Thursday, September 29, 2016

अमेरिकन चुनाव की डिबेट

कल डोनल्ड ट्रम्प और हिलेरी क्लिंटन के बीच में अमेरिकन प्रेसीडेंसियल डिबेट को सुनकर मेरे मन में एक ख़याल आया कि क्या भारत में भी ऐसा होना चाहिए? जब ज़्यादा गूगल करके देखा तो पता चला कि वहाँ की इस डिबेट के पीछे एक बड़ा प्रोसिज़र है. डोनल्ड ट्रंप अपनी रिपब्लिकन पार्टी के 16 उम्मीदवारों से डिबेट में और अन्य बातों में लड़कर आए हैं. वहीं दूसरी तरफ हिलेरी क्लिंटन भी तो 5 लोगों से अपनी डेमोक्रेटिक पार्टी में जीत कर आई हैं.  फिर लगा कि मैं भी कहाँ दिन में तारे देखने के सपने देख रहा हूँ. क्या संभव है कि मोदी के सामने कोई बिहार या यूपी का हिन्दी बोलने वाला या रविशंकर प्रसाद जैसा विद्वान आकर बहस करे. सुषमा स्वराज या वैंकेया नायडू से बहस हो उनकी. क्या संभव है कि राहुल गाँधी ज्योतिरादित्य सिंधिया या सचिन पयलट से बहस करें. अरविंद केजरीवाल, कुमार विश्वास और मनीष सिसोदिया की लड़ाई हो. नहीं. यहाँ तो लोकतांत्रिक दल का दावा करने वाले लोगों के यहाँ पार्टी अध्यक्ष पद के चुनाव में भी निर्विरोध जीतना तय होता है. एक तरफ नागपुर से जो बिठा दिया जाए, दूसरी तरफ कोई गाँधी परिवार से थोप दिया जाता है. 
हमने अमरीकी चुनाव व्यवस्था से मार्केटिंग, कवरेज और प्रबंधन का तरीका पूरी तरह से आयात कर लिया है. वहीं की तरह यहां भी दिन रात सर्वे होते हैं और टीवी पर शो चलता है कि कौन बनेगा मुख्यमंत्री और कौन बनेगा प्रधानमंत्री. प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के नाम पर बाकी विधायक या सांसद बिना अपनी योग्यता के प्रदर्शन के जीत जाते हैं. अमरीका में तो ट्रंप के नाम पर रिपब्लिकन का कोई भी उम्मीदवार सीनेट या कांग्रेस के लिए नहीं जीत सकता. सबको पार्टी और क्षेत्र में अपनी योग्यता साबित करनी होती है. 
आपने टीवी पर देखा होगा कि डोनाल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन के बीच बहस हो रही है. वो बहस हो रही है विश्वविद्यालय में. हमारे नेता भी इंटरव्यू देते हैं मगर पहले से सवाल लिखवा लेते हैं, छात्रों के बीच जाते हैं तो सवालों की चिट पहले मंगा लेते हैं. ट्रंप और क्लिंटन की बहस को जो एंकर संचालित कर रहा था वो पहले बताता है कि सवाल मेरे हैं और किसी से साझा नहीं किये गए हैं.
जिस वक्त हिलेरी और ट्रंप बहस कर रहे थे उसी वक्त अमरीका के तमाम विश्वविद्यालयों के ऑडिटोरियम में इस डिबेट को लाइव दिखाया जा रहा था. डिबेट से पहले पैनल की चर्चा भी हुई और डिबेट के बाद भी चर्चा हुई. इस तरह की बहस का आयोजन वहां दोनों दलों की छात्र शाखाएं करती हैं. यहीं से भविष्य के लिए नेता भी पैदा होते हैं. इस बात पर भी बहस हुई कि जिस एंकर ने ट्रंप और हिलेरी की बहस को संचालित किया वो कितना तटस्थ था. आपने तो दो मुख्य उम्मीदवारों के बीच की बहस को ही भारत में देखा है लेकिन वहां के विश्वविद्यालयों में बहस पर बहस होती है. भारत में इसकी मांग करेंगे तो कुछ लोग कहने लगेंगे कि टैक्स के पैसे से पढ़ने आए हैं या राजनीति करने. अमरीका में इस वक्त सीनेट और कांग्रेस का भी चुनाव हो रहा है. वहां भी हर स्तर पर उम्मीदवारों के बीच बहस होती है.
अमरीका का लोकतंत्र जितना भी महान हो लेकिन उसके चुनाव में किसी ग़रीब का चेहरा नहीं दि‍खता है. भारत में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को मंच से दिख तो जाता है कि उनकी रैली में ढाई सौ से पांच सौ रुपये देकर लाए लोगों की माली हालत कैसी है. अमरीका के नेता किसी ग़रीब को लेकर अपनी स्मृति बताते हैं कि मेरे दादा जी ड्राईवर थे. इसे सुनकर वहां लोग भावुक हो जाते हैं. फैमिली टच आ जाता है और भूल जाते हैं कि जो नेता अपने दादा की ड्राईवरी का किस्सा सुना रहा है उसके प्रचार का बजट एक हज़ार करोड़ से लेकर तीन हज़ार करोड़ तक का है. आप ओपनसीक्रेट डॉट ओआरजी पर जाकर देख सकते हैं कि कितना पैसा आया है कितना खर्च हुआ है. जो पैसा बच जाता है वो डोनर को लौटा दिया जाता है. इस बार दोनों मिलकर 6000 करोड़ खर्च करने वाले हैं. 6000 करोड़.
ये पहला डिबेट है. ट्रंप राष्ट्रपति ओबामा पर आरोप लगाते रहे हैं कि ओबामा ने आतंकी संगठन आईएसआईएस की स्थापना की है और हिलेरी क्लिंटन उसकी कोफाउंडर हैं. भारत में ऐसे आरोप लग जाएं तो पार्टी से जुड़े बेरोज़गार वकील मानहानि का केस कर दें. ट्रंप ने ये मामला फिर उठा दिया. हिलेरी क्लिंटन बोलती रहीं कि मेरे पास आईएसआईएस से लड़ने की योजना है. ट्रंप ने कहा कि आप शत्रु को बता रही हैं कि आप क्या कर रही हैं. वे तंज कर रहे हैं कि आपने आईएसआईएस का लड़ने के नाम पर समर्थन किया. हिलेरी ने बताया कि आईएसआईएस से लड़ने के लिए टेक कंपनियों के साथ मिलकर काम करना होगा. हवाई हमले भी करने होंगे. ट्रंप ने कहा कि इराक से सेना हटाने के फैसले के कारण ही आईएसआईएस जैसे संगठन को पनपने का मौका मिला. ट्रंप ने कहा कि क्लिंटन तो कई साल से आईएसआईएस से निपटने का दावा कर रही हैं लेकिन वो छोटे से संगठन से अब कई देशों में फैल चुका है.
इस तरह से टैक्स से लेकर तमाम मुद्दों पर नब्बे मिनट तक दोनों के बीच बहस हुई. मीडिया ने दोनों की बातों की फैक्ट चेकिंग की और बताया कि किसने जवाब देते वक्त किस तरह से तथ्यों को सही बताया या गलत बताया. बहस 2016 में हो रही है लेकिन हिलेरी क्लिंटन ने ट्रंप से सवाल कर दिया कि 1970 के दशक में ट्रंप ने अश्वेत को किराये पर मकान देने से मना कर दिया था. इसलिए वो नस्लभेदी हैं और ओबामा की पैदाइश के ख़िलाफ़ झूठ फैला रहे हैं. क्लिंटन ने यह भी कहा कि ट्रंप यह नहीं बता रहे हैं कि वे टैक्स देते थे या नहीं. सभी उम्मीदवारों ने अपना टैक्स रिटर्न सार्वजनिक किया है. ट्रंप क्यों नहीं कर रहे हैं. हिलेरी का आरोप है कि ट्रंप टैक्स नहीं देते हैं. ट्रंप का जवाब था कि इसका मतलब है कि वे स्मार्ट हैं. तो हिलेरी ने कहा कि आपने सेना के लिए कुछ नहीं दिया, स्वास्थ्य या स्कूल के लिए कुछ नहीं दिया. ट्रंप ने हिलेरी की बीमारी को मुद्दा बना दिया कि वे कमज़ोर हो गई हैं. स्टेमिना नहीं है. यह सब सुनकर आप राहत की सांस ले सकते हैं कि हम इससे भी नीचे गिरते रहे हैं. भाषणों में गिरने की होड़ के लिए हमें सीएनएन और फॉक्स न्यूज देखने की ज़रूरत नहीं है. हम गिरना जानते हैं. ट्रंप का उभार पूरी दुनिया में बहस का मुद्दा है. कहा जा रहा है कि अमरीका दक्षिणपंथ की तरफ जा रहा है. जहां बाहर से आए लोगों या दूसरे धर्मों के प्रति कम सहिष्णुता है. ट्रंप की बातें और मुद्रायें अजीब हैं. हिलेरी क्लिंटन इस बहस के बाद आगे बताई जा रही हैं लेकिन क्या बहस से ही वहां नतीजे तय होते हैं. अमरीका ट्रंप के कारण बदल रहा है या अपनी ग़रीबी के कारण बेचैन है.

भगत सिंह एक विचार

पिछले दो दिन से मैं भगत सिंह को बहुत जी रहा हूँ, कहीं किसी प्रोग्राम को अटेंड करना तो कभी उनके बारे में लिखे गीत और नाटक देखना सुनना. कई लोग कहते हैं कि मुझे भी भगत सिंह बनना है, लेकिन आज के दौर में बिल्कुल भी संभव नहीं है भगत सिंह बनना. आज तो हमें उनके 10% होने में भी मुस्किल दिखती है, कोई न कोई आतंकवादी कहकर मार  देगा. इसलिए अपनी जगह पर रहकर समाज में बदलाव लाने की कोशिशें करना ही आज का भगत सिंह होना है. कम से कम 1-2% भी अगर हम उनके विचारों को जिंदा रख सके तो बहुत होगा. निजी जीवन में जितना हो सकता है उतना तो कोशिश, हर व्यसन(नशे), चरित्रदोष से मुक्त होकर ना केवल खुद पढ़ना बल्कि दूसरों को भी पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका देना ही समाज में हमारी अच्छी छवि बना सकता है, हर ग़लत चीज़ का विरोध करना और हमेशा कमजोर की तरफ खड़े होना ही भगत सिंह होना है. जातिवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ना ही भगत सिंह होना है. हर जेंडर का सम्मान करना और उनकी बराबरी के लिए लड़ना ही भगत सिंह होना है. मजदूरों और किसानों के हित में बोलना ही भगतसिंह होना है. बात बात पर झूंठ ना बोलना ही भगतसिंह होना है. किसी राजनीतिक दल में हिम्मत नहीं है कि वो भगत सिंह के विचारों को अपना सकें. इसलिए किसी दल से चिपक कर नहीं चल सकता मैं, अगर आज आम आदमी पार्टी सही मुद्दों को उठा रही है तो उसके साथ हूँ, कल वो ऐसा नहीं करेगी तो मैं दूसरा विकल्प देखूँगा. ऐसा हर युवा को करना चाहिए. एक और अंतिम बात आज भगत सिंह का टी शर्ट पहन कर या डीपी लगाकर घूमने वाले कितने युवा हैं जो अपनी शादी में दहेज नहीं लेंगे. मैं तो इस बारे में अपने पिताजी को एक पत्र भी लिख चुका हूँ, उनकी सोंच बदल दी मैने. उस पत्र से मेरे कट्टर परिवार के फिल्मी ठाकुर टाइप पिता जी ने मान लिया और मुझे इन सब बातों से हमेशा के लिए आज़ादी भी दी.  इस समय वो पत्र गाँव में होगा जैसे ही मिलेगा सबको दिखा दूँगा. इसलिए जितना भी हो सकता है भगत सिंह बनने की कोशिश की है मैने. 

Monday, September 19, 2016

कश्मीर पर समाधान कैसे हों?

इतने बड़े इश्यू पर टीवी पर बैठकर चिल्लाने से कुछ नहीं होगा यह सही बात है. कल टाइम्स नाउ पर सर्वे हो रहा था कि मैसेज करके बताइए क़ि पाकिस्तान से युद्ध होना चाहिए या नहीं? क्या मज़ाक है? सरकार किसी की भी हो लेकिन ऐसे समय में हर नागरिक को सरकार के ऊपर भरोसा करके छोड़ देना चाहिए क़ि आप अपने हिसाब से देश हित में कदम उठाइए. युद्ध इतना आसान नहीं है. और अगर युद्द हो भी गया तो क्या होगा? जो पाकिस्तान पहले से बर्बाद है, उसे और बर्बाद करना, क्या वही बर्बाद होगा? हमारा भी तो नुकसान है उसमें. हम विश्व के उभरते हुए देश में है, जहाँ एक बड़ा युवा वर्ग है, शिक्षा, से लेकर आर्थिक स्तर पर हम मजबूत हो रहे हैं. अगर एक भी परमाणु बम पाकिस्तान पर फेकेंगे तो वो बर्बाद, अगर हमारे उपर कुछ किया उन्होने तो हमारा भी नुकसान. इसलिए युद्ध एक मात्र और अंतिम रास्ता है इसका यह कहना बहुत इमोशनल और बचकाना है. क्या इंटरनशनल लेवल पर युद्ध कर देना इतना आसान होता है? क्या इंटरनैशनल क़ानून नहीं होते हैं? हमारी राजनीतिक पीढ़ी को ऐसे मुद्दो पर साथ आकर इंटरनेशनल लेवल पर मजबूती से रणनीति पर काम करना चाहिए. ना कि कश्मीर में सरकार बनाने के लिए अलगाव वादियों से समझौता करना. 
रही बात कश्मीरी अवाम की तो उन्हें पता होना चाहिए कि हमारे यहाँ लोकतंत्र है, यह बात कश्मीरी लोगों को समझना चाहिए, बलूचिस्तान में हैं तो ज़्यादातर मुस्लिम ही लेकिन होता क्या है? पाकिस्तानी आर्मी महिलाओं के रेप करके जाती है, बलूचिस्तान में. अगर कश्मीर भी वहाँ चला गया तो इनको अकल आएगी. फिर कोई छोटा सा भी आंदोलन करके बताएँ देश या सरकार के खिलाफ तो जिंदा लटका दिए जाएँगे किसी चौराहे पर तालिबान की तरह. अभी कुछ दिन पहले स्वात घाटी(पाकिस्तान) पर मैं एक रिपोर्ट पढ़ रहा था जिसमें कहा गया कि इतनी खूबसूरत जगह को आईएस आई ने कब्ज़े में करके नर्क बना दिया है. लोगों को टीवी, इंटरनेट यूज करने पर मौत मिलती है. 7-8 साल की बच्चियों को बुर्क़ा पहनना अनिवार्य है, जो ना पहने उसके साथ रेप. लड़कियों को मदरसे में केवल कुछ साल पढ़ना उसके बाद घर में क़ैद. सुनकर रोना आता है इंसानियत के नाते. यह जो कट्टरवाद है ये एक जहर है, जिसको एक बार खून बहाने की आदत पड़ गई वो बहाता है, पहले वहाँ दूसरे धर्म के लोगों को मारा जब वो ख़त्म हो गए तो खुद के धर्म वालों को सिया सुन्नी में बाँटकर
उड़ी आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए एक बार फिर कहना चाहता हूं कि कश्मीर का विवाद एक राजनीतिक मसला है, इसे राजनीतिक पहल से ही हल किया जा सकता है। इसका सैन्य-समाधान नहीं है। आज हमने अपने 17 सैनिकों की मूल्यवान जिन्दगी खोई है। ये सभी किसी किसान या किसी मजदूर-कर्मचारी या किसी निम्न-मध्यवर्गीय परिवार के चिराग रहे होंगे। सत्ता-संचालन करने वाले हमारे अमीर सियासतदान और ऊंचे पदों पर बैठे आभिजात्य हुक्मरान बरसों-बरस से सरहद पर वही पुरानी नीतियां दुहरा रहे हैं- 'हर हमले का मुंहतोड़ जवाब देंगे या एक के बदले चार या सात सिर लायेंगे।' क्या इससे हमारे जवान का वह एक सिर वापस आ जायेगा? ऐसे मौकों पर स्टूडियोज को ‘वाक् युद्ध-स्थल’ में तब्दील करने वाले कुछ चैनल आज बता रहे थे कि ऐसा भीषण आतंकी हमला 26 सालों में पहली बार हुआ। सवाल है, ऐसा क्यों भाई? 2014 में सत्ता में आने के बाद इस सरकार के संचालकों ने देश को बताया थी कि अब दिल्ली में एक ताकतवर सरकार आ गई है। दुश्मन की औकात नहीं कि हमारी तरफ आंख उठाकर देखे। फिर आज यह सब क्यों हो रहा है? 
दरअसल, ऐसे मसले उत्तेजक बयानों से नहीं हल होते। ‘बुद्धिहीन वीरता’ कामयाबी की तरफ नहीं ले जाती। आज जरूरत है, संजीदा होकर विचार करने की। अपनी रणनीति की समीक्षा करके नया रास्ता खोजने की। आखिर हम टकराव और आंतकवाद के स्थायी समाधान की कोशिश क्यों नहीं करते, ऐसा माहौल बनाने की रणनीति पर क्यों काम नहीं करते, जिसमें किसी का सिर न कटे! सरहद पर शांति और सौहार्द्र हो, जैसा आज दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों की सरहदों पर है। अनेक देशों के उदाहरण हैं, जो सैकड़ों साल एक-दूसरे से युद्ध करते रहे लेकिन बीसवीं सदी में ज्यादातर ने अपने मसले राजनीतिक स्तर पर हल कर लिये और युद्ध से हमेशा के लिये तोबा कर लिया। इतिहास पलटकर देख लीजिये, यूरोप में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। उनका सैन्य-बंदोबस्त का खर्च कम हुआ। बजट का बड़ा हिस्सा वे विकास और अपनी जनता के कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च करने लगे। .यही कारण है कि वे आज जीवन के हर क्षेत्र मे आगे हैं।  
कुछ समय पहले श्रीनगर स्थित हमारी सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख ले.जनरल हुड्डा ने भी कहा था कि कश्मीर एक राजनीतिक मसला है, यह कोई कानून-व्यवस्था का मसला नहीं है। इसलिये इसका समाधान भी राजनीतिक स्तर पर ही होना है। आखिर, हम अपने श्रेष्ठ और शीर्ष सैन्य-कमांडर की बात क्यों नहीं सुनते ! आज शाम कुछ टीवी स्टूडियोज की बहस-चर्चाएं सुनते हुए मन क्षोभ और विषाद से भर गया। सरहद पर हमारे जवान शहीद हुए हैं लेकिन वातानुकूलित स्टूडियो में बैठे कुछ महाशय ‘मार डालो-खत्म कर डालो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो’ की दहाड़ लगा रहे थे। कुछ हिन्दी चैनल बता रहे थे, ‘भारत-पाकिस्तान में परमाणु-युद्ध होने की स्थिति में भारत से ज्यादा नुकसान पाकिस्तान का ही होगा। वह बरबाद हो जायेगा।‘ मानो परमाणु युद्ध की स्थिति में भारत आबाद रहेगा! आखिर यह कैसी पत्रकारिता है, कैसे विचारक हैं, कैसे सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं, जो सिर्फ युद्धोन्माद का धंधा करते दिखते हैं! आतंकवाद को सिरे से खारिज करते हुए मैं युद्धोन्माद की दो-तरफा कोशिशों को भी खारिज करता हूं। आज की दुनिया में विवादों का स्थायी समाधान किसी युद्ध से नहीं, राजनीतिक पहल से ही खोजा जा सकता है।

Sunday, September 18, 2016

मीडिया बनाम दलित चेतना

कल मैं दलित चेतना पर वर्तमान मीडिया के बारे में रिसर्च कर रहा था, तो सबसे बड़ा चैनल या न्यूज पोर्टल नेशनल दस्तक दिखा. वो आज के दौर में दलितों से जुड़ी खबरें आगे आकर दिखा रहा है. लेकिन उसमें मुझे एक संकुचित विचारधारा या पूर्वाग्रह दिखाई दिया. जिग्नेश मेवानी के साथ इंटरव्यू में पत्रकार बार बार यही सवाल कर रहा था क़ि दलितों का नेतृत्व इस समय कौन कर रहा है? तो जिग्नेश बोला क़ि दलितों को अभी भी राजनीतिक आज़ादी का इंतजार है. तो वो बार बार ज़ोर देकर कहता है क़ि क्या आप काशीराम के काम को नकार रहे हैं? फिर कहता है क़ि आप नहीं मानते की बीएसपी दलितों का प्रतिनिधित्व करती है? फिर जिग्नेश ने सवाल किया तो वो कहता है क़ि आप नहीं मानते क़ि मायावती ने दलित चेतना लाई है. फिर लेफ्ट पर हमला चालू कर दिया और लेफ्ट विरोध के अपने शब्दों को बार बार उसके मूह में डालने की कोशिश की. इसी चैनल पर कुछ दिन पहले मैने देखा था क़ि जिग्नेश मेवानी लेफ्ट से दूरी बना रहे हैं. असल में जिग्नेश कन्हैया के दोस्त हैं, इस समय. वो पत्रकार जिग्नेश को कहता है  क़ि आप लेफ्ट के साथ मत जाइए उन्होंने दलितों की दशा और बेकार की है, उसके दो मिनट बाद ही वो कहता है अंबेडकर फूले काशीराम और पेरियार ने जो किया वो क्या है? तो मुझे नहीं समझ में आया क़ि पेरियार भी तो लेफ्ट के थे फिर वो कैसे पूरे लेफ्ट पर हमलावर है? कुछ मिलकर इसमें मुझे यही दिखा क़ि ये चैनल प्रो बीएसपी है. यह संभव है क्योंकि वो दलित चेतना के लिए आए हैं, बार बार बीएसपी के लिए काम कर चुके प्रोफ़ेसर विवेक कुमार का इंटरव्यू लेकर दिखना यही दिखता है. 
असल में इस पोर्टल या चैनल के लोग उसी मानसिकता से घिरे हैं जिससे हमारे देश का पूरा दलित चिंतक घिरा था. कहते हैं कि बाबा साहब अंबेडकर का 10-12 पीएचडी स्कॉलर मिलकर भी सामना नहीं कर सकते थे. मुंबई में उनके घर में 50 हज़ार किताबों की लाइब्रेटी थी. यह देश के दलित चिंतक या विद्वानों की बड़ी असफलता है क़ि कोई भी बाबा साहब को उनके असली रूप में जनता के सामने पेश नहीं कर सका. नतीजा यह हुआ क़ि इतने बड़े अर्थशास्त्री और क़ानून के जानकार को विश्व के अन्य देशों में पढ़ाया जाता है और भारत में केवल एक दलित नेता के रूप में ही देखा जाता है. जबकि होना यह चाहिए था क़ि बाबा साहब को कोर्ट करके दलितों में तो चेतना लाई जा सकते थे, बाकी जगहों पर क़ानून के जानकार और अर्थशास्त्री बनाकर पेश करते. इसका दुष्परिणाम हुआ क़ि उच्चवर्ग बाबा साहब से नफ़रत करने लगा, और जब कोई किसी से नफ़रत करता है तो उसके अच्छे कामों को भी नकार देता है. मेरा मतलब बाबा साहब के विचारों को लेकर खुद लड़ना था, जबकि सभी दलित नेता और चिंतकों ने खुद का बचाव बाबा साहब के नाम पर किया क्योंकि वो क़ानून के विधाता थे, और दलितों में इमोशानल कार्ड  खेलकर उनके नाम पर वोट लिए. रामविलास पासवान से लेकर राम दास अठावाले, मायावती तक कोई भी अपने आगे कोई दलित लीडरशिप नहीं ला पाए. मैं यह आरोप काशी राम पर नहीं लगा सकता हूँ, उन्होने मायावती को आगे करके अपना काम कर दिया था. बीएसपी की तो एक समय पंजाब और महाराष्ट्र तक में लहर थी. महाराष्ट्र में बीएसपी को अंबेडकर के सपनो की पार्टी कहते थे, आज सब बिखर गए, क्योंकि उनको कोई दल नहीं मिला. यह भी नहीं है कि यूपी की तरह वो बीजेपी या हिंदूवादी शिवसेना में चले गए, वहाँ के दलित हिंदुत्व को नकार कर एकदम से बौद्धिस्ट हैं. लेकिन मायावती यूपी की सीएम रहकर महाराष्ट्र की पार्टी चलाना चाहती थी, और किसी को आगे नहीं किया. खैर ये तो बात थी एक तथाकथित दलित राजनीतिक दल की. लेकिन दलित मीडिया की  उस बात को मैं बिल्कुल खारिज करता हूँ क़ि दलितों का प्रतिनिधित्व केवल दलित ही कर सकता है, आप लालू प्रसाद के नब्बे के दशक के सामाजिक न्याय की लड़ाई को कैसे भूल सकते हैं उन्होने सीएम रहते हुए बिहार की जड़ों में घुसे हुए जातिवाद को काफ़ी हद तक कमजोर किया वो भी अपरकास्ट का खुला विरोध करके. एक और बात अंत में कहना चाहता हूँ क़ि आज के छात्र आंदोलनों में दलित चेतना को लेकर कोई उम्मीद तो नहीं दिखाई देती है. लेफ्ट के छात्र संगठन हमेशा से बात करते हैं दलितों की लेकिन जहाँ जहाँ उनकी सरकारें रहीं उन राज्यों में दलितों की दशा और भी खराब है. लेफ्ट में कोई नेता दलित नहीं उभर पाता है. उनके लिए सड़कों पर लड़े दलित, झंडा दलित उठाए लेकिन नेतृत्व के समय कविता कृष्णन, प्रकाश करात, कन्हैया कुमार ही आते हैं कोई दलित नहीं. उनके विरोध में आज एक दलित छात्र संगठन आया है. बाप्सा जो बिल्कुल कदम से कदम मिलकर अंबेडकर के सपनो पर चलना चाहता है. मतलब हिंदू धर्म और शास्त्रों का खुला विरोध करके. जो आज के दौर में संभव नहीं है. आज सोसाल मीडिया से लेकर समाज के निचले दौर तक दक्षिणपंथी विचारधारा घुल गई है, इसके लिए आप लेफ्ट या बिल्कुल हिंदू धर्म विरोधी होकर नहीं जीत सकते है. आपको सेंट्रल में रहकर लड़ना होगा इनसे. और हमेशा ध्यान रहे क़ि कोई ग़लती न हो. जेएनयू के चुनाव में मुझे कई मित्रों ने बताया कि दक्षिण पंथी विचारधारा के लोगों ने इसबार एबीवीपी की जगह लेफ्ट के मोहित पांडे को वोट दिया है, क्योंकि इसबार लड़ाई एबवीपी बनाम लेफ्ट नहीं. बाप्सा बनाम लेफ्ट थी. इसलिए उँची जाति के छात्र नहीं चाहते थे क़ि कोई भी दलित छात्र जीतकर उनका नेतृत्व करे.

Thursday, September 15, 2016

सोसल मीडिया के खतरे

मैं कई बार कह चुका हूं कि सोसल मीडिया को राजनीति में एक टूल की तरह प्रयोग करना बहुत खतरनाक है, बिना कुछ सोचे समझे, कुछ भी भावनात्मक पोस्ट आई कि बगदाद की तस्वीर को असम की बताकर शेयर कर दिया जाता है। बहुत डर लगता है इस भीड से कि कहीं कोई मुजफ्फरनगर फिर से न करा दिया जाए। बारूद के ढेर पर बैठ कर रह गया है समाज, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। 
उत्तर प्रदेश में सभी दल केवल मुददे पर राजनीति कर रहे हैं। सपा अपने काम बता रही है भले झूठ हो, बीएसपी जय भीम के नारे के सहारे है। 
लेकिन भाजपा और आरएसएस का कैडर केवल कट्टरपंथी बातों पर आधारित राजनीति कर रहे हैं। हर रोज कई वाट्सएप और फेसबुक ग्रुप में बिना पूछे जोड दिया जाता है। गाय, गंगा, हिंदू, राम न जाने क्या क्या माँ बहन बचाओ जैसे मैसेज भेज देते हैं। यह बहुत खतरनाक है, कुछ नहीं हो पाता है। आईटी एक्ट की धारा 166 और आईपीसी के अंडर केश भी किया तो पता नहीं चल पाया क्या हुआ? ये सरकार की ऐसे लोगों को छूट है। भविष्य में इसके परिणाम बहुत खतरनाक हो सकते हैं।
मैं राजनीति करने से इसलिये ही डरता हूँ। मुझे एनएसयूआई, लेफ्ट, सपा के स्टूडेंट विंग से लेकर एबीवीपी तक के ऑफर आए साथ काम करने के। लेकिन कहीं हिम्मत नहीं हुई। आम आदमी पार्टी के लिए काम किया लेकिन मुम्बई में कुछ फीका प्रदर्शन और नेतृत्व देखकर पीछे हट गया। साम्प्रदायिकता के लेटेस्ट ट्रेंड में असल बात तो यह है कि इसके खिलाफ भी किसी पार्टी के युवा लड नहीं पाते हैं। एक तरफ ओवैसी सेना कट्टर हिन्दूवादी लोगों का सामना कटटर इस्लामी मैसेज से करते हैं, जिनमें हिंदू विरोध होने पर बाकी भाजपा विरोधी भी मजबूर हो कर साथ आ जाते हैं। और सब को पडी नहीं है, ज्यादातर दलों के युवा समर्थकों को तो वैचारिक या टेक्निकल अकल ही नहीं है। रही बात आम आदमी पार्टी की तो मेरा निजी अनुभव है कि यहाँ भ्रष्टाचार से निपटने के लिए तो ईमानदार युवा फौज है, लेकिन साम्प्रदायिकता से लडने में सझम नहीं है। बहुत लोगों की तो विचारधारा में छुपा हुआ हिंदुत्व है। बडे नेता कुमार विश्वास उदाहरण हैं। वे अब तो कुछ बदल भी गए हैं। कई युवाओं के राजनीतिक बैकग्राउंड 1990 के बाबरी समर्थक टाइप लोगों के हैं। अब जरूरी है नेतृत्व के द्वारा ऐसी ट्रेनिंग। जब राष्ट्रीय स्तर पर लडेंगे तो लोग सामने आएगे इस सोच के खिलाफ। यह दम तो प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और संजय सिंह में ही है। जिसमें कई लोग तो अलग हैं। इसे आप अभी इग्नोर कर सकते हैं, लेकिन मेरा डर बेवजह नहीं है।

चाचा-भतीजे में महाभारत

यह पहला मौका नहीं है जब समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव का खुलेआम पक्ष लिया हो. इससे पहले इस साल 15 अगस्त के मौके पर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की उपस्थिति में कहा था कि यदि शिवपाल पार्टी का साथ छोड़ देते हैं तो समाजवादी पार्टी बिखर जाएगी. हम थोड़ा और पीछे जाएं तो नवंबर 2013 में लोकसभा चुनावों से कुछ महीने पहले मुलायम ने शिवपाल को रामगोपाल यादव पर तरजीह देते हुए चुनावों के लिए पार्टी की कमान उनके हाथ में ही सौंपी थी. पार्टी की मंगलवार को हुई बैठक में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश इकाई के प्रमुख का पद वापस ले लिया गया और यह फैसला किसी और का नहीं बल्कि पार्टी सुप्रीमो और उनके पिता मुलायम सिंह यादव का ही था. जवाब में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने चाचा और पार्टी के कद्दावर नेता शिवपाल सिंह यादव से सभी मंत्रालयों का प्रभार वापस ले लिया. इस मामले में पार्टी के पुराने नेताओं का कहना है कि कुछ भी हो जाए लेकिन, समाजवादी पार्टी को यदि 2017 में होने वाला विधानसभा चुनाव जीतना है तो मुलायम के पास शिवपाल का बचाव करने और उन पर निर्भर रहने के आलावा और कोई दूसरा आॅप्शन नहीं है.  भले ही अखिलेश यादव पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद का चेहरा हैं, पार्टी में अमर सिंह की वापसी हो गई है और आजम खान जैसे बड़े नेता मौजूद हैं लेकिन, पार्टी कार्यकर्ताओं की बड़ी जमात मुलायम सिंह यादव के बाद शिवपाल को ही अपना नेता मानती है. पार्टी से जुड़े कुछ लोग बताते हैं कि शिवपाल यादव कार्यकर्ताओं के साथ हमेशा संपर्क में रहते हैं, राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर जमीनी स्तर पार्टी के लिए काम करते हैं, कार्यकर्ताओं के बीच पार्टी के किसी दूसरे बड़े नेता की इतनी पकड़ नहीं है जितनी शिवपाल की है, ये कुछ ऐसी बाते हैं जो शिवपाल को औरों से अलग खड़ा करती हैं और मुलायम के लिए उनको महत्वपूर्ण बनाती हैं. इस संबंध में समाजवादी पार्टी के एक नेता का कहना है, ‘अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव ही पार्टी के पोस्टर बॅाय होंगे. आगामी 3 अक्टूबर से वह एक बार फिर पार्टी के लिए समर्थन जुटाने के मकसद सेविकास से विजय की ओरयात्रा करने वाले हैं. उन्होंने ट्विटर पर इसकी घोषणा भी कर दी है. यदि समाजवादी पार्टी चुनाव जीतने सफल रहती है तो वही एक बार फिर मुख्यमंत्री भी होंगे. लेकिन, मुलायम सिंह यादव यह बात अच्छे तरीके से जानते हैं कि चुनाव जीतने के लिए एक मजबूत संगठन और निष्ठावान संगठनकर्ता की जरूरत होती है. संगठन के काम के लिए शिवपाल यादव पार्टी के सबसे उपयुक्त चेहरे हैं. उन्होंने नेता जी के साथ दशकों तक पार्टी संगठन में काम किया है और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी बहुत ही गहरी पैठ है. समाजवादी पार्टी के एक अन्य नेता कहते हैं, ‘मुस्लिम और यादव समुदाय पार्टी का सबसे बड़ा वोट बैंक है. मुलायम सिंह के बाद शिवपाल इन दोनों ही समुदायों के बीच पार्टी के सबसे स्वीकार्य नेता हैं. पार्टी के लिए आगामी चुनाव में इन दोनों समुदायों का अधिकटम वोट पाने के लिए मुलायम को शिवपाल के सहयोग की जरूरत पड़ेगी. वहीं, शिवपाल की पार्टी कार्यकर्ताओं के आलावा आम लोगों में भी अच्छी पकड़ है. अखिलेश इस मामले में अपने चाचा शिवपाल से पीछे ही हैं. मुख्यमंत्री जहां हर सप्ताह लखनऊ स्थित अपने आवास पर आम लोगों के समस्याओं के समाधान के लिए जनता दरबार का आयोजन करते हैं वहीं, शिवपाल ऐसी बैठक हर रोज करते हैं. वो लोगों की परेशानियों सुनते हैं और उनके सामने ही संबंधित अधिकारियों को फोन लगाकर इस संबंध में कार्रवाई करने का निर्देश देते हैं, इससे आम लोग के बीच शिवपाल को लेकर एक विश्वास की भावना है.इटावा के जसवंतनगर विधानसभा सीट से चौथी बार चुनाव जीतने वाले शिवपाल यादव की पार्टी में अन्य पक्षों से बातचीत करने और किसी भी तरह के विवाद में संकट मोचन की भूमिका निभाने वाले नेता की छवि है. विधानसभा चुनावा के मद्देनजर कौमी एकता दल के साथ हुए हालिया समझौते में शिवपाल ही पार्टी की तरफ से पहल करने वाले नेता थे. समाजवदी पार्टी में अमर सिंह की वापसी में भी शिवपाल ही मुख्य भूमिका में रहे. पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता बेनी प्रसाद वर्मा को पार्टी में फिर से वापस लाने का श्रेय शिवपाल को ही जाता है. हाल फिलहाल समाजवादी पार्टी में चाचा भतीजे के बीच चल रहे घमासान से कार्यकर्ताओं में निराशा है और वे इस विवाद के जल्द से जल्द शांत होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. शिवपाल और अखिलेश को नेता जी का दोनों हाथ बताते हुए एक पार्टी नेता का कहना है, ‘मुलायम चाहते हैं कि अखिलेश आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपनी बेदाग छवि के साथ प्रचार पर अपना ध्यान केंद्रीत करें और पार्टी और संगठन की जिम्मेदारी शिवपाल पर छोड़ दें. शिवपाल संगठन के काम से भली भांति परिचति हैं और पार्टी के लिए समर्थन जुटाने में अखिलेश से ज्यादा महत्वपूर्ण भी हैं.शायद यही वजह है कि मुलायम किसी भी कीमत पर शिवपाल के साथ खड़े रहना चाहते हैं और इसके लिए यदि अखिलेश की इच्छा के विरुद्व भी जाना पड़े तो उसके लिए भी तैयार हैं. 
समाजवादी पार्टी में अगर अखिलेश को यही शख्त कदम उठाने थे तो 4.5 साल से क्या कर रहे थे? उनके घर के साढ़े पाँच मुख्यमंत्री मीडिया में कहे जाते थे, अखिलेश उसमें से आधे थे. तब तो कभी अखिलेश ने ध्यान नहीं दिया, अगर 2014 में इतनी ईमानदारी कार्यकर्ताओं के प्रति अखिलेश दिखाते तो लोकसभा में और सीटें मिल जातीं. मैं अखिलेश यादव को बहुत जमाने से देखता आया हूँ. मेरे गाँव के कई लोगों के निजी संबंध थे, तो आते जाते देखा था. अखिलेश के प्रति उत्तर प्रदेश में युवा बेहद प्रभावित हैं. ख़ासकर यादव और ओबीसी में तो क्रेज़ है. आप कन्नौज की तरफ जाएँगे तो दिखता है, कि मुलायम को 40 साल तक के लोग दददा, और अखिलेश को युवा अखिलेश भाईया कहते हैं, डिंपल को भाभी. मैं ये संबंध इसलिए गिना रहा हूँ क्योंकि इससे उनके परिवार के प्रति राजनीतिक रिश्ते दिखते हैं. 2007 में समाजवादी पार्टी की हार शिवपाल चाचा के गुडों के कारण ही हुई थी. फिर 2012 में सबने अखिलेश को ही वोट दिया था, ना क़ि शिवपाल और आज़म ख़ान को. फिर आज़म का मुस्लिम प्रेम और शिवपाल चाचा के चेलों की गुंडागर्दी 2014 में पार्टी को ले डूबी. अब यह बात अखिलेश को फिर से समझ में आई है, इसलिए वो फिर से खुद के हाथ में कमान लेकर आगे आए हैं. वैसे उनके शासन में कोई बड़ा घोटाला नहीं हुआ इसबार. विकास कार्य के जो वादे किए थे मेनीफेस्टो में वो 70% तो पूरे किए हैं. अगर जनता तक वो पहुँचा पाए तो सर्वे कहते हैं कि जनता अभी भी उनको बेहतर मुख्यमंत्री के तौर पर देखती है

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...