Friday, December 9, 2016
मोदीजी को कैशलेस के भाई कमलेश की चिट्ठी
Monday, November 28, 2016
कैशलेस इकॉनमी मतलब राम राज्य?
भारत के पूरे काले धन का 6% केवल कैश में है, और भारत के पूरे कैश का 86% नोट बंद हो गया है, केवल 14% पर भारत चल रहा है. तो हम केवल 6% के लिए पूरे देश को कैसे लाइन में लगा सकते हैं? बाकी का 94% ब्लैक मनी पर तो कुछ भी एक्शन ही नहीं हो रहा है? मतलब साफ है ये केवल और केवल सर्जिकल स्टाइक के जैसे राजनीतिक फायदे के लिए हुआ था, नहीं तो चार दिन पहले फिर से 7 जवान कैसे शहीद हो गए? कैसी सुरक्षा है तुम्हारी? पिछले 4 महीने में 41 जवान शहीद हो चुके हैं और एटीएम में खड़े आदमी को सेना के जवान के साथ जोड़कर उसकी अहमियत को कम करते हैं. हमारा काम लाइन में लगना नहीं है, अगर मैं छुट्टी करके लाइन में लगूंगा तो कमाउँगा क्या? फिर खाने और खरीदने को क्या होगा? फिर सरकार टैक्स कैसे ले पाएगी मुझसे? फिर उन सैनिकों को सेलरी कैसे देगी? कहते हैं कहाँ नुकसान हुआ? अरे गाँवों में जाकर देखो, लोगों के खेत सूख गए, मजदूर और किसान सुबह जाते हैं लाइन में लगने और शाम को 2000 लेकर आते हैं जो कोई दुकानदार लेता नहीं है, मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है, बच्चे भूखे मर रहे हैं. मेरे गाँव में लोगों के कोल्डस्टोरेज में रखे हज़ारों क्विंटल आलू सीजन पर कोई खरीद नहीं रहा है, कल मेरे चाचा ही दिल्ली की आज़ाद मंडी लेकर गए तो ट्रक का भाड़ा तक नहीं निकला जो आलू 1400 रुपए पैकेट था 8 तारीख के पहले वो 350 रुपए में बिका. बहुत लोगों ने तो कोल्ड स्टोरेज से निकाले ही नहीं. बहुत लोगों ने तो फेक दिए, मिर्ची की भी फसल का वहाँ अंतिम समय है कोई व्यापारी खरीद नहीं रहा है, गेंहूँ की फसल 20-25 दिन लेट हुई जा रही है, अगले साल के उत्पादन में बहुत कमी होने वाली है. फिर देखते हैं यही कैश ही खा लेना सब लोग. धारावी भिवंडी के कारखाने बंद होने से प्रवासी मजदूर वापस जा रहे हैं, इसका असर भले ही अभी आपको ना दिखे लेकिन अगले 2-3 साल तक जीडीपी की 2-3% कमी के साथ होगा.
अब आते हैं इलेक्ट्रिक पेमेंट सिस्टम पर. देश में कितने % लोग हैं जो स्मार्ट फ़ोन यूज करते हैं? क्या देश में आपके एप डाउनलोड करके सपोर्ट करने वाले ही रहते हैं? देश में बहुत लोग अनपढ़ और ग़रीब हैं वो क्रेडिट डेबिट कार्ड या एप नहीं चला सकते हैं. अमेरिका का उदाहरण तो मैने दिया ना? फिर इससे मंहगाई तो बढ़ेगी ही ना? हर दुकानदार इन सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों को 2-3% सर्विस चार्ज देगा तो वो अपना मार्जिन तो उतना ही रखेगा, और आम आदमी से वसूलेगा.
अंत में एक सवाल और आपसे करना चाहता हूँ क़ि क्या कोई मर्डर कर दे और कह दे क़ि मैं आरोपी हूँ तो वो बच जाना चाहिए? नहीं ना? ठीक उसी तरह एक काला धन रखने वाला अपना कालाधन बता कर कैसे बच सकता है? चाहे वो आतंकवाद का पैसा हो? चाहे वो लोगों की हत्याएँ कराकर कमाया गया पैसा हो? चाहे वो चोरी का पैसा हो? चाहे वो ड्रग्स सप्लाई करके कमाया गया पैसा हो? मार्केट में दलाल लोग 20-30% में नोट बदल कर दे रहे हैं, लेकिन वो नोट भी कालेधन में ही रहते हैं, इसलिए सरकार ने इसी लाइन में आकर 50% में उसको पूरा सफेद करने का ठेका ले लिया. पीएम बोलते थे कि जिसके पास भी कालाधन है बचेगा नहीं? गंगा में नोट बहाने से कोई नहीं बचेगा? लेकिन ये सब जोश तब ठंडा हुआ जब इनके कॉरपोरेट आकाओं के यहाँ से फ़ोन आया होगा? वही कॉरपोरेट आका जिनको 1 रुपए में ज़मीन दी जाती है, कांग्रेस भी उनसे करोड़ो रुपए चंदा लेती थी, आज बीजेपी भी लेती है. 2014 के चुनाव में मोदी जी ने अपने चुनाव प्रचार पर 600 करोड़ रुपए खर्चा किए थे, वो कहाँ से आए थे? आज भी यूपी के चुनाव में वो रैलियाँ हो रही हैं. अड़ानी के प्लेन में घूमने वाले मोदी भिखारी कैसे हो गए? 10 लाख का सूट पहनने वाले फकीर कैसे हो गए? ट्रिकल डाउन थ्योरी इकॉनोमी (मतलब अमीर का विकास होगा तो ग़रीब का खुद ब खुद हो जाएगा) ऐसा सोचनें वाले ग़रीबों के हमदर्द कैसे हो गए? ऐसे में सवाल उठता है क़ि वो आदमी क्यों रोता है जो पिछले समय में लाशों के अंबार देखकर कभी नहीं रोया होगा? ये गुण एक तानाशाह के गुण हैं, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1889 में लिखा था क़ि दुनियाँ का हर तानाशाह राष्ट्रवाद का चेहरा लगाकर आगे बढ़ता है, वो जनता के बीच अपने झंडे(भगवा) को नीचे रखकर देश के झंडे (तिरंगे) को लेकर जाता है. कभी इंदिरा इज इंडिया कहा जाता था आज मोदी भक्ति को देश भक्ति कहा जाता है. हो सकता है मुझे भी देशभक्त ना समझा जाए, लेकिन ये लोकतंत्र है "लोक" का मतलब होता है लोग......... और लोग केवल मुंबई दिल्ली में ही नहीं गाँवों में भी रहते हैं, स्मार्ट फ़ोन नहीं हो सकता हैं उनके पास, जिनके पास रोटी नहीं है. अभी एक महीने पहले यूएन की वर्ड हॅंगर इंडेक्स की रिपोर्ट आई जिसमें भुखमरी और कुपोषण के मामले में बांग्लादेश और नेपाल तक हमसे आगे हैं, हम पूरे विश्व में 97 नंबर पर हैं और पाकिस्तान 105 मतलब खुश हो सकते हैं क़ि पाकिस्तान से आगे हैं.
Thursday, November 24, 2016
पीएम के सर्वे पर आम आदमी के जवाब
Wednesday, November 23, 2016
क्या भारत में कैशलेस इकोनॉमी हो सकती है?
Sunday, November 20, 2016
राष्ट्रवाद की नई परिभाषा
Wednesday, November 16, 2016
सोनम गुप्ता कौन है?
Monday, November 14, 2016
नेहरू की हस्ती मिटाना इतना आसान नहीं
आज देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिन है, बहुत लोग जानकारी के अभाव में उनके चरित्र हनन से लेकर न जाने कैसे कैसे आरोप लगाया करते हैं। लेकिन जितना मैंने आजादी के बाद के इतिहास और संविधान को पढा है उसमें यही पता चला कि अगर नेहरू नहीं होते तो शायद लोग जिनका नाम लेते हैं वो देश को इतने भी एकता के सूत्र में नहीं बांध पाते। संविधान में हमारे मौलिक अधिकार, सेकुलरिज्म, बोलने और रहने की आजादी या कहें आम आदमी के लिए साॅफ्ट संविधान बनाया। कश्मीर के मुद्दे पर लोग उन्हें दोषी ठहराते हैं लेकिन अगर राजा हरि सिंह के साथ उनका एग्रीमेंट देखो तो पता चलेगा कि और कोई होता तो कश्मीर भारत के साथ मिलता ही नहीं। कोई लडडू नहीं पडा था जो उठाकर खा लेते। हो सकता है कि इतने बडे और लुटे हुए देश को संभालते संभालते कुछ गलतियां हुई होगी। बाकी आज भी देश तो उन्नीस बीस ठीक उनके ही बनाए रास्ते पर चल रहा है। वो कोई एसी में बैठे राजकुमार नहीं थे। जवाहर लाल नेहरू एक स्वतंत्रता सेनानी थे. उन्होंने अपने जीवन के 11 साल जेल में बिताये. महात्मा गांधी के बाद वह अपनी पीढ़ी के सबसे बड़े नेता थे. एक ऐसे लोकप्रिय जननेता जो अपनी अनोखी हिंदुस्तानी भाषण कला से बड़ी संख्या में भारतीयों को प्रभावित कर देते थे. वह अंतरराष्ट्रीय ख्याति के विद्वान थे. लेखक के रूप में वह भारतीय इतिहास की दुर्लभ बातें दुनिया के सामने लाए.
जवाहर लाल नेहरू ने आधुनिक भारत की बहुत सारी संस्थाओं की नींव रखी. उन्होंने उस समय लोकतंत्र की मजबूती के लिए काम किया जब पूरी दुनिया में तानाशाही का बोलबाला था. नेहरू ने भारत को उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी राष्ट्र के रूप में पहचान दिलाई. देश में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के साथ ही उन्होंने कई नए शहरों की स्थापना की. इसके चलते दुनिया में देश को नई पहचान मिली.
तीन दशक से ज्यादा समय तक नेहरू भारत के गौरव रहे. वह हमारे समधर्मी संस्कृति, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत,आदर्शवाद, बुद्धिमत्ता और राजनीतिज्ञता के प्रतीक थे.
अब हम करीब दो दशक तक निर्वाचित रहे प्रधानमंत्री को गलत साबित करना चाह रहे हैं. हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी उन्हें खलनायक के रूप में याद रखे. वास्तव में क्या हमें उनके बारे में बात नहीं करनी चाहिए. क्या यह पागलपन नहीं है?
कुछ महीने पहले मध्य प्रदेश सरकार ने फेसबुक पोस्ट में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की प्रशंसा करने पर बड़वानी जिले के डीएम अजय गंगवार को तबादला कर दिया.
हो सकता है राज्य के मुख्यमंत्री ने नेहरू को अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा दी गई श्रद्धांजलि नहीं पढ़ी हो. लेकिन मैं अप्रैल 2014 की उस सुबह की याद दिलाना चाहता हूं जब उनकी उपस्थिति में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने एक बड़ी भीड़ सामने कहा कि भारत के लोकतंत्र को इसकी मजबूती के लिए नेहरू का ऋणी होना चाहिए. क्या उस समय शिवराज सिंह चौहान को गुस्सा आया था?
अपने पूरे जीवनकाल में नेहरू की हत्या करने की चार बार कोशिश की गई पर वे जिंदा बच गए. लेकिन यह साफ है कि जो प्रयास अब किया जा रहा है वह उनके जीवन, प्रतिष्ठा और विरासत को समाप्त करने का है. इतिहास की किताबों से उनका नाम हटाया जा रहा है. उनके ऐतिहासिक भाषण को पाठ्यक्रम से निकाल दिया गया है. भारत के इस नायक की छवि को खराब करने के लिए नकली फोटो का सहारा लिया जा रहा है. तथ्यों को तोड़ा—मरोड़ा जा रहा है. साथ ही इतिहास से भी छेड़छाड़ किया जा रहा है. उनके विरोधी अपनी कल्पना शक्ति से एक नए नेहरू की छवि का निर्माण कर रहे हैं जिससे लोग उनसे घृणा करें.
नेहरू की छवि खराब करने के पीछे के कारण को आसानी से बताया जा सकता है. वैचारिक विरोधियों के लिए नेहरू भारत के विचार के प्रतीक हैं. ऐसा देश जो धर्मनिरपेक्ष, उदार और समधर्मी देश है. ये नेहरू ही कर सकते थे जब कांग्रेस के मंत्री रामधारी सिंह दिनकर संसद में उनकी आलोचना करते थे, उनके घोर विरोधी अंबेडकर और मुखर्जी सरकार के मंत्री थे योग्यता के आधार पर। वो एकबार एक बेइमान कांग्रेस के नेता को वोट न देने की बात रैली में 10 मिनट पहले पता चलने पर कह देते थे। इसकी जगह पर वह भारत को संकीर्ण, सांप्रदायिक और रूढ़िवादी देश बनाना चाह रहे हैं. नेहरू के उपर हमला वास्तव में पूर्व प्रधानमंत्री की उस विरासत पर हमला करने की कोशिश है जो भारतीय मानस की जड़ों में गहरे से बैठ गई है. इसका दूसरा कारण मनोवैज्ञानिक है. अच्छाई से घृणा करना मानव स्वभाव की जड़ों में निहित है. खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जिसके गुणों और योग्यताओं की कमी हम अपने व्यक्तित्व में महसूस करते हैं. अवचेतना के स्तर पर नेहरू के बहुत सारे आलोचक उनसे जलन महसूस करते हैं. इस कारण से वह उनका तिरस्कार करते हैं क्योंकि उनके व्यक्तित्व में उन गुणों की कमी है.
हालांकि यह तर्क नहीं है कि नेहरू कभी असफल नहीं हुए. 1962 में चीनी हमले से निपटने की उनकी नीति, कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने का निर्णय (नैतिक रूप से सही, कूटनीतिक तौर पर गलत) और समाजवाद पर उनके जोर ने दीर्घकालिक समस्याओं को जन्म दिया. लेकिन इन सारे मसलों पर सही संदर्भों और उचित मंशा के साथ सार्वजनिक रूप से बहस और तर्क—वितर्क किया जाना चाहिए.
लंबे समय तक नेहरू को भारत के इतिहास से हटाए जाने का दांव उल्टा भी पड़ जाएगा.
इसलिए भारत के स्वतंत्रता पूर्व और इसके बाद के इतिहास को उनसे जोड़ा जाना चाहिए. नेहरू से अलग भारत संभव नहीं होगा.
वास्तव में उन्हें बदनाम किए जाने की हालिया कोशिशों से लोगों में उन्हें पढ़ने को लेकर रुचि बढ़ेगी. यह प्रयास इसलिए किया जाएगा क्योंकि लोग प्रोपेगैंडा से अलग सच को जानने की कोशिश करेंगे. अंत में उनके आलोचक नेहरू और उनकी विचारधारा में लोगों की रुचि बढ़ाना बंद कर देंगे. नेहरू जीवित रहेंगे, वे अपने आलोचकों और उनकी उनकी ईर्ष्या के बावजूद जिंदा रहेंगे.
सबको पता है कि उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था। बच्चे होते ही बहुत प्यारे हैं, मैं अभी भी अपने बचपन को याद करते हुए बहुत कुछ लिखता या बोलता रहता हूँ, कोई छुपाता है और मेरी ईमानदारी है कि मैं खुलकर बोलता हूँ सब। राजनीति, कानून, साहित्य, किताबें सब अलग है और निजी जीवन में हंसना खुश रहना अलग बात है। इससे मेरे अंदर एक ईमानदारी बनी रहती है, कभी असमंजस हुआ तो जो भी अच्छा इंसान है पूछ लेता हूँ। सब स्वीकार करता हूँ, हिटलर या बडा नहीं बनने का शौक है। ये सब खुद को बच्चे की तरह रखने से होता है। क्योंकि बच्चे सच्चे होते हैं।
Friday, November 11, 2016
नोट बंद होने का सामाजिक विश्लेषण
Thursday, November 10, 2016
ट्रम्प की जीत के मायने।
बस एक निराशा हुई कि लोग उनकी जीत के बाद सभा में नारे कैसे लगा रहे थे, " वी हेट मुस्लिम्स, वी हेट ब्लैक्स, वी डोंट वांट माइग्रेट्स " ये ख़तरनाक है. मुस्लिम्स से समझ में आया कि आईएसआई और इस्लामिक आतंकवाद या कट्टरपंथियों के बाद एक माहौल है जो नफ़रत पैदा करता है, लेकिन सभी मुस्लिम्स तो आरोपी नहीं हैं. काले लोगों के खिलाफ भी बोलना बेहद दुखद है, मैं भी तो काला हूँ, मैं भी तो माइग्रेट हूँ, कैसे ऐसी बातों को समर्थन कर दूँगा और निजी तौर पर ट्रम्प कोई बहुत अच्छे इंसान भी नहीं हैं जितना उनको सुना और जाना है, अगर आप उनके बयान सुनते होंगे तो पता होगा. महीलाओं, हर दूसरे धर्म, रंग, टैक्स चोरी, पर जो वो सोचते हैं. लोगों ने जिन मुद्दों पर उनको चुना है उसपर ही काम करें. उनको 25% दक्षिणपंथियों के अलावा भी लोगों ने अलग मुद्दों पर दूसरे ग़लत लोगों के खिलाफ वोट दिया है, बहरहाल ट्रंप एक ऐसा नेता हैं, जिनके बयानों को सभ्य महफिलों में दोहराया नहीं जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं उन सभ्य महफिलों के अपने काले कारनामे नहीं है. दुनिया पर युद्ध थोप कर, अपनी जनता को भूखे रखकर अमेरिका विश्व शक्ति बन सकता है लेकिन वो दुनिया के सामने एक योग्य उम्मीदवार नहीं रख सका, ये उसके लोकतंत्र की हार है. ये पूरे विश्व में हो रहा है जब लोगअपने ज़मीनी मुद्दों को सुनकर किसी नेता को समर्थन कर रहे हैं, विचारधारा बहुत . मुद्दा रह नहीं गई है. आप देखिए क़ि यूरोप के इतिहास के सबसे बड़े आंदोलन वहाँ की लेफ्ट या सोसलिस्ट सरकारें जो 70% वोट के साथ जीती थी, उनके खिलाफ भी हो रहे हैं. तो सीधी सी बात है क़ि वो सरकारें लोगों के मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रही हैं. अमेरिका में भी जिन लोगों ने ट्रम्प को वोट दिया उसमें से मात्र 25-30% लोग ही दक्षिणपंथी विचारधारा के हैं, बाकी के सभी तो अल्ट्रा लेफ्ट या सेंटर ही थे. ये वो लोग हैं जो जॉब, शिक्षा और विकास के साथ साथ अमेरिका की सुरक्षा के लिए भी चिंतित थे, पिछले साल के एक सर्वे को मैं कोर्ट करते हुए कह रहा हूँ क़ि अमेरिका के 56-57% आर्मी ने के मैगज़ीन के सर्वे में ओबामा के खिलाफ बाते कहीं थी. लोग आर्मी को बाहर भेजने और उसके मिस्यूज के खिलाफ भी हैं, ट्रम्प उन देशों से सेना का खर्चा लेना चाहते हैं. लोगों को अच्छा लगा ये सब.
अब सवाल ये है क़ि क्या ट्रंप के पास कोई नया आर्थिक मॉडल है. वो आ तो गए हैं, लेकिन क्या वे आउटसोर्सिंग बंद कर देंगे, अमेरिका में बाहरी लोगों का आना बंद कर सकते हैं. दुनिया को ग्लोबल विलेज में बदलने निकला था अमेरिका, अब उसे याद आ रहा है कि उसकी लोकल बस छूट गई है. देखना होगा कि वहां कि जनता ने ट्रंप के बयानों पर दिल लुटाया है, या शालीन भाषा बोलकर उसे ग़रीब बनाने वालों के ख़िलाफ़ बग़ावत की है. 2008 की मंदी के बाद से आज तक दुनिया संभल नहीं सकी है. जनता गुस्से में सरकार तो बदल रही है लेकिन क्या कहीं अर्थव्यवस्था बदल रही है. अमेरिका में ट्रंपागमन के मौके पर सोहर गाने वाले नहीं हैं. वहां तो पांच सौ और हज़ार के नोट रद्दी में नहीं बदले हैं, फिर वहां जश्न क्यों नहीं है, या जो जश्न मना रहे हैं, वो वहां की मीडिया में क्यों नहीं हैं?
Sunday, October 30, 2016
भगत सिंह:(समाज शास्त्रिक विशलेषण)
Thursday, October 27, 2016
सहानुभूति की लहर पर सवार अखिलेश
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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कुछ ही दिन पहले पूर्व फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता और अब कंगना रनौट द्वारा साथी कलाकारों व फिल्म निर्देशकों पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के ...
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इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत प...