Thursday, September 1, 2016
सातवें वेतन आयोग की नई सेलरी
Sunday, August 28, 2016
लोकतंत्र को कंधे पर उठाए मांझी
आज नौ बजते ही मैं रो पडा यह सुनकर कि एक इंसान को अपनी पत्नी के शव को 12 किलोमीटर दूर तक कंधे पर लादकर गया। पैसे न होने की वजह से अस्पताल की एंबुलेंस नहीं मिली। लोग देखते रहे किसी ने मदद नहीं की। दरअसल वो एक लाश लेकर खडी हुई कई लाशों के बीच से होकर गुजर रहा था। कैसा समाज? कैसी इंसानियत? कैसे लोग? हम और आप सब उसमें शामिल हैं, सोचो किसी को कुछ हो जाए तो हम या तो फोटो खींचेगे या फिर मुंह फेर कर निकल जाएगे। शर्मनाक है यह। माझी से हमें दशरथ माझी भी याद आ गया. वही दशरथ माझी जिसने अपनी पत्नी का इलाज नहीं होने देने के लिए दोषी पहाड़ को काटकर गिरा दिया था, बिना किसी सरकार के, बिना किसी स्मार्ट योजना के. उसने अपने हौसले से पहाड़ को मनुष्य की शक्ति का बोध कराया था. दोनों माझी में एक बात यह साझी है कि दोनों अपने-अपने प्रेम में कितने कोमल और अपने निश्चयों के धनी हैं. दाना माझी क्या सोच रहे होंगे... अमंग देई के शव को कंधों पर लादे हुए! कंधे पर अमंग को लेकर चलते हुए उसे क्या कुछ याद आ रहा होगा? उसके साथ दौड़ रही बेटी के आंसू और पत्नी का शव मिलकर दाना की मनोस्थिति को कितना व्याकुल कर रहे होंगे. उसे शायद प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के सपने और भाषण भी याद आ रहे होंगे. उसे लोकतंत्र की उन रस्मों की याद नहीं आ रही होगी.दाना को ओडिशा सरकार की उस योजना की भी याद आई होगी, जिसे नवीन पटनायक सरकार ने फरवरी में शुरू किया था.. ‘महापरायण’ योजना. जिसके तहत शव को सरकारी अस्पताल से मृतक के घर तक पहुंचाने के लिए मुफ्त परिवहन की सुविधा दी जाती है. तो यह दाना को क्यों नहीं मिली. क्या यह योजना उस जिला मुख्यालय के अस्पताल तक पहुंचने से पहले विकलांग हो गई, जहां टीबी से अमंग की मौत हुई. माझी ने बहुत कोशिश की लेकिन इस देश में सब कुछ आपकी हैसियत से तय होता है. यहां तक कि निजी अस्पताल में आपका इलाज भी. की विवशता हम कैसे लिख सकते हैं. माझी को मदद उसी मीडिया से मिली जो इन दिनों सबके निशाने पर है. जब उन्हें अस्पताल के अधिकारियों से किसी तरह की मदद नहीं मिली तो उन्होंने पत्नी के शव को एक कपड़े में लपेटा और कंधे पर लादकर भवानी पटना से करीब 60 किलोमीटर दूर रामपुर ब्लॉक के मेलघारा गांव के लिए पैदल चलना शुरू कर दिया. इसके बाद कुछ स्थानीय संवाददाताओं ने उन्हें देखा. जिला कलेक्टर को फोन किया और फिर शेष 50 किलोमीटर की यात्रा के लिए एक एम्बुलेंस की व्यवस्था की गई. दाना डर गया होगा कि कहीं उसकी प्रिय अमंग देई का शव अंतिम विदा से पहले सड़ न जाए. उसके जीते जी भले कोई नागरिक अधिकार नसीब न हुए हो, लेकिन कम से कम मरने के बाद तो सम्मानजनक अंतिम विदाई दी जाए. इस नाते मुझे दो माझी एक जैसे लग रहे हैं. दोनों सरकार से लड़े, अपनी जिद पर जिए. दोनों की पत्नी व्यवस्था से हारीं.साउथ सूडान में जब इमरजेंसी थी तो केविन कार्टर की खींची हुई यह तस्वीर आज ताजा हो जाती है, जिसमें एक बच्चा और गिद्ध बैठा है। यहां के राष्ट्रवादी मीडिया के लिए लाश लादे हुए तस्वीर तो टीआरपी के लिए अच्छी है, लेकिन जब उसके बुनियादी स्वास्थय के सवालों पर चर्चा होगी तो बोरिंग हो जाएगा सब।
Thursday, August 25, 2016
मोहन भागवत के बयान के मायने
Tuesday, August 16, 2016
गुजरात की राजनीति में उभरे तीन युवा नेता
Monday, August 15, 2016
लाल किले से मोदी जी 2016
Sunday, August 7, 2016
जीएसटी के मायने
Monday, August 1, 2016
कश्मीर पर टिप्पणी
इतने दिनों से चल रहा है लेकिन मैं कश्मीर के बारे में कुछ नहीं लिख रहा था। इतने गंभीर मामले पर जल्दबाजी में क्या लिख दूं? लेकिन आज यह तस्वीर भी फेसबुक पर ही कहीं से मिल गई तो रहा नहीं गया। शायद कश्मीर के लोग और सेना इतना नफरत नहीं करते हैं एक दूसरे से, जितना इन नेताओं ने नफरत पैदा कर दी है। या फिर टीआरपी वाली मीडिया के लिए जरूरी है। आप कश्मीर के इतिहास को देखिए, हमेशा सूफीवाद के साथ मिलकर रहे हैं लोग। लेकिन थोडी सी सम्प्रदायिक चिंगारी को आग में अमन और चैन के दुश्मन बदल देते हैं। यह चिंगारी हमारी सामाजिक असफलता की वजह से निकल कर बाहर आती है। युवाओं को भडकाकर हथियार के रूप में प्रयोग करने के लिए अलगाववादी बैठे हुए हैं, कभी कश्मीर में, तो कभी छत्तीसगढ के दंतेवाडा में। हमारी खास कर बहुसंख्यक समाज की सामाजिक जिम्मेदारी है कि हम अपने अल्पसंख्यकों के साथ सौतेला व्यवहार न करें, जिससे वे गलत रास्ते पर भटक कर न जाने पाए। चाहे वह मुसलिम, ईसाई या फिर दलित समुदाय हो। बहुसंख्यक समाज को समझने की जरूरत है कि हमेशा बडे भाई के कर्तव्य अधिक होते हैं इसलिए छोटी मोटी बातों को अनसुना करके बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए। कहीं न कहीं कश्मीरी पंडितों के पलायन के कारण पर समाधान के बजाए हर दल ने राजनीतिक तौर पर इसे जिंदा रखा। कुछ लोगों कहीं के मुददे कहीं खडे किए, अयोध्या के मुददे पर वहां और 370 पर यूपी में राजनीति हुई। यही कारण है कुछ खराब लोग आम जनता से लोगों को भडकाकर कर ट्रेनिंग कैंप ले गए। 1990 के दशक में तो कुछ नहीं था? यही वह समय था जब देश में सम्प्रदायिक राजनीति पहली बार चरम पर पहुंच गई थी। मंडल कमीशन के बाद आरक्षण तो कभी बाबरी विध्वंस के दंगे। तब तक न मुस्लिम आतंकवाद था न कभी पलायन। कभी दंगों की आग जली तो कभी बम धमाके। फिर कभी अलगाववादियों ने खूब नरसंहार किया। फिर कभी अफास्पा कानून का का गलत इस्तेमाल तो कभी वहाँ के लोगों से पत्थरबाजी फिर जवाब में सेना की गोलियां। और हाँ ये जो दल, नेता और राष्ट्रवाद के नमूने पत्रकार सोसल मीडिया पर सेना सेना किया करते हैं ये सब सेना के दुश्मन हैं। इनको सेना की शहादत पर तिरंगा लगाकर पाकिस्तान की मां *** आता है बस। इनकी देशभक्ति यहां से समाप्त। किसी में दम नहीं है कि सेना के जिंदा जवानों के अधिकारों के लिए सरकार से सवाल पूछ सकते। वन रैंक वन पेंशन के लिए आंदोलन में कितने सैनिक मरे? अबतक लड रहे हैं लेकिन कोई नहीं बोला। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करके एक झुनझुना थमा दिया गया। मात्र 18 हजार रुपये सैलरी मिलती है, क्या हमारा देश उन्हें 50 हजार रुपये सैलरी नहीं दे सकता है? क्यों नहीं ये शिक्षित राष्ट्रवादी युवा ये सवाल करते हैं कि सेना के उस जवान के बच्चे अच्छे स्कूलों में नहीं पढ पाते हैं। 20 साल की नौकरी में 10-12 साल तो उस कर्ज को चुकाने में बीत जाते हैं जो उसकी नौकरी के समय मां बाप ने इन नेताओं तक जाने वाली रिश्वत के खातिर लिया था। जब मैं ये सवाल करता हूं तो आप मुझे राष्ट्रद्रोही या पाकिस्तान चले जाओ कह देते हैं। लेकिन जब जब ये नफरत के सौदागर दो समुदायों को लडाने के लिए ललकारेंगे, चित्कारेंगे तब तब मैं उन समुदायों को आपस में गले मिलने के लिए पुकारते हुए पाएंगे। आप इसे कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन मैं इसे आंधियों के बीच खडा रहना कहता हूँ।
सेना के नाम पे भी हमें राष्ट्रवाद नाम की पट्टी पढाई जाती है पर उनकी बुनयादी जरुरतो पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता, अगली बार जब आप को सेना के नाम पर ललकारे तो इसे याद करना, और कभी दिल्ली आ के संसद के आस-पास नेताओ के घर के बाहर देखना दो कौड़ी के नेता अंदर AC रूम मैं बैठ के खाना खाते है और हमारे जवान उनके गेट के बहार सड़क पे बैठ के खाते है.
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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बडा अशोभनीय सा है किसी लडकी के लिए ऐसे लिखना या बोलना। लेकिन ट्विटर पर देखते हुए पक गया था। सो आज इसकी खोज करते करते एक मित्र ने ये कहान...
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पिछले हफ्ते ढाका में हुए आतंकी हमले के बाद एक बार फिर से इस्लाम को लेकर सब लोग आपस में शक जैसी स्थिति उत्पन्न करने लगे हैं, इस बहस का मुख...
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कल डोनल्ड ट्रम्प और हिलेरी क्लिंटन के बीच में अमेरिकन प्रेसीडेंसियल डिबेट को सुनकर मेरे मन में एक ख़याल आया कि क्या भारत में भी ऐसा होना च...