Sunday, September 18, 2016

मीडिया बनाम दलित चेतना

कल मैं दलित चेतना पर वर्तमान मीडिया के बारे में रिसर्च कर रहा था, तो सबसे बड़ा चैनल या न्यूज पोर्टल नेशनल दस्तक दिखा. वो आज के दौर में दलितों से जुड़ी खबरें आगे आकर दिखा रहा है. लेकिन उसमें मुझे एक संकुचित विचारधारा या पूर्वाग्रह दिखाई दिया. जिग्नेश मेवानी के साथ इंटरव्यू में पत्रकार बार बार यही सवाल कर रहा था क़ि दलितों का नेतृत्व इस समय कौन कर रहा है? तो जिग्नेश बोला क़ि दलितों को अभी भी राजनीतिक आज़ादी का इंतजार है. तो वो बार बार ज़ोर देकर कहता है क़ि क्या आप काशीराम के काम को नकार रहे हैं? फिर कहता है क़ि आप नहीं मानते की बीएसपी दलितों का प्रतिनिधित्व करती है? फिर जिग्नेश ने सवाल किया तो वो कहता है क़ि आप नहीं मानते क़ि मायावती ने दलित चेतना लाई है. फिर लेफ्ट पर हमला चालू कर दिया और लेफ्ट विरोध के अपने शब्दों को बार बार उसके मूह में डालने की कोशिश की. इसी चैनल पर कुछ दिन पहले मैने देखा था क़ि जिग्नेश मेवानी लेफ्ट से दूरी बना रहे हैं. असल में जिग्नेश कन्हैया के दोस्त हैं, इस समय. वो पत्रकार जिग्नेश को कहता है  क़ि आप लेफ्ट के साथ मत जाइए उन्होंने दलितों की दशा और बेकार की है, उसके दो मिनट बाद ही वो कहता है अंबेडकर फूले काशीराम और पेरियार ने जो किया वो क्या है? तो मुझे नहीं समझ में आया क़ि पेरियार भी तो लेफ्ट के थे फिर वो कैसे पूरे लेफ्ट पर हमलावर है? कुछ मिलकर इसमें मुझे यही दिखा क़ि ये चैनल प्रो बीएसपी है. यह संभव है क्योंकि वो दलित चेतना के लिए आए हैं, बार बार बीएसपी के लिए काम कर चुके प्रोफ़ेसर विवेक कुमार का इंटरव्यू लेकर दिखना यही दिखता है. 
असल में इस पोर्टल या चैनल के लोग उसी मानसिकता से घिरे हैं जिससे हमारे देश का पूरा दलित चिंतक घिरा था. कहते हैं कि बाबा साहब अंबेडकर का 10-12 पीएचडी स्कॉलर मिलकर भी सामना नहीं कर सकते थे. मुंबई में उनके घर में 50 हज़ार किताबों की लाइब्रेटी थी. यह देश के दलित चिंतक या विद्वानों की बड़ी असफलता है क़ि कोई भी बाबा साहब को उनके असली रूप में जनता के सामने पेश नहीं कर सका. नतीजा यह हुआ क़ि इतने बड़े अर्थशास्त्री और क़ानून के जानकार को विश्व के अन्य देशों में पढ़ाया जाता है और भारत में केवल एक दलित नेता के रूप में ही देखा जाता है. जबकि होना यह चाहिए था क़ि बाबा साहब को कोर्ट करके दलितों में तो चेतना लाई जा सकते थे, बाकी जगहों पर क़ानून के जानकार और अर्थशास्त्री बनाकर पेश करते. इसका दुष्परिणाम हुआ क़ि उच्चवर्ग बाबा साहब से नफ़रत करने लगा, और जब कोई किसी से नफ़रत करता है तो उसके अच्छे कामों को भी नकार देता है. मेरा मतलब बाबा साहब के विचारों को लेकर खुद लड़ना था, जबकि सभी दलित नेता और चिंतकों ने खुद का बचाव बाबा साहब के नाम पर किया क्योंकि वो क़ानून के विधाता थे, और दलितों में इमोशानल कार्ड  खेलकर उनके नाम पर वोट लिए. रामविलास पासवान से लेकर राम दास अठावाले, मायावती तक कोई भी अपने आगे कोई दलित लीडरशिप नहीं ला पाए. मैं यह आरोप काशी राम पर नहीं लगा सकता हूँ, उन्होने मायावती को आगे करके अपना काम कर दिया था. बीएसपी की तो एक समय पंजाब और महाराष्ट्र तक में लहर थी. महाराष्ट्र में बीएसपी को अंबेडकर के सपनो की पार्टी कहते थे, आज सब बिखर गए, क्योंकि उनको कोई दल नहीं मिला. यह भी नहीं है कि यूपी की तरह वो बीजेपी या हिंदूवादी शिवसेना में चले गए, वहाँ के दलित हिंदुत्व को नकार कर एकदम से बौद्धिस्ट हैं. लेकिन मायावती यूपी की सीएम रहकर महाराष्ट्र की पार्टी चलाना चाहती थी, और किसी को आगे नहीं किया. खैर ये तो बात थी एक तथाकथित दलित राजनीतिक दल की. लेकिन दलित मीडिया की  उस बात को मैं बिल्कुल खारिज करता हूँ क़ि दलितों का प्रतिनिधित्व केवल दलित ही कर सकता है, आप लालू प्रसाद के नब्बे के दशक के सामाजिक न्याय की लड़ाई को कैसे भूल सकते हैं उन्होने सीएम रहते हुए बिहार की जड़ों में घुसे हुए जातिवाद को काफ़ी हद तक कमजोर किया वो भी अपरकास्ट का खुला विरोध करके. एक और बात अंत में कहना चाहता हूँ क़ि आज के छात्र आंदोलनों में दलित चेतना को लेकर कोई उम्मीद तो नहीं दिखाई देती है. लेफ्ट के छात्र संगठन हमेशा से बात करते हैं दलितों की लेकिन जहाँ जहाँ उनकी सरकारें रहीं उन राज्यों में दलितों की दशा और भी खराब है. लेफ्ट में कोई नेता दलित नहीं उभर पाता है. उनके लिए सड़कों पर लड़े दलित, झंडा दलित उठाए लेकिन नेतृत्व के समय कविता कृष्णन, प्रकाश करात, कन्हैया कुमार ही आते हैं कोई दलित नहीं. उनके विरोध में आज एक दलित छात्र संगठन आया है. बाप्सा जो बिल्कुल कदम से कदम मिलकर अंबेडकर के सपनो पर चलना चाहता है. मतलब हिंदू धर्म और शास्त्रों का खुला विरोध करके. जो आज के दौर में संभव नहीं है. आज सोसाल मीडिया से लेकर समाज के निचले दौर तक दक्षिणपंथी विचारधारा घुल गई है, इसके लिए आप लेफ्ट या बिल्कुल हिंदू धर्म विरोधी होकर नहीं जीत सकते है. आपको सेंट्रल में रहकर लड़ना होगा इनसे. और हमेशा ध्यान रहे क़ि कोई ग़लती न हो. जेएनयू के चुनाव में मुझे कई मित्रों ने बताया कि दक्षिण पंथी विचारधारा के लोगों ने इसबार एबीवीपी की जगह लेफ्ट के मोहित पांडे को वोट दिया है, क्योंकि इसबार लड़ाई एबवीपी बनाम लेफ्ट नहीं. बाप्सा बनाम लेफ्ट थी. इसलिए उँची जाति के छात्र नहीं चाहते थे क़ि कोई भी दलित छात्र जीतकर उनका नेतृत्व करे.

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