भारत सरकार का अति आत्मविश्वास देखिए क़ि खुद ही सर्वे कराकर कह दिया क़ि 93% लोग उनके इस फ़ैसले से खुश हैं. आख़िर यह कौन सा जनमत संग्रह है जहाँ लोगों की राय ली ही नहीं गई?
देखना पड़ेगा क़ि देश में कितने % लोगों के पास स्मार्ट फ़ोन हैं, उनमें से कितने % लोग इंटरनेट यूज करते हैं उनमें से भी कितने % लोग एप डाउनलोड करके वोट करने वाले हैं..... भारत की 130 करोड़ जनता में से 5 लाख लोगों ने ट्विटर ट्रेंड के जैसे वोट कर दिया और खुद ही कह दिया क़ि 93% लोग खुश हैं. आप अगर यही चश्मा और कुछ दिन लगाए रहे तो मुझे उम्मीद है उसके परिणाम बहुत भयानक होंगे. मैं न केवल भाजपा का आलोचक राजनीतिक व्यक्ति बल्कि एक अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेशन से जुड़ा हुआ आदमी भी हूँ, इसलिए कह रहा हूँ. मैं गाँव से भी हमेशा जुड़ा हुआ हूँ, मेरा परिवार वहाँ है तो रोज पता करता रहता हूँ, लोगों की समस्याएँ केवल बैंक के बाहर लगी लाइनों में ही नहीं और भी हैं. ख़ासकर किसानों ने जो नुकसान झेला है उससे उनके 4-5 साल तक ना उबर पाने की आशंका है. लोगों को हताशा में मरने के अलावा कुछ नहीं दिखाई दे रहा है. मैं यहाँ उत्तर भारतीय प्रवासी हूँ इसलिए अकसर लेवरों जो मेरे गाँव के आस पास के होंगे उनसे भी मिल रहा हूँ बेचारे घर पर बैठे हैं.....उनको खाने के भी वांदे हो गए हैं. ऐसे बहुत सी समस्याएँ हैं जिनको गिनाते गिनाते शाम हो जाएगी. रही बात क्या अच्छा हुआ? कितना काला धन बाहर आया? आगे सब ईमानदारी से हो जाएगा? इसके सब जवाब मुझे पता हैं रोज ऐसे सैकड़ो लोग और केश देखता रहता हूँ. और असल में यही लोग तो हैं जो इस सर्वे में भाग लेकर इसपर खुशी जाता रहे हैं. उनको डर है क़ि अगर वोट नहीं दिया मोदी के पक्ष में तो लोग चोर ना समझ लें. जो आम आदमी है उसको तो अधिकार ही नहीं दिया उनकी राय लेने का? क्या केवल जनता एप और स्मार्ट फ़ोन वाली ही है? ये कैसा लोकतंत्र? मोदी जी ने 10 सवाल किए आज मैं उन दस सवालों के जवाब उन ग़रीब लोगों की तरफ से देना चाहता हूँ......
1. क्या आपको लगता है कि भारत में काला धन है...?
जवाब : क्या मज़ाक करते हो साहब? ये कोई सवाल हुआ? 5वीं क्लास के बच्चे से पूछ लो वो भी हाँ में ही जवाब देगा? जब आपको पता नहीं है तो कैसे 2014 के पहले खूब चिल्ला चिल्लाकर कहते थे क़ि क़ालाधन बाहर लाना है. नहीं पता तो बाबा राम देव से पूछ लो? उनको पूरी डीटेल्स पता हैं. कहाँ है, किसके पास है.?
2. क्या आपको लगता है, भ्रष्टाचार और काले धन की बुराई से लड़कर उसे खत्म करने की ज़रूरत है...?
जवाब : प्रधानमंत्री जी आप गजब करते हो. अगर आप कलमाडी, एदूरप्पा और शिवराज सिंह चौहान से भी पूछ लोगे तो वो भी हाँ ही बोलेंगे? पिछले ढाई साल में आपने लोकपाल की नियुक्ति नहीं की. गुजरात में 12 तक आपने लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं होने दी. कैसे हम विश्वास कर लें क़ि आप भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हो? बीएमसी, एमसीडी से लेकर देश के हर मुंसीपल कॉरपोरेशन में भ्रष्टाचार है, सत्तासीन लोग आपकी पार्टी के हैं, लेकिन वहाँ एक भी कोशिश नहीं की गई. ये जो रैलियों में 100-150 करोड़ खर्चा हो रहा है वो कहाँ का पैसा है? आप राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई में क्यों नहीं लाना चाहते हैं? नियत सॉफ पता चलती है क़ि भ्रष्टाचार से लड़ना है या कुछ और ही इरादा है.
3. कुल मिलाकर काले धन से निपटने के लिए सरकार के कदम के बारे में आप क्या सोचते हैं...?
जवाब : (मैं एक आम आदमी की तरफ से ये जवाब दे रहा हूँ.) देखिए प्रधानमंत्री जी, सच बात तो यह है कि आपके इस सवाल से पहले हमें मौका ही नहीं मिला था कि सोच सकें कि आपका कदम कैसा है. पहले सारा वक्त बैंकों की कतार में, एटीएम की लाइन में खत्म हुआ. नौकरी के लिए किसी तरह समय निकला. फिर बाक़ी वक्त अख़बार और टेलीविज़न में खप गया. पता नहीं, क्या-क्या दिखाते रहे, 20 मर गए, 30 मर गए, 40 मर गए. कोई गृहिणी बीमार बच्चे को घर छोड़कर आई तो कोई अपनी बेटी की शादी के लिए पैसे के लिए भटकता मिला. मज़दूरों को रोज़ी नहीं मिल रही है, किसानों के पास कटाई के भुगतान और नए बीज के लिए पैसे नहीं हैं, रोज़ी मिल नहीं रही है, फैक्ट्री में छंटनी होने वाली है... और न जाने क्या-क्या.
हमारी समझ कम है, लेकिन यह तो फिर भी समझ आ गया कि जितना काला धन आप सोच (या बता) रहे हैं, उतना तो ठेंगा आपके हाथ नहीं आने वाला. शराब ठेकेदार से लेकर शराब निर्माता तक, पीडब्लूडी विभाग के भ्रष्टतम इंजीनियर से लेकर आपकी पार्टी के मंत्रियों तक सब निश्चिंत दिख रहे हैं. सबका जुगाड़ हो गया है, उल्टे वे कह रहे हैं कि 10-20 परसेंट दिला दें, तो वे दूसरों का भी ठिकाने लगा देंगे. मैंने सुना कि 8 नवंबर की रात अफसरों और नेताओं की बीवियों ने सोने की बड़ी खरीदारी की. एक मुख्यमंत्री की पत्नी के ऑर्डर की बड़ी चर्चा भी सुनी. लेकिन साहब, ये आपके अफ़सर जो हैं न, हैं बड़े निठल्ले. किसी को पकड़ ही नहीं पाए आज तक. अरे, दो-चार बीवियां भी जेल जातीं, तो आपके कदम का असर दिखता.
दूसरी बात यह समझ आई कि काला धन तो सोना-चांदी, फ्लैट, ज़मीन-जायदाद, खेतों और शेयरों आदि में लगा है. ज़्यादातर बेनामी. सो, आप तो उनका कुछ कर नहीं पाएंगे. और देखिए न, लोगों ने यह भी कहना शुरू कर दिया है कि विदेशी खातों में जमा काले धन में आपकी दिलचस्पी ही नहीं, तभी तो आपने न जर्मनी की सरकार की बात पर तवज्जो दी, न उस व्हिसलब्लोअर को, जिसने आपको सहयोग का प्रस्ताव दिया था. विद्वान लोग कह रहे हैं कि इस नोटबंदी का असर दो महीने बाद देखना, सो, हम भी उसी इंतज़ार में हैं.
4. भ्रष्टाचार के खिलाफ नरेंद्र मोदी सरकार के प्रयासों के बारे में आप क्या सोचते हैं...?
जवाब : सच कहें साहब, तो इस बारे में हम कुछ कह नहीं पाएंगे, क्योंकि हमें एक्को प्रयास के बारे में अब तक पता नहीं चला. आपकी अपनी सरकार के बारे में कोई घोटाला अब तक पकड़ में नहीं आया है, लेकिन इसे सावधानी कह सकते हैं... इसे प्रयास में कैसे गिनें, बताइए भला...? लोग उल्टी बातें ज़रूर कहते-सुनते रहे कि आपकी सरकार ने विजय माल्या को भगा दिया, आपने अपने किसी कारोबारी दोस्त को फलां ठेका दिलवा दिया, आप अपने मुख्यमंत्रियों के काले कारनामों को अनदेखा करके चलते हैं, आपने नोटबंदी की सूचना पहले से लोगों को दे दी थी आदि. लेकिन लोगों की बात कितनी सुनेंगे और कहां तक सुनेंगे. हमें तो अब आपका ही फॉर्मूला ठीक लगने लगा है, किसी की मत सुनो. अरे कुछ नहीं तो कांग्रेस वालों को ही जेल में डाल दो, कुछ लड़कर तो दिखाइए.
5. 500 और 1,000 रुपये के नोट बंद करने के मोदी सरकार के प्रयासों के बारे में आप क्या सोचते हैं...?
जवाब : इसपर देश में डिस्कोर्स क्या है? कोई पति पत्नी पर जोक कर देता है तो कोई 15 लाख ना माँगने पर कोई ढंग का विमर्श ही किधर हुआ? अख़बार में पढ़ा साहब, एक आदिवासी 500 रुपये का एक नोट लेकर 90 किलोमीटर दूर बैंक पहुंचा, लेकिन पैसा मिला नहीं. 20-25 किलोमीटर पैदल चलकर एक नोट बदलवाने वाले तो दर्जनों लोगों के बारे में सुना. लोगों के दिल की धड़कनें रुकने की ख़बर मिली. जैसा हमने पहले भी कहा, बेटी की शादी के लिए बदहवास पिता के बारे में टीवी पर देखा. पता नहीं, आपको ये सब ख़बरें मिलती हैं या नहीं. कुछ लोग कह रहे हैं कि आपने देशहित में बहुत बड़ा क़दम उठाया है. वे कह रहे हैं कि इसके बाद हमारी अर्थव्यवस्था चीन को पीछे छोड़कर अमेरिका के करीब पहुंच जाएगी.
6. क्या आपको लगता है कि नोटबंदी से काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद को रोकने में मदद मिलेगी...?
जवाब : आपने तो दावा ठोक ही रखा है कि ऐसा होने वाला है. अगर इसके उलट कुछ कहें तो आपके भक्तजन देशद्रोही होने से लेकर पाकिस्तानी होने तक कुछ भी कह सकते हैं, इसलिए डर लगता है. फिर भी आपने पूछा है तो बता देते हैं कि काले धन पर रोक तो शायद नहीं लगने वाली, इसकी रफ्तार थोड़े दिनों तक धीमी हो सकती है, प्रॉपर्टी बाज़ार से लेकर सोने-चांदी तक सबकी ख़रीद धीमी पड़ जाएगी और हो सकता है, इस बार आपके इन्कम टैक्स वालों को अतिरिक्त काम करना पड़े. लेकिन यह थोड़े दिन की बात है. आपने जो किया है, वह छोटा ऑपरेशन भर है. देश की अफरातफरी से भ्रम में मत पड़िएगा. वह तो गरीब, मज़दूर, किसान और गृहिणियों की भगदड़ है.
मुझे तो एक भी सेठ, अफसर, ठेकेदार या बिचौलिया बदहवास नहीं दिखा. भ्रष्टाचार इससे कैसे रुकेगा, यह ज्ञान तो आप जैसा कोई ज्ञानी ही दे सकता है. हमें तो कुछ रुकता दिख नहीं रहा है. जब बैंक का अफसर ही दस टका लेकर नोट बदल रहा है, तो कहां रोकिएगा भ्रष्टाचार को...? हां, यह हो सकता है कि आप अपनी पार्टी से इसकी शुरुआत कर दें और पहले अपने सारे सांसदों और विधायकों की संपत्ति की जांच करवा दें. आपकी नाक के नीचे एक रेड्डी साहब 500 करोड़ की शादी कर गए और बदले में छापा भी नहीं पड़ा, नोटिस भर मिला. विरोधियों का भ्रष्टाचार रोककर अपनों को छूट देने की नीति काम नहीं आएगी. आतंकवाद का जहां तक सवाल है, तो हमारा आकलन है कि इससे रत्तीभर फर्क नहीं पड़ने वाला. कल ही एएन आई की खबर आई क़ि कश्मीर में आतंकवादियों के हमले अभी भी चालू हैं कई जगह, बस इंडियन मीडिया का इंटरेस्ट ख़त्म हुआ है वहाँ से. एक फोटो भी उसी न्यूज एजेंसी ने एक फोटो पोस्ट किया जिसमें आतंकियों के पास 2-2 हज़ार के नोट के बंडल थे. उनके लाखों 2-2 हज़ार के नोट कैसे आए? जब तक नक्सलियों को आपकी पार्टी के नेता पैसे पहुंचाते रहेंगे, उन्हें किस बात की चिंता...? यक़ीन नहीं...? पूछिएगा अपने मुख्यमंत्री से, किसी डायरी में किस-किसका नाम था.
7. क्या नोटबंदी से ज़मीन-जायदाद, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य तक आम आदमी की पहुंच बनेगी...?
जवाब : पहले तो आप बताइए कि आप आम आदमी किसे कहते हैं...? एक चौथाई से अधिक आबादी तो गरीबी रेखा से नीचे है. लगभग 10 फीसदी आबादी वह है, जो हाल ही में गरीबी रेखा के दायरे से बाहर हुई है, यानी वह अब भी बहुत गरीब है. फिर बड़ी संख्या में लोग औसतन गरीब हैं. गिनती के लोग हैं, जिन्हें आप मध्यवर्ग में गिन सकते हैं. प्यू रिसर्च और ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट दोनों का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय पैमाने से केवल 2.3 करोड़ लोग मध्यवर्ग में आते हैं. तो आपकी परिभाषा का आम आदमी यदि मध्यवर्ग से आता है, तब तो यह सवाल ही अप्रासंगिक है. लेकिन अगर ग़रीबों को आप आम आदमी मानते हैं, तो बात अलग हो जाती है. माफ़ करिए फ्लो में इंट्र्प्ट कर रहा हूँ, इसी बीच खबर आई है क़ि 39000 रुपए से अधिक जमा करने वाले परिवार को आप बीपीएल लिस्ट से बाहर कर रहे हैं. क्या 39000 साल मतलब 3250 प्रति महीने और 108 रुपए प्रति दिन कमाने वाला ग़रीबी रेखा से बाहर हो जाता है? आप ग़रीबी ख़त्म कर रहे हैं या ग़रीब?
विद्वानों का अनुमान है कि कुछ समय के लिए प्रॉपर्टी के दाम घटेंगे, लेकिन इसका लाभ आम आदमी उठा पाएगा, कहना कठिन है, क्योंकि नोटबंदी के बाद उसके जीवन में भी बहुत कुछ बदलने वाला है. उच्च शिक्षा अभी भी हमारे देश में यूरोप और अमेरिका की तरह बहुत महंगी नहीं है, क्योंकि हमारे यहां अभी उच्च शिक्षा का महत्व भी कम है. एक चपरासी की नौकरी निकाल दीजिए तो लाख दो लाख उच्चशिक्षा पाए लोग आवेदन दे देंगे. स्वास्थ्य का जहां तक सवाल है, तो इसका कोई संबंध नोटबंदी से हमें समझ में नहीं आता. वह पहले भी आम आदमी की पहुंच से दूर था, और अभी भी रहेगा.
8. भ्रष्टाचार, काले धन, आतंकवाद और नकली नोटों से इस लड़ाई में आपको जो असुविधा हुई, क्या आपको उसका बुरा लगा...?
जवाब : यह सवाल जाकर एक बार पूछिए सुबह से कतार में लगे भूखे-प्यासे लोगों से, किसानों से या फिर उस आदिवासी से, जिनमें से अधिकांश को अभी पता ही नहीं है कि बांस के किसी टुकड़े में सहेजकर रखा गया उसका रुपया अब रद्दी के टुकड़े में बदल चुका है. हमारा अनुमान है कि आप इन सवालों के जवाबों को एक सर्वे की तरह प्रकाशित करवाएंगे कि देखिए 80 फीसदी लोगों को तकलीफ नहीं है. लेकिन आप यह नहीं बताएंगे कि यह सर्वे सिर्फ़ 2.3 करोड़ जनता के बीच हुआ है और लगभग 98 प्रतिशत जनता को आपने जवाब देने का मौका ही नहीं दिया है. फिर भी मैंने पूरी दुनियाँ में फेक करेंसी पर रिसर्च किया है तो बताना चाहता हूँ क़ि दुनियाँ का कोई भी डॉलर ऐसा नहीं है जिसकी फेक कॉपी नहीं आती है. सबसे अधिक उसकी ही आती है. आपने इस नोट में भी ऐसा कुछ नहीं किया है जो पहले वाले नोट से बेहतर सिक्योरिटी रखता है. बस जी न्यूज वाले सुधीर जैसे लोगों से ही फर्जी चिप की खबर आई थी. बाकी तो सब फेक है.
9. क्या आप मानते हैं कि कुछ भ्रष्टाचार विरोधी लोग खुले आम काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के समर्थन में लड़ रहे हैं...?
जवाब : मैंने जब जवाब लिखना शुरू किया था तो सोचा था कि एक प्रधानमंत्री अपने देश की जनता से सवालों के जवाब जानना चाहता है. लेकिन प्रधानमंत्री जी, मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि ये सवाल एक आम बीजेपी कार्यकर्ता या संघ के सेवक के सवाल हैं. राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के दंश से पीड़ित और आहत. एक ऐसे बेचारे राजनीतिज्ञ का सवाल, जो देश को देश की तरह नहीं, राजनीतिक विचारधाराओं में बंटे खेमे में देखता है. आपको नाम लेकर पूछना चाहिए कि फलां-फलां लोग नोटबंदी का विरोध करके क्या हमारी छवि को गोबर में मिलाने का षडयंत्र कर रहे हैं...? तब इसका जवाब आसान होता. जो आपके किसी निर्णय के खिलाफ है, वह भ्रष्टाचार, काले धन और आतंकवाद का समर्थक हो गया...? यह तो लोकतंत्र की परिभाषा नहीं है, प्रधानमंत्री जी. आप जुमले उछालकर राजनीति कर सकते हैं, तो आपके जुमलों का मज़ा लेने की राजनीति भी करने दीजिए.
10. क्या आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोई सुझाव या आइडिया देना चाहेंगे...?
जवाब : ज़रूर. ऐसा मौक़ा कब आएगा कि एक साधारण नागरिक प्रधानमंत्री को सुझाव दे सके. पहला सुझाव यह कि आप प्रधानमंत्री हैं, तो प्रधानमंत्री बनकर रहिए. आपकी बातों से किसी आम राजनीतिक कार्यकर्ता जैसी बू नहीं आनी चाहिए. दूसरा यह कि आप अपने सलाहकारों को तत्काल बदल दीजिए. वे आपको किसी गहरी खाई में धकेलने की योजना बनाकर काम कर रहे हैं. तीसरा यह कि विदेश यात्राएं छोड़कर पहले अपने देश को ठीक से घूम लीजिए, जिससे आपको ग़रीब, मज़दूर, किसान और आदिवासी का दुख-दर्द समझ में आ सके. आप समझ सकें कि सहकारी बैंक बंद करने से क्या होता है, बच्चे का गुल्लक फूटता है तो क्या होता है और बेटी की शादी का पैसा लुट जाए तो कैसा लगता है. चौथा और अंतिम सुझाव यह कि अच्छा होगा कि आप अपनी मां और पत्नी को अपने साथ रखिए, इससे मानवीय रिश्तों और संवेदनाओं के प्रति आपकी समझ बढ़ेगी. देश के लिए घर-परिवार छोड़ने वाला उतना महान राजनीतिज्ञ नहीं हो सकता, जितना देश को घर-परिवार की तरह रखने वाला हो सकता है. और हाँ अंत में एक सलाह और क़ि इस सर्वे को फिर से मैनुअल करवाइए. और इन सवालों को बदलिए हर सवाल में भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर गर्दन पर तलवार जैसे रखकर हमसे सवाल किए गए हैं. भ्रष्टाचार पर आप क्या कर रहे हैं, वो मैं बता चुका हूँ, आतंकवाद का सवाल जानबूझकर बार बार पूछ रहे हैं क़ि कोई भी सवाल का जवाब ना में देने के पहले 10 बार सोचे क़ि कहीं वो आतंकवाद का समर्थक तो नहीं है? बस इतना ही कहूँगा गुस्सा तो इतना है क़ि निकाल दिया तो कहीं मैं भी पाकिस्तान ने भेज दिया जाऊ.......
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