Tuesday, March 8, 2016

महिला दिवस विशेष टिप्पणी

आज इंडियन एक्सप्रेस में कन्नूर के एक कलाकार मुरली का इंटरव्यू पढ़ रहा था, जिसमें वो कहते हैं क़ि करथॅला नामक क्षेत्र की महिला नेंगाली ने ब्रेस्ट कवर टैक्स के खिलाफ आंदोलन किया था (in 1803 Year) । वहीं पर उसका बलिदान हुआ था, जिसे मलयालम में मूलाचिपा राम्बु (महिला के स्तन का स्थान) कहते हैं। वह महिला लगभग 29-30 साल की थी, वहाँ पर एक क़ानून था जिसमें महिलाओं के स्तन ढकने पर टैक्स होता था। जिस महिला के स्तन जीतने बड़े होते थे, उतना ही अधिक टैक्स देना पड़ता था। लेकिन इस बलिदान के बाद यह टैक्स हटा लिया गया था। 
फिर दूसरी बात का पता चलता है जब मैने महाराष्ट्र विधानसभा की वेबसाईट पर जाकर कुछ नए क़ानूनो के बारे में जानकारी लेनी चाही। दिसंबर में मैं मुंबई के ग्रांडरोड गया था, एक कोलकाता से आई रिसर्च फेलो के साथ। वो भारत के रेडलाइट एरिया की सामाजिक स्थितियों पर काम कर रही हैं। वो मेरे लिए काफी यादयादगार और अंदर से हिला देने वाला अनुभव था। इस दौरान महाराष्ट्र सरकार ने एक अच्छा कदम उठाया है। अब से महाराष्ट्र में डांस बार को लेकर अब राज्य सरकार नए कायदे लाने की कोशिश में है। महाराष्ट्र सरकार बार बालाओं के लिए तय वेतन और काम करने के तय घंटे जैसे नियम लाने की कोशिश में है। साथ ही बार में काम करने वाली महिलाओं को घर से लाने ले जाने की जिम्मेदारी बार मालिकों की होगी यह भी कहा गया है। गृह राज्यमंत्री रंजीत पाटिल ने कहा कि बार बालाओं का शोषण रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है। होटल और बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रवीण अग्रवाल का कहना है कि बार मालिक हमेशा से बार में काम करने वाली लड़कियों की सुरक्षा का खास ख्याल रखते आए हैं। नए नियमों के मामले में सरकार को पहले बार मालिकों से बात करनी चाहिए थी और उनका भी सुझाव लेना चाहिए था। फिलहाल सरकार कुछ और नियमों के साथ डांस बार पर कानून का दायरा बढ़ाने की कोशिश में है।
फिर गूगल करते करते एक अजीब आकड़ा सामने आया। अंतररास्ट्रीय महिला दिवस पर ब्लाग की रिसर्च के लिए एक मित्र से मिली मैगजीन पढी। जिसमें एक सच्चाई से रूबरू हुआ। सचाई यह कि हमारा देश संसार के उन दस देशों में शामिल है जहां की आबादी में पुरुषों की तुलना में महिलाओं का प्रतिशत न्यूनतम है। इन चुनिन्दा दस देशों में सबसे ऊपर है कतर जहाँ मात्र 23.4 प्रतिशत महिलायें है यानी एक चौथाई से भी कम… और सबसे नीचे है सामोआ जहाँ 48.4 प्रतिशत महिलायें है। बाकी के आठ देश क्रमानुसार इस प्रकार है।
2:UAE
3: ओमान
4: बहरीन
5: कुवैत
6: सउदी अरब
7: भूटान
8: चायना.......... इस सूची में भारत नवें नंबर पर है। परन्तु सबसे अधिक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस सूची में पाकिस्तान शामिल नहीं है यानी महिला पुरुष अनुपात के मामले में हम पाकिस्तान से भी गये बीते हैं। लिंगानुपात के मामले में गुजरात 22वें नंबर पर आता है। हरियाणा और राजस्थान के हाल तो और भी खतरनाक हो रहे हैं। मोदी जी की बेटी बचाओ, बेटी पढाओ योजना बहुत अच्छी है, उम्मीद है कि वो महिला आरक्षण बिल पास कराने की कोशिश करेंगे। जिससे महिला शक्ति मुंबई दिल्ली के बाहर भी स्थापित हो सके। जैसा कि आपने देखा कि कैसे स्त्रियों की संख्या से लेकर उनके अधिकारों तक में आसमानताएँ नज़र आती हैं। ऐसे में सामाजिक असमानता को देखते हुए महिला आरक्षण होना आवश्यक है। आरक्षण का अर्थ ही होता है, सामाजिक पिछड़े समाज को आगे बढ़ाना। यह बिल लोकसभा में पास होना है। मोदी जी के पास बहुमत है, अगर वो सच में बेटी को पढ़ना और बचाना चाहते हैं तो पास करें यह बिल। जिन राज्यों में पंचायतों में महिला आरक्षण दिया है, वो सराहनीय है। और जो लोग महिला आरक्षण का विरोध करते हैं वो मनुवादी सोंच के समर्थक हैं। वही मनुवाद जो कहता है क़ि महिलाओं को घर में शोभा बनाकर ही रखा जाए। वही मनुवादी सोंच जब संघ के संस्थापक और मोदी जी के गुरु गोलवलकर कहते हैं कि महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए। तभी तो आर एस एस में महिलाओं को एंट्री नहीं है। वही मनुवादी सोंच जब तोगड़िया महिलाओं को जिंदा बम बताते हैं। जिन्हे घर से बाहर ना निकालने दिया जाए। एक ही नहीं न जाने कितने मुल्ला मौलानाओं की सोंच भी तालिबानी है तो फ़तवे देते हैं महिला अधिकारों के खिलाफ। आप सोँचकर देखिए कि अगर महिलाओं के आरक्षित लोकल ट्रेन के डब्बे और बस की सीटें। बंद हो गए तो क्या होगा? यह भी आरक्षण ही है। हम तो बात मैरीटल रेप को भी क़ानूनी अधिकार बनाने की बात करते हैंआख़िर क्यों शादी के बाद सेक्सुअल रिलेशनशिप केवल पुरुष के हिसाब से ही चलती है देश के सरकारी सर्वे के अनुसार 76% महिलाओं की आज़ादी नहीं चलती है, सेक्सुअल रिलेशंस में शादी के बाद. जब शादी दोनो करते है, दोनो के अधिकार बराबर हैं तो महिला को भी हाँ या ना कहने का अधिकार है। हम तो ऐसे कानून की बात करते हैं जिसमें औरतों के पीरियड्स में उन्हें सरकारी या प्राइवेट जाॅब में छुट्टी मिले। उन्हें इस दौरान अशुद्ध न कहा जाए। भगवान के मंदिर,  पूजाघर या रसोई में जाने से न रोका जाए। क्योंकि उन्हें भागवत ने ही यह सब दिया है। बातें तो बहुत हैं जिससे सरकारों पर ही हमला कर सकता हूँ लेकिन राजनैतिक के साथ साथ सामाजिक ज़िम्मेदारी होती है। बहुत लंबी लड़ाई है, क़ानूनी, राजनैतिक और सामाजिक तौर पर लड़ना है, यह केवल महिलाएँ ही नहीं समानता की बात करने वाले हम जैसे पुरुषों को भी लड़ना है।  निकलना है उस मानसिकता से जो कॉलेज में लड़कियों को देखकर माल या आइटम जैसे बाजारू शब्दों से ऊपर सोचना होगा 
अब आता हूँ महिला दिवस पर। महिला-दिवस सुनकर बड़ा अजीब लगता है। क्या हर दिन सिर्फ पुरुषों का है, महिलाओं का नहीं? पर हर दिन कुछ कहता है, सो इस महिला दिवस के मनाने की भी अपनी कहानी है। कभी महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई से आरंभ हुआ यह दिवस बहुत दूर तक चला आया है, पर इक सवाल सदैव उठता है कि क्या महिलाएं आज हर क्षेत्र में बखूबी निर्णय ले रही हैं। मात्र कुर्सियों पर नारी को बिठाने से काम नहीं चलने वाला, उन्हें शक्ति व अधिकार चाहिए ताकि वे स्व-विवेक से निर्णय ले सकें। आज नारी राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है, यहाँ तक कि आज महिला आर्मी, एयरफोर्स, पुलिस, आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे क्षेत्र में नित नई नजीर स्थापित कर रही हैं। यही नहीं शमशान में जाकर आग देने से लेकर पुरोहिती जैसे क्षेत्रों में भी महिलाएं आगे आ रही हैं। रुढियों को धता बताकर महिलाएं हर क्षेत्र मेंपरचम फैलाना चाहती हैं। वर्तमान दौर में नारी का चेहरा बदला है। नारी पूज्या नहीं समानता के स्तर पर व्यवहार चाहती है। सदियों से समाज ने नारी को पूज्या बनाकर उसकी देह को आभूषणों से लाद कर एवं आदर्शों की परंपरागत घुट्टी पिलाकर उसके दिमाग को कुंद करने का कार्य किया, पर नारी आज कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, पीटी उषा, किरण बेदी, कंचन चैधरी भट्टाचार्य, इंदिरा नूई, शिखा शर्मा, किरण मजूमदार शाॅ, वंदना शिवा, चंदा कोचर, ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन, फ्लाइंग आॅफिसर सुषमा मुखोपाध्याय, कैप्टन दुर्गा बैनर्जी, ले.जनरल पुनीता अरोड़ा, सायना नेहवाल, संतोष यादव, निरुपमा राव, कृष्णा पूनिया, कुंजारानी देवी, इरोम शर्मिला, मेघा पाटेकर, अरुणा राय, जैसी शक्ति बनकर समाज को नई राह दिखा रही है और वैश्विक स्तर पर नाम रोशन कर रही हैं। नारी की शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व विकास के क्षितिज दिनों-ब-दिन खुलते जा रहे हैं, जिससे तमाम नए-नए क्षेत्रों का विस्तार हो रहा हैं। कभी अरस्तू ने कहा कि -“स्त्रियाँ कुछ निश्चित गुणों के अभाव के कारण स्त्रियाँ हैं” तो संत थाॅमस ने स्त्रियों को “अपूर्ण पुरूष” की संज्ञा दी थी, पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसे तमाम सतही सिद्वान्तों का कोई अर्थ नहीं रह गया एवं नारी अपनी जीवटता के दम पर स्वयं को विशुद्ध चित्त (Being-for- itself : स्वयं में सत् ) के रूप में देख रही है। आज यदि नारी आगे बढ़ना चाहती है तो उसके स्वाभाविक अधिकारों का दमन क्यों? पर इन सबके बावजूद आज भी समाज में बेटी के पैदा होने पर नाक-भौंह सिकोड़ी जाती है, कुछ ही माता-पिता अब बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं समझते हैं....आखिर क्यों ? क्या सिर्फ उसे यह अहसास करने के लिए कि वहनारी है। वही नारी जिसे अबला सेलेकर ताड़ना का अधिकारी तक बताया गया है। सीता के सतीत्व को चुनौती दी गई, द्रौपदी की इज्जत को सरेआम तार-तार किया गया तो आधुनिक समाज में ऐसी घटनाएँ रोज घटित होती हैं। तो क्या बेटी के रूप में जन्म लेना ही अपराध है। मुझे लगता हैकि जब तक समाज इस दोहरे चरित्र से ऊपर नहीं उठेगा, तब तक नारी की स्वतंत्रता अधूरी है। सही मायने में महिला दिवस की सार्थकता तभी पूरी होगी जब महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, वैचारिक रूप से संपूर्ण आज़ादी मिलेगी, जहाँ उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा, जहाँ कन्या भ्रूण हत्या नहीं की जाएगी, जहाँ बलात्कार नहीं किया जाएगा, जहाँ दहेज के लोभ में नारी को सरेआम जिन्दा नहीं जलाया जाएगा, जहाँ उसे बेचा नहीं जाएगा। समाज के हर महत्वपूर्ण फैसलों में उनके नज़रिए को समझा जाएगा और क्रियान्वित भी किया जायेगा। जरुरत समाज में वह जज्बा पैदा करने का है जहाँ सिर उठा कर हर महिला अपने महिला होने पर गर्व करे, न कि पश्चाताप कि काश मैं लड़का के रूप में पैदा होती। 

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