Tuesday, October 29, 2013

राजनीति में BMW की बढ़ती रफ़्तार

आप लोग सोच रहे होंगे कि राजनीति में एम्बेसडर का स्थान BMW ने कब ले लिया, तो मेरा मतलब BMW गाड़ी से नहीं बल्कि बहन मायावती से है। बसपा के लिए BMW का एक और मतलब है, ब्राम्हण+मुस्लिम+Weak Caste (दलित और पिछडे) जो इनका जनाधार भी है।

बसपा का इतिहास बेहद दिलचस्प है, पंजाब के एक दलित परिवार से निकले कांशीराम ने उत्तर भारत में एक बड़ी कोशिश की और उत्तर प्रदेश में अच्छी सफलता प्राप्त की. पहले इन्होने एक संगठन बनकर घर-घर जाकर दलितों  की परेशानियाँ पूंछी और उनकी सहायता कीसन् 1984 में पार्टी बनाई. पहले उन्हें कम सफलता मिली फिर बाद में उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी

2009 में लोकसभा चुनाव में बसपा ने 500  ( कांग्रेस ने 440 और भाजपा ने 433) सीटों पर चुनाव लड़े, कांग्रेस ने 28.55% और 11.91 करोड़ वोट के साथ 206 सीटें जीती भाजपा ने 18.8% और 7.84 करोड़ वोट के साथ 116 सीटें जीती वहीं बसपा ने 6.17% और 2.57 करोड़ वोट के साथ 21 सीटें जीती और 50 से अधिक सीटों पर दूसरे नंबर पर रही, और कई जगह उत्तर प्रदेश के बाहर भी पार्टी के प्रत्याशियों ने कड़ी टक्कर दी


2012 के उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव के दौरान बसपा को महज़ 80 सीटें ही प्राप्त हुईं, बल्कि उसका वोट शेयर प्रतिशत 27.85 था, जो सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के 32% वोट से मात्र 4.50% कम है. अगर आने वाले 2017 के चुनाव में बसपा 6-8 प्रतिशत वोट और बढ़ा लेती है, तो उसकी सीटों की संख्या 200 पार कर जाएगी

अब हम बात करते हैं, बसपा के मूल वोट की तो वो है, दलित, जो उत्तर प्रदेश में 21% है, और उसका और कोई दावेदार नहीं है इसका अर्थ हुआ कि बसपा को और भी जातियों के वो बड़ी संख्या में मिले हैं, मुस्लिम और ब्रम्हणों की एक बड़ी ज़मात पार्टी के साथ जुड़ी है हो सकता है दोनो तथाकथित जातियों का वोट लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के साथ जुड़ जाता है इसी को ध्यान में रखकर बसपा सभी सामान्य सीटों पर ब्राम्हण प्रत्याशियों को उतारती है. ओ. बी. सी. जातियों के वोट (गैर-यादव) स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सभी दलों को मिलतें हैं

मुजफ़्फ़र नगर दंगों के बाद से सपा के हालत काफी खराब हो रहे हैं, मुस्लिमों को डर है, कि मोदी से बचाव का विकल्प सपा नहीं है, और हिन्दू अखिलेश को मुस्लिम हितैषी मान बैठे हैं उसे बसपा में भी एक उम्मीद नजर आती है, जिसका कारण है, कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में मुस्लिमों की दशा दलितों के जैसी ही होती है
अगर बात गठबन्धन की करें तो बसपा अपने 2017 में लखनऊ की कुर्सी तक पहुंचाने का तथाकथित जन-आधार(मुस्लिम जो उत्तर प्रदेश में 18+% है) को मोदी या भाजपा के गठबन्धन से दूर नहीं करना चाहेगी

अब कांग्रेस भी मायावती की तरफ नजर बिछाए बैठी है, जिसका परिणाम सी. बी. आई. द्वारा केस वापस लेने में दिख चुका है अगर भविष्य में बसपा और कांग्रेस का गठबन्धन हो जाता है तो मोदी को रोकना दोनो के लिए आसन नहीं होगा यह गठबन्धन 2014 में उत्तर प्रदेश में ही अकेले 60 से अधिक सीटें जीत सकता है, और बसपा 50+ सीटों के साथ राष्‍ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका अदा कर सकती है एक बार 1995 में बसपा और कांग्रेस को हम साथ देख चुके हैं, तब तो सफलता अच्छी नहीं मिली थी, लेकिन आज की परिस्थितियाँ कुछ और हैं अगर पूरे देश को ही देखें तो कांग्रेस का भी मूल वोट मुस्लिम के अलावा दलित रहा है, और अब बसपा को भी कई राज्यों में कम ही सही लेकिन काफी वोट मिलता है क्योंकि वो देश के अकेली बड़ी दलित समर्थक पार्टी है अगर यह गठबन्धन 2013 नवंबर के चुनावों में एक साथ जाए तो भाजपा 2014 के युद्ध में 0-4 की हार के साथ उतरने को मजबूर होगी
वैसे तो BMW का मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत सम्मान करता हूँ, क्योंकि वो  एक महिला हैं जो निचले तबके से उठकर आई हैं लेकिन कभी-कभी उनकी तानाशाही प्रव्रत्ति उनपर हावी हो जाती है जिसमें राहुल गाँधी की वह बात सत्य नजर आने लगती है, कि मायावती ने उत्तर प्रदेश में किसी दलित नेता को उभरने का मौका नहीं दियाएक हद तक यह सच्चाई भी है, कि अगर वो राष्‍ट्रीय (केन्द्रीय) राजनीतिक सड़क पर रेस करने लगी तो कौन सा दलित नेता उनकी मसाल थामेगा? फिर तो पार्टी ब्राम्हणवादी विचारधारावी लोगों के हाथ में आ जाएगी. और जब काशीराम की तरह वो नहीं रहेगी तो पार्टी का विलय भाजपा जैसी पार्टी में हो जाएगा
एक तरफ़ हम  इसपर इतना गणितकर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बुआजी (क्योंकि मेरे पिताजी बहनजी कहते हैं) का मूड उत्तर प्रदेश को छोड़ कर कहीं दिलचस्पी नहीं ले रही हैं अभी तक एक रैली नही हुई है, अगर अभी से वे स्वयं जोरदार प्रचार करें, तो चारों राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ और दिल्ली) में बसपा के बिना सरकार नहीं बन पाएगीखैर ये सब बातें तो भविष्य के गर्भ में छुपी हैं कि BMW राजनीति की सड़क पर किस समय और कौन सा गियर डालेंगी. उम्मीद है कि यह रेस (कांग्रेस(राहुल) बनाम भाजपा (मोदी) से हटकर त्रिकोणीय भी हो सकेगी
 

Sunday, October 27, 2013

मेरी पहली बरेली यात्रा

बात 2011 फरवरी की है, मेरे बी. ए. फाइनल के पेपर होने ही वाले थे, तभी पता चला कि बरेली में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस फोर्स की रैली भर्ती है, उसमें केवल 700 पद थे. मैंने भी सेना में जाने के लिए अच्छी खासी तैयारी कर रखी थी. कई दोस्त तैयार हुए, एक फरवरी को मैं भी गया. माँ ने बहुत तैयारी के साथ भेजा. कासगंज पहुचते ही, पता चला कि भीड़ बहुत हो गई है, फिर भी हम लोग गए, वहां जाकर पता चला कि 11 प्रदेशों से 4.5 लाख लड़के आ गए हैं. रहने के लिए भी जगह नहीं थी, पूरे शहर में कुछ भी खाने को नहीं मिल रहा था, गन्ने की भरी ट्राली जा रही थी, तभी कुछ लड़कों ने हरकते शुरु कर दी, तभी सेना के जवान आ गए और लाठी चार्ज कर दिया. रात भर में पूरा शहर श्मशान बन गया. कुछ नहीं बचा. हमारे सब दोस्त बिछड़ गए. मैं चार अन्य दोस्तो (सोनू, अमर, छोटे और जगरूप) के साथ एक स्थानीय बाबा के सत्संग आश्रम में चला गया और रात भर उनका सत्संग चला एक तरफ हम सोते रहे, फिर सुबह कैम्प की ओर चले तो फिर से ग्रामीण और छात्रों के बीच में हिंसा सुरु हो चुकी थी. सैकड़ों गाडियाँ जलाई जा चुकी थी, पेट्रोल पम्प जल चुके थे, कई छात्र मर चुके थे, हम भी राम गंगा नदी के किनारे भुँखे-प्यासे पड़े थे. हमने भी कई जगह मार खाई. साम को पांच बजे तक हालत बेकाबू ही थे. मोबाइल की बैट्री खतम होने से घर के लोगों से बात नहीं हो पा रही थी.



तभी हमने सोचा कि चलो अब स्टेशन की ओर चलते हैं, पहले रोड पर गए तो पुलिस ने मार कर भगा दिया. फिर हम रेलवे पुल पर गए, जहां से ट्रेन निकलती थी, उसी जगह से हमने जाने का तय किया. चलने के लिए एक फिट चौड़ी पट्टी थी.
जिसपर चलना आसान नहीं था, क्योंकि 40-50 फीट नीचे पानी की ओर देखो तो डर लगे और अगर ध्यान हटाया तो पता नहीं पैर अलग पड जाए तो मरे, जब ध्यान से चले तो नजर एक जगह रुकने का डर. सब एक पंक्ति में जा रहे थे, कि ट्रेन का सिग्नल आ गया, मेरे दो मित्र (अमर और छोटे) तो 500 मीटर लंबे पुल को पार कर चुके थे, हमे बीच में फंस गए, जल्दी से डिवाइडर के स्थान पर खड़े हो गए, कुछ मित्र तो ऐसे ही किनारे होकर खड़े हो गए. ट्रेन निकली मुझे लगा की आज 3-4 मित्र तो गए, लेकिन भगवान की दया से सब ठीक थे, हम जल्दी से गए. पहले तो राम गंगा स्टेशन से कई ट्रेन छोड़ी जो बहुत भरी थी, उन्हे देखकर वो फेविकोल वाला विग्यापन की याद आती थी जो एक ट्रक पर भूसे के ढेर की तरह लोगो को भर कर ले जाता है.
वही जो ट्रॅन हमने छोड़ी उसी ट्रेन में मेरठ रूट पर आग लग गई सैकडो छात्र मर गए, हम अपने को  पता नही कितना खुशकिस्मत मान रहे थे. फिर एक ट्रेन पर चढ़े, इंजन पर मैं भी खड़ा हो गया बरेली से कासगंज तक लगभग तीन  घंटे का सफर हमने उस फरवरी की शर्दी में कटा. कासगंज में स्टेशन पर लाठी चार्ज हो गया हम दो लोग (मैं और सोनू शर्मा) एक बूढ़े जोड़े के पास बैठ गए तो उस बूढ़े ने मुझे डंडा मार के भगा दिया. उस संघर्ष में मेरे तत्कालीन प्रिय मित्र मा. श्री जगरूप सिंह के पैर में बहुत चोंट आ गई वो चल भी नहीं पा रहे थे. हम रात एक बजे एक ट्रेन में चढ़ने में फिर सफल हुए और सुबह आठ बजे    जबरजस्त भीड़ में चौबेपुर स्टेशन पर उतरे. ऐसा लगा जैसे यमराज के घर से वापस आ गया हूँ.
फिर हमने अखबार खरीदे और गाँव तक तीन किलो मीटर तक पैदल चलकर आए. जैसे ही घर पहुचे हमारे घर वालों को मानो जान मिल गई हो. पता नही कितनी प्रार्थनाएँ हम पर की गई थी. सब के सब बहुत खुश हो रहे थे.
तभी से हम दोस्तों में से कितनों ने तो अपना सेना  में जाने का सपना भी भुला दिया, उन्हीं मे से मैं भी एक हूँ. सरकार और आई. टी. बी. पी. के बीच में आरोप- प्रत्यारोप चल रहा था. सबसे बड़े मुद्दे  "बेरोजगारी" पर आज 
 भी किसी का ध्यान नहीं है.
देखो  कब तक हमारे जैसे नवजवान  हार कर  बैठते रहेंगे? और कब तक निर्दोष युवा सेना में जाने से पहले शहीद होते रहेंगे?

मुंशीजी से साहित्यिक प्रेम

आज से 1 महीने पहले मैने मुंशी प्रेम चंद्र के दो महान ग्रंथ गबन और गोदान पढने शुरु किए थे, कल रात को 3.50 पर दोनो को खतम कर पाया! मैने सुन रखा था, कि आज तक उनकी आलोचना कमलेश्वर और मानवर सिंह जैसे आलोचक भी नहीं कर पाए! गोदान के अंतिम 39वें भाग में 382वें पेज में मुझे लगा कि अब मैं उनकी आलोचना कर दूंगा! क्योंकि तीसरे भाग में होरी का भाई हीरा जो उसकी गाय को जहर देकर भाग गया था, वो अभी तक नहीं लौटा था! मैं अंतिम पेज की 2 लाइन ही पढ पाया था कि वो वापस आ गया! सच में महान लेखक वही होता है, जो किसी को आलोचना का एक छोटा सा मौका भी ना दे! अब मैं गोदान को अपने गांव की भाषा (हिन्दी और अवधी मिली-जुली, जो कानपुर के पास के गावों में बोली जाती है) में लिखने की कोशिश करूंगा.
और वही हाल हुआ गबन का 50वें भाग तक कहानी बिल्कुल अंतहीन लग रही थी, सब कुछ बिखरा पड़ा था, मुझे अचम्भा तो तब हुआ जब अंतिम भाग 52 में सब कुछ अच्छी प्रेम कहानी फिल्म की तरह समाप्त हुआ? कहीं से भी आलोचना की गुंजाइस नही रह गई.
मैंने बहुत साहित्य पढ़ा है, लेकिन मुंशी जी के जितना दिलकश लेखक् नही मिल पाया! सवा सेर गेंहू, पूस की रात, बड़े घर की बहू, कोई मुसीबत ना हो तो बकरी पाल लो, ठाकुर का कुंआँ और ना जाने कितनी अनगिनत कहानियाँ मैंने पढी हैं. हर कहानी में यही लगता है, कि मानो ये कथा मेरी या मेरे ही किसी परिचित आदमी की है, हर बार घर, गाँव, गरीबी, प्यार, भक्ति से दिल रोमांचित हो जाता है.
उनकी भाषा में कुछ अपनापन सा है! असली भारत के दर्शन हो जाते हैं, हमेशा हर बुराई का विरोध किया, चाहे वो सामंतवाद हो, जातिवाद हो, ब्रम्हनवाद हो, पूंजीवाद हो और सच्चे मार्क्सवादी की तरह समाजवाद को बढ़ावा दिया!
अगर विलीयम सेक्सपियर हिन्दी के लेखक होते या मुंशी जी अंग्रेज़ी के तो उनके आगे सेक्सपियर कहीं नहीं टिकते? फिर भी हमारे (साहित्य प्रेमियों के) लिए वो ईश्वर हैं, अगर सचिन क्रिकेटप्रेमियों के हैं तो, हर बात का जबाब हर कहानी में ही देकर चले गए.

दो भारतीय नायकों को जन्मदिन मुबारक

आज देश के दो बड़े महानायकों का जन्मदिन है, एक अमिताभ बच्चन और दूसरे लोकनायक जय प्रकाश नारायण का! अमिताभ तो रील हीरो हैं, लेकिन जे.पी. साहब रीयल हीरो थे! मैंने उनकी आत्मकथा पढी और इस समय कारावास की कहानी पढ रहा हूँ, जो उन्होंने इमरजेंसी के दौरान जेल में लिखी थी! उनके जैसे महान पुरुष की आज फिर से देश को जरूरत है, जे.पी. एक नाम नहीं बल्कि विचारधारा का नाम है, जिसे हर युवा को अपनाना चाहिए! जरूरी नही है, कि आप राजनीति में आएं, जीवन के किसी भी कष्ट में अगर उनके जैसा दृणसंकल्प हो तो कोई भी कार्य मुस्किल नही है! सबसे बड़ा कष्ट तो इस बात का है, कि आज जितने भी उनके और लोहिया साहब के चेले हैं, सब के सब चोर हो गए हैं, किसी को देश की चिंता नहीं हैं, मई में मैं लखनाउ गया तो देखा कि जो लोहिया जिंदगी भर जातिवाद से लड़ते रहे उन्ही के चेले की पार्टी की एक सभा के पोस्टर में उन्हें अग्रवाल बता दिया गया! बेचारे कितने दुखी होंगे मरने के बाद भी? और वही दशा जे.पी. की है, उनके नाम को भी बेंच कर कितने नेता अपनी चमकाने में जुटे हैं?

Saturday, October 26, 2013

नमो के बोल बच्चन

आजकल सारे न्यूज चैनल दो-दो घंटे तक ब्रेक-फ्री मोदी जी के भाषण दिखाते रहते हैं. कल मोदी जी ने बुंदेलखंड में कहा कि हमने गुजरात में उत्तरप्रदेशी और बिहारी मजदूरों के लिए एक स्कीम सोची है, कि इन मजदूरों से 8 घंटे की बजाय 12 घंटे काम कराया जाए, जिससे उन्हे ज्यादा पैसा मिलेगा. उन्हें फसल के समय बारिस में 3 महीने की छुट्टी दी जाए, जब कि इस समय तो मंदी का दौर होता है, वो कहते हैं कि इन 3 महींनों की सेलरी हम देते हैं, हम सैकड़ों मजदूर दिखा सकते हैं, जिन्हे छुट्टी का पैसा नहीं मिलता है.
अब मुद्दे की बात यह है, कि मोदी जी अदानी पॉवर, रिलायंस, टाटा और विदेशी अनगिनत कम्पनियों में हम पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए क्या कर रहे हैं? क्या किसी कम्पनी से कहा कि उ. प्र. और बिहार के युवाओं को मैनेजर या इंजीनियर बनाओ? क्या हमारे अंदर ये आत्मविश्वास या टैलेंट नहीं है? क्या हमेशा ही हम यू.पी. बिहार वालों को मजदूर की नजर से ही देखते रहोगे? क्या कभी मुम्बई में अपने गठबन्धन वालों से ये कहा कि इन बिहारी या उत्तरप्रदेशी गरीब मजदूरों को मत सताओ?

आप पाकिस्तान और ISI के बारे में एक नहीं पचासो बार बोले हैं, कि मियाँ मुशर्रफ की औलादें और बच्चा पैदा करने की फैक्ट्रियाँ या मुसलमान आतंकवादियों से मिल रहे हैं. उसी की एजेंट बता कर बेचारी निर्दोष बिहार की बेटी इशरत जहां को मार दिया था. इस बात से याद आया कि जब से इनके 31 आई. ए. एस. ओफ़ीसार (टीम बंजारा) जेल गए हैं, तब से इनके उपर कोई आतंकवादी की साजिस नहीं हुई है.
 आप कहते हैं YES WE CAN तो फिर ओबामा की तरह खुली बहस कर अर्थनीति तो बताओ, ABP News के एक प्रोग्राम में राजनाथ सिंह जी थे, तो मैने अभय कुमार दुबे जी को मैसेज किया कि इनसे अर्थनीति के बारे में पूछो, तो दुबे जी ने पूंछा कि क्या आप कोई वैकल्पिक अर्थनीति रखते हैं, जैसे स्वदेशी आदि. तो सिंह बोले कि इसे हम अपने द्रष्टि पत्र में सामिल कर रहे हैं, तो दुबे जी ने कहा कि घोषणा पत्र में सामिल करो द्रष्टि पत्र तो 20 साल बाद भी लागू हो सकता है. तो राजनाथ बोले ये तो हम चुनाव जीतने पर ही बताएंगे. रही बात विदेशनीति की तो अब तक वो केवल एक गंवार की तरह ही बोलते रहे हैं, कि पाकिस्तान पर चढ बैठो, चीन से युद्ध कर दो, अमेरिका पर दबाव बना दो. अगर यही सब कुछ है, तो क्या बाजपाई जी बेवकूफ थे, जो बार बार पाकिस्तान से बात करते थे? कहते हैं, कि मैं चाय बेंचने बेंचने वाला हूँ, आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मनमोहन सिंह के पिता भी एक मजदूर किसान थे, लालू प्रसाद भी गरीब थे, मायावती से बेहतर कौन होगा, गरीब, दलित महिला. आपको रास्ते में कितने इंजीनियर मिल जाएंगे जो नदी पार करके 20 किलोमीटर साईकिल चला कर स्कूल जाते थे. जब आंसू नही बहाने गए थे, तो अपनी गरीबी क्यों बता डाली? गरीब वो है, जो गरीब को याद रखे गुजरात में दलित और गरीब की क्या हालत है, किसी से छुपा नहीं है? इनकी घड़ी, जूते, कुर्ते पर आज लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं. एक-एक रैली में 100-200 करोड़ जो कार्पोरेट काला धन खर्च कर रहा है, उसे भी तो कुछ लालच होगा?
केवल जोर से बोलना ही सब कुछ नहीं होता है. दोस्तों अब हमें ही यह तय करना है, कि हम किसी लफ्फाज़ के चक्कर मे तो नहीं आ रहे हैं?

Friday, October 18, 2013

हिन्दुत्वादियों का ढोंग

अभी कुछ समय से मोदी को भाजपा मुस्लिम  हितैषी पेन्ट करने में जुटी हुई है, इसके लिए भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन और मुख़्तार अब्बास नक़वी की  अध्यक्षता मे एक दृष्टि पत्र (Vision Document) तैयार करने को कहा गया है। भाजपा की इस नीति का पूर्ण रूप से खुलासा तो तब हुआ जब दिग्विजय सिंह ने बुर्का-टोपी के बिल वाली बात कहकर इनकी पोल खोल दी थी। मीडिया और अल्पसंख्यकों को दिखाने के लिए ये लोग अपने ही कार्यकर्ताओं को बुर्का-टोपी पहनाकर ले जाएंगे। आज कल मुम्बई में भी शिव सेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना की तरफ से कई जगहों पर त्योहारों या नव वर्ष पर शुभकामनाओं वाले पोस्टर और होर्डिंग्स मिल जाते हैं। इनमें अधिकतर में ईद और क्रिसमस पर मुस्लिम और ईसाई नवयुवकों के चित्र और नाम होते हैं। आश्चर्य की बात है कि छठ पूजा पर भी ये तथाकथिक दल शुभकामना संदेश किसी उत्तरभारतीय के नाम से देते हैं।
इस तरह की कोशिश कट्टर दक्षिणपंथियों के द्वारा को पहली बार नहीं हो रही है, इसके पहले भी संघ भी इस तरह के कार्य कर चुका है। अगर राष्‍ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पिछली राजनीति या इतिहास को उठाकर देखें तो उसके हिन्दुत्ववादी विचारधारा पर ज्यादा सोंचने की जरूरत नहीं है। वैसे तो भारतीय जनता पार्टी भी संघ को अपने पित्रसत्तात्मक वरिष्ट के रूप में मानती रही है, लेकिन उसमें भी हमेशा से ही दो समूह रहे हैं। एक नरेन्द्र मोदी और कल्याण सिंह का बचाव करने वाला और  दूसरा चेहरा औपचारिक रूप से शाहनवाज़  हुसैन और मुख़्तार अब्बास नक़वी को प्रवक्ता रूपी ढाल बनाता है।
"ठीक यही चेहरा संघ में भी है, सुनने में अजीब लगेगा लेकिन यह सही है। 23.12.2012 को सी. बी. आई. ने संघ के मुख्य सचिव इंद्रेश कुमार को  मक्का मस्जिद ब्लास्ट के लिए पूंछताछ के लिए बुलाया तो देखा कि दिल्ली स्थित C.B.I. मुख्यालय के बाहर उनके समर्थन में एक बड़ी मुस्लिम भीड़ इकट्टा थी। उनके पक्ष में नारे और प्रार्थना कर रहे थे, जो स्वभाविक नहीं था। फिर उनके बोर्ड पढ कर पता चला कि ये लोग मुस्लिम राष्‍ट्रीय मंच  (संघ की साखा)  के लोग  थे। मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक मो. अफजल हैं। इसका गठन 24.12.2002 को हुआ, और इसका उद्देश्य भारतीय मुसलमानों को संघ की मुख्य धारा से जोड़ना था। मतलब लिफाफे देकर किराएदार की हैसियत से सभाओं में ले जाना हैं।" (तहलका की पुरानी रिपोर्ट के आधार पर)
इसके पहले भी संघ ने कई बार मुस्लिमों को जोड़ने का प्रयास किया है. लेकिन दिखावे के तौर पर। केवल ऐसे कुछ मुस्लिमों की तलाश करते रहे हैं, जो खुद मुस्लिम समाज के विरोध करने वाले संघ को मीडिया और सिविल सोसाइटी के सामने निर्दोष बता सकें। संघ और उसकी बजरंग दल जैसी शाखाएँ हमेशा से अल्पसंख्यकों को बर्दास्त नहीं कर पाई हैं, तो फिर उन्हें मुख्यधारा में जोड़ने की सोंच भी कैसे सकते हैं। संघ कहता है कि हमने हर मुस्लिम समस्या को गंभीरता से उठाया है। क्या संघ सारे देश को बेवकूफ समझता है? क्या आम आदमी इस मंच से बाबरी मस्जिद विध्वंस, गुजरात दंगे या मालेगांव विस्फोट भूल पाएगा ? या संघ को इससे क्लीन चिट  देगा? मेरा तो मानना है कि यह संघ का अपने बचाव में सामने रखने का साक्ष्य मात्र है, "कि हम अल्पसंख्यक विरोधी नहीं हैं।" हमेशा ही संघ द्वारा मुसलमानों को एक अलग समूह के रूप में देखा जाता रहा है। जब कि वो भी हिन्दुओं के छोटे नहीं बराबर के भाई हैं। अंततोगत्वा तो यही लगता है कि संघ का यह नाटक मंच किसी काम का नहीं है। इससे मोदी और संघ का कोई भला नहीं होगा। मुझे नहीं लगता है कि देश की जनता इतनी कमजोर याद्दास्त वाली है। आखिर संघ भी 1925 से और भाजपा 1952 (जनसंघ) से देश में कार्यरत है। आखिर क्यों अब तक ये लोग देश की नंबर एक ताकत नहीं बन पाए?

Thursday, October 17, 2013

संविधान में धर्म के आधार पर भेद

कल www.gualil.com पर आशीष खेतान की रिपोर्ट देखकर अनदेखा कर दिया. फिर से रात को उस पर ध्यान गया तो भारतीय संविधान के आर्टिकल 14,15 और 25 को ध्यान से पढ़ा.

भारतीय संविधान की   परिकल्पना लोकतंत्र और   मानवाधिकारों      की सुरक्षा रही है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत सभी को समानता का अधिकार दिया गया है. अनुच्छेद-15 शैक्षणिक संस्थानों में सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है. अनुच्छेद-16 सभी नागरिकों को सरकारी नौकरियों में समानता
 का अधिकार देता है. इन तीनों  अनुच्छेदों को   आधार पर किसी भी नागरिक के साथ उसके धर्म, नस्ल, लिंग, जाति, जन्म अथवा निवास स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है. अनुच्छेद-25 के तहत सभी लोगों को   अपने धर्म और   विश्वास को मानने की  आजादी   दी गई है. यह बेहद ही खुशी की बात है कि संविधान के तहत कानून के अलावा भारतीय समाज सभी लोगों को बराबरी का दर्जा देने में यकीन करता है.

बाद में आर्टिकल 341 भी पढ़ा कुछ सही नही लगा. और जब कॉन्स्टीट्यूशन (अनुसूचित जाति) ऑर्डर, 1950 के पैरा-3 को पढ़ा तो आँखें खुली रह गईं.

इन सबके बावजूद, भारत सरकार ने कॉन्स्टीट्यूशन   (अनुसूचित जाति) ऑर्डर, 1950 के पैरा-3 में एक शर्त रखी है कि अनुच्छेद-341 के तहत अनुसूचित  जाति को मिलने वाली सुविधाएं सिर्फ हिंदू, सिख या नव-बौद्ध (धर्मांतरित) को ही दिया जाएगा. इस धार्मिक भेदभाव के कारण मुस्लिम और ईसाई दलित सरकारी शिक्षण संस्थाओं, सरकारी नौकरियों और अन्य मामलों में इस अधिकार से वंचित हैं, जबकि हिंदू, सिख या नव-बौद्ध को मानने वाले 1950 से अभी तक इनका लाभ उठा रहे हैं.

इस पैराग्राफ का तात्पर्य यह है कि यदि कोई हिंदू,सिख या बौद्ध आनुसूचित जाति का व्यक्ति धर्म परिवर्तित कर इस्लाम या ईसाई धर्म कबूल करता है, तो वह अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति को मिलने वाले तमाम सुविधाओं से वंचित हो  जाएगा.  और, अगर वही व्यक्ति दोबारा हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में वापस आ जाता है, तो फिर से वह पहले के अधिकारों का उपयोग करने के योग्य हो जाएगा.कोई ब्राम्हण लड़की हिन्दू, सिख या बौध्द दलित युवक से   शादी करे तो वह आरक्षण की हकदार और अगर वह किसी ईसाई, जैन या मुस्लिम आदिवासी से शादी करे तो उसका अधिकार समाप्त यहाँ तक की कोई दलित लड़की भी इनसे शादी करे तो उसे इसका लाभ नहीं मिल पाएगा? आखिर आपके आरक्षण का     आधार क्या है, पिछड़ापन, नीची
 जाति जो हमेशा से ब्राम्हणवाद का शिकार रही है, या फिर आदिवासी इलाके?  

यह कहना उचित नहीं  होगा कि पैरा-3 के प्रावधान गरीब मुस्लिम और ईसाइयों को धर्मांतरण कर हिंदू, सिख, बौद्ध धर्म ग्रहण करने के प्रलोभन देने के लिए बनाए गए हैं. वहीं दूसरी ओर यह पैरा हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के तहत आने वाले अनुसूचित जाति के लोगों को इस्लाम या  ईसाई धर्म कबूल करने के लिए भी हतोत्साहित करता है. हमारे मुताबिक, यह   प्रावधान गरीब   मुसलमानों     को इस्लाम छोड़ने का प्रलोभन देता है.इसका मतलब हुआ कि जो दलित हिन्दू  धर्म में घुटन   महसूसू कर   रहें हैं, और धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं उन्हे आरक्षण के प्रलोभन में वो सब सहना पड़ता है.

मुस्लिम और ईसाई दलितों के लिए सबसे  अधिक    दुख की बात यह है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में लोकसभा अथवा विधानसभा की सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दी गई हैं. इस कारण मुस्लिम और ईसाई दलित उन क्षेत्रों में चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित हैं.

वर्ष 1950 से अभी तक लोकसभा के लिए 15 बार चुनाव हो चुके हैं, लगभग 540 सीट मुस्लिम बहुल इलाकों में आरक्षित रखे गए और इन पर मुस्लिम या ईसाई दलित  जीत हासिल कर सकते थे. इस नुकसान का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अबी तक 450 मुस्लिम  सदस्य लोकसभा के लिए चुने गए और उन्हें 540 सीटों से वंचित रखा गया. ठीक इसी तरह, जो अधिकार   अनुसूचित जाति को दिए गए हैं, अगर उन सबसे मुस्लिम और ईसाई दलितों को वंचित   नहीं रखा   गया होता, तो   मुस्लिम   वर्ष 1952 से अभी तक 3000 और अधिक विधानसभा सीटें जीत  सकते थे.  लोकसभा   और    विधानसभा में इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम और  ईसाई दलितों के प्रतिनिधित्व पर पाबंदी   लगाने से मुस्लिमों को   विकास के   विभिन्न    क्षेत्रों से वंचित रखा  गया. राजनीतिक संस्थाओं में मुस्लिमों ईसाइयों का कम प्रतिनिधित्व होने के  कारण अन्य क्षेत्रों में भी उनके साथ भेदभाव को बढ़ावा मिला.


Google करने पर पता चला कि सुप्रीम कोर्ट में पैरा-3  के   खिलाफ वर्ष 2004 में एक रिट याचिका दाखिल की गई. इसमें कहा गया कि यह पैरा अनुच्छेद, 14, 15, 16  और 25 के तहत मुस्लिम और ईसाई दलितों को दिए गए अधिकार का उल्लंघन करता है. इस याचिका के जवाब  में हलफनामा दायर करते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2005 में रंगनाथ मिश्रा आयोग का गठन किया.वर्ष 2007 में आयोग ने केंद्र सरकार को पैरा-3 को समाप्त करने की सलाह दी, क्योंकि ये पैरा न सिर्फ संविधान के अनुच्छेद   14, 15, 16 और 25 का उल्लंघन करते हैं, बल्कि यह उचित भी नहीं हैं.

हाल में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक   आयोग ने  अपने  हलफनामा में पैरा-3 को खत्म करने की मांग की. अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए  राष्ट्रीय    आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामा में कहा कि मुसलमान एवं ईसाई दलितों को भी अनुसूचित  जाति का दर्जा देने की मांग की. उनका यह भी कहना था कि इस प्रावधान से हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से ताल्लुक रखने वाले अनुसूचित जाति वर्ग पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देश दिए जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने अभी अपना विचार अदालत में नहीं रखा है. यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई फैसला देने की स्थिति में नहीं है.

यह ध्यान देने वाली बात है कि लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में पैरा-3 को खत्म करने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास किया और उसे भारत सरकार को भेजा. बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने दो सितंबर, 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 3 पत्र लिखे और मांग की कि किसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक को धर्म के   आधार पर आरक्षण    नहीं दी गई है, इसलिए कॉन्स्टीट्यूशनल (अनुसूचित जाति) ऑर्डर, 1950 के तहत जोड़ा गया पैराग्राफ सही नहीं है. इससे सिर्फ हिंदू धर्म के मानने वाले अनुसूचित जाति के लोगों को ही फायदा हो  रहा है. पैरा-3 को खत्म करने की सिफारिश करते हुए उन्होंने लिखा कि इससे हिंदू धर्म के तहत आने वाले अनुसूचित जाति के लोगों को भी अपनी मर्जी का धर्म चुनने की आजादी होगी.

हम इसे असंवैधानिक और भारतीय   संविधान  में दिए गए मौलिक अधिकार के खिलाफ  अनुचित कानून मानते हैं. यह बिल्कुल भी सेकुलर  छवि के विरुद्द    है, देश की दोनो बड़ी पार्टियाँ इसपर ध्यान नही दे रहीं हैं, भाजपा तो आर्टिकल 341 ही समाप्त   करना चाहती हैं और कांग्रेस इसे अनुसूचित जाति आयोग का मामला बताकर टाल देती है. सेकुलरिज्म केवल  आर.एस.एस.+भाजपा और मोदी का विरोध करना ही नही होता है. तभी तो  कांग्रेस भी कभी माननीय राजेंदर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट कर कुछ मजबूत कदम नहीं उठा पाई हैं.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...