Friday, November 11, 2016

नोट बंद होने का सामाजिक विश्लेषण

जब से 500 और 1000 के नोट बंद हुए हैं तब से मुझे आर्थिक कम सामाजिक विश्लेषण करने का बड़ा मान हो रहा है, इसमें दो- तीन बातें बहुत आसानी से हम लोग अपने घरों में ही देख सकते हैं. पहली तो ये क़ि कुकुच लोग अपने ही घरों में अपराधी बन जाएँगे. जिसने भी पैसे छुपा कर रखे होंगे वो अब सभी अपने परिवारों की नज़र में अपराधी हो जाएँगे. बहुत लोग ऐसे पैसे को सीने पर किसी बोझ की तरह दबाए रहते हैं. ग्लानि से दबे रहते हैं. वे इस फ़ैसले से मुक्त हो जाएंगे. गीता ज्ञान का सहारा लेंगे. तुम क्या लेकर आए थे टाइप! उन्हें अपराधबोध से बाहर आने का मौका मिलेगा. यहां से वे चाहें तो ईमानदार जीवन जीने का प्रयास कर सकते हैं. दूसरी बात मैने तीन दिन से महिलाओं के ऊपर जॉक सुन रहा हूँ जो उनके छुपाए हुए पैसे पर मज़ाक है, बल्कि इसका भी अपना एक महत्व है. औरतें ये पैसा अपने लिए नहीं बचाती हैं न ही अपने ऊपर खर्च करती हैं. अपनी तमाम इच्छाओं को मार कर बचत की निरंतर साधना में लगी रहती हैं. यह पैसा औरतों की आर्थिक स्वतंत्रता का संबल होता है. इसकी खूबी यह होती है कि यह किसी की नज़र में नहीं होता मगर सबको जोड़ता चलता है. इन पैसों के ज़रिये विवाहित औरतें अपने मायके के रिश्ते को सींचती रहती हैं. कभी भाई को कुछ दे दिया कभी माई को कुछ दे दिया. इस पैसे को जब आप बैंक में रख देंगे तो हो सकता है वो अपने मायके से थोड़ी दूर हो जाएं. बैंक में रखे पैसे को पति और बच्चों से छिपाना मुश्किल है. परेशानी इस बात की नहीं है कि सरकार जान जाएगी, परेशानी इस बात से है कि समाज जान जाएगा. इंडियन एक्सप्रेस में ही एक किस्सा छपा है कि चाय वाले की पत्नी ने पांच सौ के दो नोट रजाई की परतों में छिपा कर रखे थे. हो सकता है यह उसके बुढ़ापे का सहारा हो. आसरा हो कि कुछ होगा तो यह पैसा काम आ सकता है. औरतों का यह पैसा मात्रा में कम होता है मगर बैंक में रखे पैसे से ज़्यादा सहारा देता है. जब यह पैसा बैंकों में जाएगा तो अर्थव्यवस्था को नया सहारा तो मिलेगा लेकिन औरत विरोधी इस समाज में आंचल के कोने में छिपी उनकी आज़ादी का छोटा सा ज़रिया भी लेता जाएगा.
पहली बार नरेंद्र मोदी का केजरीवाल हो गया....... मतलब केजरीवाल की तरह काम तो सही करना चाहा लेकिन उल्टा पड़ता दिख रहा है. नियत का तो पता नहीं लेकिन कोशिश ज़रूर सही थी. कई बार सरकार या कोई नेता अच्छा काम करने जाता है और वो जनता को सही सही नहीं समझा पाता है, यही इसबार मोदी सरकार के साथ हुआ. शायद एडवरटाइजिंग का समय नहीं मिला इसलिए. लेकिन सरकार को इतने बड़े देश में इतना बड़ा फ़ैसला लेने के पहले जितनी व्यवस्था सुधारना चाहिए था बैंक से लेकर अन्य सार्वजनिक स्थानों पर करना चाहिए था, वो नहीं हो पाया. इसमें सरकार की नाकामी है. एकदम से सब आसान नहीं था लेकिन कोई बड़ा प्रयास भी नहीं दिखा.  फिर मुझे कहने में कोई गुरेज़ नहीं है क़ि नोट बंद करने का तरीका एक बेहतरीन कदम है, लेकिन आम लोगों को मेरी 2 दिन पहले की उम्मीदों से ज़्यादा दिक्कत का सामना करना पड़ा. हम एसी बैठे बैठे सड़क पर संघर्ष कर रहे किसी आदमी का कष्ट नहीं देख सकते हैं. कल और आज मेरे ओफिस के रास्ते में बैंक ऑफ बड़ोदा में लगी लाइन देखी जहाँ सच में सब प्रवासी ही थे, जो 2-4-10 हज़ार रुपए जमा करने या बदलवाने आए थे. जब न्यूज में देखा कि एक ग़रीब औरत को पता चला क़ि उसके 4 हज़ार रुपए नहीं चलेंगे बंद हो गए तो वो सदमें में मर गई. एक आदमी को चिता के लिए समान नहीं मिला तो अपने पिता की लाश को टायर में जलना पड़ा. कई लोगों को मैनें भी दवाइयों और खाने पीने के लिए तरसते देखा. रिक्शे के पैसे तक लोग किसी से उधार माँगते दिखे. मेरे ही घर में डीजल लाने के लिए 100 के नोट नहीं बचे तो खेतों में पानी नहीं दे पाए. जिनके यहाँ शादी विवाह या कोई प्रोग्राम है वो परेशान हैं, वैसे निजी तौर पर तो मैं शादी में दहेज और इस बहुत बड़े खर्चे के खिलाफ हूँ तो उसपर कुछ फ़र्क नहीं पड़ता है. 
ऐसा कई बार हुआ है जब हमारी नज़र में कुछ सही होता है, और सच में सही भी होता है लेकिन जनता वो समझ नहीं पाती है, या समझा नहीं पाती है सरकार. मैं बिल्कुल कट्टर विचार का नहीं हूँ क़ि परसों बहुत अच्छा बोल रहा था, कल किसी की प्राब्लम देखी तो उसे खराब ना बोलूं, अगर जहाँ ग़लती है वो बता दूँगा. कैसे मैं लोगों की समस्यायों को अनदेखा कर दूं? सच में समस्या हुई है लोगों को मुझे भी हुई लेकिन बर्दास्त किया लेकिन सब ऐसा नहीं कर सकते हैं. इसलिए चुनावों में बीजेपी को ये मुद्दा वोट दिलाने की बजाय उल्टा भी पड़ सकता है. 
और रही बात काले धन की तो वो बाहर आ भी रहा है, लोग कुछ ना कुछ करके भले ही बैंक में डिपोजिट कर रहे हैं लेकिन अब वो सफेद हो रहा है. जाएगा कहाँ? जैसे ही कोई कैश जमा करता है वो इनकम टैक्स की वेबसाइट पर दिख जाता है, तो ऐसे कोई बचाकर नहीं ले जाएगा. कई फंडे बैंक से लेकर लोगों के मुझे पता हैं वो यहाँ बोलना ठीक नहीं है लेकिन फिर भी कुछ नहीं से कुछ हुआ तो यही ठीक है. आगे के लिए एक कदम है जो 4-5 दिन की लोगों की समस्याओं के बाद देश को फायदा पहुँचाएगा. 
ईमानदारी एक साधना है. आपको रोज़ बड़े इम्तहानों से गुज़रना पड़ता है. यही तय करते-करते परेशान रहता हूं कि ये बेईमानी तो नहीं है. आप जब ईमानदार होते हैं तो रोज़-रोज़ डरते हैं. जब बेईमान होते हैं तो रोज़-रोज़ दुस्साहसी होते चले जाते हैं. लगता है कि कोई कुछ नहीं कर सकता. ऐसे लोगों को एक झटका लगा है सो बंदा ख़ुश हुआ है. मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं. उस लिहाज़ से मैं ये लेख नहीं लिख रहा हूं. मैं समाजशास्त्रीय नज़र से लिख रहा हूं. कम से कम चार दिन के लिए ही सही, काले धन के नाम पर कुटिल मुस्कान छोड़कर बगल से निकल जाने वालों के सामने से तनकर गुज़रने का मौका तो मिला.

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