कुछ लोगों को भारत के बारे में ज़रा सी भी जानकारी नहीं है, खुद तो कुछ लिख नहीं सकते हैं, इसलिए किसी के भी फर्जी तरीके से बनाए गए फोटोसोप की चीज़ को शेयर कर देते हैं. असल में ऐसे लोग बड़े पूंजीवादी और सामंतवादी हैं. अगर वो ऐसे नहीं हैं तो उनको पता ही नहीं होगा कि उनके माँ बाप घर कैसे चला रहे हैं इस मंहगाई के दौर में. उन्हें देशभक्ति का मतलब ही नहीं पता है.केवल इंडिया इंडिया चिल्ला देना और किसी को फेसबुक पर गाली देना देशभक्ति लगती है.
गाँव में एक कहावत है अंडे में भाटा (जोड़ना)......किसी भी चीज़ को किसी जगह जोड़ देते हैं. फेसबुक पर कहीं की चीज़ों को कहीं पर फोटोशॉप से एड करके कुछ गैरतार्किक वाक्य लिखना उन्हें बड़ा क्रांतिकारी लगता है. 2 मिनट नहीं टिक पाएँगे कहीं बौद्धिक विमर्श में. भला एक इंजीनियर और लेखक या पीएचडी स्टूडेंट को एक दूसरे से कमपेयर करने का क्या मतला होगा? इंजीनियर का काम इंजीनियरिंग करना है, वो कर रहा है, देश उसको सलाम करता है. लेखक का काम लिखना है, वो लिखता है. समाज वैज्ञानिक अपना काम करता है, वैज्ञानिक अपना काम करता है. भारत एक शरीर है, उसका हर एक नागरिक एक अंग है, भला कोई कह सकता है कि आँखे ज़्यादा ठीक हैं, हाथ तो बेकार है, या फिर हाथ के आगे पैर की क्या औकात?
अगर कोई ऐसा बोलता है तो शरीर(देश) का सबसे बड़ा दुश्मन वही इंसान है. किसान भी हमारे ही पिता हैं, और सेना में भी हम गाँव वालों और ग़रीबों के भाई लड़ते हैं, ये मुंबई में बैठे फर्जी राष्ट्रवादी किसी और का चुराया हुआ फोटोशॉप पोस्ट शेयर करके देशभक्ति दिखाते हैं. भला होता क़ि ये लोग कभी राष्ट्रगान के रचायता रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी पढ़ लेते. लेकिन पढ़ना लिखना नहीं जो भी मिले भड़काऊ उसे जल्दी से जल्दी शेयर करो....... वही बात हुई कि नाख़ून काट के शहीद बनना चाहते हैं. उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है जनाब. यही कन्हैया है जिसका भाई सीआरपीएफ में था और नक्सली हिंसा में मारा गया था. लेकिन कुछ लोग बिना सोचे समझे हनुमनथप्पा को उसके सामने फोटोशॉप से खड़ा करके चिल्लाने लगते हैं. जबकि हनुमनथप्पा को वो हर भाषण में सलाम करता रहा है. क्योंकि खुद तो उसके सामने टिक नहीं सकते हैं, इसलिए किसी और को खड़ा कर देंगे, हो सकता है कि वो सामने वाला इंसान भी उसका ही समर्थक हो. हिम्मत है तो करो ऐसी तार्किक बहस. लेकिन नहीं गाली दे सकते हैं और बिना किसी सबूत और तर्क के कह देंगे तुम आतंकवादी के समर्थक हो. जबकि अपने काका से नहीं पुंछ रहे हैं कि वो क्यों महबूबा के साथ सरकार बनाए हैं. इनकी बात में दम ही नहीं है, अगर सच में विचारों की बहस करनी पड़ जाए तो 2 मिनट में भाग जाएँगे. हम किसी से मतभेद रखते हैं मनभेद नहीं. कल रात को जैसे ही पता चला हमने स्मृति ईरानी के एक्सीडेंट पर उनकी सेफ्टी के लिए शुभकामनाओं और प्रार्थना का ट्विट किया. लेकिन ये नफ़रत फैलाने वाले लोगों को कोई बात पता ही नही है सुनी सुनाई बातों पर कुछ भी बक देते हैं. मैं मोदी जी और राजनाथ के भाषणों की कला का बड़ा फ़ैन रहा हूँ, जब कभी भी अगर उनकी आलोचना की है तो किसी भी भाषण को 2-3 बार सुनने के बाद, उसमें हुई कमियों पर पड़ताल करके. अगर कोई मुझे उसपर ग़लत साबित करता है तो हमेशा ही देश खुद को सुधारा है. लेकिन कन्हैया के आलोचकों के क्या हाल हैं? आजतक किसी भी सबूत को पेश नहीं किया जा सका है जिसमें कन्हैया ने देशद्रोही नारे लगाए हों. 11 फ़रवरी और 3 मार्च के भाषण में वो कहीं भी देश के खिलाफ नहीं बोला केवल और केवल एक नफ़रत की विचारधारा का विरोध करता है जिसने गाँधी को मारा था. 2-3 दिन से मीडिया में उसके 20-15 इंटरव्यू हो चुके हैं वो हर जगह नेहरू, गाँधी, अंबेडकर के सपने के भारत की बात करता है, हर काम वो संविधान के दायरे में रहकर करना चाहता है. फिर भी किस आधार पर आप उसे गोली मारने की बात कह रहे हैं. उसे किस आधार पर देशद्रोही कह सकते हैं? कम से कम उसकी बात सुन लो फिर उसकी आलोचना करो. बिना किसी के विचार सुने और समझे उसपर चिल्लाना आपको मानसिक रूप से बीमार कर सकता है. आपको चाहिए कि आप खुद का ईगो छोड़कर उसे एक बार सुने, मुझे पूरी उम्मीद है कि वो विचारों से आपको जीत लेगा. क्योंकि वो ग़रीबों, मजदूरों, पिछड़ों, दलितों, महिलाओं, आदिवासियों और हर तरह के अल्पसंख्यकों की बात करता है. अगर आपको लगता है कि ये मुद्दे ग़लत हैं तो आप उसे गोली मार सकते हैं. लेकिन भगवान के लिए एक बार सुनकर ही गाली दो.
विचारों की लड़ाई विचारों से होती है. किसी को गोली मारकर ख़त्म किया जा सकता है यह सोंच तो गाँधी के खिलाफ नाकाम हो चुकी है, जिसने मारा था उसके ही चेले चपाटे आजकल गाँधी के नाम से हज़ारों करोड़ फूँक कर अपना प्रचार करने में लगे हैं. विदेशों में जाकर वही गाँधी याद आते हैं. मतलब जब उनके दिलों में जिंदा हैं तो बाकी उनके फालोवर्स के लिए तो बात ही अलग है. भाजपाइयों ने सवाल किया है कि देश का पेड मीडिया जिसने मोदी को बनाया, आज कन्हैया कुमार का समर्थन करने के लिए उठ खड़ा हुआ है इसका पेमेंट कौन कर रहा है? क्या आपको भी लगता है कि कन्हैया का प्रचार धन लेकर किया जा रहा है?
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