Friday, October 30, 2015

दाल की बढ़ती क़ीमतें, और ग़रीब की समस्याएँ

देश में दाल के भाव आसमान पर चढ़े हुए हैं, और बाबा रामदेव कम दाल खाने की वैज्ञानिक सलाह दे रहे हैं। ऐसा भी नहीं है क़ि सरकार ने कुछ नहीं किया, सरकार ने बहुत देर में कुछ कोशिशें की, जो नाकाफ़ी हैं। मैनें दाल के ऊपर रवीश कुमार के 5-6 प्राइमटाइम के एपीसोड देखे। वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला जी के कई लेख फेसबुक और एक अख़बार में पढ़ा। जिसके बाद इस मुद्दे पर लिखने के लिए खुद को तैयार कर पाया।
भारतीय आहार में दालों का एक विशिष्ट महत्व है। उत्तर भारत में तो दोनों समय दाल अमूमन खाई ही जाती है। इसकी एक वजह तो प्रोटीन है। अंडा या मांस खाने वालों के लिए तो प्रोटीन इनके जरिए मिल जाता है पर शाकाहारियों के लिए दाल के अलावा प्रोटीन पाने का और कोई स्रोत नहीं है। चूंकि भारत के एक बड़े इलाके का मुख्य भोजन चावल है इसलिए प्रोटीन के लिए या तो मछली खाई जाए अथवा दालें। इसी तरह जिन इलाकों का मुख्य भोजन रोटी है वहां पर भी। मांसाहारी यहां पर मटन अथवा चिकेन खाकर प्रोटीन का अपना कोटा पूरा कर लेते हैं मगर शाकाहारी क्या करें। यही कारण है कि दाल यहां के भोजन का मुख्य आहार है। हालांकि पनीर और दूध भी प्रोटीन की भरपाई करते हैं मगर एक तो पनीर शहरी इलाकों में ही मिल पाता है और मौसम के गरम होते ही उसके खराब हो जाने का खतरा पैदा हो जाता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार पूरे भारत में दालों की खपत लगभग 2.20 करोड़ टन प्रति वर्ष है। इसमें से 1.85 करोड़ टन तो घरेलू उत्पादन है और 35 लाख टन दालों को आयात करना पड़ता है। कानपुर के दलहन अनुसंधान संस्थान के विजन डाक्यूमेंट की रिपोर्ट बताती है कि आने वाले डेढ़ दशक में यह खपत करीब एक करोड़ टन और बढ़ जाएगी। हालांकि ऐसा नहीं है कि दलहन की खपत और उसका रकबा नहीं बढ़ा है। हालिया रिसर्च बताती हैं कि दलहन का रकबा भी बढ़ा है और उसकी उपज भी पिछले तीस वर्ष में लगभग दो गुनी हुई है दाल की खपत का ग्राफ रुक नहीं रहा है।
दालों में प्रोटीन की मात्रा इतनी ज्यादा होती है कि चावल या गेहूं उस मात्रा में प्रोटीन मुहैया नहीं करा पाते। प्रति सौ ग्राम पकी दाल में प्रोटीन 6.8 प्रतिशत होता है जबकि चावल में महज 2.7 प्रतिशत। दालों में भी सोयाबीन में यह मात्रा 16.6 प्रतिशत होती है और अंडे में 12.6 जबकि पके हुए चिकेन में 26.6 प्रतिशत। जाहिर है दालें प्रोटीन से भरपूर होती हैं। ऐसे में शाकाहारियों के लिए दाल का भला विकल्प और क्या हो सकता है। पिछले दिनों बाबा रामदेव ने कहा कि दाल से वायुरोग हो जाता है इसलिए पतली दाल खानी चाहिए। यह एक हद तक सच है और यह विज्ञानसम्मत तथ्य है कि अत्यधिक प्रोटीन शरीर में वायु अथवा गैस को बढ़ाता है इसीलिए रात के वक्त दाल खाने की मनाही है। मगर पतली दाल में प्रोटीन की मात्रा भी कम ही होगी जबकि एक शाकाहारी व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिए दिन भर में कम से कम बीस ग्राम प्रोटीन तो लेना ही चाहिए। जब सौ ग्राम दाल में यह सिर्फ 6.8 प्रतिशत है और सौ ग्राम दाल दिन भर में कोई खाता नहीं है तब यह मात्रा कैसे पूरी होगी। जाहिर है कुछ अन्य स्रोतों से भी। मसलन फलों से, सब्जियों में बीन्स से, गेहूं चने से। इसीलिए गेहूं के आटे में चने का आटा मिलाने की परंपरा है।
पर इधर पिछले कुछ वर्षों में दाल खाने के मामले में हिंदुस्तानी काफी चूजी हो गए हैं। सिर्फ एक ही दाल अब खाई जाने लगी है और वह है अरहर की दाल। जहां अभी कुल बीस वर्ष पहले में उत्तर प्रदेश के मध्यवर्ती क्षेत्र को छोड़कर बाकी इलाकों के लोग अरहर नहीं खाते थे वे भी अब अरहर की दाल को पसंद करने लगे हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि दालों में अरहर की बाजार कीमतें आसमान पर चढ़ गई हैं। पिछले वर्ष जो अरहर बाजार में 85 से 90 रुपये प्रति किलो के बीच आसानी से मिल जाती थी वह अब दो सौ को पार कर रही है। दाल की कीमतों में यह इजाफा बस अरहर के मामले में ही दिखाई देता है। अन्य दालें इतनी मंहगी नहीं हुईं। आज भी मसूर सौ रुपये किलो के आसपास है तो उड़द सवा सौ रुपये किलो और मूंग डेढ़ सौ रुपये। चना तो 70-75 में आसानी से मिल जाती है। अन्य दालें मसलन- लोबिया, काबुली चना और सोयाबीन भी अपने पूर्ववर्ती कीमतों पर ही मिल जाती हैं। अगर दालों पर यह एकाधिकार समाप्त हो जाए तो शायद अरहर की भागती कीमतों पर अंकुश पाया जा सकता है। यूं आयुर्वेद में अरहर की दाल अस्थि रोगियों को मना की जाती है और इसकी वजह है उसमें वायु तत्त्व की प्रचुरता। मसूर और उड़द में तो यह तत्त्व बहुत ज्यादा होता है। यही कारण है कि धीरे-धीरे इन दालों को रोजाना के भोजन से हटाया जाने लगा। इसके अलावा अरहर गलती जल्दी है और स्वाद में बेहतर होती है इसलिए भी यह दाल अन्य दालों की तुलना में ज्यादा इस्तेमाल की जाने लगी। चने की दाल को गलाना कठिन होता है और सोयाबीन में लिसलिसापन अधिक होता है। इसलिए प्रोटीन अधिक होने के बावजूद ये दालें रोज की थाली से गायब होने लगीं और अरहर दोनों समय खाई जाने लगी।
मूंग की दाल को हल्का माना गया है यानी यह अकेली दाल है जिसमें वायु तत्व कम होता है इसीलिए यह दाल शाम को खाई जाने लायक बताई गई है और जिन्हें पेट के रोग होते हैं उनके लिए तो यह दाल मुफीद है। मगर स्वाद होने तथा किसानों द्वारा इसे बोने में दिलचस्पी नहीं लेने के कारण बाजार में इस दाल की बिक्री में कोई उछाल कभी नहीं आया। इसकी एक वजह तो इस दाल की उपज साल में एक बार ही ली जा सकती है इसलिए किसान को भी यह मूंग बोना फायदे का सौदा कभी नहीं रहा। जबकि अरहर की अब साल में दो फसलें आसानी से ली जा सकती हैं। इसके अलावा अरहर की फसल पानी कम मांगती है और भारत के किसानों के लिए वह फसल बोना कभी असुविधाजनक नहीं रहा जो कम पानी मांगती हो। मगर पिछले दो वर्ष से जो सूखा पड़ा है और मार्च अप्रैल की बरसात ने फसल जिस तरह से नष्ट की है उससे दलहन की फसल सबसे ज्यादा खराब हुईं। अकेले अरहर पर ही बीस लाख टन का टोटा आया है। ऐसे में दाल आसानी से मिलने वाली नहीं। यह अलग बात है कि सरकारें जमाखोरों पर जोर डालकर और दालें आयात कर इस कमी को कुछ हद तक पूरा कर लें।

लेकिन यह आपूर्ति कितने दिन तक क़ीमतों में लगाम लगा पाएगी? यह एक देखने वाली बात होगी। मुझे नहीं लगता क़ि इसमें ज़्यादा दिनों की संभावना है, अगले वर्ष भी यह सिलसिला जारी रह सकता है। वैसे प्याज की क़ीमतों पर भी सरकार का लगाम ना लगा पाना एक असफलता है। इसके पहले दाम बढ़ते थे, तो 1-2 महीनें में कम हो जाते थे, लेकिन इसबार 4-5 महीने से अधिक हो गए लेकिन कुछ आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं। जो ग़रीबों के लिए बड़े ही कष्ट की बात है। जबकि उनकी आय में तो कुछ भी बृद्धि नहीं हो रही है।

बुद्धिजीवियों के निशाने पर क्यों मोदी?

पिछले कुछ दिनों से लगातार यह चर्चा चल रही है कि देश का माहौल खराब हो रहा है. लेखकों, साहित्याकारों, इतिहासकारों से लेकर वैज्ञानिक तक इस तरह की चिंता जता रहे हैं. लेकिन आखिर क्यों ऐसी चर्चाएं चल रही हैं. बिहार चुनाव में पिछले कुछ दिनों में जिस तरह धर्म के आधार पर आरक्षण और पाकिस्तान में पटाखे जैसे बयान दिए गये. क्या यह भी इसके लिए जिम्मेदार हैं. बिहार की रैली में पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दलितों का आरक्षण छीनने वाला बयान, उसके कुछ दिन बाद एक और रैली में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का पाकिस्तान में पटाखे वाला बयान. इन दोनो ही बयानों में एक समानता है. इनमें एक धर्म विशेष को निशाना बनाया जा रहा है. इसीलिए यह सवाल उठ रहा है कि क्या चुनाव के आखिरी दौर में बीजेपी विकास को छोड़ हिंदू-मुस्लिम का कार्ड खेल रही है. अमित शाह के पाकिस्तान वाले बयान की शिकायत के बाद चुनाव आयोग ने जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांगी. लेकिन अमित शाह यह मानने को तैयार नहीं कि उन्होने कुछ गलत कहा. एक इंटरव्यू में इस बारे में पूछे गये सवाल पर अमित शाह ने कहा कि जो मैने कहा उसका मतलब था कि अगर मोदी और बीजेपी कमजोर होते हैं तो देशद्रोही ताकतें खुश होती हैं. इसमें सांप्रदायिक क्या है? इस पर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का कहना है कि उसने सारे बिहारियों को पाकिस्तानी करार दिया है. धर्म के आधार पर आरक्षण देने की साजिश वाले नरेंद्र मोदी के बयान को लेकर भी सवाल उठ रहे है. भारत के संविधान में जातिगत आरक्षण की व्यवस्था है यानी धर्म के आधार पर आरक्षण दिया ही नहीं जा सकता. तो फिर मोदी ऐसे बयान क्यों दे रहे हैं ? बीफ विवाद और दादरी की घटना के बाद से देश के बिगड़ते माहौल पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी इस बात पर जोर दिया है कि विविधता और सहनशीलता भारतीय संस्कृति की ताकत है. इन्हें खोने नहीं देना नहीं चाहिए. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर देश में ऐसा माहौल कौन बना रहा है.

Thursday, October 29, 2015

क्या अपराधी भी इसी तरह वकील बनेगे?

न्यायिक सुधारों पर बात होती है तो वह सिर्फ न्यायाधीशों और न्यायालयों की कार्यप्रणाली तक सीमित रहती है. वकील, जो न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा अंग हैं इस बहस से अक्सर अछूते रह जाते हैं
भारतीय राजनीति को अपराधियों से मुक्त करने के प्रयास समय-समय पर होते रहे हैं. कभी न्यायालयों ने हस्तक्षेप करके तो कभी संसद ने स्वयं ही जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव करते हुए आपराधिक छवि के लोगों को राजनीति से दूर रखने की पहल की है. अब ऐसी ही पहल न्याय व्यवस्था को अपराधियों से मुक्त कराने के लिए भी होने लगी हैं. हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने इस संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है. न्यायालय ने माना है कि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का वकालत जैसे पेशे में होना एक गंभीर समस्या है और इसे जल्द से जल्द रोका जाना बेहद जरूरी है.
बीती जुलाई में ‘बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया’ (बीसीआई) के अध्यक्ष ने चेन्नई में आयोजित एक समारोह में बताया था कि देश भर में लगभग 30 प्रतिशत वकील या तो फर्जी हैं या वकालत की जगह अवैध धधों में संलिप्त हैं. उनका यह भी कहना था कि न्यायालयों में काला कोट पहनकर घूमने वाले 20 प्रतिशत से ज्यादा वकीलों के पास सही डिग्रियां तक नहीं हैं. दिल्ली सरकार में मंत्री रहे जितेन्द्र तोमर भी इस दावे का एक उदाहरण हो सकते हैं. कानून की फर्जी डिग्री हासिल करने के आरोप में उन्हें हाल ही में जेल जाना पड़ा जबकि इसी डिग्री के सहारे वे कानून मंत्री तक बन बैठ थे. ऐसे कई मामलों का जिक्र अपने फैसले में करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के जस्टिस एन किरुबकरण ने लिखा है, ‘न तो कानूनी पेशा अपराधियों को आश्रय देने का कोई अड्डा है और न ही कानून की डिग्री उनकी आपराधिक गतिविधियों की कोई ढाल.
मद्रास उच्च न्यायालय ने यह फैसला एसएम अनंत मुरुगन द्वारा लगाई गई एक याचिका की सुनवाई के दौरान दिया है. इस याचिका में प्रार्थना की गई थी कि अपराधियों को वकालत के पेशे में घुसने से रोका जाए. न्यायालय ने याचिकाकर्ता की बातों को गंभीरता से लेते हुए माना कि इसमें काफी हद तक तीन वर्षीय पाठ्यक्रम का भी दोष है. अपने फैसले में जस्टिस एन किरुबकरण ने लिखा है, ‘लॉ कॉलेजों को चाहिए कि वे किसी भी छात्र को दाखिला देने से पहले यह सुनिश्चित करें कि उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं है. यह एलएलबी के तीन वर्षीय पाठ्यक्रम में ही होता है कि अपराधी भी दाखिला पा जाते हैं. पांच वर्षीय पाठ्यक्रम में आयु सीमा तय होती है इसलिए इसमें किसी अपराधी के दाखिले की संभावनाएं नहीं होती. तीन वर्षीय पाठ्यक्रम को समाप्त किया जाना ही न्याय व्यवस्था के हित में है.’
वर्तमान व्यवस्था में वकालत की डिग्री हासिल करने के लिए दो तरह के पाठ्यक्रम मौजूद हैं. पहला पांच वर्षीय पाठ्यक्रम है. इसमें 12वीं कक्षा के बाद ही दाखिला लिया जा सकता है. जस्टिस एन किरुबकरण की ही तरह कानून के कई अन्य जानकार भी इसी पाठ्यक्रम की पैरवी करते हैं. इन लोगों का मानना है, चूंकि पांच वर्षीय पाठ्यक्रम में छात्रों को 12वीं पास करते ही दाखिला लेना होता है, इसलिए इसमें वही छात्र आते हैं जो इस पेशे के प्रति गंभीर होते हैं. यह लगभग वैसी ही व्यवस्था है जैसी मेडिकल या इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए देश में मौजूद है.
इसके अलावा दूसरी और पारंपरिक व्यवस्था है तीन वर्षीय पाठ्यक्रम की. इसमें दाखिले के लिए स्नातक होना जरूरी है. इस व्यवस्था को समाप्त करने की मांग पिछले कुछ समय से उठने लगी है. ऐसी मांग करने वालों का तर्क है कि इस व्यवस्था से मुख्यतः वे लोग वकालत के पेशे में आते हैं जिनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं होता. इसमें कोई अधिकतम आयु सीमा न होने के चलते कई ऐसे लोग भी वकालत के पेशे में चले आते हैं जिन्हें भ्रष्टाचार या किसी अन्य आरोप में अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा हो. कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोग कानून से संरक्षण के लिए भी वकालत का रुख करते हैं. मद्रास उच्च न्यायालय ने भी ऐसे ही कारणों के चलते इस व्यवस्था को समाप्त करने की बात कही है.
तीन वर्षीय पाठ्यक्रम में कोई अधिकतम आयु सीमा न होने से ऐसे लोग भी वकालत में आ आते हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा हो. कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोग भी कानून से संरक्षण के लिए वकालत का रुख करते हैं
न्याय व्यवस्था में बढ़ते अपराधीकरण का उदाहरण देते हुए न्यायालय ने कई मामलों का जिक्र किया है जिनमें कोर्ट परिसर में हुई हत्याएं, वकीलों का हत्या जैसे अपराधों में दोषी होना, कई वकीलों पर गुंडा अधिनियम लगाया जाना और कई वकीलों द्वारा सरकारी कर्मचारियों से मारपीट करने जैसी घटनाएं शामिल है. इन तमाम कमियों को दूर करने और न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए जस्टिस एन किरुबकरण ने अपने फैसले में केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया को 14 निर्देश जारी किये हैं. इनमें पचास साल पुराने अधिवक्ता अधिनियम में संशोधन करने, बीसीआई की व्यवस्था में भारी बदलाव करने, आपराधिक मामलों में दोषी लोगों के पंजीकरण पर रोक लगाने, कानून के छात्रों का पुलिस से सत्यापन कराने, आपराधिक मामलों में आरोपित छात्रों के दाखिले पर रोक लगाने, कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले हर छात्र को पंजीकरण से पहले आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करने, लॉ कॉलेजों की संख्या कम करने और तीन वर्षीय पाठ्यक्रम समाप्त करने जैसे निर्देश शामिल हैं.
कानून के जानकारों की मानें तो इन सभी निर्देशों को लागू करना आसान नहीं है क्योंकि कई मौजूदा वकील इसका विरोध करेंगे और इस फैसले को निश्चित ही सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे. लेकिन इन्हें यह भी लगता है कि यदि इनमें से कुछ महत्वपूर्ण निर्देश भी लागू हो पाए तो न्याय व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार हो सकते हैं.
अमूमन जब भी न्यायिक सुधारों पर चर्चा होती है तो वह सिर्फ न्यायाधीशों और न्यायालयों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने तक ही सीमित रह जाती है. लेकिन जो वकील इस व्यवस्था का सबसे बड़ा और सबसे अहम अंग हैं, उनके सुधार पर चर्चा कम ही होती है. जितने विश्वास से एक व्यक्ति अपना स्वास्थ्य किसी डॉक्टर के हवाले करता है, उतने ही विश्वास से कोई अपने कानूनी अधिकार भी एक वकील के हवाले करता है. इसलिए एक वकील का अपने क्षेत्र में पारंगत होना भी उतना ही जरूरी है जितना एक डॉक्टर का. लेकिन वकालत में हर जगह के चुके हुए भी आसानी से दाखिल हो सकते हैं.
अक्सर हडतालों का कारण किसी वकील की अन्य व्यक्ति से हुई झड़प या मारपीट होती है. इसके चलते लोगों को तरह-तरह की असुविधाओं का सामना तो करना ही पड़ता है उन्हें न्याय मिलने का रास्ता और भी लंबा हो जाता है
साल 2011 में पंजाब के तेजिंदर सिंह तब चर्चा में आए थे जब जज बनने की प्रारंभिक परीक्षा में उन्होंने शून्य से भी कम (नेगेटिव) अंक हासिल किए और फिर भी उनका चयन हो गया. आरक्षण के चलते प्रारंभिक परीक्षा पास करने वाले तेजिंदर अंततः जज बनने से तो चूक गए थे लेकिन एक वकील तो वे थे ही. अब कानून की शून्य जानकारी वाले तेजिंदर लोगों को कैसी कानूनी सलाह देते होंगे इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. जस्टिस एन किरुबकरण का यह फैसला न्याय व्यवस्था के इसी पक्ष को सुधारने की बात करता है.
जिला न्यायालयों में आए दिन होने वाली हड़ताल न्याय व्यवस्था की एक बड़ी समस्या है. अक्सर ऐसी हडतालों का कारण किसी वकील की किसी अन्य व्यक्ति से हुई झड़प या मारपीट होती है. इसके चलते तमाम लोगों को तरह-तरह की असुविधाओं का सामना तो करना ही पड़ता है उन्हें न्याय मिलने का पहले से ही लंबा रास्ता और भी लंबा हो जाता है. क्योोंकि जिन मामलों की सुनवाई का नंबर कई महीनों बाद हड़ताल के दौरान आया था, वे कई और महीने आगे बढ़ जाते हैं. हड़ताल कराने वाले क्रियाकलापों में ज्यादातर वकीलों की वही खेप शामिल होती है जिस पर रोक लगाने की बात जस्टिस एन किरुबकरण ने अपने फैसले में की है.
हड़ताल के अलावा किसी वकील की मृत्यु होने पर भी जिला न्यायालयों में एक दिन का अवकाश घोषित कर दिया जाता है. कई बार ऐसे लोगों की मृत्यु पर भी न्यायालय बंद कर दिया जाता है जिनका नाम बतौर वकील कभी बार एसोसिएशन में दर्ज तो हुआ था लेकिन जिन्होंने कभी वकालत नहीं की. यानी कि वे वकील, जो केवल नाम के लिए वकील बने थे.
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के अनुसार भारतीय न्यायालयों में इतने मामले लंबित हैं कि अब यदि एक भी नया मामला दाखिल न किया जाए, तो भी पुरानों को निपटाने में 360 साल का समय लगेगा. ऐसी स्थिति में न्यायालय का एक भी अतिरिक्त दिन बंद रहना पूरी न्याय व्यवस्था को प्रभावित करता है. जस्टिस किरुबकरण के फैसले में दिए गए 14 निर्देश ऐसी ही कई समस्याओं से न्याय व्यवस्था को मुक्त करने की बात करते हैं.

Wednesday, October 21, 2015

उपवास (वैज्ञानिक परीक्षण)

दोस्तों आज दिनांक 21 अक्तूबर 2015 को  नवरात्रि का अंतिम दिन है. मैने भी यह सोँचकर उपवास रख लिया था क़ि जितने भी 2-4 दिन तक हो पाएगा, करूँगा अन्यथा ख़त्म कर दूँगा. लेकिन माँ दुर्गा ने अंदर से ऐसी शक्ति दी क़ि 13 अक्तूबर से शुरू हुआ उपवास अंतिम चरण तक आ गया. 5 दिन तक तो कुछ भी नहीं लगा, लेकिन उसके बाद एनर्जी में बेहद कमी आ गई, हालाँकि तबतक भूख लगनी कम हो गई थी. पूरा दिन ओफिस में आकर काम करता हूँ क्योंकि घर पर रहकर बर्दास्त करना बहुत मुस्किल होता है. दिन में काम करके थोडी सी थकान होती है तो रात को नींद भी आ जाती है, अन्यथा करवट बदलते बदलते ही रात काट देनी पड़ती है. आज रात को तो बहुत समस्या हुई लेकिन जैसे तैसे नींद आई और सुबह हुई. क्योंकि आज अंतिम दिन था इसलिए डॉक्टर के पास जाकर चेकअप करवाया. बीपी और शुगर तो नॉर्मल से बहुत कम है. होमोग्लोबिन तो नहीं चेक करवाया लेकिन देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है. जो भी देखता है यही बोलता है क़ि 1-2 महीने से बीमार हो क्या? सच भी है अभी नवरात्रि के 10-12 दिन पहले गणपति फेस्टिवल में टायफायेट और मलेरिया से बाहर आया था तब भी ऐसा ही हो गया था. 
लेकिन इसबार जो भी हुआ ऐसे ही एक ज़िद में हुआ. घर पर किसी को नहीं बताया था जब पता चला तो सब बड़ा ही गुस्सा हुए. खैर माँ के आशीर्वाद से जो भी हुआ अच्छा ही हुआ. ज़्यादातर लोग कुछ ना कुछ मनोकामना लेकर व्रत करते हैं लेकिन मेरी ऐसी कोई भी माँग नहीं थी. केवा कहने के लिए नहीं दिल से कुछ भी नहीं माँगा था, बस यही सोचा था क़ि देश में शांति रहे मेरे अपने दोस्त, परिवार के लोग खुश रहे और रही बात मेरी तो बिना माँगे ही उपवास किया यह सोँचकर क़ि माँ दुर्गा अपने हिसाब से मेरी ज़रूरतें पूरी कर देंगी. 
वैसे उपवास को लेकर मेरा एक अलग नज़रिया है. भक्ति के हिसाब से कभी उपवास करना ही नहीं चाहिए. उपवास का एक सीधा सा अर्थ होता है जो क़ुरान में है क़ि हमें भूख का अहसास करना है, जबतक हम भूख का अहसास नहीं करेगें, तबतक खाने की और भूखे इंसान ई ज़रूरत कैसे समझ पाएँगे. भूख क्या है पता ही नहीं चलेगा? यही मतलब जैन धर्म के पर्यूषण पर्व के दौरान चलने वाले उपवास का भी होता है. मैने इतने दिन अपनी जेब में पर्स तक नहीं रखी एक भी पैसा लेकर नहीं आया क़ि ऐसा ना हो क़ि कहीं पैसे हों और कुछ खाने का मन हो जाए. खुद की क्षमता देखनी चाही थी क़ि मेरे अंदर कितनी क्षमता है. मैं कितना बर्दास्त कर सकता हूँ. मैं खुद को एक बड़े संघर्शकर्ता के रूप में देखता हूँ, और आगे चलकर अगर कभी ऐसी ज़रूरत पड़ी तो पीछे नहीं हटूँगा. मैं बिना किसी संसाधन के रह सकता हूँ, यह मैने जाना. मुझे देखना था क़ि मैं खुद को ग़रीबी या अकाल में भी रख सकता हूँ. मैने यह सीखा कि ज़िद या जुनून कैसा होता है? यह मेरी एक ज़िद ही थी मेरे उसूलों, मेरे संघर्ष, मेरे वादे, मेरे आगे बढ़ने की ज़िद, जिससे मैं समझौता नहीं कर सकता हूँ. 

Monday, October 19, 2015

आख़िर लेखक क्यों चिंतित हैं?

मैं आपको आज जर्मनी ले चलता हूँ। सबने ही हिटलर का नाम तो सुना ही होगा। जब तानाशाही की एक हद पार हो गई तो वहाँ की सिविल सोसाइटी ने आवाज़ उठाई, ख़ासकर लेखकों ने। जबकि अधिकतर पत्रकार और मीडिया तो हिटलर के साथ ही थे। लेकिन जब लेखकों ने आवाज़ उठाई तो एक क्रांति ने जन्म लिया। क्योंकि लेखक समाज का आईना होते हैं, हो सकता है क़ि ज़्यादातर लेखक सेकुलर होने के कारण समाजवादी पार्टी, कांग्रेस या लेफ्ट से कुछ जुड़ाव या नज़दीकियाँ रखते हों, लेकिन वो नज़दीकियाँ राजनैतिक नहीं कही जा सकती हैं, वो उनकी पसंद की राजनीतिक विचारधारा या उस विचारधारा के नेता के कारण हो सकता है। आज जो देश में हो रहा है, वो भी नाजीवादी सोंच और माहौलके विरोध में उठाया हुआ एक छोटा सा कदम हो सकता है। और यह कदम आगे चलकर इस घमंडी सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर देगा।
कर्नाटक में छह कन्नड़ साहित्यकारों ने तर्कवादी लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या के मामले में जांच की धीमी गति के खिलाफ अपने पुरस्कार कन्नड़ साहित्य परिषद को पिछले हफ्ते लौटा दिए। फिर अंग्रेजी की मशहूर लेखिका नयनतारा सहगल और हिंदी कवि अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लौटाने की घोषणा की। कलबुर्गी हत्या के विरोध में हिंदी साहित्य के एक और जाने-माने नाम उदय प्रकाश ने भी पिछले महीने ऐसा ही कदम उठाया था। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की भांजी सहगल ने हिंदू धर्म को खतरनाक रूप से विकृत करने तथा भारत को नष्ट करने के कथित प्रयासों का विरोध करने के लिए, तो वाजपेयी ने असहमति के अधिकार की रक्षा के लिए संघर्षरत लोगों से एकजुटता जताने के लिए यह कदम उठाया। ये सभी साहित्यकार महसूस करते हैं कि जिन उसूलों ने आधुनिक भारतीय राष्ट्र को स्वरूप दिया और जिनकी अभिव्यक्ति हमारे संविधान में हुई, वे आज खतरे में हैं। संभव है कि ऐसे अहसास के पीछे कारण इन लेखक-कवियों के अपने वैचारिक रुझान हों। इसके बावजूद वे व्यथित महसूस कर रहे हैं, तो यह समय उनसे संवाद स्थापित करने का है। साहित्यकार किसी समाज की उच्चतर चेतना के प्रतिनिधि होते हैं। उनसे अपेक्षा रहती है कि वे सामाजिक मूल्यों के पहरेदार की भूमिका निभाएं। अतः उनकी आलोचनाओं से सत्ता-तंत्र को खफा नहीं होना चाहिए। न ही उनकी बातों को नजरअंदाज करना चाहिए। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की फुुफेरी बहन होने के बावजूद नयनतारा सहगल ने 1975 में लगी इमरजेंसी की आलोचना की थी। तब अनेक दूसरे साहित्यकर्मियों ने भी जोखिम उठाते हुए तत्कालीन इंदिरा सरकार का विरोध किया था। आपातकाल विरोधी माहौल बनाने में उन सबका खास योगदान था। आज देश में इमरजेंसी नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं बदस्तूर जारी हैं। बोलने, शांतिपूर्ण ढंग से विरोध जताने और न्यायपालिका की पनाह लेने के तमाम अवसर उपलब्ध हैं। इसके बावजूद कुछ लेखक कुछ घटनाओं को अनिष्टकारी संकेत मान रहे हैं, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार कहा है कि हमारा एकमात्र राष्ट्रीय ग्रंथ हमारा संविधान है। ऐसे में इस राष्ट्र के बुनियादी स्वरूप को लेकर वर्तमान सरकार और विचारकों के एक तबके में ऐसे मतभेद नहीं हो सकते, जिन्हें पाटना संभव नहीं हो। अतः संवाद की पहल की जानी चाहिए, ताकि वर्तमान कड़वाहट को यथाशीघ्र दूर किया जा सके। अब तक देश में 40 से अधिक लेखकों और साहित्यकारों ने अपने अपने पुरस्कार लौटा दिए हैं। क्या सबके सब राजनैतिक हो सकते हैं। कल मुनव्वर राणा ने लाइव टीवी शो के दौरान अपना पुरस्कार लौटा दिया। 
 मैं खुद एक बड़ा साहित्यकार या लेखक तो नहीं हूँ, जिसने कोई एवार्ड जीता हो लेकिन एक पुराना साहित्यप्रेमी तो रहा ही हूँ। लेकर नामवर, बिहारी, तुलसी और मुंशी प्रेमचंद से मिर्ज़ा ग़ालिब तक को पढ़ा है। आधुनिक लेखकों को किताबों, अख़बारों और पत्रिकाओं में पढ़ता रहा हूँ। पिछले एक- डेड साल से बड़ी ही सक्रियता के साथ ब्लॉगर भी रहा हूँ। हमेशा ही ज़मीन से जुड़ी हुई चीज़ों पर लिखता रहा हूँ। वैसे तो राजनीति पर ही लिखने का शौक है लेकिन साथ ही साथ महिला शशक्तिकरण, किसानों के मुद्दे, ग़रीबी, पिछड़ापन और आरक्षण इसके बाद ख़ासकर सेकूलरिज़्म और बहुसंख्यकवाद के खिलाफ लिखता रहा हूँ। और हमेशा ही वही लिखा है जो देश या समाज में महसूस कर रहा हूँ। पिछले एक साल और उसमें भी ख़ासकर 3-4 महीने से मैने काफ़ी हद तक ब्लॉग लिखने बंद भी कर दिए हैं। उसका सीधा सा कारण है देश में बनाया जा रहा असुरक्षित माहौल।  माहौल क्या बनाया जा रहा है पहले पंसारे और कालबर्गी की हत्या, फिर ना जाने कितने सेकुलर विचारकों पर हमले, बैन की राजनीति, गोडसे के जन्मदिन को महानता के दिन में बताना, दादरी, अखलाख़ और ना जाने क्या क्या गिनाया जाए आपको?

Saturday, October 17, 2015

राजनीति बदलने को मजबूर हुए नेता

बिहार विधान सभा के चुनाव इसबार सबसे नाटकीय रहे हैं। सबसे पहले बड़ी बड़ी रैलियों के साथ शुरुआत फिर विकास के नाम पर दोनो तरस से बड़े बड़े भाषण इसके बाद मुद्दे से हटकर किस तरह से बीफ, शैतान, दानव और ब्रम्‍हपिशाच जैसे मुद्दों पर राजनीति निकल गई। यही कारण है क़ि यहाँ के हर एक ओपीनीयन पोल में तस्वीर बदलती आई है। कुछ ठप्पा लगे  हुए चैनलों को छोड़ दिया जाए तो सबने काँटे की ही टक्कर बताई है। यह बात सही भी है कि इस बार के चुनाव में बड़े बड़े राजनैतिक पंडित मुँह की खाने वाले हैं। सबकी अपनी अपनी सोंच और गणित हो सकती है लेकिन बात यह भी है क़ि राजनीति कभी किसी एक स्थिति पर नहीं टिकती है। ख़ासकर बिहार जैसे प्रदेश में. यहाँ साक्षरता की दर भले ही कम हो, पढ़े लिखे लोग भले ही कम हों, लेकिन राजनैतिक रूप से बहुत समझदार लोग हैं।यही कारण है क़ि जब पूरा देश सांप्रदायिकता में जलने लगा है तब भी बिहार में शांति रही है। 

अब मैं आता हूँ यहाँ की राजनीति पर। देश के दूसरे सर्वाधिक आबादी वाले राज्य में जैसे-जैसे राजनीतिक संग्राम अपने नतीजे के ओर बढ़ रहा है वैसे-वैसे ही 38 वर्ष पुराना जेपी आंदोलन जिसे आमतौर पर बिहार आंदोलन के नाम से जाना जाता है, फिर से सुर्खियों में आ रहा है. जयप्रकाश नारायण (जेपी) एक क्रांतिकारी समाजवादी नेता थे, जिन्होंने 1977 में कांग्रेस के खिलाफ एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया था. 1977 में आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में पहली बार कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी और इसका श्रेय जेपी को ही जाता है.
1977 के चुनाव के बाद जनता पार्टी (कांग्रेस विरोधी पार्टी) ने दिल्ली की बागडोर संभाली, लेकिन दो जनता पार्टी केवल दो साल ही सत्ता पर टिक पाई. 1977 में कुल 324 सीटों में से जनता पार्टी ने 214 सीटों पर जीत हासिल किया था.
1980 के दशक तक जनता पार्टी, बिहार में भी कमज़ोर पड़ती नज़र आई. इस समय तक बिहार में कई दूसरे गुट और दल उभर कर सामने आए. मौजूदा तारीख में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल (यूनाइटेड) बिहार के दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियां हैं. यह दोनों पार्टियां जनता गठबंधन से अलग हुई गुटों द्वारा बनाई गई थीं एवं 1990 में बिहार की महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों के रुप में उभरी. इस साल तक दोनों पार्टियां को जाति वोट बैंक एवं एक-दूसरे के विपक्षी के रुप में जाना जाता था. इस वर्ष बिहार में हो रहे विधानसभा चुनाव में दोनों ही पार्टियां कांग्रेस के साथ सहयोगी हैं. इसे विडंबना ही कहा जा सकता है क्योंकि 1970 के दशक में कांग्रेस के 'शासक' शासन के विरोध के रुप में ही जनता पार्टी उभरा था.

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में कुछ बड़े गठबंधन देखने को मिले हैं- जद (यू), राजद और कांग्रेस के एक महागठबंधन. तीन पार्टियों का महागठबंधन बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) और हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (सेक्युलर) सहित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के विरुद्ध चुनाव में खड़े हैं. अन्य समूह में हैं समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा जिसमें समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और जन अधिकार पार्टी (JAP) शामिल हैं, एवं लेफ्ट अलायंस जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भाकपा (माले), भारत की सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर (एसयूसीआई) (कम्युनिस्ट), ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (एफबी) और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) शामिल हैं.
लोकसभा- सदस्य के मामले में बिहार चौथे स्थान पर है. 80 सदस्यों के साथ उत्तर प्रदेश पहले, 48 की संख्या के साथ महाराष्ट्र दूसरे एवं 43 सदस्यों के साथ पश्चिम बंगाल तीसरे स्थान पर है. लोकसभा सदस्यों की संख्या के कारण भी बिहार को राष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण समझा जाता है.

जनता पार्टी से टूट कर बनी हुई दूसरी पार्टियां, नए दल और नए गठबंधन बना रही हैं. राष्ट्रीय एवं राज्य चुनावों में प्रदर्शन के आधार पर उनकी स्थिति राष्ट्रीय या राज्य पक्षों के बीच बदलती रहती है. जद (यू) और राजद का अधिक तीव्रता से बिहार में सीट केंद्रित करने का एक मुख्य कारण वर्ष 2000 में बिहार और झारखंड का अलग होना है. 
अगर बात अब BJP की जाए तो बिहार की राजनीति जिस तरह करवट ले रही है ऐसे में सुशील मोदी के लिए मुख्यमंत्री बनना मुश्किल ही है। सुशील मोदी को शाहनवाज हुसैन और नंदकिशोर यादव नेतृत्व के मामले में कड़ी टक्कर दे रहे हैं. शाहनवाज हुसैन ने भी इस मामले पर दो टूक कह दिया है कि भला किसे नेता बनना अच्छा नहीं लगता है? नंदकिशोर यादव बीजेपी में एकलौते यादव जाति के बड़े नेता हैं. उनकी छवि सुशील मोदी की तरह नीतीश के वफादर की नहीं है.. यादवों का बिहार की राजनीति में अच्छा-खासा प्रभाव है। नीतीश सरकार में नंदकिशोर यादव को बढ़िया काम करने वाले मंत्री का खिताब भी मिल चुका है। ऐसे में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी नंदकिशोर यादव को आजमा सकती है.. नंदकिशोर यादव बिहार बीजेपी को लीड करने के मामले में सुशील कुमार मोदी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं.. दरअसल, नंदकिशोर यादव बिहार में उस जाति से ताल्लुक रखते हैं जो पिछड़ी जातियों में सबसे दबंग और सबसे ज्यादा मतदाता संख्या वाली है.. बिहार में यादवों का 21 फीसदी वोट है।

Friday, October 2, 2015

इंसान से बड़ी जानवर की जान

बीफ खाने की आशंका पर एक बुजुर्ग की हत्या कर दी जाती है और हम अपने आपको लोकतांत्र कहते हैं, शर्मनाक है! यूपी के दादरी में गोमांस खाने की आशंका के चलते एक बुजुर्ग की पीट पीट कर हत्या कर दी गई जब की उसका बेटा जख्मी है. मृतक की बेटी का कहना है कि फ्रीज से मिला मांस अगर बीफ नहीं निकला तो क्या उसके कतल कर दिए गए पिता लोटाए जाएंगे. गंगा जमुनी तहजीब की कसमें खाने वाले मुलक में मजहबी लकीर खींच कर लोगों को मोत के घाट उतारा जा रहा है.
मेक इन इंडिया हो या डिजिटल इंडिया इस विकास का फायदा तब है जब हम पहले इंसानी जान सिखे और मिल कर रहे...फेसबुक पर जो गाय की फोटो डालकर देश में गाय की घटती आबादी को लेकर ढेर सारा घडियाली आंसू बहाते हैं और मुसलमानो को इसके लिए दोषी ठहराते हैं और जरा सी अफवाह पर कानून को अपने हाथ में लेकर एक मुसलमान को मौत के घाट उतार देते हैं. ऐसी पोस्ट और अफवाह सुनकर एक इंसान को मौत देने वालों से मैं पूछना चाहता हूँ की जब सड़क पर आवारा, छूटे हुए गाय या बैल दिख जाते हैं तो वो क्या करते है, उन्हे अपने घर ले जाकर पालते है...दंगाइयों के लिए गाय आस्था की खाल में छुपाया हुआ एक घातक हथियार है. रांची से लेकर दिल्ली तक यह घातक हथियार लेकर लोग सड़कों पर उतर रहे हैं. वे किसी की भी हत्या कर सकते हैं. गाय एक अदृश्य हथियार है जो बंदूक, कटार, कट्टे, चाकू, चापड़ में छुपा है. गाय के बहाने नरपिशाचों की टोली किसी का भी कत्ल कर सकती है. कश्मीर में गोमांस पार्टी का आयोजन करने की घोषणा करने वाले भक्त को मारने कोई नहीं पहुंचा. क्योंकि वह अपने खेमे का था. जैन मंदिरों के सामने बूचड़खाना खोलकर मुर्गा हलाल करने वालों को किसी ने कुछ नहीं कहा. गाय सिर्फ उनको निपटाने का एक घिनौना हथियार है जिन्हें हम नापसंद करते हैं. भक्तों को आदमी का मांस खाने वालों से कोई दिक्कत नहीं है. आस्थाएं इतनी क्रूर हैं कि वहशियों के लिए अपने भीतर के वहशीपन को हवा दे रही हैं. कुछ लोग गायें पालते हैं, उन्हें प्यार करते हैं, उनका दूध खाते हैं, कुछ लोग गाय की आड़ में धर्म के भीतर भरी घृणा पालते हैं. मेरे घर में भी गायें थीं. मेरे गांव में हिंदू मुसलमान सबके घर में गायें थीं. वहां गाय या बकरी कोई मसला नहीं था. जो गायें नहीं पालते, गाय उनके लिए अस्मिता का सवाल है जिसके लिए पूरे हिंदुस्तान को आग की लपटों में झोंक सकते हैं.
समाजवादी पार्टी सरकार की तारीफ करते करते आज सब्र जवाब दे रहा है. माना की कोई भी सरकार खुद दंगे नहीं करवा सकती कभी, लेकिन इस तरह के हालात के बाद सख्त कार्रवाई तो करना ही चाहिए. अगर आपसे ये भी नहीं होता, तो आने वाले चुनाव मे इसका परिणाम आप खुद देखेंगे.

जो लोग गाय के लिए हो-हल्ला मचाते हैं उन्हें उन दसियों हज़ार गायों की पीड़ा से कोई मतलब नहीं है जो सही देखभाल न मिलने के कारण सड़कों पर दम तोड़ रही हैं. जब गायें बूढ़ी हो जाती हैं या किसी और वजह से दूध देने लायक नहीं रहती तो उन्हें घर से बाहर खदेड़ दिया जाता है, दर-दर भटकने के लिए. भारतीय सड़कों पर गायें दिखना आम बात है. मैंने सड़कों के किनारों गायों को गंदगी खाते हुए देखा है. मैंने इतनी बीमार गायें देखी हैं कि उनकी हड्डियां खाल से बाहर निकलती दिखाई देती हैं. क्या गायों को भुखमरी के लिए मजबूर करना गोहत्या के बराबर नहीं है. लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं है. मुझे ये कहते हुए दुख हो रहा है कि ऐसे प्रतिबंध आजकल राजनीतिक कारणों से ज़्यादा लगाए जाते हैं. उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में पहले से ही महाराष्ट्र पशु परिरक्षण अधिनियम 1976 था जिसके तहत गोहत्या प्रतिबंधित थी (इसमें बछिया और बछड़ा भी पहले से ही शामिल थे) लेकिन इसके तहत प्रमाण पत्र लेने के बाद बैलों और भैंसों के वध की अनुमति थी.
दुनियाभर के देशों में गाय का मांस खाया जाता है. लेकिन अब 2 मार्च 2015 के बाद से जो नया क़ानून प्रभावी है उसके तहत बीफ़ की बिक्री और निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है जिसकी वजह से बहुत से लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी है. ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं कि गोहत्या मानवहत्या के बराबर है. मैं इसे एक बेवकूफ़ी भरा तर्क मानता हूँ. कोई एक जानवर की तुलना एक इंसान से कैसे कर सकता है. ऐसे प्रतिबंधों के पीछे वोट बैंक की राजनीति करने वाले प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी तत्व हैं. हम समझ नहीं रहे हैं। हम समझा नहीं पा रहे हैं। देश के गांवों में चिंगारी फैल चुकी है। इतिहास की अधकचरी समझ लिये नौजवान मेरे साथ सेल्फी तो खींचा ले रहे हैं लेकिन मेरी इतनी सी बात मानने के लिए तैयार नहीं है कि वो हिंसक विचारों को छोड़ दें। हमारी राजनीति मौकापरस्तों और बुज़दिलों की जमात है।
वैसे एक खूनी खेल सोशल मीडिया में भी चलता है... भूमिकाएं ऐसी ही होती हैं... कोई छिप कर, कोई खुल कर हमले करता है आवाज़ दबाने के लिए। जानते हैं आप। कहने की भी ज़रूरत नहीं।

पूछिए न खुद से कौन हैं आप इनमें से?

अब भी इंसान पाते हैं खुद को?

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...