Thursday, November 10, 2016

ट्रम्प की जीत के मायने।

अमेरिका के इस चुनाव नतीजे के बाद मुझे एक शेर याद आया, 
शाद रहबरे, मक्कार से रहजन अच्छा,
नुकसान उठाना है तो  किसी जाहिल से उठाओ....
अमेरिका के भी लोगों ने पूरे चुनाव के दौरान यही देखा कि किसी बहुत चालाक आदमी से ठगे जाने से अच्छा है क़ि कोई जेबकतरा आपकी जेब काट ले जाए. मुझे लगता है क़ि इस चुनाव के 3 इमीडिएट फैक्टर्स जो हैं. पहला है ओबामा का 8 साल का कार्यकाल. अमेरिका की हालत ख़राब है,  20 सितंबर को ओपिनियन पोल कराने वाली संस्था गैलप के चेयरमैन जिम क्लिफटन ने एक लेख लिखा था. सन् 2000 में 61 फीसदी अमरीकी खुद को अपर-मिडल क्लास का मानता थे, लेकिन 2008 तक आते-आते 51 प्रतिशत लोग ही अपर मिडिल क्लास कहलाने लगे, यानी आर्थिक हालत इतनी खराब होगी कि समाज के ऊपरी तबके की संख्या में 10 फीसदी की कमी आ गई. मतलब ये हुआ कि अमेरिका में 25 करोड़ व्यस्क हैं, इसका 10 फीसदी यानी ढाई करोड़ लोग आर्थिक रूप से तबाह हो चुके हैं. अमेरिकी एक्सचेंज में 20 साल के भीतर पब्लिक लिस्टेड कंपनी की संख्या आधी रह गई है. पहले 7300 कंपनियां पब्लिक लिस्टेड थी, जो अब 3700 पर आ गई हैं. इससे अमेरिका में भयानक तरीके से नौकरियां कम हुई हैं. 48 प्रतिशत लोगों के पास ही पक्की और पूरी नौकरी है. नए बिजनेस स्टार्ट अप की संख्या ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम स्तर पर है. अमेरिका की इस हालत पर यकीन नहीं है तो जीतने पर ट्रंप ने जो कहा वो अमेरिका के बारे मे ही कहा है, बुंदेलखंड के बारे में नहीं. उनके बयान से लगा कि अमेरिका में न तो हाईवे हैं, न पुल हैं. एयरपोर्ट और स्कूल भी नहीं हैं. ऐसा पिछले चुनाव से ही था, ओबामा अमेरिकी इतिहास के पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जो अपना दूसरा चुनाव कम मतों से जीते थे, आमतौर पर ऐसा होता नहीं था. तो भी डेमोक्रेटिक पार्टी लोगों के गुस्से को समझ नहीं पाई. ये इशारा तब आया जब रिपब्लिकन पार्टी में डोनल्ड ट्रम्प और बर्नी सैंडर्स डेमोक्रेटिक पार्टी में उभर रहे थे, शायद ये 2015 की शुरुआत थी. ऐसे में नंबर आया वहाँ की मीडिया का जो आज हताश है अपनी हार पर. मीडिया चुनाव तो नहीं लड़ रहा था, लेकिन हिलेरी क्लिंटन के लिए दिन-रात एक किये हुए थे. जनता ने ट्रंप को जिता दिया, जिन्हें वहां की मीडिया ने इडियट तक कहा. ओपिनियन पोल की हार तो ऐसी हुई है कि दिल्ली और बिहार चुनाव की भी याद नहीं आ रही है. जब भी मीडिया सत्ता से जुड़े किसी नेता का प्रचारक बन जाता है, नेता उस मीडिया को देखती तो है मगर उसकी सुनती नहीं है. जब भी मीडिया किसी नेता के लिए बैटिंग करता है, जनता उसे आउट कर देती है. ट्रंप की जीत पर आलोचक हैरान हैं तो मीडिया की इस हार पर भारत के गांवों में भी जश्न मनना चाहिए. अमेरिकी अखबारों ने खुलकर हिलेरी का समर्थन करना शुरू कर दिया था. उनके कसीदे कसे जाने लगे थे. अमेरिकी मीडिया ने ट्रंप में बुराई देखी, आगे आकर जनता को आगाह किया, मैं नहीं कहूँगा क़ि ट्रम्प को कोई सभ्य मीडिया समर्थन करता, लेकिन अगर मीडिया ने ट्रम्प का विरोध करके अच्छा किया तो हिलेरी का समर्थन करके कौन सा अच्छा किया? तब वो मीडिया कहां था जब बर्नी सैंडर्स लोगों के हक का सवाल उठा रहे थे. यही मीडिया बर्नी का मज़ाक उड़ाने में लगा हुआ था. जनता मीडिया को समझ गई है. 
इसमें आप विपक्ष की मानसिकता देखिए, मुद्दों को छोड़कर सब बातें हुईं. हिलेरी कैंप ने जितने भी जगह भाषण दिए वहाँ ट्रम्प पर निजी हमले बहुत किए, कहा क़ि उनसे बच्चे डर जाते हैं, उनकी बेटी और सेक्स लाइफ से लेकर पिछली जिंदगी पर खूब हमले किए. आरोप सही भी होंगे, लेकिन ये जनता पर छोड़ देना चाहिए कि वो उसे पसंद करेगी क़ि नहीं? आप राजनीति में निजी हमलों पर भारत से लेकर पूरे विश्व का इतिहास उठाकर देखिए हमला सहने वाले के प्रति लोगों की सहानुभूति होती है. मीडिया ने हिलेरी पर लगे आरोपों को अनदेखा किया, मगर ट्रंप के आरोपों के प्रति इतना देखा कि लोग तंग आ गए. ट्रंप बुरे थे तो क्या हिलेरी बहुत अच्छी थीं. सबक ये है कि दो अयोग्य उम्मीदवार होंगे तो उसमें वो उम्मीदवार हारेगा जो शालीन होने का नाटक करेगा.
बस एक निराशा हुई कि लोग उनकी जीत के बाद सभा में नारे कैसे लगा रहे थे, " वी हेट मुस्लिम्स, वी हेट ब्लैक्स, वी डोंट वांट माइग्रेट्स " ये ख़तरनाक है. मुस्लिम्स से समझ में आया कि आईएसआई और इस्लामिक आतंकवाद या कट्टरपंथियों  के बाद एक माहौल है जो नफ़रत पैदा करता है, लेकिन सभी मुस्लिम्स तो आरोपी नहीं हैं.  काले लोगों के खिलाफ भी बोलना बेहद दुखद है, मैं भी तो काला हूँ, मैं भी तो माइग्रेट हूँ, कैसे ऐसी बातों को समर्थन कर दूँगा और निजी तौर पर ट्रम्प कोई बहुत अच्छे इंसान भी नहीं हैं जितना उनको सुना और जाना है, अगर आप उनके बयान सुनते होंगे तो पता होगा. महीलाओं, हर दूसरे धर्म, रंग, टैक्स चोरी, पर जो वो सोचते हैं. लोगों ने जिन मुद्दों पर उनको चुना है उसपर ही काम करें. उनको 25% दक्षिणपंथियों के अलावा भी लोगों ने अलग मुद्दों पर दूसरे ग़लत लोगों के खिलाफ वोट दिया है, बहरहाल ट्रंप एक ऐसा नेता हैं, जिनके बयानों को सभ्य महफिलों में दोहराया नहीं जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं उन सभ्य महफिलों के अपने काले कारनामे नहीं है. दुनिया पर युद्ध थोप कर, अपनी जनता को भूखे रखकर अमेरिका विश्व शक्ति बन सकता है लेकिन वो दुनिया के सामने एक योग्य उम्मीदवार नहीं रख सका, ये उसके लोकतंत्र की हार है. ये पूरे विश्व में हो रहा है जब लोगअपने ज़मीनी मुद्दों को सुनकर किसी नेता को समर्थन कर रहे हैं, विचारधारा बहुत . मुद्दा रह नहीं गई है. आप देखिए क़ि यूरोप के इतिहास के सबसे बड़े आंदोलन वहाँ की लेफ्ट या सोसलिस्ट सरकारें जो 70% वोट के साथ जीती थी, उनके खिलाफ भी हो रहे हैं. तो सीधी सी बात है क़ि वो सरकारें लोगों के मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रही हैं. अमेरिका में भी जिन लोगों ने ट्रम्प को वोट दिया उसमें से मात्र 25-30% लोग ही दक्षिणपंथी विचारधारा के हैं, बाकी के सभी तो अल्ट्रा लेफ्ट या सेंटर ही थे. ये वो लोग हैं जो जॉब, शिक्षा और विकास के साथ साथ अमेरिका की सुरक्षा के लिए भी चिंतित थे, पिछले साल के एक सर्वे को मैं कोर्ट करते हुए कह रहा हूँ क़ि अमेरिका के 56-57% आर्मी ने के मैगज़ीन के सर्वे में ओबामा के खिलाफ बाते कहीं थी. लोग आर्मी को बाहर भेजने और उसके मिस्यूज के खिलाफ भी  हैं, ट्रम्प उन देशों से सेना का खर्चा लेना चाहते हैं. लोगों को अच्छा लगा ये सब.
इस प्रकार इस चुनाव ने न केवल ग्लोबलाइजेशन के अस्तित्व के सामने एक बहुत पैना और गहरा प्रश्नचिन्ह ही खड़ा किया है, बल्कि इस सवाल का उत्तर खोजने के लिए भी विवश कर दिया है कि आखिर क्यों ब्रिटेन और अमेरिका के साथ-साथ दुनिया के महारथी इनके परिणामों के बारे में सही-सभी पता लगाने में बहुत बुरी तरह असफल रहे हैं? जाहिर है कि इस असफलता के मूल में वहां के आम बहुसंख्यक लोगों की चेतना तक न पहुंच पाने की उनकी कमजोरी और सीमाएं रही हैं. विषेशज्ञों का यह वर्ग उसी समूह का सदस्य है, जिसे ग्लोबलाइजेशन की मलाई मिल रही है. इसलिए स्वाभाविक रूप से वह उसके पक्ष में है. जबकि इन देशों का बड़ा वर्ग न केवल आर्थिक रूप से ही इससे त्रस्त है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी. इसलिए जब भी उसे जनमत के माध्यम से इसके प्रति अपने आक्रोश और असहमति को व्यक्त करने का मौका मिलता है, वह कर देता है. ब्रिटेन में ब्रेग्जिट वही था और अब अमेरिका में ट्रम्प वही है. ट्रम्प की जीत के जरिए अमेरिका ने साफ-साफ कह दिया है कि यदि दुनिया में ग्लोबलाइजेशन को बचाना है, तो उसका सिर्फ एक ही रास्ता है, और वह है कि ‘‘अमेरिका के कोरस गान के समूह में शामिल हो जाओ.’’
अब सवाल ये है क़ि क्या ट्रंप के पास कोई नया आर्थिक मॉडल है. वो आ तो गए हैं, लेकिन क्या वे आउटसोर्सिंग बंद कर देंगे, अमेरिका में बाहरी लोगों का आना बंद कर सकते हैं. दुनिया को ग्लोबल विलेज में बदलने निकला था अमेरिका, अब उसे याद आ रहा है कि उसकी लोकल बस छूट गई है. देखना होगा कि वहां कि जनता ने ट्रंप के बयानों पर दिल लुटाया है, या शालीन भाषा बोलकर उसे ग़रीब बनाने वालों के ख़िलाफ़ बग़ावत की है. 2008 की मंदी के बाद से आज तक दुनिया संभल नहीं सकी है. जनता गुस्से में सरकार तो बदल रही है लेकिन क्या कहीं अर्थव्यवस्था बदल रही है. अमेरिका में ट्रंपागमन के मौके पर सोहर गाने वाले नहीं हैं. वहां तो पांच सौ और हज़ार के नोट रद्दी में नहीं बदले हैं, फिर वहां जश्न क्यों नहीं है, या जो जश्न मना रहे हैं, वो वहां की मीडिया में क्यों नहीं हैं?

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...