Sunday, November 10, 2013

बेकसूर मुस्लिम युवा

हमारे देश में आतंकवाद एक बड़ी समस्या है, जिसे हमारा समाज एक खास नजर से देखने का आदी हो गया है। लेकिन क्या हमारा सरकारी तंत्र भी इसे हमारी ही नजर से देखता है? क्या वो इस समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त तरीके रखता है, या फिर खानापूर्ति के लिए ही कुछ नवजवानों को पकडकर बंद कर देता है। आज मेरा प्रयास भी कुछ इसी तरफ प्रकाश डालने का है। क्योंकि मुझे इस विषय में जानकारी कम है, और कुछ पत्रिकाओं या पुराने अखबारों (नई दुनिया, तहलका, दि हिन्दू आदि) से पढकर विचार किया है, तो हो सकता है, क़ि कुछ बातें उनसे मिली हुई होंगी। नीचे दिए गए सभी उदाहरण तहलका से लिए गए हैं
कुछ दिन पहले ही हमारे देश के गृहमंत्री ने सभी राज्यों को चिट्ठी लिखी जिसमें कहा गया क़ि, " किसी भी राज्य में कोई भी अल्पसंख्यक (अल्पसंख्यक मतलब यहाँ पर मुस्लिम समुदाय से है) को बेगुनाह नहीं फंसाया जाए। पूरे देश में भाजपा और कई अन्य पार्टियों ने बहुत हो-हल्ला किया कि गृहमंत्री मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति क्यों कर रहे हैं। आखिर उनका यह निर्देश बेकार तो नहीं था, अभी 2009- सितंबर 2013 तक 57 मुस्लिम युवा बेकसूर निचली और उपरी अदालतों (District, Higher & Supreme Court) से छोड़े गए हैं, जो आतंकवाद के आरोप में कई सालों से सजा काट रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विषय पर पुलिस प्रसासन और सरकार को कई बार हिदायत दी है। हम मान रहे हैं कि भारत में ज्यादातर आतंकवादी एक विशेष समुदाय से पाए गए हैं, लेकिन उसी समुदाय से गलत लोगो को फंसाया भी गया है। क्यों कुछ गलत लोगों की वजह से सब को निशाना बनाया जाए। फिर इस प्रकार से तो ग्रहमंत्री ने कई बार नक्सल प्रभावित राज्यों को चिट्ठी लिखी है कि किसी भी बेकसूर आदिवासी को नहीं फंसाया जाए, और यह भी सब को पता है क़ि माओवादी या नक्सलवादी भी आदिवासी ही होते हैं। तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप सब बेकसूर आदिवासियों को फसा देंगे। अभी कुछ दिन पहले ही मैं उत्तर प्रदेश गया तो कई कट्टरपंथी लोग अखिलेश को अखिलेशुददीन कहने लगे हैं, वजह पूछने पर कहते हैं कि अखिलेश ने मुस्लिम आतंकवादियों को छोड़ने की बात क्यों कर दी? तो क्या उन्हें यह नहीं पता है कि 2009 में मायावती सरकार ने एक निमेश आयोग बनाया था, जिसमें गलत मुस्लिम युवाओं को फँसाए गए मामलों की जांच करने की बात कही गई थी। और यह जांच 2012 में पूरी भी हो गई थी। उसी रिपोर्ट के आधार पर अखिलेश यादव ने यह बात की थी। 
पहली उदाहरण मैं 2006 में हुए मालेगांव विस्फोट का पेश करना चाहता हूँ, जिसमें ब्लास्ट के तुरंत बाद करीब 20 मुस्लिम नवनवानों को महाराष्ट्र ए. टी. एस. (ATS) ने पकड लिया गया और बाद में राष्‍ट्रीय जांच आयोग (NIA) नें जांच में पाया कि इस ब्लास्ट में हिन्दुत्वादी संगठनों के लोग (कर्नल पुरोहित, साध्वी प्र ज्ञानी और बजरंग दल के कई कार्यकर्ता) आरोपी पाए गए। जांच के बाद कई निर्दोष मुस्लिमों को छोड़ा भी गया और कई अभी तक जेल में हैं
मई 2008 में जयपुर में बम ब्लास्ट हुआ था, एक विशेष जांच दल ने इसकी जांच शुरु की और 14 लोगो को गिरफ्तार कर लिया। दिसंबर 2012 में अदालत ने 14 लोगों को दोषमुक्त कर छोड़ दिया। अब सवाल यह उठता है कि असली गुनाहगार कौन है? और पुलिस उन्हें क्यों नहीं पकड पाई? क्या पुलिस ने अपनी गर्दन बचाने के लिए निर्दोष लोगों को पकड़ा? पुलिस के अनुसार ये सब प्रतिबंधित संगठन सिमी SIMI (Islamic Students Movement in India) के सदस्य थे। अगर वो इस संगठन के सदस्य थे भी तो उनका कौन सा गुनाह था, 2007 में मार्कण्डेय काटजू साहब ने जज रहते हुए एक फैसले में कहा था, "कि किसी भी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होना गुनाह नहीं है, उस पर तब तक कार्यवाही नहीं की जा सकती जब तक वह किसी गैरकानूनी गतिविधि में लिप्त नहीं पाया जाए"। सुप्रीम कोर्ट ने और भी कई बार ऐसी टिप्पणी की है, 2004 में कोर्ट ने संघ का उदाहरण देते हुए कहा था, कि क्या संघ के प्रतिबंध के समय उसके कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए थे?
अब आते हैं अपनी मूल बात पर इसी प्रकरण में 28 वर्षीय अनमुल्ला ने अपनी जवानी के 3 साल जेल में बीता दिए, हालांकि बाद में उसे न्याय मिला लेकिन जेल में रहने के दौरान उसकी सजा और प्रताडना का जिम्मेदार कौन होगा? आतंकवादी होने का धब्बा उसके उपर लगा है, वो समाज में कैसे रह रहा होगा, सोचा है किसी ने? उस समय राजस्थान में भाजपा की सरकार थी
। वो कहती है कि जांच के समय तो कांग्रेस की सरकार थी, और केन्द्र में भी कांग्रेस का शासन था, तो जिम्मेदारी उसी की है। कांग्रेस कहती है कि हमने भाजपा की गलती पर न्याय दिलाया है। आखिर न्याय में इतनी देर क्यों हुई? इतने सालों की सजा की जिम्मेदारी कौन लेगा? इसके कई गवाह कहते हैं कि उन्हें पुलिस ने जबरजस्ती बयान दिलाया था। एक गवाह गिरिराज कहता है कि मैने 20-25 लोगो की बैठक में सिमी की आतंकी गतिविधि की बाते सुनी थी। पुलिस ने सबूत के रूप में 4 सी. डी. भी पेश की थी, जबकि पुलिस आयुक्त से जज ने पूछा कि इस सी. डी. में क्या है, तो उसका जवाब था, क़ि मैनें कभी सी. डी. चलकर नहीं देखी। इसी तरह कुछ उर्दू पत्रिकाएँ भी पेश की गईं जब कि जांच अधिकारी को उर्दू पढ़ना नहीं आता था। अदालत में चार्जसीट गलत पाई गई और सबूतों मे कुछ गलत नहीं पाया गया। सब गवाह पलट गए। और वो बरी हो गए
हमारे समाज में इतनी नफरत फैल चुकी है कि कोई वकील इनका केश लड़ने को भी तैयार नहीं होता है, इसी तरह की एक और घटना अहमदाबाद (गुजरात) की है
। वहां की एक स्थानीय मस्जिद में मौलाना हकीम ने 25 जुलाई 2008 (शुक्रवार) को नमाज़ पढ़ाई और ख़ुतबा (धर्मोपदेश) में पढ़ा कि" अगर तुम्हारा पड़ोसी भूखा है तो तुम अपना पेट नहीं भर सकते हो, वह किसी भी धर्म का हो, वह भी हमारी तरह इंसान है"। लगभग 24 घंटे बाद 53 लोगों की मौत का कारण बने अहमदाबाद धमाकों के कुछ मिनट बाद ही पुलिस ने हलीम को गिरफ्तार किया और जनता के बीच जमकर पीटा। उसकी दाढी तक उखड ली। उन्हें 8 दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया। गुजरात की मोदी सरकार के वकील ने मजिस्ट्रेट को बताया कि हलीम सिमी का सदस्य है, और पिछले कई सालों से फरार चल रहा है। यह 2002 के दंगों का बदला लेने के लिए गुजरात से मुस्लिम लड़कों को आतंकी ट्रेनिंग के लिए उत्तर प्रदेश के आजमगढ भेजता है. इनके निशाने पर मोदी और आडवाणी सहित कई बड़े नेता हैं
जबकि यह भी पता चला क़ि हलीम फरार नहीं था और कई वर्षों से अपने घर में ही रहता था
। उसके परिवार ने अदालत को गुजराती में लिखी हुई हलीम के नाम लिखी एक चिट्ठी दिखाई जो उसके घर से एक किलोमीटर दूर स्थित थाने से आई थी उसमें लिखा था, "मरकज अहले-हदीस (इस्लामी पंथ) ट्रस्ट का दफ्तर खुला है, जिसके आप सदस्य हैं। आपको निर्देश है कि सभी सदस्यों के दस्तावेज थाने में जमा करा दिए जाएँ। 28 जून 2008 को Unity & Peace Forum (जिसके सदस्य हिन्दू और मुस्लिम दोनो समुदाय के लोग हैं) नाम के एक संगठन ने बैठक के लिए लाउडस्पीकर प्रयोग की इजाजत के लिए पत्र लिखा था, जिसके मुख्य वक्ता हलीम होंगे। 27 वर्षीय एहसान-उल-हक तो अपना "निकाहनामा" भी दिखते हैं जिसपर मौलाना हलीम के हस्ताक्षर मौजूद हैं। तो अब आप ही सोचिए क़ि वो गायब कैसे चल रहे थे। 43 वर्षीय हलीम उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं और अहले-हदीस (पैगंबर मोहम्मद का इस्लामी पंथ, जिसे सुन्नी समुदाय विरोधी मानता है.) के प्रचारक हैं. पुलिस तो अहले-हदीस को भी लस्कर की साखा बता रही थी। जबकि इसकी एक गोष्ठी में दिल्ली में गृहमंत्री शिवराज सिंह पाटिल भी सामिल हुए थे।  हालांकि हलीम को 24 घंटे बाद ही मजिस्ट्रेट ने छोड़ने का आदेश भी दे दिया
अब यह बात किसी को गिरफ्तार कर छोड़ने की नहीं है आखिर क्यों हमारी पुलिस एक घंटे के भीतर ही मुस्लिम समुदाय के कुछ निर्दोष लोगों को पकडकर बंद कर देती है? क्यों सही अपराधी को पकड़ नहीं पाते है? क्या यह मानवाधिकार का हनन नहीं है? हमारा इलेक्ट्रानिक मीडिया तो इस पर बहुत संवेदनहीन हो गया है एक घंटे के भीतर ही एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने लगता है। 15.05.2013 को बंगलोर में भाजपा दफ्तर के बाहर ब्लास्ट हुआ तो सब टी. वी. चैनलों ने इंडियन मुजाहिद्दीन को लेकर एक डाक्यूमेंट्री दिखानी शुरुकर दी। बाद में जांच में पता चला कि धमाके के आरोपी का प्रयोग किया हुआ सिम कार्ड 2 महीने पहले तक  RSS के एक कार्यकर्ता के पास था, और उसके खोने की रिपोर्ट लिखाई गई थी। उसके आरोपियों मे एक अरोपी  तो कर्नाटक के हिन्दू वादी संगठन श्री राम संगठन का सदस्य था. अब क्या ये टी. वी. वाले मुस्लिम समुदाय से माफी मांगेगे? मैं कहता हूँ कि आप भटकल को पकड़ कर फांसी दे दो? किसी भी आतंकवादी को पकड़ो और उसकी न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर सजा दो, फिर उसे जो सजा मिले सब को मंजूर है. किसी भी समुदाय का हो हमें मंजूर होगा, लेकिन बेगुनाहों को पकडना आप कब बंद करेंगे?
हमारा समाज आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़कर देखना कब बंद करेगा? कब तक आप यह सवाल करते रहेंगे "हर एक मुस्लिम आतंकवादी नहीं होता है लेकिन हर एक आतांकवादी मुस्लिम क्यों होता है?" आपको नहीं पता क्या कि भारत में सबसे पहले आतंकवाद की शुरुआत खालिस्तान (पंजाब) में किसने की थी? क्या आपको नहीं पता कि इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की हत्या किस आतंकवाद से हुई थी? क्या आपने कभी लिट्टे संगठन का नाम सुना है? क्या आपको पता है कि माओवादी मुस्लिम नहीं होते हैं? क्या आपको पता है कि मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद ब्लास्ट किसने किए थे? सब बातों पर जानकारी और चर्चा करो बाद में सब मुस्लिमों पर अंगुली उठाओ, फिर भी यह याद रखना कि आपकी अपनी तीन अंगुलियाँ आपकी ओर उठी होंगी। और जिस दिन से आप यह काम बंद कर देंगे उसी दिन से कोई भी मुस्लिम युवा किसी विदेशी ताकत के प्रभाव या बहकावे में आना बंद कर देगा। 
इस बात पर देश के युवा शायर इमरान प्रतापगाढ़ी का एक शेर अर्ज़ किया है...
मेरे हिस्से में दुनिया का गम लिख दिया
 नाम पर मेरे सारे सितम लिख दिया। 
चाहने वालों पर इस कदर ज्यादती। 
इक पटाका भी फोड़ा तो बम लिख दिया। 
तुमको जितनी मुहब्बत है इस मुल्क से। 
उससे ज्यादा कहीं मैं वफादार हूँ। 
तुम कहते हो मैं गद्दार हूँ। ।

 

Monday, November 4, 2013

क्या सच में मोदी की लहर है?

पिछले 7-8 महीने से सोसल मीडिया और सिविल सोसाइटी में एक चर्चा बहुत जोरो पर है, "अगला प्रधानमंत्री कौन होगा? क्या मोदी प्रधानमंत्री बनेगे? " अब तो सोसल मीडिया पर इसके लिए एक वार(युद्ध) भी शुरु हो गया है। एक दिन दिन फ़ेसबुक पर मैंने एक प्रश्न डाला कि,"क्या आप मोदी को प्रधानमंत्री बनाना चाहते है"? तो 99% उत्तर "हाँ" में गए। गाँव गया था तो कुछ मित्रों से भी इसी विषय पर चर्चा होने लगी, मुझे छोड़ कर सब मोदी के प्रसंसक थे। मुम्बई यूनीवर्सिटी की लाइब्रेरी में पहुच गया तो 5-6 लोग टेबल पर बैठे थे, सब में चर्चा हो रही थी। सब मोदी के पक्ष में थे. इस तरह से मुझे लगा की उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक मोदी की लहर चल रही है। जैसा कि आपको बताया कि जिस-जिससे मैं मिला उनमें 90% वोट मोदी के थेजब किसी से टी. वी के सर्वे बताओ तो कि 160-180 सीटें मिल रही हैं तो समर्थक कहते हैं कि या तो सर्वे गलत होगा या फिर सब मीडिया कांग्रेस से बिका हुआ है।
मुझे थोड़ा सा डर लगा। फिर आराम से रात को बहुत सोंचा तब याद आया कि यार मोदी (भाजपा) को पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में तो शून्य ही मिलता है. मैने यह नहीं बताया कि मुझे कोई मुस्लिम नहीं मिला, कोई दलित नहीं मिला, कोई यादव नहीं मिला, कोई ईसाई नहीं मिला, कोई संघ का शिकार अल्पसंख्यक नहीं मिला, कोई आदिवासी नहीं मिला, कोई गरीब नहीं था, कोई गरीब नहीं मिला, कोई मजदूर नहीं मिला, कोई किसान नहीं मिला और कोई मेरे जैसा प्रवासी नहीं थावो सब पढ़े-लिखे, उच्च जाति के हिन्दू थेउनको मोदी के रूप में मसीहा दिखाई देता हैउन्हे सोसल मीडिया पर अर्मत्य सेन के खिलाफ होने वाली तानाशाही नहीं दिखती हैउन्हें मोदी का शाहज़ादा और दिल्ली की सल्तनत का कहने का अर्थ(सहजादा मतलब मोदी गाँधी परिवार को मुस्लिम मानते हैं, और दिल्ली की सल्तनत पर अब तक मुग़लों का कब्जा समझ रहे हैं) नहीं समझ में आता हैउन्हें चुन-चुनकर साफ करना है, कहने में लोकतंत्र को खतरा नहीं दिखता। 
दरअसल आज मोदी के साथ में कौन लोग हैं? तो हम उन्हे कई वर्गों में विभाजित कर सकते हैं
1- इस श्रेणी में वो लोग आते हैं जो पूरी तरह से सम्प्रदायिक हैं. इनमें से ज्यादातर भाजपा, संघ या अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ता भी हैंइन्हे लगता है कि ईसाई और मुस्लिमों के पूर्वजों ने देश पर शासन किया है, तो अब इनसे बदला लेना हैये लोग हमेशा से मुस्लिम विरोधी रहे हैं और इन्हें फूटी आंख भी देखना पसंद नहीं करते हैंअब तो इन लोगों को मोदी के रूप में अपना लीडर(नरसंहारक) मिल गया हैयह वर्ग भाजपा का परंपरिक वोट बैंक है। 
2- दूसरे तबके के लोग पूरी तरह से साम्प्रदायिक नहीं हैं लेकिन ये सेकुलर भी नहीं हैंइन्हें यह लगता है कि मुस्लिम देश में ना रहें, लेकिन जो लोग शान्तिप्रिय या बड़े कलाकार (आमिर, सलमान या अब्दुल कलाम) देश में रह सकते हैंकभी यह वर्ग कांग्रेस का वोट बैंक रह चुका है, लेकिन इसे अब इंदिरा गाँधी या राजीव गाँधी के जमाने वाली कांग्रेस नहीं नजर आती हैइसे मंहगाई, भ्रष्टाचार के साथ कांग्रेस का मुस्लिम प्रेम(सेकुलरिज्म) भी बुरा लगता हैअब इन्हें सत्ता परिवर्तन की जरूरत महसूस हो रही है रही है, जो मोदी कर सकते हैं। 
3- तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण तबका है, युवा वर्ग. जिसे राजनीति का ज्ञान उपर्युक्त लोगों से कम हैइस वर्ग ने इतिहास नहीं देखा है, और पढने के लिए उसे अपनी साइंस और इंजीनियरिंग की किताबों से मौका नहीं मिलता हैइसने ना 1977-79 तक की जनता पार्टी की सरकार देखी है और ना ही 1998-2004 तब एन. डी. . की सरकार देखी हैउसने महंगाई देखी है, भ्रष्टाचार देखा है, बेरोजगारी और चीन का डर देखा हैइसने पाकिस्तान का आतंकवाद देखा हैइसने एक कमजोर प्रधानमंत्री देखा हैइस वर्ग को सभी समस्याओं का रामबाण नरेन्द्र मोदी में नजर आता हैइसे सेकुलरिज्म कोई मुद्दा ही नहीं लगता है। इन्हें मोदी के कुर्ते पर 2002 के दाग नहीं दिखते हैं
इनमें से दूसरे और तीसरे तबके के लोग कट्टरपंथी तो नहीं हैं लेकिन मोदी को सांप्रदायिक (Communal) इसलिए नहीं मानते हैं क्योंकि किसी कोर्ट ने आज तक उन्हें सजा नहीं दीइन्हें भारत की आदलत के बाहर सबूत मिटाने और जांच की हकीकत नहीं मालूम हैखासकर युवा वर्ग ने तो कभी इन चीजों का सामना हीं नहीं किया हैउसने दंगों में अपनों को नहीं खोया है, यह युवा वर्ग इतना कोरा है, कि फ़ेसबुक पर मोदी सेना का हर पोस्ट द्रवित कर देता हैमुजफ़्फ़र नगर दंगों में सोसल मीडिया का दुरुपयोग खासकर इसी वर्ग के साथ हुआ थाकिसी ने लिख दिया दंगे के दौरान पुलिस को 15 हिन्दू शव गंगा में मिले तो ये युवा गूगल पर यह भी नहीं देखेगा की गंगा मुजफ़्फ़र नगर में हैं या नही तुरंत शेयर, लाइक, कमेन्ट कर देगा। 
इन्हें लगता है, कि अगर मोदी हिन्दू हित में सोंच रहे हैं तो अच्छा ही होगा, उन्हें लगता है दंगे होंगे तो मैं सुरक्षित रहूँगा। सेकुलर होना एक मुस्किल कार्य है, लोगो के बीच टेक्निकल रूप से तो सेकुलर हो सकते हो, लेकिन उनके हिन्दू पक्ष वाली बात का जवाब देना कठिन होता है।
अब बात करते हैं राजनैतिक हालात की तो इसे हम सबसे बड़े राजनैतिक खेत उत्तर प्रदेश में दो वर्ग मान सकते हैं, जिनपर मुलायम सिंह और मायावती की पैठ है। आदिवासी छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश के अलावा वामपंथियों का अधिकार है। पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में मोदी को मैं दस से अधिक सीटें नहीं दूंगा। जहां इनकी लहर है, व़हाँ उत्तर और पश्चिम में भी भाजपा 170-200 सीटों पर ही मजबूती से लड़ने लायक है। क्योंकि व़हाँ भी हिन्दुओं का एक सेकुलर और बुद्धिजीवी तबका है, जो छोटे-छोटे अल्पसंख्यक समुदायों से मिलकर बना है। भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी को उम्मीदवार बनाकर एक बात तो तय कर दी है, कि अब वो ठंडे बस्ते में रखे अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को और नहीं रोक सकती है। अगर यह बात है तो भाजपा को यह याद रखना होगा कि आज की लहर से ज्यादा तो 90 के दशक में लौह पुरुष(आडवाणी) की लहर थी।
आडवाणी वो हीरो थे, जो भाजपा को 02 से 180+ सीटों तक लेकर गए थे, फिर भी इस देश की जनता ने दिखा दिया कि गरीब को रोटी, कपड़ा और मकान पहले चाहिए, बाद में मंदिर-मस्जिद।
हर जगह अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और स्थानीय परिस्थितियाँ होती हैं। मेरे गाँव के आस-पास ही 2-3 लोकसभा सीटों पर यादव (मुलायम), दलित(मायावती) और अन्य पिछड़ा वर्ग गैर-यादव दोनो में जाते हैं, भाजपा के लिए केवल ब्राम्हण वोट ही बचता है, उसमें मे भी बसपा ने हर सामान्य सीट से ब्राम्हण प्रत्याशी उतार दिया है. मोदी को 70% लोग जानते ही नहीं हैं, एक दिन नरेगा के मजदूर कार्य करने जा रहे थे, मैं अखबार पढ रहा था, तो एक ने पूछा क्या खबर है, तो मैंने बताया 19 को कानपुर में मोदी आ रहे हैं, क्योंकि मैं क्रिकेट का सौकीन हूँ इस लिएतो बोला यो कउन आए, का मैच ख्यालती रहाय?
जब 1998 में भाजपा को 180 के आस-पास सीटें मिली थी तो आडवाणी ने स्वयं अटल बिहारी बाजपेई जी का नाम आगे किया था। आज जब भाजपा अपने हिन्दुत्व कार्ड को जिस तरह से उत्तरप्रदेश और बिहार में शुरु कर चुकी है, उससे लग रहा है, कि उसने साईनिंग गुजरात का नारा कैग और रघुराम रजन कमेटी की रिपोर्ट के बाद भुला दिया है। जबकि उसके पास इस समय कोई अटल जैसे कद्दावर सर्वसम्मानित नेता भी मौजूद नहीं है. मोदी या भाजपा के लिए सबसे बड़ी तो चुनौती सेकुलर क्षेत्रीय दल हैं, जो मोदी को रोंकने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अभी दिल्ली में गैर-कांग्रेस एन्टी-भाजपा दलों की बैठक हुई, सबके बीच में सिर्फ यही चर्चा मुख्य रही। इन 17 दलों में से कई तो पहले भाजपा के साथ रह चुके हैं, लेकिन आप को याद नहीं तब अटल जी थे। आज मोदी रैलियों भीड़ भले ही कितनी इकट्ठा कर लें, लेकिन वो एक मंच से पूरे देश को संबोधित नहीं कर सकते हैं, जैसा उस गैर-सोसल मीडिया के जमाने में इंदिरा, जेपी या नेहरू करते थे। उनकी आवाज केवल नागपुर और दिल्ली के बीच रह जाती है। 
अतः यह प्रश्न ही बेईमानी है, कि मोदी 272+ का सपना पूरा कर रहे हैं, क्योंकि आप ट्विटर और फ़ेसबुक पर तो 100 एकाउन्ट्स चला सकते हैं, लेकिन वोट केवल एक ही डाल सकते हैं, फिर क्या पता सोसल मीडिया वालों मे कितनों का वोट है, कोई हार्वर्ड से तो कोई 18 साल से कम है। जैसा कि सब ने सुना होगा कि 31 अक्टूबर को उन्होंने सरदार पटेल की मूर्ति का उद्घाटन किया है, उसमें उनका भाषण गौर से सुनो तो पटेल की इज्जत कम वोट की राजनीति ज्यादा नजर आती है, एक बार तो वो जन्मदिन की जगह पुण्यतिथि भी बोल गए। उन्होने पटेल को गुजराती अस्मिता से जोड़ा है, अगर और कोई भगत सिंह या सुभाष चंद्र बोस भी गुजरात के होते और पटेल बाहर के तो बोस या भगत सिंह की मूर्ति बनवाते।
लेकिन वो भूल गए कि लौहपुरुष का अर्थ त्याग होता है, जो पटेल ने जवाहर और अडवानी ने अटल के लिए दिया। अब वो स्वयं को भी लौह पुरुष के रूप में पेश कर रहे हैं, तो हम क्या समझें कि 2014 में क्यौं होगा जो जवाहर या अटल की भूमिका अदा करेगा। फिर तो मोदी जी को आडवाणी पार्ट-टू मतलब पी. एम. इन वेटिंग बनने के लिए तैयार रहना होगा।


Sunday, November 3, 2013

हाँ मैं भी प्रवासी हूँ।

बचपन से ही मैं प्रवास को लेकर परेशान रहने लगा था। जब कुछ दिन के लिए कानपुर आ गया तो गाँव के मित्र ताना देने लगे कि अब तो साहब बड़े हो गए हैं, कानपुर के लोगो को कहते सुना कि अब शहर में देहाती {प्रवासी}छात्रों की वजह से भीड़ बढ रही है। फिर 2011 मई में मुम्बई आ गया तो असली सफर शुरु हुआ। पहले आकर 8 दिन तक गाँव के ही एक मित्र के यहाँ रुककर केवल बेरोजगारी से संघर्ष करता रहा। जब जॉब मिली तो एक सीनियर ने भईया कह दिया, तो खुशी हुई कि सब समझदार हैं छोटे का भी सम्मान करते हैं। कुछ दोस्तों ने बताया कि हम उत्तर प्रदेश और बिहार वालों को भईया ही कहा जाता है। तो भी लगा कि शायद जैसे मराठी, गुजराती, मारवाड़ी, मद्रासी, उसी तरह हम भी उत्तरप्रदेशी और बिहारी भईया शब्द से संबोधित किए जाते हैं। बाद में जब इस शब्द के इतिहास पर गया तो पता चला कि इस भईया शब्द के पीछे सस्ते श्रम का अपमान छुपा है। एक ऐसे शहर में जहां एक छोटा लड़का /लड़की अपने से बड़े भाई / बहन को "तू" कहते हैं, पत्नी अपने पति को "तू" कहती है। किसी का सम्मान नहीं है वहाँ  हम लोग जो अपने से छोटे को भी भईया कहते हैं, तो हमारी हर बात में भईया कहना इन लोगों को मजाक लगने लगा। तो हमे ये लोग भईया ही कहने लगे।
जब मैं ओफ़िस में रखा गया था तो सब ने समझा था कि यू. पी. का है, B.A. किया है, ये तो हमारा हेल्पर का काम अच्छा करेगा। मेरे सामने 5 सीनियर थे, आज 2 ने जॉब छोड़ दिया और 3 मेरे जूनियर हो गए, अब मैं C.A. सर का असिस्टेंट हो गया हूँ। मेरे C.A. सर ने मुझे बहुत सिखाया. आज एम. कॉम. (M.Com.) वाले मेरे जूनियर हो गए हैं।
जब इतिहास के पन्नो को पलट कर देखा तो पता चला कि हमसे ज्यादा हमारे पुरखे पूरे देश और अरब तक में भुगत चुके हैं। हम उत्तर प्रदेश और बिहार वालों को एक अभिशाप मिल चुका है। अभी हाल ही में मोदी जी ने झाँसी के भाषण में यह दिखा दिया था। उन्होने कहा कि हमने गुजरात में उत्तरप्रदेशी और बिहारी मजदूरों के लिए एक स्कीम सोची है, कि इन मजदूरों से 8 घंटे की बजाय 12 घंटे काम कराया जाए, जिससे उन्हे ज्यादा पैसा मिलेगा. उन्हें फसल के समय बारिस में 3 महीने की छुट्टी दी जाए, जब कि इस समय तो मंदी का दौर होता है, वो कहते हैं कि इन 3 महींनों की सेलरी हम देते हैं, हम सैकड़ों मजदूर दिखा सकते हैं, जिन्हे पैसा नहीं मिलता है.
अब मुद्दे की बात यह है, कि क्या अदानी पॉवर, रिलायंस, टाटा और विदेशी अनगिनत कम्पनियों में हम पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए क्या कर रहे हैं? क्या किसी कम्पनी से कहा कि उ. प्र. और बिहार के युवाओं को मैनेजर या इंजीनियर बनाओ? क्या हमारे अंदर ये आत्मविश्वास या टैलेंट नहीं है? क्या हमेशा ही हम यू.पी. बिहार वालों को मजदूर की नजर से ही देखते रहोगे? क्या कभी मुम्बई में अपने गठबन्धन वालों से ये कहा कि इन बिहारी या उत्तरप्रदेशी गरीब मजदूरों को मत सताओ? उनका मतलब था कि गुजरात में केवल मजदूरो के लिए ही जगह है, जिनका खून पिया जा सके और चूँ तक ना करें।
फिर से अपनी बात पर लौटता हूँ, एक तरफ उत्तर प्रदेश और बिहार के वो अभागे इलाके जो अपने लोक गीतों में हम जैसों के लिए तरसते रहे और एक तरफ हम "चिट्ठी आई है" जैसे गानों के साथ मुम्बई के बंद कमरों मे सिसकते रहे। छठ हो या दिवाली ऐसी हूक उठती है, लगता है क़ि बस दीवार पर सर दे मारें। कहाँ और कब तक रोएँ? 6 फुट के जवान शरीर पर आंसू टपकते देखकर अजीब लगता है। दोस्तों के बाहर जाने या सोने का इंतजार रहता है, कि कहीं अकेले में रो लूँ। गाँव में जिन्हे गाली देता था आज उन्हीं की याद आती है। किसी की छत से लाउड स्पीकर से बजता आल्हा और आधार का कैसेट या फिर वो गाना क्या तुमने किसी से प्यार किया? हां मैने भी किया। आज फिर से यूट्यूब पर वो सब सुनने का मन करता है। तालाब / गंगा किनारे क्रिकेट खेलना, खेतों में जानवर चराना, गाँव के तीन-तीन हनुमान जी के मेले और सार्वजनिक कार्यों में इतनी हिस्सेदारी से गाँव से इतना प्यार हो गया कि पहली लड़की के जैसे रुलाता है। क्या करें सब छूट गया।
इस पर मुझे मुनव्वर राणा का एक शेर याद आ रहा है... 
                               मुमकिन है क़ि अब हमें गाँव भी पहचान ना पाए।
                               बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए।।
                              ऐ रेत के जर्रे तेरा अहसान बहुत है।  
                              आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए।।
मुम्बई की गलियों में हर वक्त अपनों को खोजते रहता था। किसी पान की दुकान वाले से पूंछा तो बताया गोरखपुर का हूँ तो मैं बोला अरे वहीं तो मेरे दोस्त के मामा रहते हैं। ओफ़िस के वाचमैन से पूछा तो बताया इलाहाबाद। तो कहा वहां तो मेरे पापा खूब हाईकोर्ट तक पैदल गए हैं, कई दोस्त हैं वहाँ, अपना शहर है फिर जाति पूंछकर बात लम्बी कर देना। बाल काटने वाला लखनउ का था तो मेरा नंबर जल्दी लगा देता था। कितने सब्जी वालों से व्यवहार हो गया था। इसी तरह से एक अजीब सा रिस्ता जुड़ गया था। गाँव के 4-5 लड़के साथ में या आस-पास रहते हैं फिर भी यह अकेलापन? एक दिन जुहू चौपाटी पर से वापस आनें में देर हो गई तो कोई आटोरिक्सा नहीं मिल रहा था। बहुत देर हो गई एक रिक्‍सेवाला चाय पी रहा था तो मैनें भांपकर कहा, " अरे भईया सांताक्रुज चलिहौ का"? तो वो तुरंत तैयार हो गया। रास्ते में बोला कि भई जाने वाला तो नहीं था लेकिन अपने आदमी हो तो चल दिया। और भी बातें होती रहीं जैसे कहाँ के हो? क्या करते हो? आदि।
उसकी बातों से मुझे भी सुकून मिल रहा था, वो भी मेरी थोड़ी सी सफलता पर काफी खुश था। अंत में बोला अरे भाई सब भईया आप के जैसे हों तो कोई कुछ नहीं कर कर पाए। सांताक्रूज आने पर मीटर देखा तो 24 रुपए हुए थे, तो मैंने 10-10 के तीन नोट (30 रुपए) दिए तो उसने 10 का एक नोट वापस कर दिया तो बो मैने कहा नही यार सब काट लो तो वो बोला क्या यार अपने ही आदमी से क्या कमा लेंगे? उसकी ये बात सुनकर बहुत गर्व महसूस हुआ। जब वो राम-राम कहकर (जब कि वो आजमगढ का मुस्लिम था) जाने लगा तो ऐसा लगा जैसे कोई अपना स्टेशन से छूट रहा हो। अब कुछ महीनों या एक साल से यह रिस्ते बनाने का सिलसिला कुछ कम हो गया है, फिर मुझे लगा कि शायद मैं एक सफेदपोस प्रवासी हो रहा हूँ। अब तो मेरे जैसे और भी बहुत इस शहर में मिल जाएंगे।  जो मजदूर हैं। उन्हीं को प्रवासी बताकर धकियाया जाता है। यहाँ पर कई तरह के प्रवासी हैं। सबसे उपर गुजराती, फिर पैसे वाले मद्रासी, फिर मारवाड़ी, उसके बाद हम भईया लोगों के दो (मजदूर और कुछ पढ़े-लिखे) वर्ग. हम उ.प्र. और बिहार के प्रवासियों को तो तीसरे दर्जे का मान लिया जाता है। एलीट प्रवासी तो ठीक हैं, लेकिन दिक्कत हमी से है, राज ठाकरे कहते हैं, कि उत्तरभारतीयों की वजह से मुम्बई में सभी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। शीला दीक्षित कहती हैं की दिल्ली प्रवासियों का बोझ नहीं सह पाएगी। मैने प्रवासी होने की कोई किताब नहीं पढी है, बस अपना दर्द लिख रहा हूँ। असल में प्रवासी होना एक आर्थिक प्रक्रिया है। जरूरत है. अगर ऐसा नहीं है कोई गुजराती या सरदार प्रवासियों से कुछ कहकर देखे फिर पता चल जाएगा, दूसरे दिन मुम्बई गरीब हो जाएगी। जरूरत हमारी भी है, वर्ना मुम्बई के अंदर और बाहर इतना रीयल स्टेट  में सस्ता श्रम कैसे मिलता? फिर क्यों मराठी हमारे इंतजार में होटल, ढाबा, समोसा /वड़ा पाव और फोन (P.C.O.) लेकर खड़े रहते हैं।क्या हमारे प्रवासियों ने बोझ डाला है, और तथाकथित प्रवासी रुई के बने हुए हैं। हमारे कारण ही यहाँ का एक बड़ा बाजार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से टिका है. उसका विस्तार हुआ है। हमारे मजदूर प्रवासियों ने बोझ उठाया है, कभी किसी पर बोझ नहीं बने हैं। अगर हम नहीं होंगे तो आपको एक आदमी का लेवर (मजदूरी) खर्चा इतना देना पड़ेगा कि स्वयं ही वो कार्य करने की सोंचोगे। हमारे मजदूरों के बिना आपकी यहाँ की कोई भी टेक्नोलॉजी विकास नहीं कर सकती थी। हमारे वाचमैनों ने आपकी पुलिस के बराबर मुम्बई की सुरक्षा की है। आप यह भी नहीं कह सकते हैं कि हमें मुम्बई से प्यार नहीं है, आप गंदगी फैलाते हो हम उसे साफ करते हैं। इस पर एक उर्दू शायर का शेर है...
" जाने क्या बात है तुझमें ऐ मुम्बई सलीस्तां
कि शामे अवध, सुबहो बनारस छोड़ आए"
उदारीकरण एक बेईमान आर्थिक अवधारणा है, पूरे देश में शहरों के आस-पास कंपनियाँ लगाई गईं लेकिन उत्तरप्रदेश और बिहार को कमजोर कानून व्यवस्था का बहाना बताकर अपेक्षित कर दिया, क्योंकि यहाँ से मोती रकम नहीं मिल पाई। आज भी प्लंबर के रूप में सूरत से लेकर पुणे तक उड़िया मजदूरों का कोई जवाब नहीं मिलेगा। ऐसे ही दिल्ली को भी बनाने में उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के मजदूरों से पहले पंजाबियों ने सस्ते श्रम, पसीने और अकूत मेहनत का बलिदान दिया है। दिल्ली को हमारे मजदूरों ने ही एक सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान दिलाई है, लेकिन भजनपुरा, संगम विहार और अली गाँव  की गालियों की सडन देखकर जी घिना जाता है। गैर-कानूनी प्रवासी के ठप्पे के साथ वोटर कार्ड तो बना लेकिन रासनकार्ड नहीं। हमारे प्रधानमंत्री पंजाब के होकर असम से सांसद हैं, जाने कितने मंत्री और अभिनेता हमारे उत्तर प्रदेश से लोकसभा गए लेकिन कभी रोते उत्तर प्रदेश के आंसू नहीं पोंछे. तो क्या वो सब प्रवासी नही हैं।
लेकिन प्रवासी शब्द को तो केवल मजदूर का ही पर्यायवाची बना दिया गया है। मुम्बई में बॉलीवुड से उत्तर भारतीय और बंगाली फिल्मी हस्तियाँ निकाल दो तो राखी सावंत और नाना पाटेकर के सिवाय बचेगा कौन? लेकिन याद नहीं क्या? वो सब सफेद कॉलर के प्रवासी हैं. प्रवासी का अर्थ मजदूर से क्यों लगाया जाता है। ग्लोब्ल प्रवास से क्यों नहीं. लोग दिल्ली / मुम्बई से जाकर बंगलोर और कानपुर में भी इंजीनियर बनते हैं. जब गुजरात और पंजाब से लोग नैरोबी और कनाडा में बसें तो एन. आर. आई. और जब हम अरब या मॉरिसस चले जाएँ तो मजदूर प्रवासी। प्रवासीकरण बाजार में क्यों नहीं हो सकता है, एक जगह की कार दूसरी जगह, पूरी टेक्नोलॉजी की दुनिया ही प्रवासी है। प्रवास रुकने पर एयरलाइंस का कारोबार ठप हो जाएगा। टेक्नोलॉजी के साथ-साथ श्रम का हस्तान्तरण भी हो सकता है, नहीं तो माजदूर के साथ-साथ टेक्नोलॉजी, हीरो-हीरोइन और बाजार उद्योग भी लौटा दो। हिन्दी से नफरत करते हो तो चेन्नई एक्सप्रेस स्थानीय भाषा में बनाकर 300 करोड़ कमा के दिखा दो?अगर हमारी हिन्दी नहीं होगी तो आप दूसरे प्रदेश के आदमी से कैसे बात करेंगे? क्या सबको अंग्रेज़ी आती है, और अगर आती है, तो आप राष्ट्र भाषा को इतना बेकार समझ रहे हैं कि वो एक विदेशी भाषा से बेकार है? अगर उत्तरप्रदेश /बिहार से नफरत है तो विदेशियों से कहना बंद करो कि ताजमहल हमारा है और अगर हमसे नफरत है तो भगवान राम और कृष्ण भी तो भईया थे, उन्हें पूजना बंद करो। श्री क्रष्ण से बड़ा प्रवासी कौन है? यू. पी. से जाकर द्वारिका (गुजरात) में बसे थे। जे. पी. लोहिया का नाम इतिहास से मिटा सकते हो?
जब हमें मुम्बई में सस्ता श्रमिक मानते हो तो इन्हीं सेठों के लड़के आई. आई. एम. (IIM)अहमदाबाद और मुम्बई आई. आई. टी. (IIT) से निकल कर अमेरिका और लन्दन की कम्पनियों में क्या समझे जाते हैं? तब नहीं मानोगे लेकिन वो भी वहां सस्ते श्रमिक ही हैं। बेजरूरत का प्रवास है यह, जहां ज्यादा पैसे वहीं चल दिए। कुल मिलकर हम प्रवासियों की वजह से ग्लोबल अर्थव्यवस्था में जान आई है, वर्ना कौन लेता ये महंगे फ्लैट जब यह बनते ही नहीं? झारखण्ड जैसे राज्य उजड़े हैं तब जाकर यहाँ उजाला हुआ है। हमें स्वीकार करना पड़ेगा। तब किसी ने भईया कहा था तो अच्छा लगा था, तो अब कोई कहता है तो बुरा और राजनैतिक लगता है। सब के सब प्रवासी हैं, नहीं हैं तो उनके बच्चे हो जाएंगे. क्यों नहीं कानून में हमें प्रवासी होने का भी मौलिक अधिकार मिलना चाहिए. ताकि किसी को भी प्रवासी होनें में शर्म ना आए। और जो कहे कि वह देखो मलेरिया लेकर आया है, तो उसे जेल में ठूँसा जा सके। जब से वे स्वयं कहीं और से आकर यहाँ जगह बना सकते हैं तो और कोई क्यों नहीं? दिल्ली गैंग रेप हुआ, जिसमें एक-दो आरोपी उ.प्र. और बिहार के थे, तुरंत कह दिया कि ये घटनाएँ बिहारियों की वजह से होती हैं. जबकि वो लड़की (निर्भया) भी उत्तरप्रदेश की थी, किसी ने नहीं कहा कि उत्तर प्रदेश की लड़कियों के साथ दिल्ली में गलत हो रहा है या वो दरिंदगी का शिकार बनाई जा रही हैं। इन्हें तो हर बात में राजनीति करनी है।
अतः किसी को भी प्रवासी होने में शर्म नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह एक व्यापक जाल है, जब आदमी एक ज़िले से निकलकर दूसरी जगह जाता  है तो भी प्रवासी होता है। और जो इसे रोके वो ग्लोबलाइजेसन को रोक दे। क्या मुम्बई और दिल्ली के लोग दूसरे शहरों में नहीं जा रहे हैं। प्रवासी होना एक आर्थिक, सामाजिक और निरंतर प्रक्रिया है। इसे कोई नहीं रोक सकता है, और जो प्रयास भी करे वो आसमान से धुंआ हटा रहा है। और ऐसा कार्य कोई स्वछ दिमाग वाला इंसान तो कर  नहीं सकता है.
(Special Thanks to Ravish Kumar's Report on "दिल्ली में प्रवासी")

Tuesday, October 29, 2013

राजनीति में BMW की बढ़ती रफ़्तार

आप लोग सोच रहे होंगे कि राजनीति में एम्बेसडर का स्थान BMW ने कब ले लिया, तो मेरा मतलब BMW गाड़ी से नहीं बल्कि बहन मायावती से है। बसपा के लिए BMW का एक और मतलब है, ब्राम्हण+मुस्लिम+Weak Caste (दलित और पिछडे) जो इनका जनाधार भी है।

बसपा का इतिहास बेहद दिलचस्प है, पंजाब के एक दलित परिवार से निकले कांशीराम ने उत्तर भारत में एक बड़ी कोशिश की और उत्तर प्रदेश में अच्छी सफलता प्राप्त की. पहले इन्होने एक संगठन बनकर घर-घर जाकर दलितों  की परेशानियाँ पूंछी और उनकी सहायता कीसन् 1984 में पार्टी बनाई. पहले उन्हें कम सफलता मिली फिर बाद में उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी

2009 में लोकसभा चुनाव में बसपा ने 500  ( कांग्रेस ने 440 और भाजपा ने 433) सीटों पर चुनाव लड़े, कांग्रेस ने 28.55% और 11.91 करोड़ वोट के साथ 206 सीटें जीती भाजपा ने 18.8% और 7.84 करोड़ वोट के साथ 116 सीटें जीती वहीं बसपा ने 6.17% और 2.57 करोड़ वोट के साथ 21 सीटें जीती और 50 से अधिक सीटों पर दूसरे नंबर पर रही, और कई जगह उत्तर प्रदेश के बाहर भी पार्टी के प्रत्याशियों ने कड़ी टक्कर दी


2012 के उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव के दौरान बसपा को महज़ 80 सीटें ही प्राप्त हुईं, बल्कि उसका वोट शेयर प्रतिशत 27.85 था, जो सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के 32% वोट से मात्र 4.50% कम है. अगर आने वाले 2017 के चुनाव में बसपा 6-8 प्रतिशत वोट और बढ़ा लेती है, तो उसकी सीटों की संख्या 200 पार कर जाएगी

अब हम बात करते हैं, बसपा के मूल वोट की तो वो है, दलित, जो उत्तर प्रदेश में 21% है, और उसका और कोई दावेदार नहीं है इसका अर्थ हुआ कि बसपा को और भी जातियों के वो बड़ी संख्या में मिले हैं, मुस्लिम और ब्रम्हणों की एक बड़ी ज़मात पार्टी के साथ जुड़ी है हो सकता है दोनो तथाकथित जातियों का वोट लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के साथ जुड़ जाता है इसी को ध्यान में रखकर बसपा सभी सामान्य सीटों पर ब्राम्हण प्रत्याशियों को उतारती है. ओ. बी. सी. जातियों के वोट (गैर-यादव) स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सभी दलों को मिलतें हैं

मुजफ़्फ़र नगर दंगों के बाद से सपा के हालत काफी खराब हो रहे हैं, मुस्लिमों को डर है, कि मोदी से बचाव का विकल्प सपा नहीं है, और हिन्दू अखिलेश को मुस्लिम हितैषी मान बैठे हैं उसे बसपा में भी एक उम्मीद नजर आती है, जिसका कारण है, कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में मुस्लिमों की दशा दलितों के जैसी ही होती है
अगर बात गठबन्धन की करें तो बसपा अपने 2017 में लखनऊ की कुर्सी तक पहुंचाने का तथाकथित जन-आधार(मुस्लिम जो उत्तर प्रदेश में 18+% है) को मोदी या भाजपा के गठबन्धन से दूर नहीं करना चाहेगी

अब कांग्रेस भी मायावती की तरफ नजर बिछाए बैठी है, जिसका परिणाम सी. बी. आई. द्वारा केस वापस लेने में दिख चुका है अगर भविष्य में बसपा और कांग्रेस का गठबन्धन हो जाता है तो मोदी को रोकना दोनो के लिए आसन नहीं होगा यह गठबन्धन 2014 में उत्तर प्रदेश में ही अकेले 60 से अधिक सीटें जीत सकता है, और बसपा 50+ सीटों के साथ राष्‍ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका अदा कर सकती है एक बार 1995 में बसपा और कांग्रेस को हम साथ देख चुके हैं, तब तो सफलता अच्छी नहीं मिली थी, लेकिन आज की परिस्थितियाँ कुछ और हैं अगर पूरे देश को ही देखें तो कांग्रेस का भी मूल वोट मुस्लिम के अलावा दलित रहा है, और अब बसपा को भी कई राज्यों में कम ही सही लेकिन काफी वोट मिलता है क्योंकि वो देश के अकेली बड़ी दलित समर्थक पार्टी है अगर यह गठबन्धन 2013 नवंबर के चुनावों में एक साथ जाए तो भाजपा 2014 के युद्ध में 0-4 की हार के साथ उतरने को मजबूर होगी
वैसे तो BMW का मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत सम्मान करता हूँ, क्योंकि वो  एक महिला हैं जो निचले तबके से उठकर आई हैं लेकिन कभी-कभी उनकी तानाशाही प्रव्रत्ति उनपर हावी हो जाती है जिसमें राहुल गाँधी की वह बात सत्य नजर आने लगती है, कि मायावती ने उत्तर प्रदेश में किसी दलित नेता को उभरने का मौका नहीं दियाएक हद तक यह सच्चाई भी है, कि अगर वो राष्‍ट्रीय (केन्द्रीय) राजनीतिक सड़क पर रेस करने लगी तो कौन सा दलित नेता उनकी मसाल थामेगा? फिर तो पार्टी ब्राम्हणवादी विचारधारावी लोगों के हाथ में आ जाएगी. और जब काशीराम की तरह वो नहीं रहेगी तो पार्टी का विलय भाजपा जैसी पार्टी में हो जाएगा
एक तरफ़ हम  इसपर इतना गणितकर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बुआजी (क्योंकि मेरे पिताजी बहनजी कहते हैं) का मूड उत्तर प्रदेश को छोड़ कर कहीं दिलचस्पी नहीं ले रही हैं अभी तक एक रैली नही हुई है, अगर अभी से वे स्वयं जोरदार प्रचार करें, तो चारों राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ और दिल्ली) में बसपा के बिना सरकार नहीं बन पाएगीखैर ये सब बातें तो भविष्य के गर्भ में छुपी हैं कि BMW राजनीति की सड़क पर किस समय और कौन सा गियर डालेंगी. उम्मीद है कि यह रेस (कांग्रेस(राहुल) बनाम भाजपा (मोदी) से हटकर त्रिकोणीय भी हो सकेगी
 

Sunday, October 27, 2013

मेरी पहली बरेली यात्रा

बात 2011 फरवरी की है, मेरे बी. ए. फाइनल के पेपर होने ही वाले थे, तभी पता चला कि बरेली में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस फोर्स की रैली भर्ती है, उसमें केवल 700 पद थे. मैंने भी सेना में जाने के लिए अच्छी खासी तैयारी कर रखी थी. कई दोस्त तैयार हुए, एक फरवरी को मैं भी गया. माँ ने बहुत तैयारी के साथ भेजा. कासगंज पहुचते ही, पता चला कि भीड़ बहुत हो गई है, फिर भी हम लोग गए, वहां जाकर पता चला कि 11 प्रदेशों से 4.5 लाख लड़के आ गए हैं. रहने के लिए भी जगह नहीं थी, पूरे शहर में कुछ भी खाने को नहीं मिल रहा था, गन्ने की भरी ट्राली जा रही थी, तभी कुछ लड़कों ने हरकते शुरु कर दी, तभी सेना के जवान आ गए और लाठी चार्ज कर दिया. रात भर में पूरा शहर श्मशान बन गया. कुछ नहीं बचा. हमारे सब दोस्त बिछड़ गए. मैं चार अन्य दोस्तो (सोनू, अमर, छोटे और जगरूप) के साथ एक स्थानीय बाबा के सत्संग आश्रम में चला गया और रात भर उनका सत्संग चला एक तरफ हम सोते रहे, फिर सुबह कैम्प की ओर चले तो फिर से ग्रामीण और छात्रों के बीच में हिंसा सुरु हो चुकी थी. सैकड़ों गाडियाँ जलाई जा चुकी थी, पेट्रोल पम्प जल चुके थे, कई छात्र मर चुके थे, हम भी राम गंगा नदी के किनारे भुँखे-प्यासे पड़े थे. हमने भी कई जगह मार खाई. साम को पांच बजे तक हालत बेकाबू ही थे. मोबाइल की बैट्री खतम होने से घर के लोगों से बात नहीं हो पा रही थी.



तभी हमने सोचा कि चलो अब स्टेशन की ओर चलते हैं, पहले रोड पर गए तो पुलिस ने मार कर भगा दिया. फिर हम रेलवे पुल पर गए, जहां से ट्रेन निकलती थी, उसी जगह से हमने जाने का तय किया. चलने के लिए एक फिट चौड़ी पट्टी थी.
जिसपर चलना आसान नहीं था, क्योंकि 40-50 फीट नीचे पानी की ओर देखो तो डर लगे और अगर ध्यान हटाया तो पता नहीं पैर अलग पड जाए तो मरे, जब ध्यान से चले तो नजर एक जगह रुकने का डर. सब एक पंक्ति में जा रहे थे, कि ट्रेन का सिग्नल आ गया, मेरे दो मित्र (अमर और छोटे) तो 500 मीटर लंबे पुल को पार कर चुके थे, हमे बीच में फंस गए, जल्दी से डिवाइडर के स्थान पर खड़े हो गए, कुछ मित्र तो ऐसे ही किनारे होकर खड़े हो गए. ट्रेन निकली मुझे लगा की आज 3-4 मित्र तो गए, लेकिन भगवान की दया से सब ठीक थे, हम जल्दी से गए. पहले तो राम गंगा स्टेशन से कई ट्रेन छोड़ी जो बहुत भरी थी, उन्हे देखकर वो फेविकोल वाला विग्यापन की याद आती थी जो एक ट्रक पर भूसे के ढेर की तरह लोगो को भर कर ले जाता है.
वही जो ट्रॅन हमने छोड़ी उसी ट्रेन में मेरठ रूट पर आग लग गई सैकडो छात्र मर गए, हम अपने को  पता नही कितना खुशकिस्मत मान रहे थे. फिर एक ट्रेन पर चढ़े, इंजन पर मैं भी खड़ा हो गया बरेली से कासगंज तक लगभग तीन  घंटे का सफर हमने उस फरवरी की शर्दी में कटा. कासगंज में स्टेशन पर लाठी चार्ज हो गया हम दो लोग (मैं और सोनू शर्मा) एक बूढ़े जोड़े के पास बैठ गए तो उस बूढ़े ने मुझे डंडा मार के भगा दिया. उस संघर्ष में मेरे तत्कालीन प्रिय मित्र मा. श्री जगरूप सिंह के पैर में बहुत चोंट आ गई वो चल भी नहीं पा रहे थे. हम रात एक बजे एक ट्रेन में चढ़ने में फिर सफल हुए और सुबह आठ बजे    जबरजस्त भीड़ में चौबेपुर स्टेशन पर उतरे. ऐसा लगा जैसे यमराज के घर से वापस आ गया हूँ.
फिर हमने अखबार खरीदे और गाँव तक तीन किलो मीटर तक पैदल चलकर आए. जैसे ही घर पहुचे हमारे घर वालों को मानो जान मिल गई हो. पता नही कितनी प्रार्थनाएँ हम पर की गई थी. सब के सब बहुत खुश हो रहे थे.
तभी से हम दोस्तों में से कितनों ने तो अपना सेना  में जाने का सपना भी भुला दिया, उन्हीं मे से मैं भी एक हूँ. सरकार और आई. टी. बी. पी. के बीच में आरोप- प्रत्यारोप चल रहा था. सबसे बड़े मुद्दे  "बेरोजगारी" पर आज 
 भी किसी का ध्यान नहीं है.
देखो  कब तक हमारे जैसे नवजवान  हार कर  बैठते रहेंगे? और कब तक निर्दोष युवा सेना में जाने से पहले शहीद होते रहेंगे?

मुंशीजी से साहित्यिक प्रेम

आज से 1 महीने पहले मैने मुंशी प्रेम चंद्र के दो महान ग्रंथ गबन और गोदान पढने शुरु किए थे, कल रात को 3.50 पर दोनो को खतम कर पाया! मैने सुन रखा था, कि आज तक उनकी आलोचना कमलेश्वर और मानवर सिंह जैसे आलोचक भी नहीं कर पाए! गोदान के अंतिम 39वें भाग में 382वें पेज में मुझे लगा कि अब मैं उनकी आलोचना कर दूंगा! क्योंकि तीसरे भाग में होरी का भाई हीरा जो उसकी गाय को जहर देकर भाग गया था, वो अभी तक नहीं लौटा था! मैं अंतिम पेज की 2 लाइन ही पढ पाया था कि वो वापस आ गया! सच में महान लेखक वही होता है, जो किसी को आलोचना का एक छोटा सा मौका भी ना दे! अब मैं गोदान को अपने गांव की भाषा (हिन्दी और अवधी मिली-जुली, जो कानपुर के पास के गावों में बोली जाती है) में लिखने की कोशिश करूंगा.
और वही हाल हुआ गबन का 50वें भाग तक कहानी बिल्कुल अंतहीन लग रही थी, सब कुछ बिखरा पड़ा था, मुझे अचम्भा तो तब हुआ जब अंतिम भाग 52 में सब कुछ अच्छी प्रेम कहानी फिल्म की तरह समाप्त हुआ? कहीं से भी आलोचना की गुंजाइस नही रह गई.
मैंने बहुत साहित्य पढ़ा है, लेकिन मुंशी जी के जितना दिलकश लेखक् नही मिल पाया! सवा सेर गेंहू, पूस की रात, बड़े घर की बहू, कोई मुसीबत ना हो तो बकरी पाल लो, ठाकुर का कुंआँ और ना जाने कितनी अनगिनत कहानियाँ मैंने पढी हैं. हर कहानी में यही लगता है, कि मानो ये कथा मेरी या मेरे ही किसी परिचित आदमी की है, हर बार घर, गाँव, गरीबी, प्यार, भक्ति से दिल रोमांचित हो जाता है.
उनकी भाषा में कुछ अपनापन सा है! असली भारत के दर्शन हो जाते हैं, हमेशा हर बुराई का विरोध किया, चाहे वो सामंतवाद हो, जातिवाद हो, ब्रम्हनवाद हो, पूंजीवाद हो और सच्चे मार्क्सवादी की तरह समाजवाद को बढ़ावा दिया!
अगर विलीयम सेक्सपियर हिन्दी के लेखक होते या मुंशी जी अंग्रेज़ी के तो उनके आगे सेक्सपियर कहीं नहीं टिकते? फिर भी हमारे (साहित्य प्रेमियों के) लिए वो ईश्वर हैं, अगर सचिन क्रिकेटप्रेमियों के हैं तो, हर बात का जबाब हर कहानी में ही देकर चले गए.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...