषण दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी आकडे के अनुसार हर साल दस लाख लोग फ्लैट खरीदते हैं। 13 लाख 800 करोड़ का निवेश है इस सेक्टर में, 76000 से अधिक कंपनियां काम कर रही हैं। लेकिन इसके बाद भी आपको कई ऐसे प्रोजेक्ट मिलेंगे जो कई वर्ष बीत जाने के बाद भी पूरे नहीं हुए हैं। खरीदार जो कि कर्ज़दार भी है, ईएमआई और किराया दोनों चुका रहा है और लाचार होकर कभी बिल्डर के पास जाता है, कभी कोर्ट के पास तो कभी मीडिया के पास। कुल मिलाकर हालात नहीं बदलते हैं। लेकिन क्या राज्यसभा में पास हुआ बिल RERA (Real Estate Regulation and Development)  उन सब समस्याओं का संपूर्ण समाधान है। 
प्रोजेक्ट बेचने के लिए डेवलपर अक्सर जिस तरह के सुनहरे ख़्वाब अपने विज्ञापनों में दिखाते थे, खरीदार उसके झांसे में आ जाते हैं। लेकिन बाद में इनमें से कई प्रावधानों को बिना बताए बदल दिया जाता है। खरीदार और डेवलपर के बीच जो बिल्डर बायर्स एग्रीमेंट होता था वह लगभग एकतरफा होता था और फ्लैट ख़रीदने की शर्तों को तय करने में खरीदार की कोई भूमिका नहीं होती थी। अगर खरीदार पैसे देने में देरी करे तो 18 से 24% के हिसाब से ब्याज लगाया जाता है लेकिन अगर बिल्डर प्रोजेक्ट देने में देरी करे 4% की दर से ब्याज देने की बात की जाती है। यही नहीं जो पैनल्टी या ब्याज देने की बात बिल्डर करता है वह भी देने को तैयार नहीं होता है। बिल्डर सुपर बिल्टअप एरिया के आधार पर फ्लैट बेचता है, जिसमें वह तमाम कॉमन स्पेस का पैसा भी ख़रीदार से ले लेता है, जबकि ख़रीदार को सिर्फ कारपेट एरिया यानि वही हिस्सा मिलता है जो उसके घर की चहारदीवारी के अंदर हो। घर सौंपने के नाम पर पूरा पैसा ले लिया जाता है लेकिन कई क्लीयरेंस नहीं मिलने का हवाला देकर घर देने में काफी देरी की जाती है। और अगर बिल्डर की मनमानी के खिलाफ़ ख़रीदार कोर्ट में जाता है तो उसे लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। देश की अदालतों में ऐसे हजारों केस इस समय चल रहे हैं।
तो क्या नया रियल एस्टेट बिल आपको इन तमाम दिक्कतों से मुक्ति दिला देगा। नए बिल के अनुसार सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रियल एस्टेट को नियमित करने के लिए रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी बनाई जाएगी। इस अथॉरिटी के तहत सभी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स और रियल एस्टेट एजेंट्स को अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा। यह बिल सभी रिहायशी और कमर्शियल रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स पर लागू होगा। यह बिल जिस दिन से लागू होगा उस दिन तक जितने भी प्रोजेक्ट्स पूरे नहीं हुए होंगे यानी कम्पलीशन सर्टिफिकेट नहीं मिला हुआ होगा, वह सब इसके तहत आ जाएंगे। किसी भी प्रोजेक्ट की बिक्री तब तक शुरू नहीं की जा सकती जब तक कि सभी जरूरी विभागों से मंजूरियां न मिल जाएं। बिल्डर अभी तक किसी भी प्रोजेक्ट में देरी के लिए यह बहाना बना देते थे कि उन्हें समय पर सभी मंजूरियां नहीं मिलीं। इसलिए बिल का यह प्रस्ताव भी काफी अहम है। मकान का कब्ज़ा देने में देरी पर बिल्डर पर लगने वाला ब्याज उस ब्याज से कम नहीं होगा जो बिल्डर देरी से पेमेंट देने पर ग्राहकों से वसूलता है। इस एक्ट के तहत दो तिहाई ग्राहकों की लिखित इजाजत के बिना मंजूर हुई योजना में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। इस एक्ट के तहत प्रोजेक्ट के पूरा होने की तिथि के बाद अधिकतम बारह महीने की देरी का ही प्रावधान है। यह बिल इस बात को सुनिश्चित करता है कि जो भी प्रचार सामग्री में दर्शाया गया होगा, अब दस्तावेज़ माना जाएगा। बिल्डर शर्तें लागू टाइप लिखकर नहीं बच सकते। यही नहीं अब उन दस्तावेजों का इस्तेमाल बिल्डर के खिलाफ सबूत के तौर पर किया जा सकेगा। अगर बिल्डर इस क्लॉज़ का उल्लंघन करता है तो उसे पैनल्टी और मुआवजा देने को बाध्य किया जा सकेगा।
किसी भी प्रोजेक्ट के लिए उसके ग्राहकों से वसूली गई रकम का सत्तर फीसदी किसी शेड्यूल्ड बैंक में एक एकाउंट में रखना होगा और इसे निर्माण पर ही खर्च किया जा सकेगा। अभी देरी की एक बड़ी वजह यह होती है कि बिल्डर एक प्रोजेक्ट का पैसा किसी दूसरे प्रोजेक्ट में लगा देते हैं। खास तौर पर लैंड बैंक बनाने में यह पैसा खर्च कर दिया जाता है जिससे बिल्डर के सामने तय प्रोजेक्ट के लिए पैसे की दिक्कत आ जाती है और उसमें देरी हो जाती है। बिल्डरों को अपने एकाउंट का ऑडिट भी कराना होगा ताकि एकाउंट से पैसे की निकासी पर निगरानी रखी जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह निर्माण के अलावा किसी और काम के लिए इस्तेमाल न हो सके। वैसे यह तो आसानी से होता रहेगा।  बिल्डरों को निर्धारित समय के अंदर रेगुलेटर की वेबसाइट पर निर्माण का स्टेटस अपडेट करते रहना होगा। वैसे इस बिल में कुछ कमियाँ भी बताई जा रही हैं, जिसमें सबसे प्रमुख यह कि कोई भी बिल्डर जेल नहीं जाएगा दूसरी कमी यह है कि  दूसरी बड़ी खामी यह बताई जा रही है कि इस बिल में रेगुलेटर बनाने का काम राज्य पर छोड़ दिया गया है। ऐसे में राज्य सरकारें अपनी इच्छा के मुताबिक रेगुलेटर की नियुक्ति कर सकती हैं। हो सकता है कई बार यह रेगुलेटर ख़रीदारों से ज्यादा उस लॉबी के दबाव में रहें जिसकी किसी सत्ता में चलती हो।  तीसरी खामी यह है कि जितनी भी डेवलपमेंट अथॉरिटी हैं जैसे डीडीए, जीडीए, नोएडा विकास प्राधिकरण वगैरह उनका इस बिल में ज़िक्र नहीं है। यह नहीं बताया गया है कि रेगुलेटर के साथ उन्हें कैसे काम करना है, जबकि इन प्राधिकरणों की बड़ी भूमिका होती है। यह बिल 500 वर्ग मीटर या उससे अधिक के प्लॉट पर ही लागू होगा, लेकिन इससे बॉम्बे जैसी जगहों पर असर पड़ेगा जहां 500 वर्ग मीटर के अंदर बिल्डर कई यूनिट बनाकर बेच देते हैं। वैसे इस बिल के बारें अब तक मीडिया में ही सुनते और पढ़ते रहा हूँ राज्य सभा में हुई बहस को भी बाद में  देखा था जिसमे उपरी तौर पर आई हुई बातों के बारे में लिख रहा हूँ. जब बिल की कॉपी हाथ में आएगी तो और खामियाँ या मजबूत पॉइंट बता पाऊँगा. वैसे यह सरकार का सराहनीय कदम है 

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