Thursday, September 15, 2016

सोसल मीडिया के खतरे

मैं कई बार कह चुका हूं कि सोसल मीडिया को राजनीति में एक टूल की तरह प्रयोग करना बहुत खतरनाक है, बिना कुछ सोचे समझे, कुछ भी भावनात्मक पोस्ट आई कि बगदाद की तस्वीर को असम की बताकर शेयर कर दिया जाता है। बहुत डर लगता है इस भीड से कि कहीं कोई मुजफ्फरनगर फिर से न करा दिया जाए। बारूद के ढेर पर बैठ कर रह गया है समाज, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। 
उत्तर प्रदेश में सभी दल केवल मुददे पर राजनीति कर रहे हैं। सपा अपने काम बता रही है भले झूठ हो, बीएसपी जय भीम के नारे के सहारे है। 
लेकिन भाजपा और आरएसएस का कैडर केवल कट्टरपंथी बातों पर आधारित राजनीति कर रहे हैं। हर रोज कई वाट्सएप और फेसबुक ग्रुप में बिना पूछे जोड दिया जाता है। गाय, गंगा, हिंदू, राम न जाने क्या क्या माँ बहन बचाओ जैसे मैसेज भेज देते हैं। यह बहुत खतरनाक है, कुछ नहीं हो पाता है। आईटी एक्ट की धारा 166 और आईपीसी के अंडर केश भी किया तो पता नहीं चल पाया क्या हुआ? ये सरकार की ऐसे लोगों को छूट है। भविष्य में इसके परिणाम बहुत खतरनाक हो सकते हैं।
मैं राजनीति करने से इसलिये ही डरता हूँ। मुझे एनएसयूआई, लेफ्ट, सपा के स्टूडेंट विंग से लेकर एबीवीपी तक के ऑफर आए साथ काम करने के। लेकिन कहीं हिम्मत नहीं हुई। आम आदमी पार्टी के लिए काम किया लेकिन मुम्बई में कुछ फीका प्रदर्शन और नेतृत्व देखकर पीछे हट गया। साम्प्रदायिकता के लेटेस्ट ट्रेंड में असल बात तो यह है कि इसके खिलाफ भी किसी पार्टी के युवा लड नहीं पाते हैं। एक तरफ ओवैसी सेना कट्टर हिन्दूवादी लोगों का सामना कटटर इस्लामी मैसेज से करते हैं, जिनमें हिंदू विरोध होने पर बाकी भाजपा विरोधी भी मजबूर हो कर साथ आ जाते हैं। और सब को पडी नहीं है, ज्यादातर दलों के युवा समर्थकों को तो वैचारिक या टेक्निकल अकल ही नहीं है। रही बात आम आदमी पार्टी की तो मेरा निजी अनुभव है कि यहाँ भ्रष्टाचार से निपटने के लिए तो ईमानदार युवा फौज है, लेकिन साम्प्रदायिकता से लडने में सझम नहीं है। बहुत लोगों की तो विचारधारा में छुपा हुआ हिंदुत्व है। बडे नेता कुमार विश्वास उदाहरण हैं। वे अब तो कुछ बदल भी गए हैं। कई युवाओं के राजनीतिक बैकग्राउंड 1990 के बाबरी समर्थक टाइप लोगों के हैं। अब जरूरी है नेतृत्व के द्वारा ऐसी ट्रेनिंग। जब राष्ट्रीय स्तर पर लडेंगे तो लोग सामने आएगे इस सोच के खिलाफ। यह दम तो प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और संजय सिंह में ही है। जिसमें कई लोग तो अलग हैं। इसे आप अभी इग्नोर कर सकते हैं, लेकिन मेरा डर बेवजह नहीं है।

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