2008 की मंदी में कई बैंक दिवालिया हो गए. लेहमन ब्रदर्स, मेरील लिंच, ए आई जी, रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड... तमाम बैंक संकट के शिकार हुए और कुछ दिवालिया भी. कुछ साल बाद साइप्रस में भी ऐसा ही संकट आया. ग्रीस में भी यही हुआ. इसी साल 29 जनवरी को जापान के सेंट्रल बैंक ने ऐसा फैसला लिया, जिसके बारे में अभी तक हमने व्यापक रूप से सुना नहीं है. जापान के लोगों को बैंकों में अपना पैसा रखने के लिए फीस देनी पड़ती है. हमारे यहां के बैंकों की तरह ब्याज़ नहीं मिलती है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कर्मशियल बैंक ज्यादा से ज्यादा पैसा बिजनेस मैन को उधार पर दे सकें. अगर पैसा इलेक्ट्रॉनिक रूप में रहेगा तो सेंट्रल बैंक वह सब कुछ पल भर में कर सकेगा जो अभी नहीं कर पाता है. मंदी की भनक मिलते ही ब्याज़ दर निगेटिव हो जाएगी. यानी आपको ही बैंक को पैसे देने होंगे कि वो आपका पैसा रख सके. नगदी व्यवस्था में यह छूट होती है जब भी आपका भरोसा कम होगा, आप अपनी पूंजी को नगद में बदल सकते हैं. कैशलेश सोसायटी में ये छूट नहीं होगी. बैंक ऑफ इंग्लैंड के पूर्व गवर्नर मर्वेन किंग ने कहा कि बैंकिंग सिस्टम में कई खामियां हैं. इसे ठीक नहीं किया गया है. हो सकता है कि फिर से संकट आ जाए. यानी बैंक डूबने लगे. बैंक का मतलब सिर्फ खाता खोलना या पैसा जमा करना नहीं है. हम सबको बैंकों के बारे में अधिक से अधिक जानना चाहिए. कैसे बैंक गरीब आदमी से दो लाख वसूलने के लिए पीछे पड़ जाते हैं. बड़े उद्योगपतियों का लाखों करोड़ का कर्ज़ा नॉन प्रॉफिट एसेट बनकर पड़ा रह जाता है. उन्हें अलग-अलग खातों में डाला जाता रहता है. इस पूरे मसले को भावना से नहीं तथ्यों से समझना चाहिए. ऐसा नहीं है कि हम और आप इलेक्ट्रॉनिक तरीके से लेन-देन नहीं करते हैं. सारी आबादी न करती हो, मगर लाखों की आबादी तो करती ही है. दुनिया की आधी आबादी बैंकिंग सिस्टम में ही नहीं है, क्योंकि बैंक में खाता खोलने के लिए कई शर्तों को पूरा करना होता है. एक आशंका यह जताई जाती है कि कैशलेश सोसायटी में आपके हर लेन देन का डेटा बैंकों के पास रहेगा. आप क्या खरीदते हैं, क्या पसंद करते हैं, किस कंपनी का खरीदते हैं. बैंक वाला इस डेटा का कुछ भी इस्तेमाल कर सकता है. तमाम कानून बने हैं और बनते हैं, इसके बाद भी पूरी दुनिया में इस खतरे का कोई मुकम्मल इलाज नहीं है.
कैशलेश यानी जब नोट का चलन समाप्त हो जाए या न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाए. बहुत से लोग इसके फायदे गिना रहे हैं. इससे सरकार को ज्यादा टैक्स आएगा क्योंकि काला धन होगा नहीं. उस पैसे से जनता का कल्याण ज्यादा होगा. फिलहाल लाइव मिंट वेबसाइट ने एक चार्ट पेश किया है, जिसके अनुसार जापान में जीडीपी का 20.66 प्रतिशत कैश है. अमरीका में जीडीपी का 7.9 प्रतिशत कैश है. भारत में जीडीपी का 10.86 प्रतिशत कैश है. चीन में जीडीपी का 9.47 प्रतिशत कैश है और यूरो ज़ोन में जीडीपी का 10.63 प्रतिशत कैश है. सब 2015 के आंकड़े हैं. दक्षिण अफ्रीका, स्वीडन, इंग्लैंड जैसे देश में जीडीपी का दो से चार प्रतिशत ही कैश है. ज़ाहिर है भारत में कैशलेश की स्थिति अभी नहीं है. लेकिन पूरे भारत को इंटरनेट से जोड़ने का अभियान डिजिटल इंडिया चल रहा है. जिसका लक्ष्य है कि 2016 तक ढाई करोड़ लोगों को डिजिटल साक्षर कर दिया जाएगा. इंडिया लिव स्टॅट्स, 2016 के अनुसार इस समय भारत में 46.2 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं यानी आबादी का 34.9 प्रतिशत. इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार गांवों में मोबाइल इंटरनेट की पहुंच 9 प्रतिशत ही है. शहरों में अधिक है 53 प्रतिशत. भारत भले इसके लिए तैयार न हो, आने वाले दस साल में तैयार भी हो जाए, जो बदलना है वो तो बदलकर रहेगा लेकिन कैशलेश हो जाने से क्या हमारी आर्थिक मुश्किलें कुछ कम हो जाएंगी.
अमेरिका में 70% लोगों के पास क्रेडिट या डेबिट कार्ड हैं, आख़िर हम टेक्नॉलॉजी में जिस देश को अपना आदर्श मानते हैं, उसके यहाँ 30% आबादी ऐसी कैसे रह गई जिसके पास क्रेडिट डेबिट कार्ड नहीं है? सीधी सी बात है, क़ि उनके पास जमा करने के लिए पैसे नहीं होंगे. रीब लोगों को अमेरिका क्या, भारत में भी कंपनियां क्रेडिट कार्ड नहीं देतीं. अमेरिका में भी दिहाड़ी मज़दूर होते हैं, जो नगद में कमाते हैं. वहां क्यों नहीं इसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया, जो भारत में कुछ लोग इसे राष्ट्रवाद में लपेट कर धमकी भरे स्वर में बता रहे हैं कि यह आर्थिक तकलीफों से मुक्ति का श्रेष्ठ मार्ग है. पूरी तरह से डिजितलाइजेशन और बैंकिंग या कैशलेश सिस्टम होने के बाद कौन गारंटी ले रहा है क़ि कालाधन, हवाला सब रुक जाएगा. अरे ये सब तो बैंकों के खातों से ही होता है. कुछ फ़र्क नहीं पड़ेगा. तो जिस बात में असमंजस है, कि ये हो सकता है, या वो होना चाहिए, उसका मतलब हुआ आप 10% लोगों को पकड़ने के चक्कर में 90% लोगों को ख़तरे में डाल रहे हैं.
कौन से डिजिटलाइजेशन की बात करते हो, इतना ईकोमर्स कारोबार हो रहा है, आजतक एक ढंग का क़ानून नहीं ला पाए हो जिससे आम आदमी को एक शिकायत का प्लेटफार्म मिल सके. सोसल मीडिया, ईमेल, बैंकिंग से लेकर बैंकों तक के खातों के पासवर्ड और डेटा चोरी हो जाते हैं लेकिन सरकार कुछ क़ानून तक नहीं बना पाई. लॉ में इसका स्पेशलाइजेशन तक नहीं है भारत में. ऐसे में रिस्क कौन लेगा? उसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
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