दुनिया भर में सरकारों के कामकाज़ का तरीका बदल रहा है. सरकारें बदल रही हैं. धारणा यानी छवि ही नई ज़मीन है. उसी का विस्तार ही नया राष्ट्रवाद है. मीडिया अब सरकारों का नया मोर्चा है. दुनिया भर की सरकारें मीडिया को जीतने का प्रयास कर रही हैं. हर जगह मीडिया वैसा नहीं रहा जैसा होने की उम्मीद की जाती है. इस तरह का राष्ट्रवाद आजकल हर जगह उभर रहा है. अपने मुल्क से मोहब्बत की यह शर्त ज़्यादा मुखर होने लगी है कि आप किसी और मुल्क से नफरत करते हैं. किसी के प्रति अविश्वास को उभारना होता है. फ्रांस लंदन, पोलैंड, रूस, अमेरिका, ऑस्ट्रिया के नेता इन्हीं मुद्दों पर लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं. इन्हीं मुद्दों पर सत्ता में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं. सभी अपने अपने देशों को फिर से महान बनाने की कसमें खा रहे हैं. पूरे विश्व में एक दौर निकल पड़ा है, जो लिबरल वैचारिकता को राष्ट्रवाद के नाम पर चैलेंज कर रहा है. ये राष्ट्रवाद निश्चित तौर पर फेक है, क्योंकि इस राष्ट्रवाद को उभारने के लिए एक चोला ओढ़ा जाता है, वो कभी सेना के नाम पर होता है, तो कभी स्वदेशी, प्रवासी विरोध तो कभी धर्म के नाम पर. भारत ही नहीं हर बहुत जगह.
मैं इसको एक अधिनायकवाद के रूप में देखता हूँ. ऐसे दक्षिणपंथी विचारों को जनता का भी खूब समर्थन मिल रहा है, उसके कारण सीधे हैं, क़ि जो लिबरल तबका है, वो केवल भाषणबाज़ी के नाम पर अपने समर्थकों को बाँधकर रखना चाहता है. जबकि उनकी सभी आर्थिक नीतियाँ फेल हो गई हैं, वो सब भी ट्रिकल डाउन थ्योरी पर चलने लगे तो पब्लिक ट्रम्प जैसे अमेरिका के टॉप अमीरों में अपना नेता देखने लगी. फिर ऐसे में बाकी बातें बहुत पीछे रह जाती हैं, जहाँ लोगों की निजी और बुनियादी चीज़ों की बात होती है. देखने वाली बात इसमें ये है कि मीडिया का भी कॉरपोरेटाइजेशन हो रहा है. यूरोप के कई देशों और अमेरिका तक में मीडिया हर मुद्दे पर एक तरफ हो जाता है, ये पिछले 5-6 सालों में भारत में भी हुआ है, लेकिन यहाँ की जनता अभी तक पूरी तरह से प्रेस निर्भर नहीं हुई है. भले ही पढ़े लिखे और युवा तबके में ये कभी कभी दिखता है, सोसल मीडिया के प्रभाव से लेकिन 70% जनता अभी भी इस सबसे दूर अपने अलग मुद्दे रखती है. जो लोग सोसल मिडया के प्रभाव में भी हैं, वो भी राजनीति को अलग अलग तरीके से देखते हैं, कभी जाति कभी धर्म तो कभी और किसी मुद्दे पर. उदाहरण के लिए यूपी बिहार में लोकसभा में बीजेपी को एक तरफ़ा समर्थन और विधान सभा में वहाँ के स्थानीय दलों को वोट देना. अभी भी मुझे उम्मीद है, कि लोग यूपी में ऐसा करेंगे. ये सही है या गलत मैं नहीं कहूँगा.
लोकतंत्र कोई बहुत सुरक्षित काल में रहा नहीं है, जहाँ तक मैं याद करता हूँ, हॉलीवुड की एक बार मैने किसी रिसर्च के दौरान 1960 के दशक की मूवी देखी थी, नाम तो नहीं याद आ रहा है.... उसमें दिखाया जा रहा था क़ि एक कंपनी कैसे प्रेस में एडवरटाइजिंग के ज़रिए कब्जा करती है, फिर वो चुनावों पर भी कब्जा करती है. ठीक वही अब भी चल रहा है. लोकतंत्र ख़तरे में है, इसे बचाने के लिए लड़ने की ज़रूरत है, जैसे भाषण हमेशा से होते रहे हैं. लेकिन इसके दुष्परिणाम बहुत देर में दिखते हैं इसलिए इसके कारणों का आकलन ठीक ठीक नहीं हो पाता है.
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