Monday, February 10, 2014

हमारे समाज की एक हकीकत यह भी है।

आजकल हम लोग जिधर भी सड़क पर निकलते हैं, तो हर चौराहे, ब्रिज, स्कैईवाक आदि पर कोई ना कोई अपंग बैठा या पड़ा हुआ भीख मांगते हुए दिखाई देता है। भीख देने के मामले में मैं बहुत कट्टर हूँ। इसपर मैने तहलका में प्रियंका दुबे की रिपोर्ट पढी थी। उसमें हमारी आंखे खुल जाती हैं। इस क्राइम को लेकर। लेकिन आज छोटे बच्चे और बूढ़े लोग जो अपंग हैं, उन्हे भी ये गिरोह के लोग खरीद लेते हैं। मैने ऐसे ही एक बच्चे से बात की। वो सान्ताक्रुज में एक ब्रिज पर बैठता है। उसके हाथ कटे हुए थे, या जन्म से नहीं हैं। यह समझ में कम आया। मैने उसे पूछा," बेटा तुम कहाँ रहते हो? तुम्हारे मम्मी-पापा कहाँ हैं? तुम्हारा नाम क्या है?" उसने कुछ भी जवाब नहीं दिया। बहुत प्रयास करने पर भी नहीं बोला. मैं रोज वहाँ से निकलते समय एक-दो रुपए देनें लगा। एक दिन रविवार की दोपहर को जब रास्ता खाली था, तब उसे 5  रुपए देकर वही बाते पूंछी तो वो गुस्सा होकर बोला," मेरे मम्मी-पापा नहीं हैं." मैने पूछा तो कहाँ रहते हो? उसने जवाब दिया," "जावेद भाई के पास" मैंने नाम पूछा तो बताया,"छोटे" मैने पूछा कब से रहते हो यहाँ तो बोला," जब से ध्यान है, तब से" पूछने पर बताया कि वाकोला में एक रूम में हम सब बच्चे लोग रहते हैं। जावेद भाई वहाँ नहीं रुकते हैं। " तब तक एक आदमी आया और उसे देखकर वो बच्चा बोला," आप जाओ यहाँ से" मैं चल दिया। मुड़कर देखा तो उस आदमी ने बच्चे को बहुत डांटा। मैं कुछ नहीं बोला वहाँ से चला आया। कई दिन तक वो बच्चा नहीं दिखा। जब दो-तीन महीने बाद दूसरे ब्रिज से निकला तो वो मिल गया। मैने पूछा," कैसे हो?" बच्चा बोला," आप जाओ उस दिन आपकी वजह से मैनें बहुत मार खाया था। " मैं वहां से चला गया।
पूरा दिन सोंचता रहा क़ि वो कौन होगा? कैसे आया होगा? फिर अपने थोड़े से दिमाग का प्रयोग कर सोंचा क़ि शायद यह जन्म से ऐसा होगा या कुछ दिन बाद हो गया होगा। तभी इसके मां-बाप ने इसे फेंक दिया होगा। कोई नहीं मानेगा क़ि कोई माँ-बाप अपने बच्चे को कैसे फेंक सकते हैं? लेकिन हकीकत हो सकती है। कौन ऐसे बेकार या बोझ बच्चे को रखना चाहेगा? शायद उन्होंने यही सोंचा होगा। तभी यह बच्चा इस गिरोह को मिल गया होगा। अब यही लोग इस बच्चे की मजबूरी से पैसा कमाते हैं। और भी कई तरह के विचार आए, जैसे किडनैप हुआ होगा या खो गया होगा। कुछ क्लियर नहीं हो सका। मैं रात को भी यही सोंचकर काफी चिंतित रहा। आज हमारे सभ्य समाज को इस बात पर हंसी आ सकती है। कोई घिन भी लग सकता है। लेकिन अगर चिंतन करके देखा जाए तो क्या हमारे महान देश की यह हकीकत नहीं है। आपके बच्चे कितने ही बड़े स्कूल में पढ़ते हों. लेकिन देश में यह भी एक हकीकत है। अपने साथ या अपने बच्चों के साथ ऐसा होने का सोचते हो रोएँ खड़े हो जाते हैं। समझ में नहीं आता है. क्या होता या क्या होगा?
हमारा समाज किताबों, मैसेज, वाट्सएप, फ़ेसबुक पर हमेशा ही माँ-बाप की इज्जत बातें करता रहता है। स्कूलों में भी बच्चों को इसपर बहुत कुछ सिखाया जाता है। हम अपने बच्चों को माँ-बाप की इज्जत करने की बात करते हैं। लेकिन अपने बुजुर्गों के साथ क्या करते हैं? अगर कोई ध्यान भी दिला दे तो गुस्सा आ जाता है। एक औरत अपने माँ-बाप से हर महीने मायके जाने की बात करेगी। लेकिन अपने पति के माँ-बाप को भिखारी की तरह व्यवहारित करने लगती है। किसी भी बुजुर्ग की इज्जत तभी तक होती है जब तक उसके हाथ से कुछ लेने का लालच होता है। आप अपना उदाहरण सोंच सकते हैं कि मैं ऐसा नहीं करता हूँ। लेकिन अपने व्यवहार को दूसरे की नजर से देखो तो पता चलेगा? इस मुद्दे पर हाल ही का मेरे साथ हुआ एक उदाहरण पेश करना चाहूंगा।
मेरे घर और ओफ़िस के बीच में में एक चौराहे पर एक 70-80 साल का बुढ्ढा ब्रिज की सीढियों के नीचे सोता हुआ या बैठा हुआ मिलता था। मैं उसे रोज देखता ना वो किसी से पैसे माँगता और ना ही कोई उसे कुछ देता। धीरे-धीरे उसकी स्थिति का अंदाजा मुझे होने लगा था. लेकिन पता नहीं किसी डर से मैं उसकी मदद नही करता था। एक दिन मेरे आगे एक चल रही थी. उसने उसने उस बुढ्ढे को 10 रुपए दे दिए। मैंने भी उस दिन के बाद उसे रोजाना 10-20 रुपए देने शुरु कर दिए। वो पैसे देकर मुझे कुछ खुशी मिलती। एक बार बारिश हो रही थी। वो ब्रिज पर जाना चाहता था। लेकिन सीढियाँ नहीं चढ पारहा था। उस दिन मैने उसकी मदद की और उपर तक उसे सहारा देकर चढ़ा दिया। उसके पास कुछ सामान नहीं था. मैने उसकी जानकारी के लिए कुछ पूछा तो उसने बताया कि वो पूना का रहने वाला है। उसका एक बेटा है. रोते हुए बताने लगा कि मेरी पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। बेटे को मजदूरी करके पढ़ाया था। बैंक में नौकरी लग गई. बैंक में ही काम करने वाली एक लड़की से लव-मैरिज कर ली थी। मैं भी इमोशनल हो गया. आगे उसने बताया कि बहू मुझे कुत्ते की तरह डाँटती थी। बाथरूम जानें नहीं देती थी। खाना नहीं मिलता था तो दवाइयों की क्या बात। कई बार उसके ही कहने पर बेटे ने मारा। तो मैं भाग आया. आगे बताया कि सामने एक छोटा सा रेस्टोरेन्ट वाला ही कुछ खाने को दे देता है। फिर तो एक सिलसिला चालू हो गया। मैने हर दिन 10-20 के अलावा कभी कभी 100-200 देने भी शुरु कर दिए। एक दिन सेलरी वाले दिन 500 दिए. तो अगले दिन देखा तो थोड़े से अच्छे कपड़े और चप्पल कहीं से लाकर पहने हुए था। सच बताउ तो उसके पास 2-4 मिनट से ज्यादा रुकने में शर्म आती थी कि कोई पहचान वाला देख न ले। कुछ ही दिन हुए होंगे. मैं 4-5 दिन के लिए गाँव चला गया। लौटकर आया तो वो मुझे नहीं दिखा। दो-तीन दिन बाद सामने रेस्टोरेन्ट वाले से पूंछा जो उसे खाना देता था। तो उसने बताया अरे वो बुढ्ढा तो एक दिन बीमार हुआ। वहीं पर टट्टी-पेशाब करके पड़ा रहा। मैंने बी.एम.सी. वालों को बोला तो वो लोग अस्पताल ले गए। बाद में वहीं से एक आदमी उसका पता या कोई पहचान वाला पूछने आया था। मैंने कहा नहीं पता तो बताया कि वो मर गया था। फिर बी.एम.सी. वालों ने ही जला दिया होगा। सुनकर मैं बहुत चिंतित हो गया। ओफ़िस तो गया लेकिन मन नहीं लगा तो दोपहर से वापस आ गया। पूरा दिन सोंचता रहा। रात को बहुत कोशिश की तब जाकर 3 बजे नींद आई। दो-तीन दिन वहाँ से निकलते हुए सब सुना लगा। फिर धीरे-धीरे मन से उसकी तस्वीर भी ओझल हो गई। आखिर वो कौन था मेरा. बाकी घिसी-पिटी पुरानी बातें और प्रवचन देकर क्या फायदा?

Thursday, February 6, 2014

क्या आरक्षण पर हो रही बहस सार्थक है?

पिछले दो-तीन दिन में कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी जी टी. वी. की बहसों में छाए हुए हैं। कारण है उनका जातिगत आरक्षण का विरोध करना। यह बहस कोई पहली बार नहीं शुरु हुई है। इसके पहले भी कई तरह के आन्दोलन इस बात के पक्ष में होते रहे हैं। कई तरह के आरक्षण विरोधी संगठन (यूथ फॉर इक्वालिटी, आरक्षण खत्म करो, Ant-Reservation) जन्‍तर-मन्‍तर और रामलीला में दिखाई देते रहे हैं। लेकिन आरक्षण को लेकर पिछले दो-तीन दशक में आरक्षण पर इतनी बहस तो केवल मंडल कमीशन के समय ही हुई थी। इस बहस में एक बात अक्सर सामने आ रही है जो द्विवदी जी ने खुद कही थी कि बाबा साहब अम्बेडकर ने ही संविधान में लिखा था कि दस साल बाद आरक्षण खत्म कर दिया जाना चाहिए। लेकिन वो लोग बिना संविधान पढ़े ही बोल रहे हैं। क्योंकि बाबा साहब ने अनुच्छेद 334 में यह लिखा था कि अगर दस वर्ष में अनसूचित जातियों-जनजातियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल जाए तो राजनैतिक आरक्षण को खत्म कर दिया जाएगा। अब सवाल है क़ि क्या राजनीति में इन जातियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया गया है? बिल्कुल नहीं। आज लोकसभा की 121 सीटों में कितने ऐसे सांसद हैं जो अपने समाज की आवाज को संसद में उठा सके हैं। अगर मायावती, जगजीवन राम जैसे कुछ उदाहरण छोड़ दिए जाएँ। जब तक उनके आका कुछ नहीं बोलते तब तक उनके मुंह से आवाज तक नहीं निकलती है। प्रमोशन में आरक्षण बिल में ही समाज वादी पार्टी के दलित सांसद ने ही बिल को फाड़ दिया था। अब आप ही बताइए क्या यह काम उसने अपने दिल से किया होगा? क्या सपा के मुखिया के कहने पर यह नहीं हुआ होगा। (हालांकि मैं व्यक्तिगत तौर पर प्रमोशन में आरक्षण पर एक स्टैंड नहीं ले पाया हूँ। मुझे सही तरह से इसपर और ज्यादा  पढ़ने और बहस करने की जरूरत है।)
अब अगर हम इस आरक्षण पर होने वाली बहस के दूसरे पहलू पर जाएँ तो, ज्यादातर लोंगों का मानना है कि देश में आर्थिक आधार पर आरक्षण होना चाहिए। आप इतने नासमझ कैसे हो सकते हैं कि गरीबी उन्मूलन को आरक्षण से जोड़ रहे हैं। आरक्षण देने का मकसद इन जातियों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का नहीं था। आरक्षण तो उनको  इस लिए दिया गया क्यों कि उनको जातिवाद के आधार पर हजारों हजार वषों से जीवन के अनेको आयामों से यथा - सत्ता, शिक्षा, उत्पादन, न्याय, संचार वयवसाय, स्व्यंसेवी संघटनों में प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया जिसेस कि वह राष्ट्र निर्माण कि प्रक्रिया में हिस्सा ले सके। ये तथाकथित लोग (जनार्दन द्विवेदी और बाबा राम देव) मनु के जमाने से, शम्भूख और एकलव्य का इतिहास क्यों भूल रहे हैंआर्थिक रूप से गरीबी 10-20 या 50 वर्ष की हो सकती हैपरन्तु दलितों कि वंचना, तिरष्कार, अनादर, अस्पृष्यता, बहिष्कार  हजारों  साल पुराना है। अब आप ही फैसला कीजिये कि आरक्षण का असली हक़दार कौन है? अगर आपको कुछ और जातियाँ इस तरह की कष्टों को झेले हुए दिखती हैं तो कृपा करके उन्हें भी आरक्षण का लाभ दीजिए। अगर आपको यह कार्यक्रम चलाना है कि किसी भी जाति के गरीब की मदद की जाए, तो आप ब्राम्हण, क्षत्रिय या किसी भी उच्च या निम्न वर्ग के लिए एक दो नहीं 10 कार्यक्रम चलाइए। किसने रोका था आपको? आप ही बताइए कि आज भी गावों में कितने प्रतिशत ब्राम्हण, क्षत्रिय, बनिए या उत्तर प्रदेश के यादव और पश्चिमी यूपी-हरियाणा के जाट गरीब होते हैंआप देखेंगे कि ज्यादातर गरीबों की संख्या भी पिछड़ी जातियों में ही होती है. फिर जो लोग असली भारतीय समाज या गाँवों को जानते हैं, उन्हें पता है कि कोई भी दलित कितना भी पैसे वाला क्यों ना हो। उसके घर में कितने भी लोग आई.ए.एस. हो गए हों, लेकिन उनकी सामाजिक स्थिति में कुछ विशेष बदलाव नहीं हुआ है। कोई भी गरीब ब्राम्हण भी उन अमीर दलितों को उसी गिरी हुई नजर से देखता है.जिस वाक्य "भारतीय संविधान के आधार किसी के साथ जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा" के आधार पर बाबा साहब ने आरक्षण दिया था। आज विरोधी लोग इसी लाइन को आधार बनाकर विरोध कर रहे हैं। क्या यह कुतर्क सही है इस वाक्य को नकारात्मक रूप से देखा जा रहा है। अब अगर हम सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बात करें तो क्या इन जातियों की जनसंख्या के अनुपात में उनको प्रतिनिधित्व मिल सका है? क्या अल्पसंख्यक कही जाने वाली जातियों को सामाजिक परिकल्प में वो जगह मिली है, जो बाबा साहब अम्बेडकर ने आरक्षण के उद्देश्य के रूप में देखी थी? अगर सही उत्तर देंगे तो नहीं। आज अगर आपको आरक्षण पर ही बहस करनी है तो  मंडल कमीशन के बाद ओ.बी.सी. में सामिल हुई कुछ जातियों की बात की जाए मैं खुद ओबीसी से आता हूँ, और इस आरक्षण का विरोंध नहीं कर रहा हूँलेकिन सामाजिक स्थिति पर मिलने वाले इस आरक्षण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए आप देश में एक शोध करवा कर पता कर सकते हैं कि किन ओबीसी जातियों की स्थिति उपर हुई है ओबीसी में मिलने वाला आरक्षण पूरा का पूरा यादव और कुछ तथाकथित जातियों को ही मिल जाता है जो यह बात कहते हैं कि जिसको एक बार आरक्षण मिल जाए तो उसे दोबारा ना मिले इसका प्रावधान तो संविधान में भी है कि किसी की भी तीसरी पीढी को आरक्षण नहीं मिलेगाहालांकि इसपर सही ढंग से अबतक अमल नहीं हो पाया है मेरी इस बात पर सहमति है कि जिन जातियों में या जिन परिवारों में पर्याप्त आरक्षण मिल चुका है, उन्हें कम आरक्षण देकर अन्य उसी श्रेणी की जातियों को अधिक मौके दिए जाने चाहिए लेकिन मेरी बात के जवाब में जे. एन. यू. के प्रोफेसर विवेक कुमार एक जवाब देते हैं उनकी रिसर्च में उन्होनें 60 आई.ए.एस. की लिस्ट बनाई जिनमें से केवल 2 के बच्चे ही आई.ए.एस. बन पाएऔर 60 प्रोफेसरों की लिस्ट में केवल 1 ऐसे थे, जिनके बाप हाईस्कूल में मास्टर और बाकी केवल तीन के ही 10वीं तक पढ़े थे इस तरह से आप पूरे विश्वास के साथ आप यह भी नहीं कह सकते हैं कि जो आदमी आरक्षण से नौकरी पाया है, तो उसका बेटा या बेटी भी आरक्षण पाकर नौकरी पा जाएंगे
इस चल रही बहस को लोग अलग-अलग ढंग से देख रहे हैं मुझे नहीं लगता है कि जनार्दन द्विवेदी जैसा परिपक्व नेता इस तरह के बयान देगायह कांग्रेस पार्टी की एक चाल हो सकती है जनार्दन द्विवेदी वर्तमान समय में कांग्रेस के चाणक्य माने जाते हैं सोनिया और राहुल से उनकी करीबी जगजाहिर है उन्होनें ऐसा कहा फिर सोनिया गाँधी ने इस बात का खण्डन किया अब मोदी या भाजपा को भी इस बात पर अपनी प्रतिक्रिया देनी ही पड़ेगी अगर भाजपा कोई भी स्पष्ट स्टैंड लेती है, तो वह फंस सकती है भाजपा को तो यह बात समझ में आ गई लेकिन मोदी को पी.एम. बनाने के लिए हरिद्वार छोड़ चुके बाबा राम देव इस चाल में फंस गए कांग्रेस को पता था कि मोदी को पसंद करने वाला तबका अपर-कास्ट ही है इसलिए अपर-कास्ट (मोदी समर्थकों) और पिछड़ा+दलित (जो कांग्रेस से नाखुश हो चुके हैं) में एक लकीर खींच दी जाए
अगर मोदी जी कहेंगे कि जातिगत आरक्षण खत्म हो तो पिछड़ी और दलित जातियाँ जिनका अपने साथ आने का मोदी और उनके समर्थक दावा कर रहे हैं, वो उनके खिलाफ हो जाएंगीअगर उन्होने जनार्दन द्विवेदी के बयान को सोनिया की तरह बकवास बता दिया तो शायद सवर्ण युवा जो उनसे 21वीं सदी के भारत के नवनिर्माण की आस लगाए बैठा है, वो अपना बोरिया बिस्तर कहीं और टिका देगा इसीलिए हार के कगार पर खड़ी कांग्रेस के द्विवेदी का यह बयान मास्टर स्ट्रोक है । दुधारी तलवार की तरह । वैसे कांग्रेस का स्टॅंड भी मुझे समझ में नहीं आ रहा है यह वही कांग्रेस है, जिसके नेता राजीव गाँधी नें मंडल के समय हो रही हिंसा पर संसद में बोलते हुए कहा था कि "कांग्रेस पार्टी जातिगत आरक्षण की जगह आर्थिक आरक्षण का समर्थन करती है" बल्कि एक प्रस्ताव भी पास हुआ थाआज उसी कांग्रेस ने इसे बकवास टाइप बता दिया हैभाजपा को अंदेशा था कि इसपर राहुल गाँधी का बयान आ सकता है, तभी वो इसे भी मोदी को रोंकने की चाल बता रही है 
अगर बाबा रामदेव मोदी से इस बात को कहेंगे, तो मुझे नहीं लगता है कि मोदी में इतना साहस है कि वो सार्वजनिक मंच पर आकर इस बात का स्पष्टीकरण दे  सकते हैं वो बाबा को इस बार भी पिछले टैक्स वाले मुद्दे के जैसे ही "विचार करने" का झुनझुना थमा देंगेबाबा रामदेव ने भाजपा और मोदी को एक गहरे संकट में डाल दिया है अब देखना होगा कि इस पर भाजपा या मोदी किस तरह से स्पष्टीकरण देंगे देंगे या भी नहीं
आरक्षण राष्ट्र निर्माण कि प्रक्रिया है जिसके माध्यम से  सामाजिक असमानता और अस्थिरता को दूर किया जा सके मैं तो कहता हूँ कि आप ओ.बी.सी. से कुछ जातियाँ कम करके आरक्षण का प्रतिशत भी कम कर दीजिए ताकि सामान्य लोगों के कम्पटीशन को और जगह मिल सकेअल्प-संख्यकों को भी आरक्षण मिलना चाहिए लेकिन एक रिषर्च के आधार पर अगर मुस्लिम ओ.बी.सी. में आरक्षण पा रहे हैं, तो उनको इससे हटाकर अन्य अल्पसंख्यकों को मिलना चाहिए आप आर्थिक आरक्षण की बात तो कर रहे हैं, अगर मान लिया जाए कि यह हो गया तो जिस तरह से देश में जाति-प्रमाणपत्रों का फर्जीवाड़ा और बिक्री सामने आ रही है उससे कैसे मान लिया जाए कि गरीबों के साथ न्याय होगा कितने असली पात्रों को सरकार बी.पी.एल. कार्ड दे पाती है क्या यह सवर्णों और अमीरों को नहीं मिल रहे हैं कितने गरीब और दलित इस प्रक्रिया से वंचित रखे जाते हैं। मैनें एक व्यापक मुद्दे पर अपनी चोटी सी राय रख दी है अब आप भी बहस करते रहिए, लेकिन जिन्दबाद! मुर्दाबाद टाइप नहीं! बाकी जउन है, वो तो चलिबे करी

Sunday, February 2, 2014

क्या बॉलीवुड को राजनीति पर बोलना चाहिए?

हमारा हिन्दुस्तान बहुत सारी संस्कृतियों और विचारधाराओं का देश हैफिर भी यहाँ पर कुछ क्रिकेट या बॉलीवुड को धर्म से कम नहीं माना जाता हैबॉलीवुड ने अपने 100 साल में बहुत सारे महानायक और महानाइकायें दी हैंइसमें दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन और आमिर ख़ान तक और मधुबाल और रेखा से लेकर दीपिका या ऐश्वर्या राय तक कलाकार दिए हैंइनका एक मात्र काम माना जाता रहा है, मनोरंजन करनाउन्होंने हमेशा बदलते वक्त में देश के हर मुद्दे पर अच्छी फिल्में और गाने दिए हैंयह एक बहस का विषय हो सकता है क़ि फिल्मों में सबकुछ सही ही नहीं होता हैलेकिन अगर नकारात्मक पहलू को छोड़ दिया जाए तो फिल्मों ने हर पीढी की सोंच को बदलने का काम किया हैगाँव-गाँव तक फैशन पहुँचालोगों में अंग्रेज़ी जानने की इच्छा आई और इसी का प्रभाव था कि अनपढ लोगों को भी देश के इतिहास और कल्चर के बारे में ज्ञान हुआइसमें सबसे अच्छी बात यह थी कि आज पूरे देश में सबसे ज्यादा हिन्दी का प्रचार-प्रसार हुआआज बंगाली और मद्रासी लोग भी फिल्में देखकर हिन्दी सीख रहे हैंदेश का युवा जागरूक हुआ
देश में 1947 के बाद से सबसे अधिक सम्प्रदायिक सौहार्द खराब हो रहा थालेकिन फिल्मों ने इसे जोड़ने का एक बड़ा प्रयास कियाबॉलीवुड ने ही कितने कट्टरपंथियों की सोंच बदल दीदिलीप (यूसुफ़) साहब, तलत महमूद, रफी साहब, गुलजार और जावेद साहब, सलीम ख़ान, शाहरुख ख़ान, आमिर ख़ान और सैकड़ों गायक, लेखक, और कलाकारों की यह पंक्ति पूरे हिन्दू बहुल देश के दिलों पर छा गईपुरानी कुप्रथाओं के अंत में भी फिल्मों ने एक बड़ी भूमिका अदा कीआज कितने ही युवा प्रेम-विवाह करते हैं, उनके मन से समाज, जाति, धर्म, और क्षेत्र का डर खत्म हो चुका हैआप मुम्बई में ही देखेंगे कि कितने ही यूपी और बिहार के लड़के महाराष्ट्रियन लड़कियों से शादी करते हैंमराठी, बंगाली, मद्रासी, पंजाबी, गुजराती सब एक-दूसरे से प्रेम-विवाह कर रहे हैंकहने का मतलब समाज को एक सकारात्मक सोच दी है इस बॉलीवुड नेपिछले कुछ वर्षों में ख़ान की तिकड़ी (सलमान, आमिर, शाहरुख) के आगे कोई टिक नहीं पाया हैतीनों में से किसी की भी फिल्म आती हैतो यह रिकार्ड टूटने की बात होती है क़ि दबंग से धूम3 ने कितने 100 करोड़ ज्यादा कमाएपूरे देश में लोगों को 15-15 दिन तक टिकट के लिए संघर्ष करना पड़ता हैजब कोई फिल्म इतनी हिट होती है, तो जाहिर सी बात है क़ि ये फिल्में पूरे देश के हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई भी देखते होंगे? केवल मुसलमानों के ही थियेटर जाने से तो कोई फिल्म 500 करोड़ नहीं कमा सकती हैमेरा मतलब है, इस देश का 90% तबका सेकुलर विचारधारा का हैसब इन फिल्मी सितारों को आँखों पर बिठाकर रखते हैं
जब ऐसे में कोई अभिनेता कोई राजनैतिक या देश के गंभीर मुद्दे जिनपर उन्हें नहीं बोलना चाहिए, बोल देता है, तो पूरे देश को ठेस पहुंचती हैकोई भी इसे पसंद नहीं करता है. जैसे 2-3 साल पहले ही शाहरुख ख़ान ने पाकिस्तान के खिलाडियों को भारत में खेलने की अनुमति को लेकर एक ऐसा ही बयान दे दिया थातब पूरा देश 26/11 के दर्द उबर भी नहीं पाया थातब उनका पूरे देश में बहुत विरोध हुआ थाजो किसी हद तक जायज भी थाहालांकि कुछ राष्ट्रवादियों के विरोध के तरीके को मैं सही नहीं मानता हूँमैं पूरे देश में लता मंगेशकर के गीतों को लोग दिल से सुनते हैंयहाँ तक कि भारत में जितने मशहूर ग़ुलाम अली हुए, उतनी ही लताजी पाकिस्तान मेंमैं भी अभी तक उनके गीतों को बहुत पसंद करता था. कुछ दिन पहले ही वो अपनी मोदी भक्ति को पूरे देश के सामने दिखा चुकी हैं। 15-31 जनवरी तक तहलका में 5 साल की बेस्ट कवर स्टोरी दी गई हैंउसमें ही लता जी पर भी एक स्टोरी हैपता नहीं क्यों कल मेरे बहुत प्रयास के बाद भी उसे मैं दिल से पढ नहीं सकाअभी 14 जनवरी से एक बहुत बड़ी चर्चा हो रही थी, सलमान ख़ान के मोदी के लिए "जय हो" के नारे लगानामैंने सलमान की 3-4 साल में कोई फिल्म नहीं छोड़ी थीइसे देखने का मन ही नहीं हुआइंटरनेट पर देखी लेकिन अच्छी फिल्म के बाद भी दिल से प्रसन्सा नहीं कर पायाअगर यह फिल्म फ्लॉप हुई है, तो केवल मुस्लिमों के नाराज होने से ही नहीं बल्कि हम जैसे सेकुलर हिन्दुओं की वजह सेएक हफ्ता भी नहीं हुआ पूरे के पूरे हॉल खाली पड़े हैंसलमान ने यह सब फिल्म को हिट करने के लिए किया था, लेकिन दांव उल्टा पड गया
कहने का मतलब यही है, क़ि जो जिसका काम है वही करे तो ज्यादा अच्छा रहता हैचाहे वो नेता हो, संत हो, अभिनेता या गायक हो सबको अपने-अपने काम करने चाहिएहो सकता है, आपकी निजी राय में कोई व्यक्ति विशेष अच्छा हो, लेकिन सर्वजनिक तौर पर आपकी प्रभाव का असर पड़ता हैक्योंकि आप "आम आदमी" नहीं हो। आपकी बात का असर पूरे समाज पर पड़ता है और आपकी यह विचारधारा उन प्रशंसकों के दिलों को ठेस पहुंचती है, जिनकी सँख्या करोड़ो में है भले ही यह प्रसंसा राहुल गाँधी या अरविन्द केजरीवाल की हो सभी को बोलने का मौलिक अधिकार हैअगर आपको बोलना ही है तो फिल्मी कैरियर छोड़कर राजनीति में कूद जाओ

Thursday, January 16, 2014

"आप" की वैचारिक आलोचना भी जरूरी है।

पिछले दो महीने से देश में चली राजनैतिक बदलाव की बयार से मैं भी बच नहीं पाया। कुछ मुद्दों पर मैने भी आम आदमी पार्टी  से प्रभावित हुआ। कल मायावती के जन्मदिन पर भी लखनऊ में उनकी एक बड़ी रैली थी। राजनैतिक विद्यार्थी होने कारण मैने उनका पूरा 1-1.5 घंटे का भाषण सुना। बहुत अच्छे से मैने उसका विश्लेषण किया। उन्होने पहली बार अपने भाषण में समाजवादी पार्टी को कम जगह दी। सपा और कांग्रेस पर भी निशाना तो साधा लेकिन उतना जोरदार नहीं जो भाजपा और आम आदमी पार्टी पर था। उन्होंने सपा की तो आलोचना कम की क्योंकि उन्हें पता है, कि अखिलेश सरकार की मीडिया में हुई किरकिरी की वजह से साख अब उठ नहीं पाएगी। कांग्रेस पूरे देश में इतनी कमजोर है, कि अब उसको भी लोग रेस से बाहर मानने लगे हैं। मायावती भी अपनी उर्जा कमजोरों पर ना लगाकर मजबूत मोदी पर भड़ास निकाली। उन्होंने मोदी का वैचारिक विरोध किया। उन्हें गोधरा से लेकर मुजफ़्फ़र नगर तक के दंगों का दोषी बताते हुए आलोचना की। पिछले कई दिनों से मोदी भी अपने चाय वाला होने का फायदा उठाते हुए इमोसनल फायदा उठा रहे थे। उनकी इस बात को कोई भी काउन्टर नहीं कर पा रहा था। लेकिन पहली बार मायावती ने मोदी की इस ढाल को वैचारिक चुनौती दी। उन्होने कहा क़ि कोई भी चायवाला देश का प्रधानमंत्री बने तो सबको खुशी होगी, लेकिन अगर कोई दलित चायवाला एक आई.पी.एस. भी बन जाए तो स्वीकार नहीं किया जाता है। उन्होने तमिलनाडु के चाय वालों का उदाहरण भी दिया कि वहाँ पर दलितों के लिए अलग कप और ग्लास होते हैं। नीतीश के उस ऐतिहासिक ज्ञान वाले भाषण के बाद पहली बार किसी ने मोदी को सही से घेरा। मोदी अब इसका कैसे जवाब देते हैं। उसका तो पता नहीं लेकिन यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, क़ि वो वैचारिक जवाब नहीं होगा। हो सकता है वही कांग्रेस के चंगू-मंगू कहकर काउन्टर अटैक करें।
मायावती भी एक सामाजिक आन्दोलन से निकली हुई नेत्री हैं। उन्हें डर है कि कहीं गैर-राजनैतिक सेकुलर हिन्दू-मुस्लिम वोट केजरीवाल ना ले जाएँ । अतः उन्हें केजरीवाल के उत्तरप्रदेश में सरकार विरोधी वोटों को बांटने का हिस्सेदार मान रही हैं। तभी आम आदमी पार्टी और केजरीवाल भी उनके निशाने पर रहे। अभी तक हमने जो केजरीवाल की आलोचना सुनी थी वो इस प्रकार थी...अन्ना आन्दोलन को हाईजैक कर आए हैं, कांग्रेस से समर्थन ले लिया, भाजपा-कांग्रेस की बी-टीम हैं या जो अन्ना के नहीं हुए वो देश के क्या होंगे? लेकिन इस आलोचना को आम जन मानस में सुनने वाले कान केवल भाजपा या कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को छोड़कर किसी के पास नहीं थे। लेकिन पहली बार केजरीवाल की वैचारिक आलोचना हुई है। उनकी इस अलोंचना ने भले ही कुछ प्रभाव न डाला हो लेकिन एक बार सोंचने को तो मजबूर कर ही दिया है। उन्होंने कहा कि दलितों, अल्पसंख्यकों व अन्य शोसित वर्गों को उच्चवर्गों या खुद के वैश्य या बनिया समाज को एक पंक्ति में खड़ा करके आम आदमी नहीं कह सकते। पहली बार किसी ने केजरीवाल की जाति पर भी बात की। देश को भी यह बात अब पता चली कि केजरीवाल बनिया जाति से आते हैं। केजरीवाल की आम आदमी की परिभाषा को भी उन्होनें चैलेंज किया।
निजीतौर पर एक पार्टी का समर्थक होने के नाते मैं इस बात पर माया के खिलाफ गुस्सा भी निकाल सकता था, लेकिन उनकी आलोचना की बजाय अपने गिरेमान में भी देखना अनिवार्य है। अब आम आदमी पार्टी एक राष्‍ट्रीय पार्टी बन गई है, तो मुझे लगता है क़ि उन्हें अब हर अहम राजनैतिक मुद्दे पर अपनी राय देश के सामने रखनी चाहिए। जैसे आतंकवाद, सेकुलरिज्म, आरक्षण, क्षेत्रीयता, नक्सलवाद, विदेशनीति और अर्थनीति। लेकिन इन मुद्दों पर अब तक पार्टी की तरफ से कोई स्पष्ट राय नहीं आई है। कई प्रवक्ता इन चीजों को पुरानी राजनीति की घटिया चीजें कह देते हैं। जैसे कुछ दिनों पहले ही पार्टी की एक मात्र दलित महिला विधायक और मंत्री राखी बिडलान ने आरक्षण को गैर-जरूरी बता दिया था। अब उन्हें इतनी भी अक्ल नहीं थी कि अगर वो सीट आरक्षित न होती तो शायद उन्हें टिकट ही ना मिलता। आज आम आदमी पार्टी में बहुत बड़ा युवावर्ग आरक्षण विरोधी भी जुड़ा है, मोदी के साथ भी। भले ही इन्हीं कुछ मुद्दों की वजह से हमारे देश की राजनीति इतनी बदहालत में हो। लेकिन देश के इतिहास, संस्कृति और समाज को देखते हुए आप इन मुद्दों से बच भी नहीं सकते हैं। अपनी विचारधारा तो बतानी ही पड़ेगी. एक और कार्यक्रम में पार्टी प्रवक्ता प्रो. आनन्द कुमार ने इन मुद्दों पर जल्दी ही पार्टी की अन्तः कमेटी की तैयार रिपोर्ट को देश के सामने रखने को कहा था। लेकिन मुझे नहीं लगता है, कि पार्टी की हाईकमान इन मुद्दों पर इतनी जल्दी चुनावी व्यस्तता के बीच आम सहमति पा सकती है। केजरीवाल, मनीष और योगेन्द्र की विचारधारा अलग-अलग है। कुमार विश्वास दक्षिणपंथी झुकाव के और प्रशान्त भूषण वामपन्थी हैं। एक लोकतान्त्रिक देश और पार्टी में ऐसा होना भी चाहिए, लेकिन देश चलाने के लिए एक राय होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर देश जनता पार्टी का बिखराव देख चुका है।
पहले हमने दलित चिंतक प्रो. विवेक कुमार को एक टीवी कार्यक्रम में यह कहते सुना था कि जे. एन. यू. मे केजरीवाल का आरक्षण विरोधी भाषण हुआ था। मैने वो भाषण की रिकॉर्डिंग सुनी लेकिन मुझे यह कहीं से भी नहीं लगा कि अरविन्द का वो भाषण आरक्षण विरोधी था। केजरीवाल ने यह कहा था कि आरक्षण जिन जातियों को मिल रहा है, उन्हीं को मिले लेकिन उनमे भी जो परिवार एक बार आरक्षण प्राप्त कर ले, उसे आरक्षण ना देकर अन्य अपेक्षित गरीब परिवार को लाभ दिया जाए। यही बात देश का हर दलित पिछड़ा और गरीब चाहता है। मेरे गाँव में ही 10-12 पिछड़ी जातियाँ रहती हैं, लेकिन केवल दो-तीन यादव परिवारों से ही 18-20 लोग सरकारी नौकरी करते हैं। यही दशा दलितों की भी है। जम्मू-कश्मीर पर आई प्रशांत भूषण की राय को मीडिया और विरोधी पार्टियों ने बहुत दुष्प्रचारित किया। उन्होंने इस बयान को ऐसे बताया जैसे प्रशांत ने यह कह दिया हो कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। जबकि इसके पहले जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी APASPA हटाने की बात कही थी। सरकार और प्रशांत भी पूर्व में कई बार यह बात दोहरा चुके हैं। मैं स्वयं इस बात को मानता हूँ, कि पूरे जम्मू-कश्मीर से लेकर लद्दाख तक सेना रहे या ना रहे इस बात पर जनता की राय लेनी चाहिए। कई बार सेना की वजह से वहाँ के लोगों को परेशानियाँ होती रही हैं। आर्मी के जवानों द्वारा कश्मीरी लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाए होती रही हैं। तो जनता की राय लेना कोई बुरी बात नहीं हो सकती है। आज पार्टी विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने कुछ सवाल उठाए, मुझे निजी तौर पर उनके 2-3 मुद्दों पर लगा क़ि सरकार को सोंचना चाहिए। लेकिन बिन्नी की मंत्रीमंडल में ना शामिल किए जाने पर दिखी नाराजगी ने आज के सवालों को संदेह के घेरे में ला दिया है। बिन्नी को मैं चुनाव के पहले से जानता हूँ, जब वो पार्षद हुआ करते थे। उन्होने कई अच्छे काम किए थे। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जमीन खड़ी करने मे बिन्नी का भी योगदान है। उनके काम और नाम को ईमानदारी के मॉडल मे रूप में पेश किया गया है। मोहल्ला सभा का मॉडल भले ही अरविन्द ने स्वराज किताब में बनाया हो लेकिन, विनोद कुमार बिन्नी ने ही सबसे पहले प्रयोग किया था। हम यह भी कह सकते हैं, क़ि एक ईमानदार और गैर-महत्वाकांक्षी होने के नाते केजरीवाल को आर्थिक नीतियों पर यहजल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए थी। हम भी मानते हैं, कि यह जनता को शॉर्टटर्म में दी गई राहत है, लेकिन यह भी सच है क़ि यह राहत आगामी चुनाव को देखते हुए दी गई है। सवाल बहुत हैं। आम आदमी पार्टी की तरफ से कुछ जवाब दिए भी गए हैं। लेकिन कुछ सवालों के जवाब आने बाकी हैं। उनका भी इंतजार रहेगा। तब-तक अलोंचना करते रहिए, लेकिन आलोचना वैचारिक हो। यही लोकतंत्र की मजबूती का एक मंत्र भी है।

Tuesday, January 7, 2014

बाबा रामदेव का टैक्सासन

अभी कुछ दिनों पहले ही एक कार्यक्रम में राजनाथ सिंह जी 2014 की नीतियों पर बात कर रहे थे। मैनें सी. एस. डी. एस. (C.S.D.S.) के संपादक अभय कुमार दुबे जी को मैसेज (SMS) किया क़ि भाजपा की 2014 के लिए अर्थनीति क्या है? अभय जी ने पूंछा लेकिन राजनाथ सिंह जी ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया। अभी एक दिन बाबा रामदेव ने मोदी के सामने समर्थन की शर्त रख दी, कि वो हमारी अर्थनीति को स्वीकार करें। मोदीजी ने भी कोई ठोस जवाब तो नहीं दिया, जमकर राजनैतिक जवाब देते हुए, कहा की हम इस पर गहन रूप से विचार करेंगे।
अब हमें यह समझना होगा कि बाबा की शर्तें क्या थी? उनका कहना है, कि भारत में सभी 32 प्रकार के कर खत्म कर दिए जाएँ और बैंकिंग ट्रांजेंक्सन पर टैक्स लगा दिया जाए। यह जो बात कही गई, वह इस प्रकार का आदमी ही कह सकता है, जो टैक्स से बहुत परेशान है, और मुम्बई या दिल्ली के अलावा भारत नहीं जानता हो। पहली बात तो यह कि जिस भारत देश में 16 लाख करोड़ रुपए प्रतिवर्ष खर्चा आता है। और 130 करोड़ जनता में से केवल 4 करोड़ जनता ही टैक्स दे रही हो। ऐसे देश में आप टैक्स खत्म करके क्या साबित करना चाहते हैं। फिर देश का खर्चा कहाँ से निकलेगा? हाँ एक सी. ए. (Charted Accountant) असिस्टेंट होंने के नाते मैं यह कह सकता हूँ, कि भारत में टैक्स का सरलीकरण (Simplification) होना चहिए। आदमी सर्विस टैक्स और टी. डी. एस. सरीखी चीजों से बहुत परेशान है। उपर से मुम्बई में एल. बी. टी. (Local Body Tax) और  लगा दिया। अब वैट पर भी सरचार्ज लगाने की सोंच रहे रहे हैं। सेल्स टैक्स की जगह वैट का आना सरलीकरण की ही एक प्रक्रिया थी। लेकिन उसपर सही से अमल नहीं हो सका है। आदमी टैक्स देने से नहीं उसके झंझट से डरता है। टैक्स लेना तो ठीक है, परन्तु उसे उसी प्रकार की सुविधाएँ भी मिलनी चाहिए। आदमी इनकम टैक्स ओफ़िस के चक्कर लगाने से डरता है। इसमें सुधारों की तो जरूरत है, लेकिन अगर यह खत्म हो गया तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या होगा? कभी सोचा है, बाबा रामदेव ने। अब बात करते हैं बैंकिंग ट्रान्जेक्सन पर टैक्स की। तो आप अगर एक अनपढ आदमी से भी पूंछे तो वो आपको यह बता सकता है, कि जो आदमी ज्यादा कमाता है सरकार उसी से कुछ टैक्स लेती है। आदमी की आमदनी जिस हिसाब से होती है, उसी प्रतिशत में टैक्स पड़ता है। दुनिया के हर देश में लगभग टैक्स लेने की यही प्रक्रिया होगी, इसकी मुझे ठीक-ठीक जानकारी नहीं है। मैनें भी एक टैक्स विरोधी मित्र से पूछा कि दुनिया का एक भी देश बताइए जहाँ टैक्स नहीं पड़ता हो। तो उन्होंने दुबई, स्विटजरलैंड, उत्तरी अमेरिका के कई देशो बरर्मुडा, बहामा और ब्राजील के नाम बताए। ब्राजील में तो यह व्यवस्था 1995-2001 तक खत्म भी हो चुकी थी। दुबई की अगर बात की जाए तो वो एक छोटा सा शहर जो आर्थिक रूप से बहुत मजबूत है। बाकी अरब देशों में तेल निकलने की वजह से अर्थव्यवस्था मजबूत है। उत्तरीअमेरिका के छोटे-छोटे देश जहां खनिजों का भंडार है, 20-25 लाख आबादी है। वहाँ ऐसा हो सकता है। लेकिन भारत जैसे बड़े और आर्थिक रूप से पिछड़े या असमानता प्रधान देश में आप इस तरह की बातों को सोच भी नहीं सकते हैं। बाबा रामदेव इसके विकल्प के रूप में जो बातें बता रहे हैं, उनमें सबसे प्रमुख है बैंकों के लेन-देन पर 2% टैक्स लगा दिया जाए। अब इस बात से तो उनकी आर्थिक और सामाजिक निरक्षरता साबित होती है। भारत में नियमानुसार कमाई के हिसाब से टैक्स देने की बात कही गई है। उदाहरण के लिए मैं 1 लाख 20 हजार रुपए सालाना कमाता हूँ, तो मुझे कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। कभी मेरे घर पर जरूरत पड़ी तो अपने बॉस से लोन लेकर 50 हजार रुपए लेकर पिताजी के खाते में ट्रांसफर कर दिए. इसपर मेरे खाते से बैंक 1 हजार और पिताजी के खाते से भी इतने ही रुपए काट लेगी। मतलब मुझे मेरे बॉस को 52 हजार रुपए चुकाने पडेंगे, अगर ब्याज लिया तो अलग से। जबकि नियमानुसार यह मेरी कमाई नहीं उधार था। तब तो मैं बैंक में पैसे न डालकर उनके हाथ में ही देना पसंद करूंगा।
उपर्युक्त उदाहरण से ही ऐसा सोंचने वालों के दावों की पोल खुल जाती है। इस नियम से तो हर आदमी बैंक का प्रयोग ही कम कर देगा। आप बात काला धन लाने की कर रहे थे, जबकि इससे तो काला धन और बाहर जाएगा। फिर से लोग रजाइयों और दीवारों में पैसा रखने लगेंगे। अभी भी रखते होंगे. फिर अगर बैंकिंग साक्षरता की बात की जाए तो इसमें भी हमारे देश की एक आबादी का बड़ा हिस्सा अबतक बैंकों से दूर है। आज हमारे देश में हर दूसरे आदमी के पास बैंक खाता नहीं है। 10 ऐसे राज्य हैं, जहाँ यह अंतर और भी अधिक है। तो फिर क्या आप यह योजना दिल्ली, मुम्बई और अहमदाबाद के लिए ही रखेंगे?
फिर दूसरी बात बाबा ने कही कि आप 1000 और 500 के नोट बंद कर दो। आप ही बताइए क्या यह काला धन रोंकने का कारगर मुद्दा होगा। ऐसा करने से देश के मध्यमवर्ग और ईमानदारउच्चवर्ग को बहुत दिक्कतें आने वाली हैं। आपकी यह टैक्स व्यवस्था किसी के भी समझ में नहीं आ रही है। क्या प्रोपर्टी खरीदने, ए.सी. खरीदने, पेट्रोल खरीदने या अन्य चीजों पर एक ही टैक्स होना चाहिए। फिर तो यह मोटी बुध्दि वाली बात हो गई। और इससे गरीब या अमीर का अंतर खत्म हो जाएगा। सब पर टैक्स की एक ही दर लगेगी. मजबूत अर्थव्यवस्था के नाम पर बाबा ने जो यह आइडिया दिया है, यह बिल्कुल फ्लॉप और किसी निरक्षर व्यक्ति का लगता है। मुझे नहीं लगता है कि उनकी यह बेतुकी माँग वो मोदी जी मान लेगे, जो गुजरात में टैक्स के नाम पर बहुत सक्त रहते हैं। बाबा को बरगला कर एक कमेटी ही बना दी जाएगी। एक तरफ बाबा मोदी की जीत के बाद अपने वित्त मंत्री का पद सोच रहे हैं। मोदी जी या भाजपा उनको भले ही वोट के डर से साफ इंकार न करे, लेकिन हमारे अनुसार तो उन्हें अपना ध्यान योगा पर ही लगाना चाहिए। अगर वो अर्थशास्त्र का काम करने लगे, तो देश को चौपट कर देंगे।

Sunday, January 5, 2014

राहुल गाँधी जी को आम युवा की पाती

आदरणीय राहुल भईया,
                       गुस्ताखी के लिए माफी चाहता हूँ, जो आपको व्यस्तता के समय डिसटर्ब कर दिया। वो तो इन्टरनेट पर आपके प्रति मोदी सेना का #PAPPU वार देखकर रहा नहीं गया। मैं आज के 21वीं सदी के भारत का एक आम युवा (आपका छोटा भाई) हूँ। आम लिखने से आप यह न समझिएगा, कि मैं आम आदमी पार्टी का दूत हूँ। आम का तो आजकल सीजन चल रहा है। कहीं आपको मैंगो फ्रूटी वाला इमरान खान और परणिति चोपडा का एड तो नहीं याद आ गया। कन्फ्यूज मत होइए, आम खाने वाला नहीं। आम आदमी वाला। मजाक छोडिए, अब आता हूँ मुद्दे की बात पर।
सुना है, कि 16-17 जनवरी को पार्लियामेंट्री कमेटी की मीटिंग में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए आपका नाम घोषित किया जाने वाला है। ये लोग आपको उपहार नहीं चुनाव से पहले ही हार (पहनाने वाला नहीं) देने वाले हैं।  सबको पता है, कि इस बार कांग्रेस की हार तय है, ना मानो तो अपने सच्चे नेताओं (जयराम रमेश, मणिशंकर अय्यर और जनार्दन द्विवेदी) से पूंछकर देखिए। दस साल से आपकी पार्टी देश को लूटती आ रही है। मनमोहन सिंह का गुस्सा जनता आपके सिर उतार देगी। तो क्या फायदा? हाँ मैं आपको यह सलाह जरूर देता हूँ, कि आपको मिशन 2019 पर लग जाना चाहिए। हो सकता है, चुनाव 2015 तक ही हो जाएँ, क्योंकि अगली सरकार की उम्र कम ही होगी। फिर आप सामने आना। क्यों ना अभी आप एक डॅमी (मीरा कुमार, शिन्दे या चिदंबरम) को खड़ा कर दें। हालांकि आपने अभी कुछ महीनों में कुछ अच्छे कार्य (लोकपाल, दागी प्रत्याशी हटाने या जनता से जुड़कर मैनिफेस्टो बनाना, समलैंगिगता के खिलाफ बोलना) किए हैं, लेकिन तबतक आप बहुत देर कर चुके थे। मैं यह भी नहीं कहता कि आपकी सरकार ने पेपर पर अच्छा काम नहीं किया है। लेकिन उसे जमीन पर भी लाना पड़ेगा। आपकी यह बात बहुत अच्छी लगी, कि पहली बार आपने हार स्वीकार की और विरोधी आम आदमी पार्टी से सीखने की बात की। अगर आपको कुछ सीखना ही है, तो आप महात्मा गाँधी, अपने पिता राजीव गाँधी, ए.के. एंटेनी और कांग्रेस के इतिहास से सीखिए। अपने चापलूस टीम मेंबरों (संजय झा, रनदीप सूरजेवाला और दिग्विजय) की बजाय जमीनी नेताओं सत्यव्रत चतुर्वेदी, जयराम रमेश, जनार्दन द्विवेदी, सचिन पायलट और मणिशंकर अय्यर सरीखों से सलाह लिया करिए। आज भी केवल फ़ेसबुक और ट्विटर से जंग नहीं जीती जा सकती है। पहले आपको जमीन पर भी कुछ करना पड़ेगा। फिर आई. टी. सेल बिठाइएगा। नहीं तो मोदी के जैसे गुब्बारे से हवा निकल जाएगी।  कुछ मीडिया हल्कों से हवा आ रही है, कि पार्टी प्रियंका दीदी को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में है। लेकिन आप इसे भी नहीं होने देना नहीं तो वो भी पार्टी को हार से नहीं बचा सकेंगी। उसमें आपकी भी इज्जत जाएगी। लोग आपको प्रियंका दीदी से कमजोर मानने लगेंगे। अभी से उनकी भी उर्जा बचकर रखिए और 2019 में वापसी के लिए वो बहुत काम आएंगी।
राहुल भईया मैं आपकी एक और बात से नाराज हूँ कि आप कह रहे हैं, कि आप शादी नहीं करेंगे। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योंकि अब आपकी मोस्ट बैचलर ऑफ इंडिया वाली छवि नही रह गई है। अब कॉलेज की लड़कियां आपको देखकर आई. लव यू. नहीं कहती हैं। मैं तो कहता हूँ आप मिशन 2019 में एक अच्छी सी हिन्दुस्तानी (अगर कोई विदेशी पसंद आ गई हो तो बताइए, हम उसे भी स्वीकार कर लेंगे) कन्या से विवाह करके जाएँ।  कोशिस यह करिएगा कि भाभी की राजनीतिक समझ भी अच्छी हो। एक से भले दो। हाँ इससे एक बात और अच्छी होगी, कि आपका मन भारत में ज्यादा लगेगा और जनता यह नहीं कहेगी कि राहुल गाँधी तो हमेशा विदेश में ही रहते हैं। आप कुमार विश्वास के ऐलान से बिल्कुल भी डरिएगा नहीं। अमेठी में आपको हराना आसान काम नहीं है। (जब तक सपा आपके साथ है)। सबसे अच्छा तो तब होगा जब मोदी भी कुमार की ललकार सुनकर अमेठी से कूद जाएँ। वहां से कुमार तो आपको टक्कर दे सकते हैं, लेकिन मोदी जी की जमानत जब्त हो जाएगी। मेरी आदत वो नहीं है, कि आपसे युवाओं के लिए पुरानी घिसी-पिटी बातें (अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीब) पर आपकी राय और मदद माँगूं। आप तो यह करना चाहते हैं, लेकिन पता नहीं कब?  अंत में एक बाद कह दूं कि देश को आपकी पार्टी की बहुत जरूरत है, बसर्ते उसमें ईमानदार लोग हों। और आप मोदी के सहजादा शब्द से बिल्कुल चिंता मत करिए, क्योकि जिस दिन कांग्रेस पार्टी से आपके परिवार का वर्चस्व खत्म हो गया, उसी दिन पार्टी खत्म हो जाएगी। पत्र खुला होने के कारण कुछ बातें नहीं लिख सका हूँ, उम्मीद है आप खुद समझ जाएंगे या किसी जमीनी और ईमानदार नेता से पूंछ लेंगे। अगर आपका दिल कहे तो आप मनमोहन सिंह जी बात (राष्ट्रपति बनने) पर भी ध्यान देकर देखना।

धन्यवाद!

आपका युवा शुभचिंतक
कमलेश कुमार राठोर 

चिराग तले अंधेरा

कल तहलका का 2014 का पहला अंक पढ़ा। पूरी पत्रिका को साहित्यमय बनाने के लिए बधाई। चूंकि मैं भी साहित्यप्रेमी रहा हूँ, बहुत अच्छा लगा। कमलेश्वर जी को बहुत पहले से पढता आ रहा था। प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद और राहुल संक्रत्यायन के बाद कमलेश्वर जी ही मुझे पसंद रहे हैं। उनकी रचना आजादी मुबारक, अम्मा, आगामी अतीत, कोहरा, मांस का दरिया, पति पत्नी और वो तथा एक सड़क सत्तावन गलियाँ बहुत पसंद हैं। जब उन्होनें आलोचना लिखनी शुरु की तभी से मैंने नामवर सिंह को सही से जाना। कल तहलका में उनकी सहयोगी लेखक मन्नू भंडारी का संस्मरण पढ़ा। बहुत चालाकी और दिल से लिखा गया था। ऐसा लिखने वाले के अंदर कलेजा चाहिए, वो भी अपने खास मित्र के मरने के बाद।
कमलेश्वर जी ने बहुत सी कहानियाँ, उपन्यास और आलोचनाएँ सामाजिक स्थिति पर लिखी हैं। हर रचना में उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को उजागर किया। पुरुषवादी विचारधारा पर बार-बार कठोर प्रहार किए। उनकी रचनाओं को पढकर उनकी विचारधारा को भी समझा जा सकता था। हमेशा ही ऐसा होता रहा है, कि लेखक की रचना पढ़कर ही उसे पहचाना जाता है। उसका सामाजिक योगदान भी पता चलता है। लेकिन कल मन्नू भंडारी ने जिस तरह से उनकी जिंदगी से पर्दा उठाया मैं तो दंग रह गया। उसके पहले मैने उनकी आत्मकथा-3 पढी थी। लेकिन उसमें ऐसा कुछ भी जिक्र नही किया गया था। असलियत पढ़कर रात भर सो नहीं पाया। क्या कोई इंसान ऐसा भी हो सकता है? जो लिखे कुछ और जीवन में कुछ और। ऐसा भी नहीं था कि केवल प्रेम प्रसंग रहे हों, दीपा नाम की औरत से उनको बच्चा था, मुम्बई और कलकत्ता में कई औरतों से ऐसे ही सम्बंध थे। अपनी पत्नी के साथ में बहुत निर्दयता का व्यवहार करते थे। मेरे हिसाब से तो इतना गिरे चरित्र का आदमी होना ही गुनाह है। अगर मन्नू जी ने यह बातें 15 साल पहले कही होती तो शायद कमलेश्वर की यह झूंठी महानता नहीं होती। हम मन्नू जी की भी मजबूरी समझ सकते हैं। लेकिन कल से मेरे मन में ना जाने क्यों हर एक लेखक की निजी जिंदगी जानने को लेकर एक इच्छा सी जाग गई है। अभी तक तो हम उस जीवनी पर ही विश्वास करते थे। जिसमें लिखा होता था, " बचपन से संघर्ष किया, पढने-लिखने में होसियार थे, 4-5 भाषाओ के साहित्य में बड़ा योगदान है आदि।" इसी प्रकार से अब राजेन्द्र यादव का वो बुढ़ापा वाला प्रेम-प्रसंग याद आ रहा है, जिसमें चार-पांच महीने पहले उनके नौकर को सजा हो गई थी। वो पता नही अब तक छूटा भी है या नहीं। राजेन्द्र के बारे में भी रिसर्च करने पर पता चला कि उनका भी चरित्र कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। इसी तरह से अब सक होता है, कि जय शंकर प्रसाद की तीन-तीन पत्नियाँ इतनी जल्दी कैसे मर गईं? भले ही वो निर्दोष हों, लेकिन सवाल तो उठता ही है।
वो लेखक जो मेरे आदर्श रहे हैं, उनकी जिंदगी में इस तरह की बाते सुनकर बहुत दुख होता है। यही दुख  अभी तरुण तेजपाल और एक कानून का विद्यार्थी होने के नाते जस्टिस गांगुली केस में भी हुआ था। जब कोई ऐसा आदमी जो हमारे समाज को एक राह दिखाने वाला हो। (इसमें आशाराम बापू का उदाहरण सटीक है। ) वह कुछ ऐसा कुकृत्य करता है, तो अत्यंत पीड़ा होती है। जब ये लोग ऐसा करेंगे तो समाज का बिगाड़ा हुआ, अनपढ, अपराधी प्रवृति के तबके से सोंच बदलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...