इतने बड़े इश्यू पर टीवी पर बैठकर चिल्लाने से कुछ नहीं होगा यह सही बात है. कल टाइम्स नाउ पर सर्वे हो रहा था कि मैसेज करके बताइए क़ि पाकिस्तान से युद्ध होना चाहिए या नहीं? क्या मज़ाक है? सरकार किसी की भी हो लेकिन ऐसे समय में हर नागरिक को सरकार के ऊपर भरोसा करके छोड़ देना चाहिए क़ि आप अपने हिसाब से देश हित में कदम उठाइए. युद्ध इतना आसान नहीं है. और अगर युद्द हो भी गया तो क्या होगा? जो पाकिस्तान पहले से बर्बाद है, उसे और बर्बाद करना, क्या वही बर्बाद होगा? हमारा भी तो नुकसान है उसमें. हम विश्व के उभरते हुए देश में है, जहाँ एक बड़ा युवा वर्ग है, शिक्षा, से लेकर आर्थिक स्तर पर हम मजबूत हो रहे हैं. अगर एक भी परमाणु बम पाकिस्तान पर फेकेंगे तो वो बर्बाद, अगर हमारे उपर कुछ किया उन्होने तो हमारा भी नुकसान. इसलिए युद्ध एक मात्र और अंतिम रास्ता है इसका यह कहना बहुत इमोशनल और बचकाना है. क्या इंटरनशनल लेवल पर युद्ध कर देना इतना आसान होता है? क्या इंटरनैशनल क़ानून नहीं होते हैं? हमारी राजनीतिक पीढ़ी को ऐसे मुद्दो पर साथ आकर इंटरनेशनल लेवल पर मजबूती से रणनीति पर काम करना चाहिए. ना कि कश्मीर में सरकार बनाने के लिए अलगाव वादियों से समझौता करना.
रही बात कश्मीरी अवाम की तो उन्हें पता होना चाहिए कि हमारे यहाँ लोकतंत्र है, यह बात कश्मीरी लोगों को समझना चाहिए, बलूचिस्तान में हैं तो ज़्यादातर मुस्लिम ही लेकिन होता क्या है? पाकिस्तानी आर्मी महिलाओं के रेप करके जाती है, बलूचिस्तान में. अगर कश्मीर भी वहाँ चला गया तो इनको अकल आएगी. फिर कोई छोटा सा भी आंदोलन करके बताएँ देश या सरकार के खिलाफ तो जिंदा लटका दिए जाएँगे किसी चौराहे पर तालिबान की तरह. अभी कुछ दिन पहले स्वात घाटी(पाकिस्तान) पर मैं एक रिपोर्ट पढ़ रहा था जिसमें कहा गया कि इतनी खूबसूरत जगह को आईएस आई ने कब्ज़े में करके नर्क बना दिया है. लोगों को टीवी, इंटरनेट यूज करने पर मौत मिलती है. 7-8 साल की बच्चियों को बुर्क़ा पहनना अनिवार्य है, जो ना पहने उसके साथ रेप. लड़कियों को मदरसे में केवल कुछ साल पढ़ना उसके बाद घर में क़ैद. सुनकर रोना आता है इंसानियत के नाते. यह जो कट्टरवाद है ये एक जहर है, जिसको एक बार खून बहाने की आदत पड़ गई वो बहाता है, पहले वहाँ दूसरे धर्म के लोगों को मारा जब वो ख़त्म हो गए तो खुद के धर्म वालों को सिया सुन्नी में बाँटकर
उड़ी आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए एक बार फिर कहना चाहता हूं कि कश्मीर का विवाद एक राजनीतिक मसला है, इसे राजनीतिक पहल से ही हल किया जा सकता है। इसका सैन्य-समाधान नहीं है। आज हमने अपने 17 सैनिकों की मूल्यवान जिन्दगी खोई है। ये सभी किसी किसान या किसी मजदूर-कर्मचारी या किसी निम्न-मध्यवर्गीय परिवार के चिराग रहे होंगे। सत्ता-संचालन करने वाले हमारे अमीर सियासतदान और ऊंचे पदों पर बैठे आभिजात्य हुक्मरान बरसों-बरस से सरहद पर वही पुरानी नीतियां दुहरा रहे हैं- 'हर हमले का मुंहतोड़ जवाब देंगे या एक के बदले चार या सात सिर लायेंगे।' क्या इससे हमारे जवान का वह एक सिर वापस आ जायेगा? ऐसे मौकों पर स्टूडियोज को ‘वाक् युद्ध-स्थल’ में तब्दील करने वाले कुछ चैनल आज बता रहे थे कि ऐसा भीषण आतंकी हमला 26 सालों में पहली बार हुआ। सवाल है, ऐसा क्यों भाई? 2014 में सत्ता में आने के बाद इस सरकार के संचालकों ने देश को बताया थी कि अब दिल्ली में एक ताकतवर सरकार आ गई है। दुश्मन की औकात नहीं कि हमारी तरफ आंख उठाकर देखे। फिर आज यह सब क्यों हो रहा है?
दरअसल, ऐसे मसले उत्तेजक बयानों से नहीं हल होते। ‘बुद्धिहीन वीरता’ कामयाबी की तरफ नहीं ले जाती। आज जरूरत है, संजीदा होकर विचार करने की। अपनी रणनीति की समीक्षा करके नया रास्ता खोजने की। आखिर हम टकराव और आंतकवाद के स्थायी समाधान की कोशिश क्यों नहीं करते, ऐसा माहौल बनाने की रणनीति पर क्यों काम नहीं करते, जिसमें किसी का सिर न कटे! सरहद पर शांति और सौहार्द्र हो, जैसा आज दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों की सरहदों पर है। अनेक देशों के उदाहरण हैं, जो सैकड़ों साल एक-दूसरे से युद्ध करते रहे लेकिन बीसवीं सदी में ज्यादातर ने अपने मसले राजनीतिक स्तर पर हल कर लिये और युद्ध से हमेशा के लिये तोबा कर लिया। इतिहास पलटकर देख लीजिये, यूरोप में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। उनका सैन्य-बंदोबस्त का खर्च कम हुआ। बजट का बड़ा हिस्सा वे विकास और अपनी जनता के कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च करने लगे। .यही कारण है कि वे आज जीवन के हर क्षेत्र मे आगे हैं।
कुछ समय पहले श्रीनगर स्थित हमारी सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख ले.जनरल हुड्डा ने भी कहा था कि कश्मीर एक राजनीतिक मसला है, यह कोई कानून-व्यवस्था का मसला नहीं है। इसलिये इसका समाधान भी राजनीतिक स्तर पर ही होना है। आखिर, हम अपने श्रेष्ठ और शीर्ष सैन्य-कमांडर की बात क्यों नहीं सुनते ! आज शाम कुछ टीवी स्टूडियोज की बहस-चर्चाएं सुनते हुए मन क्षोभ और विषाद से भर गया। सरहद पर हमारे जवान शहीद हुए हैं लेकिन वातानुकूलित स्टूडियो में बैठे कुछ महाशय ‘मार डालो-खत्म कर डालो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो’ की दहाड़ लगा रहे थे। कुछ हिन्दी चैनल बता रहे थे, ‘भारत-पाकिस्तान में परमाणु-युद्ध होने की स्थिति में भारत से ज्यादा नुकसान पाकिस्तान का ही होगा। वह बरबाद हो जायेगा।‘ मानो परमाणु युद्ध की स्थिति में भारत आबाद रहेगा! आखिर यह कैसी पत्रकारिता है, कैसे विचारक हैं, कैसे सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं, जो सिर्फ युद्धोन्माद का धंधा करते दिखते हैं! आतंकवाद को सिरे से खारिज करते हुए मैं युद्धोन्माद की दो-तरफा कोशिशों को भी खारिज करता हूं। आज की दुनिया में विवादों का स्थायी समाधान किसी युद्ध से नहीं, राजनीतिक पहल से ही खोजा जा सकता है।
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