Friday, December 9, 2016

मोदीजी को कैशलेस के भाई कमलेश की चिट्ठी

सेवा में,
आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी, 
महोदय,
                        सबसे पहले तो आपको चरणस्पर्श कर प्रणाम करता हूँ और इसका मुख्य कारण आपका बुज़ुर्ग होना और मेरा भारतीय संस्कारिता में पला बढ़ा होना है, कृपया इसको लेकर मेरे लिए कोई फैन टाइप भूमिका न सोचें।
सर,आज 09 तारीख़ है और आज ही के ठीक 31 दिन पहले आपने जो देश के सारे धन को अपने बालों की तरह सफ़ेद कर देने की प्रतिज्ञा ली थी आज उसका महीना से अधिक हो गया है और आपको "फेयर एंड लवली पर्व " की खूब बधाई और इस "मासिकोत्सव" पर एक पत्र तो बनता ही है।
इधर थोड़ा सा ट्रम्प जी ने मूड खराब कर दिया है पर फिर भी आपको टाइम ईयर ऑफ़ द पर्सन का उपविजेता बनने की भी बधाई। क्या करियेगा, हमीं भारतीयों ने ट्रम्प के लिए हवन पूजा किया था न, भला इतनी जोरदार दुआएं केवल राष्ट्रपति तक थोड़े रूकती, पर्सन ऑफ़ द ईयर भी बना गयी। हाँ इससे हमारे हवन पूजा मार्केट का एक वैश्विक फलक भी तो खुला है, आज दुनिया भर के मित्रों को चुनाव जीतने या पुरस्कार जीतने हेतु भारतीय हवन पूजन की ओर आकर्षण बढ़ा है। हो सकता है कल किसी और देश के प्रत्याशी यहां हवन कराने आयें। इस तरह आपने जान बूझ कर ट्रम्प को आगे कर असल में भारतीय अध्यात्म का ढंका बजवा दिया है और एक नया उद्योग मिला देश को वर्ना जीत तो आप ही की थी। हम सब जानते हैं जी। वैसे भी पुरस्कार विजेता का हो या उपविजेता का, कोई छोटा बड़ा नहीं होता, उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए जब की आप तो "फ़क़ीर "आदमी हैं। आपके लिए तो पुरस्कार और सम्मान कुछ मायने नहीं रखता है, लोग हर मौके कुमौके आपकी फोटो वोटो ही खींचते रहें, आपने हमेशा बस इतने में संतोष किया। दिन भर में आपको जो भी 4-5 कपडे पहनने को मिले, आपने पहन कर संतोष किया। आप जिस दिन जापान से भारत लौट एक सभा में रोये, उस दिन भी केवल 3 कपडे बदले और जिस भी रंग का कुर्ता बंडी आपको दिया गया आपने पहन लिया। जब रोलैक्स की 3.5 लाख वाली घडी मिली ट्राई कर ली, ये बात तो आपके एक अहमदाबादी भक्त ने ही बताई थी। आप हमेशा फ़क़ीर की तरह रहे, बचपन में चाय भी बेचा तो किसी से पैसा न लिया क्योंकि रावण का विमान तक खोज निकालने वाला मीडिया आज तक कोई ऐसा ग्राहक नहीं खोज पाया जो बता पाये की मैंने मोदी जी से चाय पी है और पैसे दिए, आपको काला धन से तभी से नफरत था। आप खान पान में भी साधु फ़क़ीर हैं आजकल, जब दुबई वाले काजू के आटे की रोटी मिली खा लिया, जब शिमला की 37000 वाली मशरूम मिली तो खा लिया। विदेश जहाज़ से घूमना तो मज़बूरी है, पर आपने देश के पायलटों की ख़ुशी के लिए देश के अंदर भी हमेशा फ़क़ीर की तरह हवा में घूमे, कभी रेल यात्रा जैसे विलाषी माध्यम का प्रयोग नहीं किया। अब तो रेल और भी इतना मंहगा कर दे रहे कि आम आदमी भी जहाज़ ही घूमे, रेल जैसे विलाषिता से दूर रहे। आप 22 घंटे काम करते हैं, ढाई साल में छुट्टी नहीं ली। क्या जरूरत है छुट्टी की? कौन सा जसोदा काकी को गोवा लेकर जाना है।
सर,आप तो फ़क़ीर हैं, जैसे तैसे रह लेते हैं, पर पूरा देश थोड़े आपकी तरह महामानव है। ये जल्दी टूट जाता है, जरा सा कष्ट झेलने में हांफ जा रहा है सर। लाइन में लगा उकता जाता है। ये देश और इसकी करोडों देहाती आबादी को पता भी नहीं की आप भविष्य का भारत गढ़ रहे हैं। ये तो रोजमारी करने वाली खाने कमाने वाली जनता है सर, ये क्या जाने की देश कैसे बनता है। ये लोग तो इस खटनी मरनी में दिन गुज़ार देते हैं कि रात की रोटी कैसे बने। सर,मानता हूँ कि ये फेसबुक और व्हाट्सअप पर एक्टिव पीपुल ऑफ़ इंडिया की समझदारी आपके साथ है पर दूसरी तरफ भारत की जनता कहलाने वाली जनता की मज़बूरी भी को तो देखिएगा न सर? आपने मुरादाबाद में कहा कि लोग व्हाट्सअप कर सकते हैं तो पेटीएम क्यों नहीं? ए सर, क्या
ये देश केवल उसका थोड़े है जिनके हाथ में मोबाइल है, ये देश उनका भी तो है न सर जिनके हाथ में खाली कटोरी है। जिनके पास मोबाइल में इंटरनेट नहीं, उनके हाथों में पड़े हुए घट्टे हैं, छाले हैं। ये नेटवर्क के टावर वाले इलाके के लोग नहीं, जंगल और पहाड़ वाले इलाके के भी तो लोग हैं सर।
सर, जिस देश की करोड़ों जनता पेट के लिए पीठ पर बोझ ढोती है वो "पेपीएम" साॅरी टाइपिंग मिस्टेक पेटीएम नहीं कर सकती, जिद कर रहे है आप। ऐसे देश में कैशलेस इकोनॉमी सेंसेलेस माना जायेगा सर।
आप कहते हैं अमेरिका में,स्वीडन में कैशलेस है न सब, तो सर पहले अमेरिका जैसे बना तो लीजिये भारत को। वहां हर जगह स्कूल है, अस्पताल है, रोज़गार है, बैंक है सो कैशलेस भी है, वैसे मेरी रिसर्च में पाया कि अमेरिका में भी 60% ही कैशलेस है, पर भारत में जहां आज तक गांव गांव बिजली नहीं, स्कूल नहीं, अस्पताल नहीं, रोजगार नहीं वहां पेटीएम पंहुचा के कैशलेस करने का दावा एक मजाक है सर। सर,जनता को सारी सुविधाएँ बस जियो के सिम से ही नहीं पहुचाई जा सकती। अम्बानी का रिलायन्स पवनपुत्र हनुमान नहीं।
सर, क्या देश का पीएम जब एक पूरी जमात को किनारे कर पेटीएम करो का नारा देगा तो डर नहीं लगेगा सर? सर आपने कहा था देश बदलेंगे, पर आपने नोट बदल दिया। इस बदलाव की फेसबुक छाप खुशफहमी से निकल जरा गांव देहात भी तो घूमिये न सर। जिस बुढ़िया ने कभी जरुरत पर पोती के शादी के लिए 50-60 हज़ार छुपा के रखे थे और जिसे आज तक गांव के चोर न खोज के निकाल पाये, आपने बैंक में जमा करवा दिए जो गांव में बैंक चार चार दिन लाइन में लगने के बाद भी 2000 ही देता है।
ये कैसी क्रूरतम छापेमारी है सर? सर,ये जो गांव देहात के करोड़ों दादा,बाबा,माई, दादी,मौसी,नानी के छिपे पैसे निकल रहे हैं न ये काला या भूरा धन नहीं बल्कि उनके जीवन का आसरा था, परिवार के मुश्किल के दिनों का सहारा था जिसे कोई बैंक के लॉकर से ज्यादा सुरक्षित रखा था इन माताओं ने। ये गलती से किसी किसी गरीब के लिए  किसी अन्य की मज़बूरी से डाले गए जन धन खाते में आये 1 या 2 लाख रूपये से ज्यादा सफ़ेद और नश्वर धन था। वो पुरानी मटकी और चावल के डिब्बे में रखा पैसा जन धन खाता नहीं, जीवन खाता था और हर घर का आधार था। आज वो आधार छीन गया न सर, हाथ में रह गया है आधार कार्ड की फोटो कॉपी और बदले गए 2 हज़ार के नोट। 
आप मुरादाबाद में लोगों को ब्लैक मेल की क्लास देते नजर आए, 
सर, क्या अब देश के गरीब का दिन इन्ही पैसो से बदलेगा। कम से कम भारत का पीएम तो ऐसा न बोलता सर। ये घास की रोटी खा स्वाभिमान खातिर मिट जाने वाले पुरखों का देश है, शासन चलाने में मूल्यों का तो क़द्र करिये सर। ये लुटेरे बाल्मीकि से संत बाल्मीकि बनाने का देश है,गरीब को लुटेरा बनाने का नहीं।
सर ईधर आपको क्या हो गया है, किसके संगत में हैं? मुरादाबाद में आप बोले की" अगर भ्रस्टाचार से मुक्ति चाहिए, विकास चाहिये तो भाईओं बहनों बजाओ जोर की ताली"।सर ये क्या है? क्या ताली से होगा ये सब। ये मदारियों की भाषा क्यों बोलने लगे आप। सर,आपके पीछे नेहरू,इंदिरा,लोहिया,श्यामा प्रसाद,जार्ज,वाजपेयी जी की परंपरा है भाषण देने की,उनसे सीखिए न कुछ यूट्यूब से। वैसे अगर आप कैश लेस इंडिया में स्पीचलेस रैली करने लगें तो कितना बेहतर होगा. इससे भी अच्छा होगा क़ि आप टेक्नॉलॉजी का प्रयोग करते हुए भाषण भी रिकॉर्ड करवा कर यूटयूब पर डाल दिया जाए. 
सर,माना कि जैसे बिना जिम गए चंद्रगुप्त योद्धा थे,बिना पढ़े अकबर विद्वान थे वैसे बिना कोर्स के आप भी दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री हैं पर सर थोड़ा समाजशास्त्र भी देख लीजिए की कैसे गड़बड़ा गया है देश का।इस पत्र के बाद मुझ पर जो हमला होगा वो जनता हूँ सर, आपके समर्थक से तो डर नहीं पर अनुयायी से गाली सुनूँगा ही।ससोशल मीडिया पर आपकी आलोचना करना मोगेम्बो के अड्डे पर जा मोगेम्बो को छाती ठोक हड़काने जैसा है सो इसका अंजाम जानता हूँ। पर चूँकि सर, डर लगता नही इसलिए लिखबे करूँगा। क्योंकि, सच लिखने में डर जाऊंगा तो घूंट के मर जाऊंगा, इससे अच्छा है लड़ के मर जाऊं। और सर याद रखियेगा, ये फेसबुक पर जयजयकार करती खायी अघाई सेना आपको असली जमींन पर युद्ध हरवा न दे। व्हाट्सअप से निकल जमींन पर पड़े भूखों से मिलिए, समाधान दीजिये वर्ना हर भूखे पेट के अंदर एक युद्ध कुलबुला रहा है, आवाज़ भले नहीं निकल रही, सीधे विस्फोट होगा। क्योंकि मैं किसान का बेटा हूं रोज उस दर्द से रूबरू होता हूं, लोगों की रबी की फसलें बरबाद और बहुत लेट हो गई है, जानवरों को चारा तक नहीं बचा है, इतनी शरदी में बीमार बुजुर्गों को दवाइयों के लिए पैसे नहीं हैं, गरीब मजदूरों को मजदूरी नहीं मिल रही है, शहरों से मजदूरों की वापसी हो रही है। कहीं ऐसा ना हो क़ि आप कैशलेस इकोनॉमी के चक्कर में ग्रेनलेस एग्रीकल्चर भी चालू ना करवा दें. फिर क्या खाना इंटरनेट से डाउनलोड करके खाओगे? बस अंत में एक सवाल और क़ि गुजरात या और किसी राज्य में हार्दिक पटेल जैसा युवा नेता आ गया तो आपकी सरकार तो इंटरनेट बंद करवा देगी, फिर तो आपका नेट पेमेंट बंद भी हो जाएगा. आप कौन से इकॉनमिक सुधार की उम्मीद कर रहे हैं दूसरे क्वार्टर में जीडीपी. 3% बढा लेकिन न ईएमआई कम हुई न ब्याज दर? आप दुनिया की कौन अर्थनीति के फार्मूले से इसे बढाएंगे? मुझे अपना शुभचिंतक ही जानिए, दुश्मन नहीं हूँ,इसी देश का हूँ,आप मेरे भी पीएम हैं सर। जय हिंद।
आपका शुभचिंतक
और कैश"लेश" का छोटा भाई कम"लेश"

Monday, November 28, 2016

कैशलेस इकॉनमी मतलब राम राज्य?

ये कैशलेस इकॉनमी क्या है? क्या इससे जीडीपी बढ जाएगा? क्या टैक्स चोरी खत्म हो जाती है, मेरे लिए यह नया विषय था तो थोडा रिसर्च करना पडा। देखा तो पाया कि अमेरिका में 30 से 32 लाख करोड़ की टैक्स चोरी हर साल होती है। जिस तरह से भारत में आयकर विभाग है उसी तरह से अमेरिका के इंटरनल रेवेन्यू सर्विस की एक रिपोर्ट इसी साल अप्रैल में छपी है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2008 से 2010 के बीच हर साल औसतन 458 अरब डालर की टैक्स चोरी हुई है। अगर मैंने इसका भारतीय मुद्रा में सही हिसाब लगाया है तो अमरीका में 30 से 32 लाख करोड़ रुपये सालाना टैक्स चोरी हो जाती है। यह आंकड़ा इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में नोटबंदी के बाद से कैशलेश का ऐसा प्रचार किया जा रहा है जैसे ये हाजमोला की गोली है जो अर्थव्यवस्था की बदहज़मियों को दूर कर देगी। कहा जा रहा है कि भारत में टैक्स चोरी बंद हो जाएगी या कम से कम हो जाएगी लेकिन अमेरिका में कहाँ कम हो गई। कहां बंद हो गई है।
फ्रांस की संसद की रिपोर्ट है कि हर साल 40 से 60 अरब यूरो की टैक्स चोरी होती है। 60 अरब यूरो को भारतीय मुद्रा में बदलेंगे तो यह चार लाख करोड़ होता है। वहां का टैक्स विभाग 60 अरब यूरो की कर चोरी में से 10 से 12 अरब यूरो ही वसूल पाता है। यानी 30 से 50 अरब यूरो की टैक्स चोरी वहां भी हो ही जाती है। ब्रिटेन में हर साल 16 अरब यूरो की टैक्सचोरी होती है। भारतीय मुद्रा में 11 हज़ार करोड़ की चोरी। जापान के नेशनल टैक्स एजेंसी ने इस साल की रिपोर्ट मे कहा है कि इस साल 13.8 अरब येन की टैक्स चोरी हुई है। भारतीय मुद्रा में 850 करोड़ की टैक्स चोरी होती है।1974 के बाद वहां इस साल सबसे कम टैक्स चोरी हुई है।
मान लीजिए कि पूरी आबादी इलेक्ट्रानिक तरीके से लेन-देन करती है तो भी यह गारंटी कौन अर्थशास्त्री दे रहा है कि उन तमाम लेन-देन की निगरानी सरकारें कर लेंगी। क्या यह उनके लिए मुमकिन होगा। अगर ऐसा है तो सरकार सभी बैंक खातों की जांच कर ले। हमारे बैंक तो इलेक्ट्रानिक हैं न। कई लोग कहते हैं कि बैंकों में अभी भी लोगों के कई नाम से खाते खुले हैं। बैंक अपने ग्राहकों से पहचान पत्र मांगता है तब भी बैंकों में खाता खोलकर काला-धन रखा ही जाता है। आयकर विभाग तमाम शहरों के कुछ बड़े दुकानदारों या बिजनेसमैन के यहां छापे डालकर लोगों में भ्रम पैदा करती है, सरकार सबको पकड़ रही है। क्या आप यह बात आसानी से मान लेंगे कि सांसदों, विधायकों के पास काला धन नहीं है। क्या सभी दलों के सांसदों या विधायकों के यहां छापे की ख़बर आपने सुनी है।
दुनिया में आप कहीं भी टैक्स चोरों का प्रतिशत देखेंगे कि ज़्यादातर बड़ी कंपनियां टैक्स चोरी करती हैं। आप उन्हें चोर कहेंगे तो वे आपके सामने कई तरह के टेक्नीकल नामों वाले एकाउंट्स रख देंगे। लेकिन कोई किसान दो लाख का लोन न चुका पाये तो उसके लिए ऐसे नामों वाले एकाउंट या बहीखाते नहीं होते। उसे या तो चोर बनने के डर से नहर में कूद कर जान देनी पड़ती है या ज़मीन गिरवी रखनी पड़ती है। क्या उनके लिए आपने सुना है कि कोई ट्राइब्यूनल है। 2015 में Independent Commission for the Reform of International Corporate Taxation(ICRIT) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट टैक्स सिस्टम बेकार हो चुकी है। अब बताइये, जिसकी तरह हम होना चाहते हैं, उसे ही बेकार और रद्दी कहा जा रहा है। इंटरनेट सर्च के दौरान ब्रिटेन के अख़बार गार्डियन में इस रिपोर्ट का ज़िक्र मिला है। इतने तथ्य और रिपोर्ट हैं कि आपको हर जानकारी को संशय के साथ देखना चाहिए। इस रिपोर्ट का कहना है कि मल्टीनेशनल कंपनियां जिस मात्रा में टैक्स चोरी करती हैं उसका भार अंत में सामान्य करदाताओं पर पड़ता है। क्योंकि सरकारें उनका तो कुछ बिगाड़ नहीं पाती हैं। एक दो छापे मारकर अपना गुणगान करती रहती हैं। इन मल्टीनेशनल कंपनियों के टैक्स लूट के कारण सरकारें गरीबी दूर करने या लोक कल्याण के कार्यक्रमों पर ख़र्चा कम कर देती हैं।
इसका मतलब यह है कि दुनिया भर की कर प्रणाली ऐसी है कि एक देश का अमीर दूसरे देश में अपना पैसा ले जाकर रख देगा। उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इसी साल इंडियन एक्सप्रेस ने पनामा पेपर्स पर कई हफ्तों की रिपोर्ट छापी कि कैसे यहां के बड़े बड़े लोग फर्ज़ी कंपनी और शेयर के ज़रिये विदेशों में अपना पैसा रखे हुए हैं। सरकार जांच-वांच का एलान करती है मगर इस रफ्तार से काम करती है कि अंतिम नतीजा आते आते आप सबकुछ भूल चुके होंगे। नोटबंदी के सिलसिले में सब स्लोगन बोल रहे हैं। काला धन चला जाएगा। टैक्स चोरी बंद हो जाएगी। क्या भारत में नेशनल और मल्टीनेशनल कंपनियों की टैक्स चोरी बंद हो जाएगी? इस विश्वास का आधार क्या है? क्या अमरीका में 30 लाख करोड़ रुपये की टैक्स चोरी ग़रीब और आम आदमी करता है। वहां भी बड़ी कंपनियां टैक्स चोरी करती हैं। जानबूझ कर करती हैं ताकि टैक्स अदालतों में लंबे समय तक मामला चले और फिर अदालत के बाहर कुछ ले-दे कर सुलझा लिया जाए।
अमरीका में 70 प्रतिशत लोगों के पास डेबिट या क्रेडिट कार्ड हैं। आखिर अमरीका जैसे अति विकसित देश में 30 प्रतिशत लोगों के पास कार्ड क्यों नहीं है। ज़ाहिर है वे निर्धन होंगे। उनके पास बैंक में रखने के लिए पैसे नहीं होंगे। बैंक भी सबका खाता नहीं खोलते हैं। ग़रीब लोगों को अमरीका क्या भारत में भी कंपनियां क्रेडिट कार्ड नहीं देती हैं। अमरीका में भी दिहाड़ी मज़दूर होते हैं जो नगद में कमाते हैं। वहां क्यों नहीं इसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया जो भारत में कुछ लोग इसे राष्ट्रवाद में लपेट कर धमकी भरे स्वर में बता रहे हैं कि यह आर्थिक तकलीफों से मुक्ति का श्रेष्ठ मार्ग है। गार्डियन अखबार में कैशलेश अर्थव्यवस्था पर आर्थिक पत्रकार Dominic Frisby का एक क्रिटिकल आर्टिकल पढ़ा। इसमें उन्होंने कहा है कि कैशलेश का नारा दरअसल ग़रीबों के ख़िलाफ़ युद्ध का नारा है। ग़रीबी के ख़िलाफ़ नहीं। उन्होंने कहा है कि जिस तरह से इसकी वकालत की जा रही है, उन नारों को सुनेंगे तो लगेगा कि नगद का इस्तमाल करने वाले लोग अपराधी हैं। आतंकवादी हैं। टैक्स चोर हैं। अब सवाल उठता है क़ि ये डिजिटलाइजेशन की सिक्योरिटी की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? जबतक आप ज़मीन पर सुधार नहीं करेगे हवा को कैसे साफ करेंगे? कोई मुझे बीएमसी का एक काम बिना पैसे के करवा के दिखा दे तो मैं जानूं, पहले वो तो ख़तम करो. ओनलाइन सिक्योरिटी की ये हालत है क़ि राहुल गाँधी जैसे बड़े नेता का ट्विटर एकाउन्ट हैक हो गया, फिर कांग्रेस का हो गया, फिर मोदी जी का एप हैक हो गया, कुछ दिन पहले खबर आई क़ि देश के 30 लाख डेबिट कार्ड्स की जानकारी हैक हो गई, कई करोड़ रुपए तो निकाल भी लिए गए, सरकारों की वेबसाइट्स हैक हो रही हैं लेकिन कोई भी हैकर पकड़ा नहीं गया. देश में ई कॉमर्स करोड़ो का कारोबार हो रहा है लेकिन उनकी चारसौ बीसी के खिलाफ एक ढंग का क़ानून नहीं है, और ना ही कोई शिकायत का ठीक ठाक फोरम. इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
भारत के पूरे काले धन का 6% केवल कैश में है, और भारत के पूरे कैश का  86% नोट बंद हो गया है, केवल 14% पर भारत चल रहा है. तो हम केवल 6% के लिए पूरे देश को कैसे लाइन में लगा सकते हैं? बाकी का 94% ब्लैक मनी पर तो कुछ भी एक्शन ही नहीं हो रहा है? मतलब साफ है ये केवल और केवल सर्जिकल स्टाइक के जैसे राजनीतिक फायदे के लिए हुआ था, नहीं तो चार दिन पहले फिर से 7 जवान कैसे शहीद हो गए? कैसी सुरक्षा है तुम्हारी? पिछले 4 महीने में 41 जवान शहीद हो चुके हैं और एटीएम में खड़े आदमी को सेना के जवान के साथ जोड़कर उसकी अहमियत को कम करते हैं. हमारा काम लाइन में लगना नहीं है, अगर मैं छुट्टी करके लाइन में लगूंगा तो कमाउँगा क्या? फिर खाने और खरीदने को क्या होगा? फिर सरकार टैक्स कैसे ले पाएगी मुझसे? फिर उन सैनिकों को सेलरी कैसे देगी?  कहते हैं कहाँ नुकसान हुआ? अरे गाँवों में जाकर देखो, लोगों के खेत सूख गए, मजदूर और किसान सुबह जाते हैं लाइन में लगने और शाम को 2000 लेकर आते हैं जो कोई दुकानदार लेता नहीं है, मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है, बच्चे भूखे मर रहे हैं. मेरे गाँव में लोगों के कोल्डस्टोरेज में रखे हज़ारों क्विंटल आलू सीजन पर कोई खरीद नहीं रहा है, कल मेरे चाचा ही दिल्ली की आज़ाद मंडी लेकर गए तो ट्रक का भाड़ा तक नहीं निकला जो आलू 1400 रुपए पैकेट था 8 तारीख के पहले वो 350 रुपए में बिका. बहुत लोगों ने तो कोल्ड स्टोरेज से निकाले ही नहीं. बहुत लोगों ने तो फेक दिए, मिर्ची की भी फसल का वहाँ अंतिम समय है कोई व्यापारी खरीद नहीं रहा है, गेंहूँ की फसल 20-25 दिन लेट हुई जा रही है, अगले साल के उत्पादन में बहुत कमी होने वाली है. फिर देखते हैं यही कैश ही खा लेना सब लोग. धारावी भिवंडी के कारखाने बंद होने से प्रवासी मजदूर वापस जा रहे हैं, इसका असर भले ही अभी आपको ना दिखे लेकिन अगले 2-3 साल तक जीडीपी की 2-3% कमी के साथ होगा.
अब आते हैं इलेक्ट्रिक पेमेंट सिस्टम पर. देश में कितने % लोग हैं जो स्मार्ट फ़ोन यूज करते हैं? क्या देश में आपके एप डाउनलोड करके सपोर्ट करने वाले ही रहते हैं? देश में बहुत लोग अनपढ़ और ग़रीब हैं वो क्रेडिट डेबिट कार्ड या एप नहीं चला सकते हैं. अमेरिका का उदाहरण तो मैने दिया ना? फिर इससे मंहगाई तो बढ़ेगी ही ना? हर दुकानदार इन सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों को 2-3% सर्विस चार्ज देगा तो वो अपना मार्जिन तो उतना ही रखेगा, और आम आदमी से वसूलेगा.
अंत में एक सवाल और आपसे करना चाहता हूँ क़ि क्या कोई मर्डर कर दे और कह दे क़ि मैं आरोपी हूँ तो वो बच जाना चाहिए? नहीं ना? ठीक उसी तरह एक काला धन रखने वाला अपना कालाधन बता कर कैसे बच सकता है? चाहे वो आतंकवाद का पैसा हो? चाहे वो लोगों की हत्याएँ कराकर कमाया गया पैसा हो? चाहे वो चोरी का पैसा हो? चाहे वो ड्रग्स सप्लाई करके कमाया गया पैसा हो? मार्केट में दलाल लोग 20-30% में नोट बदल कर दे रहे हैं, लेकिन वो नोट भी कालेधन में ही रहते हैं, इसलिए सरकार ने इसी लाइन में आकर 50% में उसको पूरा सफेद करने का ठेका ले लिया. पीएम बोलते थे कि जिसके पास भी कालाधन है बचेगा नहीं? गंगा में नोट बहाने से कोई नहीं बचेगा? लेकिन ये सब जोश तब ठंडा हुआ जब इनके कॉरपोरेट आकाओं के यहाँ से फ़ोन आया होगा? वही कॉरपोरेट आका जिनको 1 रुपए में ज़मीन दी जाती है, कांग्रेस भी उनसे करोड़ो रुपए चंदा लेती थी, आज बीजेपी भी लेती है. 2014 के चुनाव में मोदी जी ने अपने चुनाव प्रचार पर 600 करोड़ रुपए खर्चा किए थे, वो कहाँ से आए थे? आज भी यूपी के चुनाव में वो रैलियाँ हो रही हैं. अड़ानी के प्लेन में घूमने वाले मोदी भिखारी कैसे हो गए? 10 लाख का सूट पहनने वाले फकीर कैसे हो गए? ट्रिकल डाउन थ्योरी इकॉनोमी (मतलब अमीर का विकास होगा तो ग़रीब का खुद ब खुद हो जाएगा) ऐसा सोचनें वाले ग़रीबों के हमदर्द कैसे हो गए? ऐसे में सवाल उठता है क़ि वो आदमी क्यों रोता है जो पिछले समय में लाशों के अंबार देखकर कभी नहीं रोया होगा? ये गुण एक तानाशाह के गुण हैं, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1889 में लिखा था क़ि दुनियाँ का हर तानाशाह राष्ट्रवाद का चेहरा लगाकर आगे बढ़ता है, वो जनता के बीच अपने झंडे(भगवा) को नीचे रखकर देश के झंडे (तिरंगे) को लेकर जाता है. कभी इंदिरा इज इंडिया कहा जाता था आज मोदी भक्ति को देश भक्ति कहा जाता है. हो सकता है मुझे भी देशभक्त ना समझा जाए, लेकिन ये लोकतंत्र है "लोक" का मतलब होता है लोग......... और लोग केवल मुंबई दिल्ली में ही नहीं गाँवों में भी रहते हैं, स्मार्ट फ़ोन नहीं हो सकता हैं उनके पास, जिनके पास रोटी नहीं है. अभी एक महीने पहले यूएन की वर्ड हॅंगर इंडेक्स की रिपोर्ट आई जिसमें भुखमरी और कुपोषण के मामले में बांग्लादेश और नेपाल तक हमसे आगे हैं, हम  पूरे विश्व में 97 नंबर पर हैं और पाकिस्तान 105 मतलब खुश हो सकते हैं क़ि पाकिस्तान से आगे हैं.
नोटबंदी ने हमें अपनी आर्थिक समझ का विस्तार करने का सुनहरा मौका दिया है। हमें नारों को ज्ञान नहीं समझना चाहिए। किसी बात को अंतिम रूप से स्वीकार करने की जगह, तमाम तरह की जानकारियों को जुटाइये। तरह तरह के सवाल पूछिये। फैसला सही है या नहीं है, इसके फेर में क्यों पड़े हैं। फैसला हो चुका है। इसके अच्छे-बुरे असर को जानना चाहिए और इसके बहाने समझ का विस्तार करना चाहिए। हम सब जानते हैं कि राजनीतिक रैलियों में लोग कैसे लाये जाते हैं। ज़ाहिर है अब नेता उन्हें हज़ार-पांच सौ का चेक देकर तो नहीं लायेंगे। नेता ही कहते हैं कि उनकी रैली में पैसे देकर लोग लाए गए थे। अब ऐसी रैली में अगर कोई काला धन की समाप्ति का एलान करे तो पैसे लेकर आई भीड़ ताली तो बजा देगी लेकिन जिस असलीयत को वह जानती है, उससे आंखें कैसे चुरा सकती है। एक काम हो सकता है कि जिस रैली में काला धन की समाप्ति का एलान हो, उसमें कहा जाए कि यहां आई जनता को पैसे देकर नहीं लाया गया है। इस रैली के आयोजन में इतना पैसा ख़र्च हुआ है, कुर्सी से लेकर माइक के लिए इतना इतना किराया देना पड़ा है, इन इन लोगों ने रैली के लिए चंदा दिया है। बेहतर है कि नोटबंदी के लोग किये जा रहे दावों को छोड़ हम सवालों से देखें। हर जवाब हमारी आर्थिक समझदारी को विकसित करेगा। हम भी उतने योग्य नहीं है कि अर्थव्यवस्था के इन बारीक सवालों को दावे के साथ रख सकें। मैंने कोई अंतिम बात नहीं की है। आप भी अंतिम बात जानने का मोह छोड़ दें, नई बातें जानने की बेचैनियों का विस्तार करें।

Thursday, November 24, 2016

पीएम के सर्वे पर आम आदमी के जवाब

भारत सरकार का अति आत्मविश्वास देखिए क़ि खुद ही सर्वे कराकर कह दिया क़ि 93% लोग उनके इस फ़ैसले से खुश हैं. आख़िर यह कौन सा जनमत संग्रह है जहाँ लोगों की राय ली ही नहीं गई? 
देखना पड़ेगा क़ि देश में कितने % लोगों के पास स्मार्ट फ़ोन हैं, उनमें से कितने % लोग इंटरनेट यूज करते हैं उनमें से भी कितने % लोग एप डाउनलोड करके वोट करने वाले हैं..... भारत की 130 करोड़ जनता में से 5 लाख लोगों ने ट्विटर ट्रेंड के जैसे वोट कर दिया और खुद ही कह दिया क़ि 93% लोग खुश हैं. आप अगर यही चश्मा और कुछ दिन लगाए रहे तो मुझे उम्मीद है उसके परिणाम बहुत भयानक होंगे. मैं न केवल भाजपा का आलोचक राजनीतिक व्यक्ति बल्कि एक अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेशन से जुड़ा हुआ आदमी भी हूँ, इसलिए कह रहा हूँ. मैं गाँव से भी हमेशा जुड़ा हुआ हूँ, मेरा परिवार वहाँ है तो रोज पता करता रहता हूँ, लोगों की समस्याएँ केवल बैंक के बाहर लगी लाइनों में ही नहीं और भी हैं. ख़ासकर किसानों ने जो नुकसान झेला है उससे उनके 4-5 साल तक ना उबर पाने की आशंका है. लोगों को हताशा में मरने के अलावा कुछ नहीं दिखाई दे रहा है. मैं यहाँ उत्तर भारतीय प्रवासी हूँ इसलिए अकसर लेवरों जो मेरे गाँव के आस पास के होंगे उनसे भी मिल रहा हूँ बेचारे घर पर बैठे हैं.....उनको खाने के भी वांदे हो गए हैं. ऐसे बहुत सी समस्याएँ हैं जिनको गिनाते गिनाते शाम हो जाएगी. रही बात क्या अच्छा हुआ? कितना काला धन बाहर आया? आगे सब ईमानदारी से हो जाएगा? इसके सब जवाब मुझे पता हैं रोज ऐसे सैकड़ो लोग और केश देखता रहता हूँ. और असल में यही लोग तो हैं जो इस सर्वे में भाग लेकर इसपर खुशी जाता रहे हैं. उनको डर है क़ि अगर वोट नहीं दिया मोदी के पक्ष में तो लोग चोर ना समझ लें. जो आम आदमी है उसको तो अधिकार ही नहीं दिया उनकी राय लेने का? क्या केवल जनता एप और स्मार्ट फ़ोन वाली ही है? ये कैसा लोकतंत्र? मोदी जी ने 10 सवाल किए आज मैं उन दस सवालों के जवाब उन ग़रीब लोगों की तरफ से देना चाहता हूँ......
1. क्या आपको लगता है कि भारत में काला धन है...?
जवाब : क्या मज़ाक करते हो साहब? ये कोई सवाल हुआ? 5वीं क्लास के बच्चे से पूछ लो वो भी हाँ में ही जवाब देगा? जब आपको पता नहीं है तो कैसे 2014 के पहले खूब चिल्ला चिल्लाकर कहते थे क़ि क़ालाधन बाहर लाना है. नहीं पता तो बाबा राम देव से पूछ लो? उनको पूरी डीटेल्स पता हैं. कहाँ है, किसके पास है.? 
2. क्या आपको लगता है, भ्रष्टाचार और काले धन की बुराई से लड़कर उसे खत्म करने की ज़रूरत है...?
जवाब : प्रधानमंत्री जी आप गजब करते हो. अगर आप कलमाडी, एदूरप्पा और शिवराज सिंह चौहान से भी पूछ लोगे तो वो भी हाँ ही बोलेंगे? पिछले ढाई साल में आपने लोकपाल की नियुक्ति नहीं की. गुजरात में 12 तक आपने लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं होने दी. कैसे हम विश्वास कर लें क़ि आप भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हो? बीएमसी, एमसीडी से लेकर देश के हर मुंसीपल कॉरपोरेशन में भ्रष्टाचार है, सत्तासीन लोग आपकी पार्टी के हैं, लेकिन वहाँ एक भी कोशिश नहीं की गई. ये जो रैलियों में 100-150 करोड़ खर्चा हो रहा है वो कहाँ का पैसा है? आप राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई में क्यों नहीं लाना चाहते हैं? नियत सॉफ पता चलती है क़ि भ्रष्टाचार से लड़ना है या कुछ और ही इरादा है. 
3. कुल मिलाकर काले धन से निपटने के लिए सरकार के कदम के बारे में आप क्या सोचते हैं...?
जवाब :  (मैं एक आम आदमी की तरफ से ये जवाब दे रहा हूँ.) देखिए प्रधानमंत्री जी, सच बात तो यह है कि आपके इस सवाल से पहले हमें मौका ही नहीं मिला था कि सोच सकें कि आपका कदम कैसा है. पहले सारा वक्त बैंकों की कतार में, एटीएम की लाइन में खत्म हुआ. नौकरी के लिए किसी तरह समय निकला. फिर बाक़ी वक्त अख़बार और टेलीविज़न में खप गया. पता नहीं, क्या-क्या दिखाते रहे, 20 मर गए, 30 मर गए, 40 मर गए. कोई गृहिणी बीमार बच्चे को घर छोड़कर आई तो कोई अपनी बेटी की शादी के लिए पैसे के लिए भटकता मिला. मज़दूरों को रोज़ी नहीं मिल रही है, किसानों के पास कटाई के भुगतान और नए बीज के लिए पैसे नहीं हैं, रोज़ी मिल नहीं रही है, फैक्ट्री में छंटनी होने वाली है... और न जाने क्या-क्या. 
हमारी समझ कम है, लेकिन यह तो फिर भी समझ आ गया कि जितना काला धन आप सोच (या बता) रहे हैं, उतना तो ठेंगा आपके हाथ नहीं आने वाला. शराब ठेकेदार से लेकर शराब निर्माता तक, पीडब्लूडी विभाग के भ्रष्टतम इंजीनियर से लेकर आपकी पार्टी के मंत्रियों तक सब निश्चिंत दिख रहे हैं. सबका जुगाड़ हो गया है, उल्टे वे कह रहे हैं कि 10-20 परसेंट दिला दें, तो वे दूसरों का भी ठिकाने लगा देंगे. मैंने सुना कि 8 नवंबर की रात अफसरों और नेताओं की बीवियों ने सोने की बड़ी खरीदारी की. एक मुख्यमंत्री की पत्नी के ऑर्डर की बड़ी चर्चा भी सुनी. लेकिन साहब, ये आपके अफ़सर जो हैं न, हैं बड़े निठल्ले. किसी को पकड़ ही नहीं पाए आज तक. अरे, दो-चार बीवियां भी जेल जातीं, तो आपके कदम का असर दिखता.
दूसरी बात यह समझ आई कि काला धन तो सोना-चांदी, फ्लैट, ज़मीन-जायदाद, खेतों और शेयरों आदि में लगा है. ज़्यादातर बेनामी. सो, आप तो उनका कुछ कर नहीं पाएंगे. और देखिए न, लोगों ने यह भी कहना शुरू कर दिया है कि विदेशी खातों में जमा काले धन में आपकी दिलचस्पी ही नहीं, तभी तो आपने न जर्मनी की सरकार की बात पर तवज्जो दी, न उस व्हिसलब्लोअर को, जिसने आपको सहयोग का प्रस्ताव दिया था. विद्वान लोग कह रहे हैं कि इस नोटबंदी का असर दो महीने बाद देखना, सो, हम भी उसी इंतज़ार में हैं.
4. भ्रष्टाचार के खिलाफ नरेंद्र मोदी सरकार के प्रयासों के बारे में आप क्या सोचते हैं...?
जवाब : सच कहें साहब, तो इस बारे में हम कुछ कह नहीं पाएंगे, क्योंकि हमें एक्को प्रयास के बारे में अब तक पता नहीं चला. आपकी अपनी सरकार के बारे में कोई घोटाला अब तक पकड़ में नहीं आया है, लेकिन इसे सावधानी कह सकते हैं... इसे प्रयास में कैसे गिनें, बताइए भला...? लोग उल्टी बातें ज़रूर कहते-सुनते रहे कि आपकी सरकार ने विजय माल्या को भगा दिया, आपने अपने किसी कारोबारी दोस्त को फलां ठेका दिलवा दिया, आप अपने मुख्यमंत्रियों के काले कारनामों को अनदेखा करके चलते हैं, आपने नोटबंदी की सूचना पहले से लोगों को दे दी थी आदि. लेकिन लोगों की बात कितनी सुनेंगे और कहां तक सुनेंगे. हमें तो अब आपका ही फॉर्मूला ठीक लगने लगा है, किसी की मत सुनो. अरे कुछ नहीं तो कांग्रेस वालों को ही जेल में डाल दो, कुछ लड़कर तो दिखाइए.
5. 500 और 1,000 रुपये के नोट बंद करने के मोदी सरकार के प्रयासों के बारे में आप क्या सोचते हैं...?
जवाब : इसपर देश में डिस्कोर्स क्या है? कोई पति पत्नी पर जोक कर देता है तो कोई 15 लाख ना माँगने पर कोई ढंग का विमर्श ही किधर हुआ? अख़बार में पढ़ा साहब, एक आदिवासी 500 रुपये का एक नोट लेकर 90 किलोमीटर दूर बैंक पहुंचा, लेकिन पैसा मिला नहीं. 20-25 किलोमीटर पैदल चलकर एक नोट बदलवाने वाले तो दर्जनों लोगों के बारे में सुना. लोगों के दिल की धड़कनें रुकने की ख़बर मिली. जैसा हमने पहले भी कहा, बेटी की शादी के लिए बदहवास पिता के बारे में टीवी पर देखा. पता नहीं, आपको ये सब ख़बरें मिलती हैं या नहीं. कुछ लोग कह रहे हैं कि आपने देशहित में बहुत बड़ा क़दम उठाया है. वे कह रहे हैं कि इसके बाद हमारी अर्थव्यवस्था चीन को पीछे छोड़कर अमेरिका के करीब पहुंच जाएगी. 
6. क्या आपको लगता है कि नोटबंदी से काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद को रोकने में मदद मिलेगी...?
जवाब : आपने तो दावा ठोक ही रखा है कि ऐसा होने वाला है. अगर इसके उलट कुछ कहें तो आपके भक्तजन देशद्रोही होने से लेकर पाकिस्तानी होने तक कुछ भी कह सकते हैं, इसलिए डर लगता है. फिर भी आपने पूछा है तो बता देते हैं कि काले धन पर रोक तो शायद नहीं लगने वाली, इसकी रफ्तार थोड़े दिनों तक धीमी हो सकती है, प्रॉपर्टी बाज़ार से लेकर सोने-चांदी तक सबकी ख़रीद धीमी पड़ जाएगी और हो सकता है, इस बार आपके इन्कम टैक्स वालों को अतिरिक्त काम करना पड़े. लेकिन यह थोड़े दिन की बात है. आपने जो किया है, वह छोटा ऑपरेशन भर है. देश की अफरातफरी से भ्रम में मत पड़िएगा. वह तो गरीब, मज़दूर, किसान और गृहिणियों की भगदड़ है.
मुझे तो एक भी सेठ, अफसर, ठेकेदार या बिचौलिया बदहवास नहीं दिखा. भ्रष्टाचार इससे कैसे रुकेगा, यह ज्ञान तो आप जैसा कोई ज्ञानी ही दे सकता है. हमें तो कुछ रुकता दिख नहीं रहा है. जब बैंक का अफसर ही दस टका लेकर नोट बदल रहा है, तो कहां रोकिएगा भ्रष्टाचार को...? हां, यह हो सकता है कि आप अपनी पार्टी से इसकी शुरुआत कर दें और पहले अपने सारे सांसदों और विधायकों की संपत्ति की जांच करवा दें. आपकी नाक के नीचे एक रेड्डी साहब 500 करोड़ की शादी कर गए और बदले में छापा भी नहीं पड़ा, नोटिस भर मिला. विरोधियों का भ्रष्टाचार रोककर अपनों को छूट देने की नीति काम नहीं आएगी. आतंकवाद का जहां तक सवाल है, तो हमारा आकलन है कि इससे रत्तीभर फर्क नहीं पड़ने वाला. कल ही एएन आई की खबर आई क़ि कश्मीर में आतंकवादियों के हमले अभी भी चालू हैं कई जगह, बस इंडियन मीडिया का इंटरेस्ट ख़त्म हुआ है वहाँ से. एक फोटो भी उसी न्यूज एजेंसी ने एक फोटो पोस्ट किया जिसमें आतंकियों के पास 2-2 हज़ार के नोट के बंडल थे. उनके लाखों 2-2 हज़ार के नोट कैसे आए?  जब तक नक्सलियों को आपकी पार्टी के नेता पैसे पहुंचाते रहेंगे, उन्हें किस बात की चिंता...? यक़ीन नहीं...? पूछिएगा अपने मुख्यमंत्री से, किसी डायरी में किस-किसका नाम था.
7. क्या नोटबंदी से ज़मीन-जायदाद, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य तक आम आदमी की पहुंच बनेगी...?
जवाब : पहले तो आप बताइए कि आप आम आदमी किसे कहते हैं...? एक चौथाई से अधिक आबादी तो गरीबी रेखा से नीचे है. लगभग 10 फीसदी आबादी वह है, जो हाल ही में गरीबी रेखा के दायरे से बाहर हुई है, यानी वह अब भी बहुत गरीब है. फिर बड़ी संख्या में लोग औसतन गरीब हैं. गिनती के लोग हैं, जिन्हें आप मध्यवर्ग में गिन सकते हैं. प्यू रिसर्च और ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट दोनों का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय पैमाने से केवल 2.3 करोड़ लोग मध्यवर्ग में आते हैं. तो आपकी परिभाषा का आम आदमी यदि मध्यवर्ग से आता है, तब तो यह सवाल ही अप्रासंगिक है. लेकिन अगर ग़रीबों को आप आम आदमी मानते हैं, तो बात अलग हो जाती है. माफ़ करिए फ्लो में इंट्र्प्ट कर रहा हूँ, इसी बीच खबर आई है क़ि 39000 रुपए से अधिक जमा करने वाले परिवार को आप बीपीएल लिस्ट से बाहर कर रहे हैं. क्या 39000 साल मतलब 3250 प्रति महीने और 108 रुपए प्रति दिन कमाने वाला ग़रीबी रेखा से बाहर हो जाता है? आप ग़रीबी ख़त्म कर रहे हैं या ग़रीब?
विद्वानों का अनुमान है कि कुछ समय के लिए प्रॉपर्टी के दाम घटेंगे, लेकिन इसका लाभ आम आदमी उठा पाएगा, कहना कठिन है, क्योंकि नोटबंदी के बाद उसके जीवन में भी बहुत कुछ बदलने वाला है. उच्च शिक्षा अभी भी हमारे देश में यूरोप और अमेरिका की तरह बहुत महंगी नहीं है, क्योंकि हमारे यहां अभी उच्च शिक्षा का महत्व भी कम है. एक चपरासी की नौकरी निकाल दीजिए तो लाख दो लाख उच्चशिक्षा पाए लोग आवेदन दे देंगे. स्वास्थ्य का जहां तक सवाल है, तो इसका कोई संबंध नोटबंदी से हमें समझ में नहीं आता. वह पहले भी आम आदमी की पहुंच से दूर था, और अभी भी रहेगा.

8. भ्रष्टाचार, काले धन, आतंकवाद और नकली नोटों से इस लड़ाई में आपको जो असुविधा हुई, क्या आपको उसका बुरा लगा...?
जवाब : यह सवाल जाकर एक बार पूछिए सुबह से कतार में लगे भूखे-प्यासे लोगों से, किसानों से या फिर उस आदिवासी से, जिनमें से अधिकांश को अभी पता ही नहीं है कि बांस के किसी टुकड़े में सहेजकर रखा गया उसका रुपया अब रद्दी के टुकड़े में बदल चुका है. हमारा अनुमान है कि आप इन सवालों के जवाबों को एक सर्वे की तरह प्रकाशित करवाएंगे कि देखिए 80 फीसदी लोगों को तकलीफ नहीं है. लेकिन आप यह नहीं बताएंगे कि यह सर्वे सिर्फ़ 2.3 करोड़ जनता के बीच हुआ है और लगभग 98 प्रतिशत जनता को आपने जवाब देने का मौका ही नहीं दिया है. फिर भी मैंने पूरी दुनियाँ में फेक करेंसी पर रिसर्च किया है तो बताना चाहता हूँ क़ि दुनियाँ का कोई भी डॉलर ऐसा नहीं है जिसकी फेक कॉपी नहीं आती है. सबसे अधिक उसकी ही आती है. आपने इस नोट में भी ऐसा कुछ नहीं किया है जो पहले वाले नोट से बेहतर सिक्योरिटी रखता है. बस जी न्यूज वाले सुधीर जैसे लोगों से ही फर्जी चिप की खबर आई थी. बाकी तो सब फेक है. 
9. क्या आप मानते हैं कि कुछ भ्रष्टाचार विरोधी लोग खुले आम काले धन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के समर्थन में लड़ रहे हैं...?
जवाब : मैंने जब जवाब लिखना शुरू किया था तो सोचा था कि एक प्रधानमंत्री अपने देश की जनता से सवालों के जवाब जानना चाहता है. लेकिन प्रधानमंत्री जी, मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि ये सवाल एक आम बीजेपी कार्यकर्ता या संघ के सेवक के सवाल हैं. राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के दंश से पीड़ित और आहत. एक ऐसे बेचारे राजनीतिज्ञ का सवाल, जो देश को देश की तरह नहीं, राजनीतिक विचारधाराओं में बंटे खेमे में देखता है. आपको नाम लेकर पूछना चाहिए कि फलां-फलां लोग नोटबंदी का विरोध करके क्या हमारी छवि को गोबर में मिलाने का षडयंत्र कर रहे हैं...? तब इसका जवाब आसान होता. जो आपके किसी निर्णय के खिलाफ है, वह भ्रष्टाचार, काले धन और आतंकवाद का समर्थक हो गया...? यह तो लोकतंत्र की परिभाषा नहीं है, प्रधानमंत्री जी. आप जुमले उछालकर राजनीति कर सकते हैं, तो आपके जुमलों का मज़ा लेने की राजनीति भी करने दीजिए.
10. क्या आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोई सुझाव या आइडिया देना चाहेंगे...?
जवाब : ज़रूर. ऐसा मौक़ा कब आएगा कि एक साधारण नागरिक प्रधानमंत्री को सुझाव दे सके. पहला सुझाव यह कि आप प्रधानमंत्री हैं, तो प्रधानमंत्री बनकर रहिए. आपकी बातों से किसी आम राजनीतिक कार्यकर्ता जैसी बू नहीं आनी चाहिए. दूसरा यह कि आप अपने सलाहकारों को तत्काल बदल दीजिए. वे आपको किसी गहरी खाई में धकेलने की योजना बनाकर काम कर रहे हैं. तीसरा यह कि विदेश यात्राएं छोड़कर पहले अपने देश को ठीक से घूम लीजिए, जिससे आपको ग़रीब, मज़दूर, किसान और आदिवासी का दुख-दर्द समझ में आ सके. आप समझ सकें कि सहकारी बैंक बंद करने से क्या होता है, बच्चे का गुल्लक फूटता है तो क्या होता है और बेटी की शादी का पैसा लुट जाए तो कैसा लगता है. चौथा और अंतिम सुझाव यह कि अच्छा होगा कि आप अपनी मां और पत्नी को अपने साथ रखिए, इससे मानवीय रिश्तों और संवेदनाओं के प्रति आपकी समझ बढ़ेगी. देश के लिए घर-परिवार छोड़ने वाला उतना महान राजनीतिज्ञ नहीं हो सकता, जितना देश को घर-परिवार की तरह रखने वाला हो सकता है. और हाँ अंत में एक सलाह और क़ि इस सर्वे को फिर से मैनुअल करवाइए. और इन सवालों को बदलिए हर सवाल में भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर गर्दन पर तलवार जैसे रखकर हमसे सवाल किए गए हैं. भ्रष्टाचार पर आप क्या कर रहे हैं, वो मैं बता चुका हूँ, आतंकवाद का सवाल जानबूझकर बार बार पूछ रहे हैं क़ि कोई भी सवाल का जवाब ना में देने के पहले 10 बार सोचे क़ि कहीं वो आतंकवाद का समर्थक तो  नहीं है? बस इतना ही कहूँगा गुस्सा तो इतना है क़ि निकाल दिया तो कहीं मैं भी पाकिस्तान ने भेज दिया जाऊ.......

Wednesday, November 23, 2016

क्या भारत में कैशलेस इकोनॉमी हो सकती है?

2008 की मंदी में कई बैंक दिवालिया हो गए. लेहमन ब्रदर्स, मेरील लिंच, ए आई जी, रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड... तमाम बैंक संकट के शिकार हुए और कुछ दिवालिया भी. कुछ साल बाद साइप्रस में भी ऐसा ही संकट आया. ग्रीस में भी यही हुआ. इसी साल 29 जनवरी को जापान के सेंट्रल बैंक ने ऐसा फैसला लिया, जिसके बारे में अभी तक हमने व्यापक रूप से सुना नहीं है. जापान के लोगों को बैंकों में अपना पैसा रखने के लिए फीस देनी पड़ती है. हमारे यहां के बैंकों की तरह ब्याज़ नहीं मिलती है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कर्मशियल बैंक ज्यादा से ज्यादा पैसा बिजनेस मैन को उधार पर दे सकें. अगर पैसा इलेक्ट्रॉनिक रूप में रहेगा तो सेंट्रल बैंक वह सब कुछ पल भर में कर सकेगा जो अभी नहीं कर पाता है. मंदी की भनक मिलते ही ब्याज़ दर निगेटिव हो जाएगी. यानी आपको ही बैंक को पैसे देने होंगे कि वो आपका पैसा रख सके. नगदी व्यवस्था में यह छूट होती है जब भी आपका भरोसा कम होगा, आप अपनी पूंजी को नगद में बदल सकते हैं. कैशलेश सोसायटी में ये छूट नहीं होगी. बैंक ऑफ इंग्लैंड के पूर्व गवर्नर मर्वेन किंग ने कहा कि बैंकिंग सिस्टम में कई खामियां हैं. इसे ठीक नहीं किया गया है. हो सकता है कि फिर से संकट आ जाए. यानी बैंक डूबने लगे. बैंक का मतलब सिर्फ खाता खोलना या पैसा जमा करना नहीं है. हम सबको बैंकों के बारे में अधिक से अधिक जानना चाहिए. कैसे बैंक गरीब आदमी से दो लाख वसूलने के लिए पीछे पड़ जाते हैं. बड़े उद्योगपतियों का लाखों करोड़ का कर्ज़ा नॉन प्रॉफिट एसेट बनकर पड़ा रह जाता है. उन्हें अलग-अलग खातों में डाला जाता रहता है. इस पूरे मसले को भावना से नहीं तथ्यों से समझना चाहिए. ऐसा नहीं है कि हम और आप इलेक्ट्रॉनिक तरीके से लेन-देन नहीं करते हैं. सारी आबादी न करती हो, मगर लाखों की आबादी तो करती ही है.  दुनिया की आधी आबादी बैंकिंग सिस्टम में ही नहीं है, क्योंकि बैंक में खाता खोलने के लिए कई शर्तों को पूरा करना होता है. एक आशंका यह जताई जाती है कि कैशलेश सोसायटी में आपके हर लेन देन का डेटा बैंकों के पास रहेगा. आप क्या खरीदते हैं, क्या पसंद करते हैं, किस कंपनी का खरीदते हैं. बैंक वाला इस डेटा का कुछ भी इस्तेमाल कर सकता है. तमाम कानून बने हैं और बनते हैं, इसके बाद भी पूरी दुनिया में इस खतरे का कोई मुकम्मल इलाज नहीं है.
कैशलेश यानी जब नोट का चलन समाप्त हो जाए या न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाए. बहुत से लोग इसके फायदे गिना रहे हैं. इससे सरकार को ज्यादा टैक्स आएगा क्योंकि काला धन होगा नहीं. उस पैसे से जनता का कल्याण ज्यादा होगा. फिलहाल लाइव मिंट वेबसाइट ने एक चार्ट पेश किया है, जिसके अनुसार जापान में जीडीपी का 20.66 प्रतिशत कैश है. अमरीका में जीडीपी का 7.9 प्रतिशत कैश है. भारत में जीडीपी का 10.86 प्रतिशत कैश है. चीन में जीडीपी का 9.47 प्रतिशत कैश है और यूरो ज़ोन में जीडीपी का 10.63 प्रतिशत कैश है. सब 2015 के आंकड़े हैं. दक्षिण अफ्रीका, स्वीडन, इंग्लैंड जैसे देश में जीडीपी का दो से चार प्रतिशत ही कैश है. ज़ाहिर है भारत में कैशलेश की स्थिति अभी नहीं है. लेकिन पूरे भारत को इंटरनेट से जोड़ने का अभियान डिजिटल इंडिया चल रहा है. जिसका लक्ष्य है कि 2016 तक ढाई करोड़ लोगों को डिजिटल साक्षर कर दिया जाएगा. इंडिया लिव स्टॅट्स, 2016 के अनुसार इस समय भारत में 46.2 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं यानी आबादी का 34.9 प्रतिशत. इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार गांवों में मोबाइल इंटरनेट की पहुंच 9 प्रतिशत ही है. शहरों में अधिक है 53 प्रतिशत. भारत भले इसके लिए तैयार न हो, आने वाले दस साल में तैयार भी हो जाए, जो बदलना है वो तो बदलकर रहेगा लेकिन कैशलेश हो जाने से क्या हमारी आर्थिक मुश्किलें कुछ कम हो जाएंगी.
अमेरिका में 70% लोगों के पास क्रेडिट या डेबिट कार्ड हैं, आख़िर हम टेक्नॉलॉजी में जिस देश को अपना आदर्श मानते हैं, उसके यहाँ 30% आबादी ऐसी कैसे रह गई जिसके पास क्रेडिट डेबिट कार्ड नहीं है? सीधी सी बात है, क़ि उनके पास जमा करने के लिए पैसे नहीं होंगे. रीब लोगों को अमेरिका क्या, भारत में भी कंपनियां क्रेडिट कार्ड नहीं देतीं. अमेरिका में भी दिहाड़ी मज़दूर होते हैं, जो नगद में कमाते हैं. वहां क्यों नहीं इसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया, जो भारत में कुछ लोग इसे राष्ट्रवाद में लपेट कर धमकी भरे स्वर में बता रहे हैं कि यह आर्थिक तकलीफों से मुक्ति का श्रेष्ठ मार्ग है. पूरी तरह से डिजितलाइजेशन और बैंकिंग या कैशलेश सिस्टम होने के बाद कौन गारंटी ले रहा है क़ि कालाधन, हवाला सब रुक जाएगा. अरे ये सब तो बैंकों के खातों से ही होता है. कुछ फ़र्क नहीं पड़ेगा. तो जिस बात में असमंजस है, कि ये हो सकता है, या वो होना चाहिए, उसका मतलब हुआ आप 10% लोगों को पकड़ने के चक्कर में 90% लोगों को ख़तरे में डाल रहे हैं. 
कौन से डिजिटलाइजेशन की बात करते हो, इतना ईकोमर्स कारोबार हो रहा है, आजतक एक ढंग का क़ानून नहीं ला पाए हो जिससे आम आदमी को एक शिकायत का प्लेटफार्म मिल सके. सोसल मीडिया, ईमेल, बैंकिंग से लेकर बैंकों तक के खातों के पासवर्ड और डेटा चोरी हो जाते हैं लेकिन सरकार कुछ क़ानून तक नहीं बना पाई. लॉ में इसका स्पेशलाइजेशन तक नहीं है भारत में. ऐसे में रिस्क कौन लेगा? उसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? 

Sunday, November 20, 2016

राष्ट्रवाद की नई परिभाषा

दुनिया भर में सरकारों के कामकाज़ का तरीका बदल रहा है. सरकारें बदल रही हैं. धारणा यानी छवि ही नई ज़मीन है. उसी का विस्तार ही नया राष्ट्रवाद है. मीडिया अब सरकारों का नया मोर्चा है. दुनिया भर की सरकारें मीडिया को जीतने का प्रयास कर रही हैं. हर जगह मीडिया वैसा नहीं रहा जैसा होने की उम्मीद की जाती है. इस तरह का राष्ट्रवाद आजकल हर जगह उभर रहा है. अपने मुल्क से मोहब्बत की यह शर्त ज़्यादा मुखर होने लगी है कि आप किसी और मुल्क से नफरत करते हैं. किसी के प्रति अविश्वास को उभारना होता है. फ्रांस लंदन, पोलैंड, रूस, अमेरिका, ऑस्ट्रिया के नेता इन्हीं मुद्दों पर लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं. इन्हीं मुद्दों पर सत्ता में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं. सभी अपने अपने देशों को फिर से महान बनाने की कसमें खा रहे हैं. पूरे विश्व में एक दौर निकल पड़ा है, जो लिबरल वैचारिकता को राष्ट्रवाद के नाम पर चैलेंज कर रहा है. ये राष्ट्रवाद निश्चित तौर पर फेक है, क्योंकि इस राष्ट्रवाद को उभारने के लिए एक चोला ओढ़ा जाता है, वो कभी सेना के नाम पर होता है, तो कभी स्वदेशी, प्रवासी विरोध तो कभी धर्म के नाम पर. भारत ही नहीं हर बहुत जगह.
मैं इसको एक अधिनायकवाद के रूप में देखता हूँ. ऐसे दक्षिणपंथी विचारों को जनता का भी खूब समर्थन मिल रहा है, उसके कारण सीधे हैं, क़ि जो लिबरल तबका है, वो केवल भाषणबाज़ी के नाम पर अपने समर्थकों को बाँधकर रखना चाहता है. जबकि उनकी सभी आर्थिक नीतियाँ फेल हो गई हैं, वो सब भी ट्रिकल डाउन थ्योरी पर चलने लगे तो पब्लिक ट्रम्प जैसे अमेरिका के टॉप अमीरों में अपना नेता देखने लगी. फिर ऐसे में बाकी बातें बहुत पीछे रह जाती हैं, जहाँ लोगों की निजी और बुनियादी चीज़ों की बात होती है. देखने वाली बात इसमें ये है कि मीडिया का भी कॉरपोरेटाइजेशन हो रहा है. यूरोप के कई देशों और अमेरिका तक में मीडिया हर मुद्दे पर एक तरफ हो जाता है, ये पिछले 5-6 सालों में भारत में भी हुआ है, लेकिन यहाँ की जनता अभी तक पूरी तरह से प्रेस निर्भर नहीं हुई है. भले ही पढ़े लिखे और युवा तबके में ये कभी कभी दिखता है, सोसल मीडिया के प्रभाव से लेकिन 70% जनता अभी भी इस सबसे दूर अपने अलग मुद्दे रखती है. जो लोग सोसल मिडया के प्रभाव में भी हैं, वो भी राजनीति को अलग अलग तरीके से देखते हैं, कभी जाति कभी धर्म तो कभी और किसी मुद्दे पर. उदाहरण के लिए यूपी बिहार में लोकसभा में बीजेपी को एक तरफ़ा समर्थन और विधान सभा में वहाँ के स्थानीय दलों को वोट देना. अभी भी मुझे उम्मीद है, कि लोग यूपी में ऐसा करेंगे. ये सही है या गलत मैं नहीं कहूँगा. 
लोकतंत्र कोई बहुत सुरक्षित काल में रहा नहीं है, जहाँ तक मैं याद करता हूँ, हॉलीवुड की एक बार मैने किसी रिसर्च के दौरान 1960 के दशक की मूवी देखी थी, नाम तो नहीं याद आ रहा है.... उसमें दिखाया जा रहा था क़ि एक कंपनी कैसे प्रेस में एडवरटाइजिंग के ज़रिए कब्जा करती है, फिर वो चुनावों पर भी कब्जा करती है. ठीक वही अब भी चल रहा है. लोकतंत्र ख़तरे में है, इसे बचाने के लिए लड़ने की ज़रूरत है, जैसे भाषण हमेशा से होते रहे हैं. लेकिन इसके दुष्परिणाम बहुत देर में दिखते हैं  इसलिए इसके कारणों का आकलन ठीक ठीक नहीं हो पाता है.

Wednesday, November 16, 2016

सोनम गुप्ता कौन है?

बडा अशोभनीय सा है किसी लडकी के लिए ऐसे लिखना या बोलना। लेकिन ट्विटर पर देखते हुए पक गया था। सो आज इसकी खोज करते करते एक मित्र ने ये कहानी बताई। असलियत का तो पता नहीं लेकिन मजेदार है। कानपुर के अंदाज में।
साभार, 
"बात है 2010 की. सोनम गुप्ता का इंटर पूरा हो गया था. रिजल्ट का इंतजार था. समय था फॉर्म भराई का. रोज साइबर कैफे के चक्कर लगते. क्योंकि गुप्ता अंकल मानते थे कि इंटरनेट लगवाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं. विक्की भइया बीकॉम थर्ड इयर में घिस-घिसके पहुंच चुके थे. सबसे जिगरी दोस्त अतुल निगम की शादी हुई थी अभी लेटेस्ट में. तबसे अतुल निगम ऐसा बेडरूम में घुसे थे कि निकलने का नाम नहीं लेते थे. विक्की भइया ने अकेलेपन में फेसबुक का सहारा ले लिया था. 5 बजे सोनम गुप्ता साइबर कैफ़े पहुंचती. आधे घंटे के 10 रुपये लगते थे. साढ़े पांच बजे गुप्ता अंकल ऑफिस से लौटते हुए स्कूटर का हॉर्न देते. सोनम पापा के साथ घर चली जाती. जबसे विक्की भइया ने सोनम को देखा था, साइबर कैफ़े जाने का टाइम बदल दिया था. 8 दिन. पूरे 8 दिन सामने वाली कंप्यूटर स्क्रीन के पीछे सोनम को देखते रहे. इंटरनेट सोनम के लिए नई चीज थी. एक अद्भुत खिलौना था. आंखें फाड़ के चीजें देखा करती. कभी कभी मुस्कुराती. विक्की भइया का अकेलापन मिटता जाता. 8वें दिन सोनम फिर उसी कंप्यूटर पर बैठी. विक्की भइया अपने कंप्यूटर पर. सोनम धीरे-धीरे टाइप करती. कैफ़े के कीबोर्ड पर आवाज तेज-तेज होती. सोनम हल्के-हल्के से मुस्कुराती. कभी तेजी से ब्लश करती और दांत से अपनी मुस्कान काट के रोक लेती. अचानक सोनम की आंखें उठीं. विक्की भइया से मिल गईं. विक्की भइया तो जैसे बेहोश. स्क्रीन पर देखते हुए तेजी से फ्यूचर की प्लानिंग करने लगे. ये तक सोच लिया गुप्ता अंकल से बेटी का हाथ मांगेंगे तो क्या कहेंगे. इतने में पापा के स्कूटर का हॉर्न बजा. सोनम हड़बड़ा गई. चेहरे की रंगत बदल गई. जल्दी-जल्दी टाइप करने लगी. हॉर्न फिर से बजा. कांच के दरवाजे से देखा पापा झांक रहे थे. सोनम उठी, और झट से भाग गई. विक्की भइया उठे. बेखुदी में सोनम के कंप्यूटर पर पहुंचे. हाय, उसका फेसबुक खुला छूट गया था जल्दी में. एक चैट विंडो खुली थी. विक्की भइया खुद को रोक नहीं पाए. मैसेज पढ़ते गए. ऐसा लगता कोई जानवर अपने नुकीले पांव उनके कलेजे में धंसाता जा रहा है. इतने में पीछे से आवाज आई, ‘विक्की भइया, आधा घंटा हो गया. टाइम बढ़ा दूं?’‘नहीं’, विक्की भइया ने कहा. कुर्सी से उठे. चमड़ी छोड़ते पर्स से 10 का नोट निकाला. जाते जाते उसपर लिखा, ‘सोनम गुप्ता बेवफा है’. और नोट थमाकर बाहर निकल गए. फिर कभी उस कैफ़े में लौटकर नहीं आए।"
(सीरियस नहीं लीजिए, जिसको जानने के लिए सब पागल है वो कहानी लाया हूँ।)

Monday, November 14, 2016

नेहरू की हस्ती मिटाना इतना आसान नहीं

आज देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिन है, बहुत लोग जानकारी के अभाव में उनके चरित्र हनन से लेकर न जाने कैसे कैसे आरोप लगाया करते हैं। लेकिन जितना मैंने आजादी के बाद के इतिहास और संविधान को पढा है उसमें यही पता चला कि अगर नेहरू नहीं होते तो शायद लोग जिनका नाम लेते हैं वो देश को इतने भी एकता के सूत्र में नहीं बांध पाते। संविधान में हमारे मौलिक अधिकार, सेकुलरिज्म, बोलने और रहने की आजादी या कहें आम आदमी के लिए साॅफ्ट संविधान बनाया। कश्मीर के मुद्दे पर लोग उन्हें दोषी ठहराते हैं लेकिन अगर राजा हरि सिंह के साथ उनका एग्रीमेंट देखो तो पता चलेगा कि और कोई होता तो कश्मीर भारत के साथ मिलता ही नहीं। कोई लडडू नहीं पडा था जो उठाकर खा लेते। हो सकता है कि इतने बडे और लुटे हुए देश को संभालते संभालते कुछ गलतियां हुई होगी। बाकी आज भी देश तो उन्नीस बीस ठीक उनके ही बनाए रास्ते पर चल रहा है। वो कोई एसी में बैठे राजकुमार नहीं थे। जवाहर लाल नेहरू एक स्वतंत्रता सेनानी थे. उन्होंने अपने जीवन के 11 साल जेल में बिताये. महात्मा गांधी के बाद वह अपनी पीढ़ी के सबसे बड़े नेता थे. एक ऐसे लोकप्रिय जननेता जो अपनी अनोखी हिंदुस्तानी भाषण कला से बड़ी संख्या में भारतीयों को प्रभावित कर देते थे. वह अंतरराष्ट्रीय ख्याति के विद्वान थे. लेखक के रूप में वह भारतीय इतिहास की दुर्लभ बातें दुनिया के सामने लाए.
जवाहर लाल नेहरू ने आधुनिक भारत की बहुत सारी संस्थाओं की नींव रखी. उन्होंने उस समय लोकतंत्र की मजबूती के लिए काम किया जब पूरी दुनिया में तानाशाही का बोलबाला था. नेहरू ने भारत को उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी राष्ट्र के रूप में पहचान दिलाई. देश में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के साथ ही उन्होंने कई नए शहरों की स्थापना की. इसके चलते दुनिया में देश को नई पहचान मिली.
तीन दशक से ज्यादा समय तक नेहरू भारत के गौरव रहे. वह हमारे समधर्मी संस्कृति, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत,आदर्शवाद, बुद्धिमत्ता और राजनीतिज्ञता के प्रतीक थे.
अब हम करीब दो दशक तक निर्वाचित रहे प्रधानमंत्री को गलत साबित करना चाह रहे हैं. हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी उन्हें खलनायक के रूप में याद रखे. वास्तव में क्या हमें उनके बारे में बात नहीं करनी चाहिए. क्या यह पागलपन नहीं है?
कुछ महीने पहले मध्य प्रदेश सरकार ने फेसबुक पोस्ट में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की प्रशंसा करने पर बड़वानी जिले के डीएम अजय गंगवार को तबादला कर दिया.
हो सकता है राज्य के मुख्यमंत्री ने नेहरू को अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा दी गई श्रद्धांजलि नहीं पढ़ी हो. लेकिन मैं अप्रैल 2014 की उस सुबह की याद दिलाना चाहता हूं जब उनकी उपस्थिति में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने एक बड़ी भीड़ सामने कहा कि भारत के लोकतंत्र को इसकी मजबूती के लिए नेहरू का ऋणी होना चाहिए. क्या उस समय शिवराज सिंह चौहान को गुस्सा आया था?
अपने पूरे जीवनकाल में नेहरू की हत्या करने की चार बार कोशिश की गई पर वे जिंदा बच गए. लेकिन यह साफ है कि जो प्रयास अब किया जा रहा है वह उनके जीवन, प्रतिष्ठा और विरासत को समाप्त करने का है. इतिहास की किताबों से उनका नाम हटाया जा रहा है. उनके ऐतिहासिक भाषण को पाठ्यक्रम से निकाल दिया गया है. भारत के इस नायक की छवि को खराब करने के लिए नकली फोटो का सहारा लिया जा रहा है. तथ्यों को तोड़ा—मरोड़ा जा रहा है. साथ ही इतिहास से भी छेड़छाड़ किया जा रहा है. उनके विरोधी अपनी कल्पना शक्ति से एक नए नेहरू की छवि का निर्माण कर रहे हैं जिससे लोग उनसे घृणा करें.
नेहरू की छवि खराब करने के पीछे के कारण को आसानी से बताया जा सकता है. वैचारिक विरोधियों के लिए नेहरू भारत के विचार के प्रतीक हैं. ऐसा देश जो धर्मनिरपेक्ष, उदार और समधर्मी देश है. ये नेहरू ही कर सकते थे जब कांग्रेस के मंत्री रामधारी सिंह दिनकर संसद में उनकी आलोचना करते थे, उनके घोर विरोधी अंबेडकर और मुखर्जी सरकार के मंत्री थे योग्यता के आधार पर। वो एकबार एक बेइमान कांग्रेस के नेता को वोट न देने की बात रैली में 10 मिनट पहले पता चलने पर कह देते थे। इसकी जगह पर वह भारत को संकीर्ण, सांप्रदायिक और रूढ़िवादी देश बनाना चाह रहे हैं. नेहरू के उपर हमला वास्तव में पूर्व प्रधानमंत्री की उस विरासत पर हमला करने की कोशिश है जो भारतीय मानस की जड़ों में गहरे से बैठ गई है. इसका दूसरा कारण मनोवैज्ञानिक है. अच्छाई से घृणा करना मानव स्वभाव की जड़ों में निहित है. खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जिसके गुणों और योग्यताओं की कमी हम अपने व्यक्तित्व में महसूस करते हैं. अवचेतना के स्तर पर नेहरू के बहुत सारे आलोचक उनसे जलन महसूस करते हैं. इस कारण से वह उनका तिरस्कार करते हैं क्योंकि उनके व्यक्तित्व में उन गुणों की कमी है.
हालांकि यह तर्क नहीं है कि नेहरू कभी असफल नहीं हुए. 1962 में चीनी हमले से निपटने की उनकी नीति, कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने का निर्णय (नैतिक रूप से सही, कूटनीतिक तौर पर गलत) और समाजवाद पर उनके जोर ने दीर्घकालिक समस्याओं को जन्म दिया. लेकिन इन सारे मसलों पर सही संदर्भों और उचित मंशा के साथ सार्वजनिक रूप से बहस और तर्क—वितर्क किया जाना चाहिए.
लंबे समय तक नेहरू को भारत के इतिहास से हटाए जाने का दांव उल्टा भी पड़ जाएगा.
इसलिए भारत के स्वतंत्रता पूर्व और इसके बाद के इतिहास को उनसे जोड़ा जाना चाहिए. नेहरू से अलग भारत संभव नहीं होगा.
वास्तव में उन्हें बदनाम किए जाने की हालिया कोशिशों से लोगों में उन्हें पढ़ने को लेकर रुचि बढ़ेगी. यह प्रयास इसलिए किया जाएगा क्योंकि लोग प्रोपेगैंडा से अलग सच को जानने की कोशिश करेंगे. अंत में उनके आलोचक नेहरू और उनकी विचारधारा में लोगों की रुचि बढ़ाना बंद कर देंगे. नेहरू जीवित रहेंगे, वे अपने आलोचकों और उनकी उनकी ईर्ष्या के बावजूद जिंदा रहेंगे.
सबको पता है कि उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था। बच्चे होते ही बहुत प्यारे हैं, मैं अभी भी अपने बचपन को याद करते हुए बहुत कुछ लिखता या बोलता रहता हूँ,  कोई छुपाता है और मेरी ईमानदारी है कि मैं खुलकर बोलता हूँ सब। राजनीति, कानून, साहित्य, किताबें सब अलग है और निजी जीवन में हंसना खुश रहना अलग बात है। इससे मेरे अंदर एक ईमानदारी बनी रहती है, कभी असमंजस हुआ तो जो भी अच्छा इंसान है पूछ लेता हूँ। सब स्वीकार करता हूँ, हिटलर या बडा नहीं बनने का शौक है। ये सब खुद को बच्चे की तरह रखने से होता है। क्योंकि बच्चे सच्चे होते हैं।

Friday, November 11, 2016

नोट बंद होने का सामाजिक विश्लेषण

जब से 500 और 1000 के नोट बंद हुए हैं तब से मुझे आर्थिक कम सामाजिक विश्लेषण करने का बड़ा मान हो रहा है, इसमें दो- तीन बातें बहुत आसानी से हम लोग अपने घरों में ही देख सकते हैं. पहली तो ये क़ि कुकुच लोग अपने ही घरों में अपराधी बन जाएँगे. जिसने भी पैसे छुपा कर रखे होंगे वो अब सभी अपने परिवारों की नज़र में अपराधी हो जाएँगे. बहुत लोग ऐसे पैसे को सीने पर किसी बोझ की तरह दबाए रहते हैं. ग्लानि से दबे रहते हैं. वे इस फ़ैसले से मुक्त हो जाएंगे. गीता ज्ञान का सहारा लेंगे. तुम क्या लेकर आए थे टाइप! उन्हें अपराधबोध से बाहर आने का मौका मिलेगा. यहां से वे चाहें तो ईमानदार जीवन जीने का प्रयास कर सकते हैं. दूसरी बात मैने तीन दिन से महिलाओं के ऊपर जॉक सुन रहा हूँ जो उनके छुपाए हुए पैसे पर मज़ाक है, बल्कि इसका भी अपना एक महत्व है. औरतें ये पैसा अपने लिए नहीं बचाती हैं न ही अपने ऊपर खर्च करती हैं. अपनी तमाम इच्छाओं को मार कर बचत की निरंतर साधना में लगी रहती हैं. यह पैसा औरतों की आर्थिक स्वतंत्रता का संबल होता है. इसकी खूबी यह होती है कि यह किसी की नज़र में नहीं होता मगर सबको जोड़ता चलता है. इन पैसों के ज़रिये विवाहित औरतें अपने मायके के रिश्ते को सींचती रहती हैं. कभी भाई को कुछ दे दिया कभी माई को कुछ दे दिया. इस पैसे को जब आप बैंक में रख देंगे तो हो सकता है वो अपने मायके से थोड़ी दूर हो जाएं. बैंक में रखे पैसे को पति और बच्चों से छिपाना मुश्किल है. परेशानी इस बात की नहीं है कि सरकार जान जाएगी, परेशानी इस बात से है कि समाज जान जाएगा. इंडियन एक्सप्रेस में ही एक किस्सा छपा है कि चाय वाले की पत्नी ने पांच सौ के दो नोट रजाई की परतों में छिपा कर रखे थे. हो सकता है यह उसके बुढ़ापे का सहारा हो. आसरा हो कि कुछ होगा तो यह पैसा काम आ सकता है. औरतों का यह पैसा मात्रा में कम होता है मगर बैंक में रखे पैसे से ज़्यादा सहारा देता है. जब यह पैसा बैंकों में जाएगा तो अर्थव्यवस्था को नया सहारा तो मिलेगा लेकिन औरत विरोधी इस समाज में आंचल के कोने में छिपी उनकी आज़ादी का छोटा सा ज़रिया भी लेता जाएगा.
पहली बार नरेंद्र मोदी का केजरीवाल हो गया....... मतलब केजरीवाल की तरह काम तो सही करना चाहा लेकिन उल्टा पड़ता दिख रहा है. नियत का तो पता नहीं लेकिन कोशिश ज़रूर सही थी. कई बार सरकार या कोई नेता अच्छा काम करने जाता है और वो जनता को सही सही नहीं समझा पाता है, यही इसबार मोदी सरकार के साथ हुआ. शायद एडवरटाइजिंग का समय नहीं मिला इसलिए. लेकिन सरकार को इतने बड़े देश में इतना बड़ा फ़ैसला लेने के पहले जितनी व्यवस्था सुधारना चाहिए था बैंक से लेकर अन्य सार्वजनिक स्थानों पर करना चाहिए था, वो नहीं हो पाया. इसमें सरकार की नाकामी है. एकदम से सब आसान नहीं था लेकिन कोई बड़ा प्रयास भी नहीं दिखा.  फिर मुझे कहने में कोई गुरेज़ नहीं है क़ि नोट बंद करने का तरीका एक बेहतरीन कदम है, लेकिन आम लोगों को मेरी 2 दिन पहले की उम्मीदों से ज़्यादा दिक्कत का सामना करना पड़ा. हम एसी बैठे बैठे सड़क पर संघर्ष कर रहे किसी आदमी का कष्ट नहीं देख सकते हैं. कल और आज मेरे ओफिस के रास्ते में बैंक ऑफ बड़ोदा में लगी लाइन देखी जहाँ सच में सब प्रवासी ही थे, जो 2-4-10 हज़ार रुपए जमा करने या बदलवाने आए थे. जब न्यूज में देखा कि एक ग़रीब औरत को पता चला क़ि उसके 4 हज़ार रुपए नहीं चलेंगे बंद हो गए तो वो सदमें में मर गई. एक आदमी को चिता के लिए समान नहीं मिला तो अपने पिता की लाश को टायर में जलना पड़ा. कई लोगों को मैनें भी दवाइयों और खाने पीने के लिए तरसते देखा. रिक्शे के पैसे तक लोग किसी से उधार माँगते दिखे. मेरे ही घर में डीजल लाने के लिए 100 के नोट नहीं बचे तो खेतों में पानी नहीं दे पाए. जिनके यहाँ शादी विवाह या कोई प्रोग्राम है वो परेशान हैं, वैसे निजी तौर पर तो मैं शादी में दहेज और इस बहुत बड़े खर्चे के खिलाफ हूँ तो उसपर कुछ फ़र्क नहीं पड़ता है. 
ऐसा कई बार हुआ है जब हमारी नज़र में कुछ सही होता है, और सच में सही भी होता है लेकिन जनता वो समझ नहीं पाती है, या समझा नहीं पाती है सरकार. मैं बिल्कुल कट्टर विचार का नहीं हूँ क़ि परसों बहुत अच्छा बोल रहा था, कल किसी की प्राब्लम देखी तो उसे खराब ना बोलूं, अगर जहाँ ग़लती है वो बता दूँगा. कैसे मैं लोगों की समस्यायों को अनदेखा कर दूं? सच में समस्या हुई है लोगों को मुझे भी हुई लेकिन बर्दास्त किया लेकिन सब ऐसा नहीं कर सकते हैं. इसलिए चुनावों में बीजेपी को ये मुद्दा वोट दिलाने की बजाय उल्टा भी पड़ सकता है. 
और रही बात काले धन की तो वो बाहर आ भी रहा है, लोग कुछ ना कुछ करके भले ही बैंक में डिपोजिट कर रहे हैं लेकिन अब वो सफेद हो रहा है. जाएगा कहाँ? जैसे ही कोई कैश जमा करता है वो इनकम टैक्स की वेबसाइट पर दिख जाता है, तो ऐसे कोई बचाकर नहीं ले जाएगा. कई फंडे बैंक से लेकर लोगों के मुझे पता हैं वो यहाँ बोलना ठीक नहीं है लेकिन फिर भी कुछ नहीं से कुछ हुआ तो यही ठीक है. आगे के लिए एक कदम है जो 4-5 दिन की लोगों की समस्याओं के बाद देश को फायदा पहुँचाएगा. 
ईमानदारी एक साधना है. आपको रोज़ बड़े इम्तहानों से गुज़रना पड़ता है. यही तय करते-करते परेशान रहता हूं कि ये बेईमानी तो नहीं है. आप जब ईमानदार होते हैं तो रोज़-रोज़ डरते हैं. जब बेईमान होते हैं तो रोज़-रोज़ दुस्साहसी होते चले जाते हैं. लगता है कि कोई कुछ नहीं कर सकता. ऐसे लोगों को एक झटका लगा है सो बंदा ख़ुश हुआ है. मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं. उस लिहाज़ से मैं ये लेख नहीं लिख रहा हूं. मैं समाजशास्त्रीय नज़र से लिख रहा हूं. कम से कम चार दिन के लिए ही सही, काले धन के नाम पर कुटिल मुस्कान छोड़कर बगल से निकल जाने वालों के सामने से तनकर गुज़रने का मौका तो मिला.

Thursday, November 10, 2016

ट्रम्प की जीत के मायने।

अमेरिका के इस चुनाव नतीजे के बाद मुझे एक शेर याद आया, 
शाद रहबरे, मक्कार से रहजन अच्छा,
नुकसान उठाना है तो  किसी जाहिल से उठाओ....
अमेरिका के भी लोगों ने पूरे चुनाव के दौरान यही देखा कि किसी बहुत चालाक आदमी से ठगे जाने से अच्छा है क़ि कोई जेबकतरा आपकी जेब काट ले जाए. मुझे लगता है क़ि इस चुनाव के 3 इमीडिएट फैक्टर्स जो हैं. पहला है ओबामा का 8 साल का कार्यकाल. अमेरिका की हालत ख़राब है,  20 सितंबर को ओपिनियन पोल कराने वाली संस्था गैलप के चेयरमैन जिम क्लिफटन ने एक लेख लिखा था. सन् 2000 में 61 फीसदी अमरीकी खुद को अपर-मिडल क्लास का मानता थे, लेकिन 2008 तक आते-आते 51 प्रतिशत लोग ही अपर मिडिल क्लास कहलाने लगे, यानी आर्थिक हालत इतनी खराब होगी कि समाज के ऊपरी तबके की संख्या में 10 फीसदी की कमी आ गई. मतलब ये हुआ कि अमेरिका में 25 करोड़ व्यस्क हैं, इसका 10 फीसदी यानी ढाई करोड़ लोग आर्थिक रूप से तबाह हो चुके हैं. अमेरिकी एक्सचेंज में 20 साल के भीतर पब्लिक लिस्टेड कंपनी की संख्या आधी रह गई है. पहले 7300 कंपनियां पब्लिक लिस्टेड थी, जो अब 3700 पर आ गई हैं. इससे अमेरिका में भयानक तरीके से नौकरियां कम हुई हैं. 48 प्रतिशत लोगों के पास ही पक्की और पूरी नौकरी है. नए बिजनेस स्टार्ट अप की संख्या ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम स्तर पर है. अमेरिका की इस हालत पर यकीन नहीं है तो जीतने पर ट्रंप ने जो कहा वो अमेरिका के बारे मे ही कहा है, बुंदेलखंड के बारे में नहीं. उनके बयान से लगा कि अमेरिका में न तो हाईवे हैं, न पुल हैं. एयरपोर्ट और स्कूल भी नहीं हैं. ऐसा पिछले चुनाव से ही था, ओबामा अमेरिकी इतिहास के पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जो अपना दूसरा चुनाव कम मतों से जीते थे, आमतौर पर ऐसा होता नहीं था. तो भी डेमोक्रेटिक पार्टी लोगों के गुस्से को समझ नहीं पाई. ये इशारा तब आया जब रिपब्लिकन पार्टी में डोनल्ड ट्रम्प और बर्नी सैंडर्स डेमोक्रेटिक पार्टी में उभर रहे थे, शायद ये 2015 की शुरुआत थी. ऐसे में नंबर आया वहाँ की मीडिया का जो आज हताश है अपनी हार पर. मीडिया चुनाव तो नहीं लड़ रहा था, लेकिन हिलेरी क्लिंटन के लिए दिन-रात एक किये हुए थे. जनता ने ट्रंप को जिता दिया, जिन्हें वहां की मीडिया ने इडियट तक कहा. ओपिनियन पोल की हार तो ऐसी हुई है कि दिल्ली और बिहार चुनाव की भी याद नहीं आ रही है. जब भी मीडिया सत्ता से जुड़े किसी नेता का प्रचारक बन जाता है, नेता उस मीडिया को देखती तो है मगर उसकी सुनती नहीं है. जब भी मीडिया किसी नेता के लिए बैटिंग करता है, जनता उसे आउट कर देती है. ट्रंप की जीत पर आलोचक हैरान हैं तो मीडिया की इस हार पर भारत के गांवों में भी जश्न मनना चाहिए. अमेरिकी अखबारों ने खुलकर हिलेरी का समर्थन करना शुरू कर दिया था. उनके कसीदे कसे जाने लगे थे. अमेरिकी मीडिया ने ट्रंप में बुराई देखी, आगे आकर जनता को आगाह किया, मैं नहीं कहूँगा क़ि ट्रम्प को कोई सभ्य मीडिया समर्थन करता, लेकिन अगर मीडिया ने ट्रम्प का विरोध करके अच्छा किया तो हिलेरी का समर्थन करके कौन सा अच्छा किया? तब वो मीडिया कहां था जब बर्नी सैंडर्स लोगों के हक का सवाल उठा रहे थे. यही मीडिया बर्नी का मज़ाक उड़ाने में लगा हुआ था. जनता मीडिया को समझ गई है. 
इसमें आप विपक्ष की मानसिकता देखिए, मुद्दों को छोड़कर सब बातें हुईं. हिलेरी कैंप ने जितने भी जगह भाषण दिए वहाँ ट्रम्प पर निजी हमले बहुत किए, कहा क़ि उनसे बच्चे डर जाते हैं, उनकी बेटी और सेक्स लाइफ से लेकर पिछली जिंदगी पर खूब हमले किए. आरोप सही भी होंगे, लेकिन ये जनता पर छोड़ देना चाहिए कि वो उसे पसंद करेगी क़ि नहीं? आप राजनीति में निजी हमलों पर भारत से लेकर पूरे विश्व का इतिहास उठाकर देखिए हमला सहने वाले के प्रति लोगों की सहानुभूति होती है. मीडिया ने हिलेरी पर लगे आरोपों को अनदेखा किया, मगर ट्रंप के आरोपों के प्रति इतना देखा कि लोग तंग आ गए. ट्रंप बुरे थे तो क्या हिलेरी बहुत अच्छी थीं. सबक ये है कि दो अयोग्य उम्मीदवार होंगे तो उसमें वो उम्मीदवार हारेगा जो शालीन होने का नाटक करेगा.
बस एक निराशा हुई कि लोग उनकी जीत के बाद सभा में नारे कैसे लगा रहे थे, " वी हेट मुस्लिम्स, वी हेट ब्लैक्स, वी डोंट वांट माइग्रेट्स " ये ख़तरनाक है. मुस्लिम्स से समझ में आया कि आईएसआई और इस्लामिक आतंकवाद या कट्टरपंथियों  के बाद एक माहौल है जो नफ़रत पैदा करता है, लेकिन सभी मुस्लिम्स तो आरोपी नहीं हैं.  काले लोगों के खिलाफ भी बोलना बेहद दुखद है, मैं भी तो काला हूँ, मैं भी तो माइग्रेट हूँ, कैसे ऐसी बातों को समर्थन कर दूँगा और निजी तौर पर ट्रम्प कोई बहुत अच्छे इंसान भी नहीं हैं जितना उनको सुना और जाना है, अगर आप उनके बयान सुनते होंगे तो पता होगा. महीलाओं, हर दूसरे धर्म, रंग, टैक्स चोरी, पर जो वो सोचते हैं. लोगों ने जिन मुद्दों पर उनको चुना है उसपर ही काम करें. उनको 25% दक्षिणपंथियों के अलावा भी लोगों ने अलग मुद्दों पर दूसरे ग़लत लोगों के खिलाफ वोट दिया है, बहरहाल ट्रंप एक ऐसा नेता हैं, जिनके बयानों को सभ्य महफिलों में दोहराया नहीं जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं उन सभ्य महफिलों के अपने काले कारनामे नहीं है. दुनिया पर युद्ध थोप कर, अपनी जनता को भूखे रखकर अमेरिका विश्व शक्ति बन सकता है लेकिन वो दुनिया के सामने एक योग्य उम्मीदवार नहीं रख सका, ये उसके लोकतंत्र की हार है. ये पूरे विश्व में हो रहा है जब लोगअपने ज़मीनी मुद्दों को सुनकर किसी नेता को समर्थन कर रहे हैं, विचारधारा बहुत . मुद्दा रह नहीं गई है. आप देखिए क़ि यूरोप के इतिहास के सबसे बड़े आंदोलन वहाँ की लेफ्ट या सोसलिस्ट सरकारें जो 70% वोट के साथ जीती थी, उनके खिलाफ भी हो रहे हैं. तो सीधी सी बात है क़ि वो सरकारें लोगों के मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रही हैं. अमेरिका में भी जिन लोगों ने ट्रम्प को वोट दिया उसमें से मात्र 25-30% लोग ही दक्षिणपंथी विचारधारा के हैं, बाकी के सभी तो अल्ट्रा लेफ्ट या सेंटर ही थे. ये वो लोग हैं जो जॉब, शिक्षा और विकास के साथ साथ अमेरिका की सुरक्षा के लिए भी चिंतित थे, पिछले साल के एक सर्वे को मैं कोर्ट करते हुए कह रहा हूँ क़ि अमेरिका के 56-57% आर्मी ने के मैगज़ीन के सर्वे में ओबामा के खिलाफ बाते कहीं थी. लोग आर्मी को बाहर भेजने और उसके मिस्यूज के खिलाफ भी  हैं, ट्रम्प उन देशों से सेना का खर्चा लेना चाहते हैं. लोगों को अच्छा लगा ये सब.
इस प्रकार इस चुनाव ने न केवल ग्लोबलाइजेशन के अस्तित्व के सामने एक बहुत पैना और गहरा प्रश्नचिन्ह ही खड़ा किया है, बल्कि इस सवाल का उत्तर खोजने के लिए भी विवश कर दिया है कि आखिर क्यों ब्रिटेन और अमेरिका के साथ-साथ दुनिया के महारथी इनके परिणामों के बारे में सही-सभी पता लगाने में बहुत बुरी तरह असफल रहे हैं? जाहिर है कि इस असफलता के मूल में वहां के आम बहुसंख्यक लोगों की चेतना तक न पहुंच पाने की उनकी कमजोरी और सीमाएं रही हैं. विषेशज्ञों का यह वर्ग उसी समूह का सदस्य है, जिसे ग्लोबलाइजेशन की मलाई मिल रही है. इसलिए स्वाभाविक रूप से वह उसके पक्ष में है. जबकि इन देशों का बड़ा वर्ग न केवल आर्थिक रूप से ही इससे त्रस्त है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी. इसलिए जब भी उसे जनमत के माध्यम से इसके प्रति अपने आक्रोश और असहमति को व्यक्त करने का मौका मिलता है, वह कर देता है. ब्रिटेन में ब्रेग्जिट वही था और अब अमेरिका में ट्रम्प वही है. ट्रम्प की जीत के जरिए अमेरिका ने साफ-साफ कह दिया है कि यदि दुनिया में ग्लोबलाइजेशन को बचाना है, तो उसका सिर्फ एक ही रास्ता है, और वह है कि ‘‘अमेरिका के कोरस गान के समूह में शामिल हो जाओ.’’
अब सवाल ये है क़ि क्या ट्रंप के पास कोई नया आर्थिक मॉडल है. वो आ तो गए हैं, लेकिन क्या वे आउटसोर्सिंग बंद कर देंगे, अमेरिका में बाहरी लोगों का आना बंद कर सकते हैं. दुनिया को ग्लोबल विलेज में बदलने निकला था अमेरिका, अब उसे याद आ रहा है कि उसकी लोकल बस छूट गई है. देखना होगा कि वहां कि जनता ने ट्रंप के बयानों पर दिल लुटाया है, या शालीन भाषा बोलकर उसे ग़रीब बनाने वालों के ख़िलाफ़ बग़ावत की है. 2008 की मंदी के बाद से आज तक दुनिया संभल नहीं सकी है. जनता गुस्से में सरकार तो बदल रही है लेकिन क्या कहीं अर्थव्यवस्था बदल रही है. अमेरिका में ट्रंपागमन के मौके पर सोहर गाने वाले नहीं हैं. वहां तो पांच सौ और हज़ार के नोट रद्दी में नहीं बदले हैं, फिर वहां जश्न क्यों नहीं है, या जो जश्न मना रहे हैं, वो वहां की मीडिया में क्यों नहीं हैं?

Sunday, October 30, 2016

भगत सिंह:(समाज शास्त्रिक विशलेषण)

भगतसिंह जिज्ञासु विचारक थे, क्लासिकल नहीं. 23 साल की उम्र का एक नौजवान स्थापनाएं करके चला जाये-ऐसी संभावना भी नहीं हो सकती. भगतसिंह तो विकासशील थे. बन रहे थे. उभर रहे थे. अपने अंतत: तक नहीं पहुंचे थे. हिन्दुस्तान के इतिहास में भगतसिंह एक बहुत बड़ी घटना थे. भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के खांचे से निकलकर अगर हम मूल्यांकन करें और भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के संदर्भ में रखकर अगर हम विवेचित करें, तो दो अलग अलग निर्णय निकलते हैं. भगतसिंह 1907 में पैदा हुए और 1931 में हमारे बीच से चले गये. ऐसे भगतसिंह का मूल्यांकन कैसा होना चाहिए? लोग गांधीजी को अहिंसा का पुतला कहते हैं और भगतसिंह को हिंसक कह देते हैं. भगतसिंह हिंसक नहीं थे. जो आदमी खुद किताबें पढ़ता था, उसको समझने के लिए अफवाहें गढ़ने की जरूरत नहीं है. उसको समझने के लिए अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, स्तुति और निंदा की जरूरत नहीं है. भगतंसिंह ने 'मैं नास्तिक क्यों हूं' लेख लिखा है. भगतंसिंह ने नौजवान सभा का घोषणा पत्र लिखा जो कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के समानांतर है. भगतसिंह ने अपनी जेल डायरी लिखी है, जो आधी अधूरी हमारे पास आई है. भगतसिंह ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी एसोसिएशन का घोषणा पत्र, उसका संविधान बनाया. पहली बार भगतसिंह ने कुछ ऐसे बुनियादी मौलिक प्रयोग हिन्दुस्तान की राजनीतिक प्रयोगशाला में किए हैं जिसकी जानकारी तक लोगों को नहीं है. भगतंसिंहके मित्र कॉमरेड सोहन सिंह जो उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी में ले जाना चाहते थे, लेकिन भगतंसिंह ने मना कर दिया. जो आदमी कट्टर मार्क्सवादी था, जो रूस के तमाम विद्वानों की पुस्तकों को चाटता था. फांसी के फंदे पर चढ़ने का फरमान पहुंचने के बाद जब जल्लाद उनके पास आया तब बिना सिर उठाए भगतसिंह ने उससे कहा 'ठहरो भाई, मैं लेनिन की जीवनी पढ़ रहा हूं. एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है.थोड़ा रुको.' 
आप कल्पना करेंगे कि जिस आदमी को कुछ हफ्ता पहले, कुछ दिनों पहले, यह मालूम पड़े कि उसको फांसी होने वाली है. उसके बाद भी रोज किताबें पढ़ रहा है?
कम से कम दुनिया के 35 ऐसे बड़े लेखक थे जिनको भगतसिंह ने ठीक से पढ़ रखा था. बेहद सचेत दिमाग के 23 साल के नौजवान के प्रति मेरा सिर श्रद्धा से इसलिए भी झुकता है कि समाजवाद के रास्ते पर हिन्दुस्तान के जो और लोग उनके साथ सोच रहे थे, भगतसिंह ने उनके समानांतर एक लकीर खींची लेकिन प्रयोजन से भटककर उनसे विवाद उत्पन्न नहीं किया जिससे अंगरेजी सल्तनत को फायदा हो. मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में कुछ लोगों को मिलकर काम करना चाहिए था. मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि महात्मा गांधी और विवेकानंद मिलकर हिन्दुस्तान की राजनीतिक दिशा पर बात क्यों नहीं कर पाये. गांधीजी उनसे मिलने बेलूर मठ गए थे लेकिन विवेकानंद की बीमारी की वजह से सिस्टर निवेदिता ने उनसे मिलने नहीं दिया था. भगतसिंह समाजवाद और धर्म को अलग अलग समझते थे. विवेकानंद समाजवाद और धर्म को सम्पृक्त करते थे. विवेकानंद समझते थे कि हिन्दुस्तान की धार्मिक जनता को धर्म के आधार पर समाजवाद की घुट्टी अगर पिलायी जाए तो शायद ठीक से समझ में बात आएगी. गांधीजी भी लगभग इसी रास्ते पर चलनेकी कोशिश करते थे.
यह तार्किक विचारशीलता भगतसिंह की है. उस नए हिन्दुस्तान में वे 1931 के पहले कह रहे थे जिसमें हिन्दुस्तान के गरीब आदमी, इंकलाब और आर्थिक बराबरी के लिए, समाजवाद को पाने के लिए, देश और चरित्र को बनाने के लिए, दुनिया में हिन्दुस्तान का झंडा बुलंद करने के लिए धर्म जैसी चीज की हमको जरूरत नहीं होनी चाहिए. आज हम उसी में फंसे हुए हैं. क्या सबूत है कि अयोध्या में मस्जिद थी? क्या सबूत है कि मंदिर बन जाने पर रामचंद्र जी वहां आकर विराजेंगे? 
एक बिंदु की तरफ अक्सर ध्यान खींचा जाता है अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए कि महात्मा गांधी और भगतसिंह को एक दूसरे का दुश्मन बता दिया जाए. भगतसिंह को गांधी जी का धीरे धीरे चलने वाला रास्ता पसंद नहीं था. लेकिन भगतसिंह हिंसा के रास्ते पर नहीं थे. उन्होंने जो बयान दिया है उस मुकदमे में जिसमें उनको फांसी की सजा मिली है, उतना बेहतर बयान आज तक किसी भी राजनीतिक कैदी ने वैधानिक इतिहास में नहीं दिया.
हमारे यहाँ संविधान तो किताब मात्र बनकर रह गया है, जब हम गीता, कुरान शरीफ, बाइबिल और गुरु ग्रंथ साहब की आयातों और श्लोकों पर बहस कर सकते हैं कि इनके सच्चे अर्थ क्या होने चाहिए? तो हमको हिन्दुस्तान की उस पोथी (संविधान) की जिसकी वजह से सारा देश चल रहा है, को पढ़ने, समझने और उसके मर्म को बहस के केन्द्र में डालने का भी अधिकार मिलना चाहिए. यही भगतसिंह का रास्ता है. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि किसी की बात को तर्क के बिना मानो. खुद उनसे भी. जब मैं भगतसिंह से तर्क करता हूं. बहस करता हूं. तब मैं पाता हूं कि भगतसिंह के तर्क में भावुकता है और भावना में तर्क है.
अंत में अभी सोचा हुआ एक सवाल आपके लिए छोडकर जा रहा हूं, मान लें भगतसिंह 1980 में पैदा हुए होते और 20 वर्ष में बीसवीं सदी चली जाती. उसके बाद 2003 में उनकी हत्या कर दी गई होती. उन्हें शहादत मिल गई होती. तो भगतसिंह का कैसा मूल्यांकन होता? सोचकर देखिए?

Thursday, October 27, 2016

सहानुभूति की लहर पर सवार अखिलेश

एक समाजवादी मित्र ने एक वीडियो भेजा है, अखिलेश कहते हैं ”हर दिन मैं खुद से उत्‍तर प्रदेश का भविष्‍य बनाने का वादा करता हूं।” इसके बाद ब्रेकफास्ट टेबल पर अखिलेश, उनकी पत्‍नी डिंपल और बच्‍चे नजर आते हैं। वीडियो में परिवार, जनता और विकास की थीम नजर आती है। आखिर में संदेश दिया गया है कि ‘उत्‍तर प्रदेश, भारत…मेरा परिवार” 
कल से चार वीडियो व्हाट्सएप पर मिल चुके हैं, जिसमें दो अखिलेश और दो शिवपाल ग्रुप से मिले हैं. 
2. इसके जवाब में शिवपाल सिंह यादव पूरे हुए वादे अब हैं नए इरादे टाइप एक जोरदार वीडियो में अनुभव की बात करते हुए किसानों को लुभाते नज़र आते हैं.
3. इस वीडियो में अखिलेश का एक गाना है, यूपी अपनी माँ है, इसकी ज़िम्मेदारी है,........अखिलेश यादव बोल रहा हूँ,....... इसमें खास बात है कि युवाओं से संवाद करने की कोशिश है.
4. अखिलेश के जवाब में इस वीडियो में सीधे मुलायम सिंह के समाजवादी और लोहियावादी विचारों को खड़ा किया गया है. 
देखते हैं ये लड़ाई अभी और कहाँ तक जाएगी. 
खास बात यह है इस वीडियो की जिसमे से पूरा यादव परिवार गायब है. कम से कम 40-50 लोगों से फोन और व्हाट्सएप पर 400-500 लोगों से बात कर चुका हूं सबकी सहानुभूति अखिलेश के साथ उस माइक छीनने के बाद वाले इमोशनल भाषण के बाद है। आज के 4 महीने पहले और आज के अखिलेश में फर्क है, लोग पहले भी कहते थे भइया ने काम किया है लेकिन यादव परिवार गुंडागर्दी करता है। मुलायम समर्थक लोगों को शायद उनके साथ हुए व्यवहार से दुख हुआ है। तभी वो रणनीति बदलकर पार्टी में रहकर ही खुद के दम पर चुनाव लडना चाहते हैं, शायद दो महीने में अकेले सब खडा करना आसान नहीं होगा। इसलिए वे खुद सहानुभूति के नाम पर चुनाव लडकर खुद ही हीरो बनना चाहते हैं। उनको पता है कि बहुमत आएगा नही तो अगर 130-150 सीटें भी आ जाती है तो गठबंधन की सरकार उनके नाम पर ही बनेगी। बाकी सब तो साइड में होगे। कल की पीसी में मुलायम की बात "शिवपाल की वापसी अखिलेश का अधिकार है" कहते ही शिवपाल के चेहरे पर खामोशी छा गई थी। शायद बेटे का कनेक्शन हो? वैसे मंत्री पद 15 दिन का बचा है इसके बाद कुछ होगा नहीं आचार संहिता लागू होने के कारण। लेकिन अखिलेश ने खडा होने और अकेले फैसला लेने का साहस दिखाया है, अब विरोधी उनपर जितना ज्यादा हमला करेगे वो मजबूत होगे। 

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...