मौजूदा हालात में गरीब के घर को गांव पुकारा जाने लगा है। किसानों के लिए इस बजट में सरकार द्वारा बहुत बड़े बड़े वायदे किए गए हैं। सबसे पहला और क्रांतिकारी वायदा है, 2022 तक हर किसान की आय दुगुनी हो जाएगी। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के अनुसार देश में 17 राज्यों में 70% से भी अधिक किसानों की वार्षिक आय बीस हज़ार रुपये हैं। इसे आप महीने में बांटेंगे तो करोड़ों किसानों की मासिक औसत आय 1662 रुपये होती है। हमारा किसान इतने कम पैसे में कैसे जीता होगा यह सोचना बंद ही कर दीजिये तो ठीक रहेगा। यह आकड़ा बेहद भयावह है, क्या होगा ऐसे देश में किसानों का? हमारे देश में 70% से अधिक जनसंख्या गाँवो रहती है, उसमें भी अगर 70% की यह हालत है तो क्या अर्थ हुआ? अब अगर प्रधानमंत्री अपने वादे में सफल रहे तो साल 2022 में यही दुगनी होकर 3332 रुपये हो जाएगी। मुद्रास्फीति को शामिल कर लें तो इस रक़म की भी कोई हैसियत नहीं रहेगी। यह आँकड़ा देश के एवरेज में देखने पर भी कोई 3000 तक ही रह जाता है। ऐसे में हम कैसे खुश हो सकते हैं कि हमारे किसान 5-6 साल बाद 3-4 हज़ार रुपए महीने के कमाने लगेंगे। देश के ज्यादातर गरीब, किसान और खेतिहर मजदूर ही हैं। इस बजट में इन उम्मीदों के पूरे होने का प्रबंध कहां दिखता है....? न्यूनतम समर्थन मूल्य तक का कहीं जिक्र नहीं आया। उसे बैंक से कर्ज लेने के लिए नौ लाख करोड़ के आंकड़े के जिक्र की तुक क्या है। सबको पता है किसानों की अब और कर्ज लेने की हैसियत चुक गई है। इन सवालों के जवाब बजट के शब्दों से नहीं, बल्कि वस्तुनिष्ठ आंकड़ों से मिल सकते है। एक बात को लेकर मैं निजी तौर पर असमंजस में हूँ क़ि अभी तक यह भी साफ नहीं हो पा रहा है कि सरकार खेती की आमदनी को डबल कर देगी या ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों की आमदनी डबल कर देगी। प्रधानमंत्री तो किसान का ही नाम ले रहे हैं मगर गांव में सिर्फ किसान नहीं रहता है।
अगर सरकार किसानों की आमदनी डबल ही करना चाहती है तो फ़सलों की लागत का पचास फीसदी जोड़ कर दाम देने की बात क्यों नहीं करती? बीजेपी ने अपने घोषणापत्र के "पेज 44" पर लिखा है कि सुनिश्चित किया जाएगा कि लागत का पचास फीसदी लाभ हो। सरकार बताये कि इसे सुनिश्चित करने के लिए क्या कर रही है? समर्थन मूल्यों में वृद्धि की हालत देखकर तो नहीं लगता न ही लागत में कोई कमी आई है। अभी जो समर्थन मूल्य मिलता है उससे बहुत मुश्किल से लागत निकल पाता है। क्या सरकार ने कोई नया फ़ार्मूला खोज लिया है जिसके दम पर इनकम डबल करने का दावा कर रही है। अगर ऐसा है तो यही बात साफ साफ कही जानी चाहिए। सरकार एकीकृत बाज़ार की बात करने लगी है। बाज़ार के सिस्टम में बिल्कुल सुधार होना चाहिए लेकिन यह अभी साफ नहीं है कि इससे क़ीमतों में उछाल ही आ जाएगा। अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा ने टीवी पर एक उदाहरण दिया कि कर्नाटक में दो सौ मंडियों को एकीकृत किया गया है फिर भी टमाटर के दाम लागत से कम है। चुनावी चर्चाओं के दौरान किसानों के लिए आय आयोग की बात चली थी वो बात भी नए नए सपनों में खो चुकी है। रही बात इस बार के बजट में गांवों की तरफ ध्यान देने की तो वो स्वागत योग्य है। लेकिन हर मद में चंद हजार करोड़ की वृद्धि कर देने से ही मंज़िल आसान नहीं होने वाली। गांवों में बुनियादी ढांचे के विकास से रोज़गार व्यापार के अवसर बढ़ेंगे लेकिन सबके लिए बढ़ेंगे कोई ज़रूरी नहीं। उन जगहों पर जाकर देखना चाहिए जहां सड़कें अच्छी हैं और सिंचाई के साधन बेहतर। पंजाब एक उदाहरण हो सकता है। वहां खेती और किसान की हालत ख़स्ता है। बुंदेलखंड, तेलंगाना और विदर्भ के सूखाग्रस्त इलाक़ों के लिए सरकार क्या योजना ला रही है जिससे किसान आत्महत्या ना करें? ऐसा कोई रोडमैप अबतक सामने आया नहीं है। स्मार्टसिटी और डिजिटल इंडिया बनाने की बात की जाती है, लेकिन मुझे समझ में नहीं आता है क़ि शहरों की 6.5 करोड़ आबादी जो स्लॅम में रहती है, (एनएसएस की रिपोर्ट के अनुसार) वो रातो रात स्मार्ट कैसे हो जाएगी। बुनियादी चीज़ों की ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं और बातें आसमान में उड़ने की। सपने बड़े कर दो लोग भूल जाएँगे। एक बार का उदाहरण है, कि उत्तराखंड में बाढ़ आ गई, तो अधिकारियों ने मंत्रीजी से कहा क़ि पानी ख़तरे के निशान से ऊपर जा रहा है क्या किया जाए? तो वो बोले ख़तरे का निशान 2 फुट ऊपर कर दिया जाए। इसी तरह पहले 32 रुपए रोज कमाने वाला ग़रीब था, अब दो साल पहले उसे 25 रुपए कर दिया। सब ग़रीब पेपर्स पर ग़रीबी रेखा से ऊपर हो गए। क्या भद्दा मज़ाक है यह ग़रीबी के साथ? इसी तरह लोग कहते हैं कि देश में बहुत लोगों को दूध नहीं पीने को मिलता है तो छास का नाम बदलकर दूध कर दो, तो सब पीने वालों की गिनती में आ जाएँगे। यह तो वही हो गया कि शियार को पीट पीट कर कबूल करवा लो कि वही शेर है, अन्यथा शेर की परिभाषा ही बदल दी जाए, जिससे हमारे देश में शेरों की संख्या बदल जाए। यह जुमलों का देश है भाई, हरिजन (मंदिर में घुसने ना देना और हरिजन कहना कितना बड़ा मज़ाक था) और दिव्यांग शब्द ऐसे ही हैं, जबकि गुजरात के भरोट जिले में विकलांगों की बैसाखी और साइकिल में भी भ्रष्टाचार हुआ है। ऐसा पहले कांग्रेस के जमाने में सलमान खुर्शीद कर चुके हैं। खैर कांग्रेस की सरकारों से तो अच्छा ही किसानों के लिए दिया गया बजट कहा जा सकता है। बस ऐसा ना हो कि कहीं यह भी बिहार के पैकेज जैसे ना निकल जाए. क्योंकि अभी 4-5 राज्यों के चुनाव आने वाले हैं।
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