Thursday, January 16, 2014

"आप" की वैचारिक आलोचना भी जरूरी है।

पिछले दो महीने से देश में चली राजनैतिक बदलाव की बयार से मैं भी बच नहीं पाया। कुछ मुद्दों पर मैने भी आम आदमी पार्टी  से प्रभावित हुआ। कल मायावती के जन्मदिन पर भी लखनऊ में उनकी एक बड़ी रैली थी। राजनैतिक विद्यार्थी होने कारण मैने उनका पूरा 1-1.5 घंटे का भाषण सुना। बहुत अच्छे से मैने उसका विश्लेषण किया। उन्होने पहली बार अपने भाषण में समाजवादी पार्टी को कम जगह दी। सपा और कांग्रेस पर भी निशाना तो साधा लेकिन उतना जोरदार नहीं जो भाजपा और आम आदमी पार्टी पर था। उन्होंने सपा की तो आलोचना कम की क्योंकि उन्हें पता है, कि अखिलेश सरकार की मीडिया में हुई किरकिरी की वजह से साख अब उठ नहीं पाएगी। कांग्रेस पूरे देश में इतनी कमजोर है, कि अब उसको भी लोग रेस से बाहर मानने लगे हैं। मायावती भी अपनी उर्जा कमजोरों पर ना लगाकर मजबूत मोदी पर भड़ास निकाली। उन्होंने मोदी का वैचारिक विरोध किया। उन्हें गोधरा से लेकर मुजफ़्फ़र नगर तक के दंगों का दोषी बताते हुए आलोचना की। पिछले कई दिनों से मोदी भी अपने चाय वाला होने का फायदा उठाते हुए इमोसनल फायदा उठा रहे थे। उनकी इस बात को कोई भी काउन्टर नहीं कर पा रहा था। लेकिन पहली बार मायावती ने मोदी की इस ढाल को वैचारिक चुनौती दी। उन्होने कहा क़ि कोई भी चायवाला देश का प्रधानमंत्री बने तो सबको खुशी होगी, लेकिन अगर कोई दलित चायवाला एक आई.पी.एस. भी बन जाए तो स्वीकार नहीं किया जाता है। उन्होने तमिलनाडु के चाय वालों का उदाहरण भी दिया कि वहाँ पर दलितों के लिए अलग कप और ग्लास होते हैं। नीतीश के उस ऐतिहासिक ज्ञान वाले भाषण के बाद पहली बार किसी ने मोदी को सही से घेरा। मोदी अब इसका कैसे जवाब देते हैं। उसका तो पता नहीं लेकिन यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, क़ि वो वैचारिक जवाब नहीं होगा। हो सकता है वही कांग्रेस के चंगू-मंगू कहकर काउन्टर अटैक करें।
मायावती भी एक सामाजिक आन्दोलन से निकली हुई नेत्री हैं। उन्हें डर है कि कहीं गैर-राजनैतिक सेकुलर हिन्दू-मुस्लिम वोट केजरीवाल ना ले जाएँ । अतः उन्हें केजरीवाल के उत्तरप्रदेश में सरकार विरोधी वोटों को बांटने का हिस्सेदार मान रही हैं। तभी आम आदमी पार्टी और केजरीवाल भी उनके निशाने पर रहे। अभी तक हमने जो केजरीवाल की आलोचना सुनी थी वो इस प्रकार थी...अन्ना आन्दोलन को हाईजैक कर आए हैं, कांग्रेस से समर्थन ले लिया, भाजपा-कांग्रेस की बी-टीम हैं या जो अन्ना के नहीं हुए वो देश के क्या होंगे? लेकिन इस आलोचना को आम जन मानस में सुनने वाले कान केवल भाजपा या कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को छोड़कर किसी के पास नहीं थे। लेकिन पहली बार केजरीवाल की वैचारिक आलोचना हुई है। उनकी इस अलोंचना ने भले ही कुछ प्रभाव न डाला हो लेकिन एक बार सोंचने को तो मजबूर कर ही दिया है। उन्होंने कहा कि दलितों, अल्पसंख्यकों व अन्य शोसित वर्गों को उच्चवर्गों या खुद के वैश्य या बनिया समाज को एक पंक्ति में खड़ा करके आम आदमी नहीं कह सकते। पहली बार किसी ने केजरीवाल की जाति पर भी बात की। देश को भी यह बात अब पता चली कि केजरीवाल बनिया जाति से आते हैं। केजरीवाल की आम आदमी की परिभाषा को भी उन्होनें चैलेंज किया।
निजीतौर पर एक पार्टी का समर्थक होने के नाते मैं इस बात पर माया के खिलाफ गुस्सा भी निकाल सकता था, लेकिन उनकी आलोचना की बजाय अपने गिरेमान में भी देखना अनिवार्य है। अब आम आदमी पार्टी एक राष्‍ट्रीय पार्टी बन गई है, तो मुझे लगता है क़ि उन्हें अब हर अहम राजनैतिक मुद्दे पर अपनी राय देश के सामने रखनी चाहिए। जैसे आतंकवाद, सेकुलरिज्म, आरक्षण, क्षेत्रीयता, नक्सलवाद, विदेशनीति और अर्थनीति। लेकिन इन मुद्दों पर अब तक पार्टी की तरफ से कोई स्पष्ट राय नहीं आई है। कई प्रवक्ता इन चीजों को पुरानी राजनीति की घटिया चीजें कह देते हैं। जैसे कुछ दिनों पहले ही पार्टी की एक मात्र दलित महिला विधायक और मंत्री राखी बिडलान ने आरक्षण को गैर-जरूरी बता दिया था। अब उन्हें इतनी भी अक्ल नहीं थी कि अगर वो सीट आरक्षित न होती तो शायद उन्हें टिकट ही ना मिलता। आज आम आदमी पार्टी में बहुत बड़ा युवावर्ग आरक्षण विरोधी भी जुड़ा है, मोदी के साथ भी। भले ही इन्हीं कुछ मुद्दों की वजह से हमारे देश की राजनीति इतनी बदहालत में हो। लेकिन देश के इतिहास, संस्कृति और समाज को देखते हुए आप इन मुद्दों से बच भी नहीं सकते हैं। अपनी विचारधारा तो बतानी ही पड़ेगी. एक और कार्यक्रम में पार्टी प्रवक्ता प्रो. आनन्द कुमार ने इन मुद्दों पर जल्दी ही पार्टी की अन्तः कमेटी की तैयार रिपोर्ट को देश के सामने रखने को कहा था। लेकिन मुझे नहीं लगता है, कि पार्टी की हाईकमान इन मुद्दों पर इतनी जल्दी चुनावी व्यस्तता के बीच आम सहमति पा सकती है। केजरीवाल, मनीष और योगेन्द्र की विचारधारा अलग-अलग है। कुमार विश्वास दक्षिणपंथी झुकाव के और प्रशान्त भूषण वामपन्थी हैं। एक लोकतान्त्रिक देश और पार्टी में ऐसा होना भी चाहिए, लेकिन देश चलाने के लिए एक राय होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर देश जनता पार्टी का बिखराव देख चुका है।
पहले हमने दलित चिंतक प्रो. विवेक कुमार को एक टीवी कार्यक्रम में यह कहते सुना था कि जे. एन. यू. मे केजरीवाल का आरक्षण विरोधी भाषण हुआ था। मैने वो भाषण की रिकॉर्डिंग सुनी लेकिन मुझे यह कहीं से भी नहीं लगा कि अरविन्द का वो भाषण आरक्षण विरोधी था। केजरीवाल ने यह कहा था कि आरक्षण जिन जातियों को मिल रहा है, उन्हीं को मिले लेकिन उनमे भी जो परिवार एक बार आरक्षण प्राप्त कर ले, उसे आरक्षण ना देकर अन्य अपेक्षित गरीब परिवार को लाभ दिया जाए। यही बात देश का हर दलित पिछड़ा और गरीब चाहता है। मेरे गाँव में ही 10-12 पिछड़ी जातियाँ रहती हैं, लेकिन केवल दो-तीन यादव परिवारों से ही 18-20 लोग सरकारी नौकरी करते हैं। यही दशा दलितों की भी है। जम्मू-कश्मीर पर आई प्रशांत भूषण की राय को मीडिया और विरोधी पार्टियों ने बहुत दुष्प्रचारित किया। उन्होंने इस बयान को ऐसे बताया जैसे प्रशांत ने यह कह दिया हो कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। जबकि इसके पहले जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी APASPA हटाने की बात कही थी। सरकार और प्रशांत भी पूर्व में कई बार यह बात दोहरा चुके हैं। मैं स्वयं इस बात को मानता हूँ, कि पूरे जम्मू-कश्मीर से लेकर लद्दाख तक सेना रहे या ना रहे इस बात पर जनता की राय लेनी चाहिए। कई बार सेना की वजह से वहाँ के लोगों को परेशानियाँ होती रही हैं। आर्मी के जवानों द्वारा कश्मीरी लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाए होती रही हैं। तो जनता की राय लेना कोई बुरी बात नहीं हो सकती है। आज पार्टी विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने कुछ सवाल उठाए, मुझे निजी तौर पर उनके 2-3 मुद्दों पर लगा क़ि सरकार को सोंचना चाहिए। लेकिन बिन्नी की मंत्रीमंडल में ना शामिल किए जाने पर दिखी नाराजगी ने आज के सवालों को संदेह के घेरे में ला दिया है। बिन्नी को मैं चुनाव के पहले से जानता हूँ, जब वो पार्षद हुआ करते थे। उन्होने कई अच्छे काम किए थे। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जमीन खड़ी करने मे बिन्नी का भी योगदान है। उनके काम और नाम को ईमानदारी के मॉडल मे रूप में पेश किया गया है। मोहल्ला सभा का मॉडल भले ही अरविन्द ने स्वराज किताब में बनाया हो लेकिन, विनोद कुमार बिन्नी ने ही सबसे पहले प्रयोग किया था। हम यह भी कह सकते हैं, क़ि एक ईमानदार और गैर-महत्वाकांक्षी होने के नाते केजरीवाल को आर्थिक नीतियों पर यहजल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए थी। हम भी मानते हैं, कि यह जनता को शॉर्टटर्म में दी गई राहत है, लेकिन यह भी सच है क़ि यह राहत आगामी चुनाव को देखते हुए दी गई है। सवाल बहुत हैं। आम आदमी पार्टी की तरफ से कुछ जवाब दिए भी गए हैं। लेकिन कुछ सवालों के जवाब आने बाकी हैं। उनका भी इंतजार रहेगा। तब-तक अलोंचना करते रहिए, लेकिन आलोचना वैचारिक हो। यही लोकतंत्र की मजबूती का एक मंत्र भी है।

Tuesday, January 7, 2014

बाबा रामदेव का टैक्सासन

अभी कुछ दिनों पहले ही एक कार्यक्रम में राजनाथ सिंह जी 2014 की नीतियों पर बात कर रहे थे। मैनें सी. एस. डी. एस. (C.S.D.S.) के संपादक अभय कुमार दुबे जी को मैसेज (SMS) किया क़ि भाजपा की 2014 के लिए अर्थनीति क्या है? अभय जी ने पूंछा लेकिन राजनाथ सिंह जी ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया। अभी एक दिन बाबा रामदेव ने मोदी के सामने समर्थन की शर्त रख दी, कि वो हमारी अर्थनीति को स्वीकार करें। मोदीजी ने भी कोई ठोस जवाब तो नहीं दिया, जमकर राजनैतिक जवाब देते हुए, कहा की हम इस पर गहन रूप से विचार करेंगे।
अब हमें यह समझना होगा कि बाबा की शर्तें क्या थी? उनका कहना है, कि भारत में सभी 32 प्रकार के कर खत्म कर दिए जाएँ और बैंकिंग ट्रांजेंक्सन पर टैक्स लगा दिया जाए। यह जो बात कही गई, वह इस प्रकार का आदमी ही कह सकता है, जो टैक्स से बहुत परेशान है, और मुम्बई या दिल्ली के अलावा भारत नहीं जानता हो। पहली बात तो यह कि जिस भारत देश में 16 लाख करोड़ रुपए प्रतिवर्ष खर्चा आता है। और 130 करोड़ जनता में से केवल 4 करोड़ जनता ही टैक्स दे रही हो। ऐसे देश में आप टैक्स खत्म करके क्या साबित करना चाहते हैं। फिर देश का खर्चा कहाँ से निकलेगा? हाँ एक सी. ए. (Charted Accountant) असिस्टेंट होंने के नाते मैं यह कह सकता हूँ, कि भारत में टैक्स का सरलीकरण (Simplification) होना चहिए। आदमी सर्विस टैक्स और टी. डी. एस. सरीखी चीजों से बहुत परेशान है। उपर से मुम्बई में एल. बी. टी. (Local Body Tax) और  लगा दिया। अब वैट पर भी सरचार्ज लगाने की सोंच रहे रहे हैं। सेल्स टैक्स की जगह वैट का आना सरलीकरण की ही एक प्रक्रिया थी। लेकिन उसपर सही से अमल नहीं हो सका है। आदमी टैक्स देने से नहीं उसके झंझट से डरता है। टैक्स लेना तो ठीक है, परन्तु उसे उसी प्रकार की सुविधाएँ भी मिलनी चाहिए। आदमी इनकम टैक्स ओफ़िस के चक्कर लगाने से डरता है। इसमें सुधारों की तो जरूरत है, लेकिन अगर यह खत्म हो गया तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या होगा? कभी सोचा है, बाबा रामदेव ने। अब बात करते हैं बैंकिंग ट्रान्जेक्सन पर टैक्स की। तो आप अगर एक अनपढ आदमी से भी पूंछे तो वो आपको यह बता सकता है, कि जो आदमी ज्यादा कमाता है सरकार उसी से कुछ टैक्स लेती है। आदमी की आमदनी जिस हिसाब से होती है, उसी प्रतिशत में टैक्स पड़ता है। दुनिया के हर देश में लगभग टैक्स लेने की यही प्रक्रिया होगी, इसकी मुझे ठीक-ठीक जानकारी नहीं है। मैनें भी एक टैक्स विरोधी मित्र से पूछा कि दुनिया का एक भी देश बताइए जहाँ टैक्स नहीं पड़ता हो। तो उन्होंने दुबई, स्विटजरलैंड, उत्तरी अमेरिका के कई देशो बरर्मुडा, बहामा और ब्राजील के नाम बताए। ब्राजील में तो यह व्यवस्था 1995-2001 तक खत्म भी हो चुकी थी। दुबई की अगर बात की जाए तो वो एक छोटा सा शहर जो आर्थिक रूप से बहुत मजबूत है। बाकी अरब देशों में तेल निकलने की वजह से अर्थव्यवस्था मजबूत है। उत्तरीअमेरिका के छोटे-छोटे देश जहां खनिजों का भंडार है, 20-25 लाख आबादी है। वहाँ ऐसा हो सकता है। लेकिन भारत जैसे बड़े और आर्थिक रूप से पिछड़े या असमानता प्रधान देश में आप इस तरह की बातों को सोच भी नहीं सकते हैं। बाबा रामदेव इसके विकल्प के रूप में जो बातें बता रहे हैं, उनमें सबसे प्रमुख है बैंकों के लेन-देन पर 2% टैक्स लगा दिया जाए। अब इस बात से तो उनकी आर्थिक और सामाजिक निरक्षरता साबित होती है। भारत में नियमानुसार कमाई के हिसाब से टैक्स देने की बात कही गई है। उदाहरण के लिए मैं 1 लाख 20 हजार रुपए सालाना कमाता हूँ, तो मुझे कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। कभी मेरे घर पर जरूरत पड़ी तो अपने बॉस से लोन लेकर 50 हजार रुपए लेकर पिताजी के खाते में ट्रांसफर कर दिए. इसपर मेरे खाते से बैंक 1 हजार और पिताजी के खाते से भी इतने ही रुपए काट लेगी। मतलब मुझे मेरे बॉस को 52 हजार रुपए चुकाने पडेंगे, अगर ब्याज लिया तो अलग से। जबकि नियमानुसार यह मेरी कमाई नहीं उधार था। तब तो मैं बैंक में पैसे न डालकर उनके हाथ में ही देना पसंद करूंगा।
उपर्युक्त उदाहरण से ही ऐसा सोंचने वालों के दावों की पोल खुल जाती है। इस नियम से तो हर आदमी बैंक का प्रयोग ही कम कर देगा। आप बात काला धन लाने की कर रहे थे, जबकि इससे तो काला धन और बाहर जाएगा। फिर से लोग रजाइयों और दीवारों में पैसा रखने लगेंगे। अभी भी रखते होंगे. फिर अगर बैंकिंग साक्षरता की बात की जाए तो इसमें भी हमारे देश की एक आबादी का बड़ा हिस्सा अबतक बैंकों से दूर है। आज हमारे देश में हर दूसरे आदमी के पास बैंक खाता नहीं है। 10 ऐसे राज्य हैं, जहाँ यह अंतर और भी अधिक है। तो फिर क्या आप यह योजना दिल्ली, मुम्बई और अहमदाबाद के लिए ही रखेंगे?
फिर दूसरी बात बाबा ने कही कि आप 1000 और 500 के नोट बंद कर दो। आप ही बताइए क्या यह काला धन रोंकने का कारगर मुद्दा होगा। ऐसा करने से देश के मध्यमवर्ग और ईमानदारउच्चवर्ग को बहुत दिक्कतें आने वाली हैं। आपकी यह टैक्स व्यवस्था किसी के भी समझ में नहीं आ रही है। क्या प्रोपर्टी खरीदने, ए.सी. खरीदने, पेट्रोल खरीदने या अन्य चीजों पर एक ही टैक्स होना चाहिए। फिर तो यह मोटी बुध्दि वाली बात हो गई। और इससे गरीब या अमीर का अंतर खत्म हो जाएगा। सब पर टैक्स की एक ही दर लगेगी. मजबूत अर्थव्यवस्था के नाम पर बाबा ने जो यह आइडिया दिया है, यह बिल्कुल फ्लॉप और किसी निरक्षर व्यक्ति का लगता है। मुझे नहीं लगता है कि उनकी यह बेतुकी माँग वो मोदी जी मान लेगे, जो गुजरात में टैक्स के नाम पर बहुत सक्त रहते हैं। बाबा को बरगला कर एक कमेटी ही बना दी जाएगी। एक तरफ बाबा मोदी की जीत के बाद अपने वित्त मंत्री का पद सोच रहे हैं। मोदी जी या भाजपा उनको भले ही वोट के डर से साफ इंकार न करे, लेकिन हमारे अनुसार तो उन्हें अपना ध्यान योगा पर ही लगाना चाहिए। अगर वो अर्थशास्त्र का काम करने लगे, तो देश को चौपट कर देंगे।

Sunday, January 5, 2014

राहुल गाँधी जी को आम युवा की पाती

आदरणीय राहुल भईया,
                       गुस्ताखी के लिए माफी चाहता हूँ, जो आपको व्यस्तता के समय डिसटर्ब कर दिया। वो तो इन्टरनेट पर आपके प्रति मोदी सेना का #PAPPU वार देखकर रहा नहीं गया। मैं आज के 21वीं सदी के भारत का एक आम युवा (आपका छोटा भाई) हूँ। आम लिखने से आप यह न समझिएगा, कि मैं आम आदमी पार्टी का दूत हूँ। आम का तो आजकल सीजन चल रहा है। कहीं आपको मैंगो फ्रूटी वाला इमरान खान और परणिति चोपडा का एड तो नहीं याद आ गया। कन्फ्यूज मत होइए, आम खाने वाला नहीं। आम आदमी वाला। मजाक छोडिए, अब आता हूँ मुद्दे की बात पर।
सुना है, कि 16-17 जनवरी को पार्लियामेंट्री कमेटी की मीटिंग में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए आपका नाम घोषित किया जाने वाला है। ये लोग आपको उपहार नहीं चुनाव से पहले ही हार (पहनाने वाला नहीं) देने वाले हैं।  सबको पता है, कि इस बार कांग्रेस की हार तय है, ना मानो तो अपने सच्चे नेताओं (जयराम रमेश, मणिशंकर अय्यर और जनार्दन द्विवेदी) से पूंछकर देखिए। दस साल से आपकी पार्टी देश को लूटती आ रही है। मनमोहन सिंह का गुस्सा जनता आपके सिर उतार देगी। तो क्या फायदा? हाँ मैं आपको यह सलाह जरूर देता हूँ, कि आपको मिशन 2019 पर लग जाना चाहिए। हो सकता है, चुनाव 2015 तक ही हो जाएँ, क्योंकि अगली सरकार की उम्र कम ही होगी। फिर आप सामने आना। क्यों ना अभी आप एक डॅमी (मीरा कुमार, शिन्दे या चिदंबरम) को खड़ा कर दें। हालांकि आपने अभी कुछ महीनों में कुछ अच्छे कार्य (लोकपाल, दागी प्रत्याशी हटाने या जनता से जुड़कर मैनिफेस्टो बनाना, समलैंगिगता के खिलाफ बोलना) किए हैं, लेकिन तबतक आप बहुत देर कर चुके थे। मैं यह भी नहीं कहता कि आपकी सरकार ने पेपर पर अच्छा काम नहीं किया है। लेकिन उसे जमीन पर भी लाना पड़ेगा। आपकी यह बात बहुत अच्छी लगी, कि पहली बार आपने हार स्वीकार की और विरोधी आम आदमी पार्टी से सीखने की बात की। अगर आपको कुछ सीखना ही है, तो आप महात्मा गाँधी, अपने पिता राजीव गाँधी, ए.के. एंटेनी और कांग्रेस के इतिहास से सीखिए। अपने चापलूस टीम मेंबरों (संजय झा, रनदीप सूरजेवाला और दिग्विजय) की बजाय जमीनी नेताओं सत्यव्रत चतुर्वेदी, जयराम रमेश, जनार्दन द्विवेदी, सचिन पायलट और मणिशंकर अय्यर सरीखों से सलाह लिया करिए। आज भी केवल फ़ेसबुक और ट्विटर से जंग नहीं जीती जा सकती है। पहले आपको जमीन पर भी कुछ करना पड़ेगा। फिर आई. टी. सेल बिठाइएगा। नहीं तो मोदी के जैसे गुब्बारे से हवा निकल जाएगी।  कुछ मीडिया हल्कों से हवा आ रही है, कि पार्टी प्रियंका दीदी को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में है। लेकिन आप इसे भी नहीं होने देना नहीं तो वो भी पार्टी को हार से नहीं बचा सकेंगी। उसमें आपकी भी इज्जत जाएगी। लोग आपको प्रियंका दीदी से कमजोर मानने लगेंगे। अभी से उनकी भी उर्जा बचकर रखिए और 2019 में वापसी के लिए वो बहुत काम आएंगी।
राहुल भईया मैं आपकी एक और बात से नाराज हूँ कि आप कह रहे हैं, कि आप शादी नहीं करेंगे। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योंकि अब आपकी मोस्ट बैचलर ऑफ इंडिया वाली छवि नही रह गई है। अब कॉलेज की लड़कियां आपको देखकर आई. लव यू. नहीं कहती हैं। मैं तो कहता हूँ आप मिशन 2019 में एक अच्छी सी हिन्दुस्तानी (अगर कोई विदेशी पसंद आ गई हो तो बताइए, हम उसे भी स्वीकार कर लेंगे) कन्या से विवाह करके जाएँ।  कोशिस यह करिएगा कि भाभी की राजनीतिक समझ भी अच्छी हो। एक से भले दो। हाँ इससे एक बात और अच्छी होगी, कि आपका मन भारत में ज्यादा लगेगा और जनता यह नहीं कहेगी कि राहुल गाँधी तो हमेशा विदेश में ही रहते हैं। आप कुमार विश्वास के ऐलान से बिल्कुल भी डरिएगा नहीं। अमेठी में आपको हराना आसान काम नहीं है। (जब तक सपा आपके साथ है)। सबसे अच्छा तो तब होगा जब मोदी भी कुमार की ललकार सुनकर अमेठी से कूद जाएँ। वहां से कुमार तो आपको टक्कर दे सकते हैं, लेकिन मोदी जी की जमानत जब्त हो जाएगी। मेरी आदत वो नहीं है, कि आपसे युवाओं के लिए पुरानी घिसी-पिटी बातें (अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीब) पर आपकी राय और मदद माँगूं। आप तो यह करना चाहते हैं, लेकिन पता नहीं कब?  अंत में एक बाद कह दूं कि देश को आपकी पार्टी की बहुत जरूरत है, बसर्ते उसमें ईमानदार लोग हों। और आप मोदी के सहजादा शब्द से बिल्कुल चिंता मत करिए, क्योकि जिस दिन कांग्रेस पार्टी से आपके परिवार का वर्चस्व खत्म हो गया, उसी दिन पार्टी खत्म हो जाएगी। पत्र खुला होने के कारण कुछ बातें नहीं लिख सका हूँ, उम्मीद है आप खुद समझ जाएंगे या किसी जमीनी और ईमानदार नेता से पूंछ लेंगे। अगर आपका दिल कहे तो आप मनमोहन सिंह जी बात (राष्ट्रपति बनने) पर भी ध्यान देकर देखना।

धन्यवाद!

आपका युवा शुभचिंतक
कमलेश कुमार राठोर 

चिराग तले अंधेरा

कल तहलका का 2014 का पहला अंक पढ़ा। पूरी पत्रिका को साहित्यमय बनाने के लिए बधाई। चूंकि मैं भी साहित्यप्रेमी रहा हूँ, बहुत अच्छा लगा। कमलेश्वर जी को बहुत पहले से पढता आ रहा था। प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद और राहुल संक्रत्यायन के बाद कमलेश्वर जी ही मुझे पसंद रहे हैं। उनकी रचना आजादी मुबारक, अम्मा, आगामी अतीत, कोहरा, मांस का दरिया, पति पत्नी और वो तथा एक सड़क सत्तावन गलियाँ बहुत पसंद हैं। जब उन्होनें आलोचना लिखनी शुरु की तभी से मैंने नामवर सिंह को सही से जाना। कल तहलका में उनकी सहयोगी लेखक मन्नू भंडारी का संस्मरण पढ़ा। बहुत चालाकी और दिल से लिखा गया था। ऐसा लिखने वाले के अंदर कलेजा चाहिए, वो भी अपने खास मित्र के मरने के बाद।
कमलेश्वर जी ने बहुत सी कहानियाँ, उपन्यास और आलोचनाएँ सामाजिक स्थिति पर लिखी हैं। हर रचना में उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को उजागर किया। पुरुषवादी विचारधारा पर बार-बार कठोर प्रहार किए। उनकी रचनाओं को पढकर उनकी विचारधारा को भी समझा जा सकता था। हमेशा ही ऐसा होता रहा है, कि लेखक की रचना पढ़कर ही उसे पहचाना जाता है। उसका सामाजिक योगदान भी पता चलता है। लेकिन कल मन्नू भंडारी ने जिस तरह से उनकी जिंदगी से पर्दा उठाया मैं तो दंग रह गया। उसके पहले मैने उनकी आत्मकथा-3 पढी थी। लेकिन उसमें ऐसा कुछ भी जिक्र नही किया गया था। असलियत पढ़कर रात भर सो नहीं पाया। क्या कोई इंसान ऐसा भी हो सकता है? जो लिखे कुछ और जीवन में कुछ और। ऐसा भी नहीं था कि केवल प्रेम प्रसंग रहे हों, दीपा नाम की औरत से उनको बच्चा था, मुम्बई और कलकत्ता में कई औरतों से ऐसे ही सम्बंध थे। अपनी पत्नी के साथ में बहुत निर्दयता का व्यवहार करते थे। मेरे हिसाब से तो इतना गिरे चरित्र का आदमी होना ही गुनाह है। अगर मन्नू जी ने यह बातें 15 साल पहले कही होती तो शायद कमलेश्वर की यह झूंठी महानता नहीं होती। हम मन्नू जी की भी मजबूरी समझ सकते हैं। लेकिन कल से मेरे मन में ना जाने क्यों हर एक लेखक की निजी जिंदगी जानने को लेकर एक इच्छा सी जाग गई है। अभी तक तो हम उस जीवनी पर ही विश्वास करते थे। जिसमें लिखा होता था, " बचपन से संघर्ष किया, पढने-लिखने में होसियार थे, 4-5 भाषाओ के साहित्य में बड़ा योगदान है आदि।" इसी प्रकार से अब राजेन्द्र यादव का वो बुढ़ापा वाला प्रेम-प्रसंग याद आ रहा है, जिसमें चार-पांच महीने पहले उनके नौकर को सजा हो गई थी। वो पता नही अब तक छूटा भी है या नहीं। राजेन्द्र के बारे में भी रिसर्च करने पर पता चला कि उनका भी चरित्र कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। इसी तरह से अब सक होता है, कि जय शंकर प्रसाद की तीन-तीन पत्नियाँ इतनी जल्दी कैसे मर गईं? भले ही वो निर्दोष हों, लेकिन सवाल तो उठता ही है।
वो लेखक जो मेरे आदर्श रहे हैं, उनकी जिंदगी में इस तरह की बाते सुनकर बहुत दुख होता है। यही दुख  अभी तरुण तेजपाल और एक कानून का विद्यार्थी होने के नाते जस्टिस गांगुली केस में भी हुआ था। जब कोई ऐसा आदमी जो हमारे समाज को एक राह दिखाने वाला हो। (इसमें आशाराम बापू का उदाहरण सटीक है। ) वह कुछ ऐसा कुकृत्य करता है, तो अत्यंत पीड़ा होती है। जब ये लोग ऐसा करेंगे तो समाज का बिगाड़ा हुआ, अनपढ, अपराधी प्रवृति के तबके से सोंच बदलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

Sunday, December 29, 2013

बेरहम अखिलेश सरकार

पिछले कई महीनों से पूरी राजनैतिक ज़मात के मुंह पर मुज़फ़्फरनगर दंगों की कहानी है। सब एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। यह वह इलाका है जो 1947,1987,1991 और न जाने कितने नाजुक मौकों पर प्रेम और सौहार्द का प्रतीक बना रहा। वहां इस घटिया राजनैतिक कलाबाजी ने दंगे करा दिए। जब दंगे हो गए, तो आरोपी की पहचान कानून पर छोड़ दी गई है। अब सवाल यह उठता है, कि अगर सपा निर्दोष भी है। तो क्या दंगा पीडितो की मदद करना उनका जिम्मा नहीं है? मैं यह नहीं कह रहा हूँ, क़ि प्रदेश सरकार ने कुछ नहीं किया है। लेकिन 40 हजार दंगा पीड़ितों में से बचे हुए 8-10 हजार लोगों की जिम्मेदारी कौन लेगा? एक तरफ वो भूँखो मर रहे है, और दूसरी ओर मुलायम कहते हैं क़ि अब राहत शिविरों में कोई दंगा पीड़ित नहीं हैं। एक तरफ उनके 37 बच्चे शर्दी से मर गए और दूसरी तरफ उनके नौकरशाह कहते हैं क़ि ठंड से किसी की मौत नहीं होती है। उपर से हमारा ये बेरहम समाज, एक मामूली छेड़छाड़ से हुए दंगे में पीड़ित महिलाओं के साथ वहां बलात्कार हुए। लेकिन इन बातों को देख और सुनकर किसी भी सभ्य समाज के कान पर जून तक नहीं रेंगती है। एक तरफ यह सब बातें हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बेशर्म अखिलेश यादव सपरिवार सैफई महोत्सव मना रहे हैं। मुम्बई से हीरोइनों को 5-5 मिनट के अश्‍लील डांस के लिए करोड़ो रुपए दे रहे हैं। कपिल शर्मा जैसे नॉन-सेन्स कामेडियन की बेहूदा कॉमेडी पर हंस रहे हैं। उन्हें लोगों की जिंदगी से ज्यादा मनोरंजन की चिंता है। संस्कृति के नाम पर जनता का पैसा बर्बाद किया जा रहा है।
लगभग दो साल पहले की बात है, मैने फ़ेसबुक पर समाजवादी पार्टी को समर्थन करने लगा था। पूरा पेज समाजवादी पार्टी से रंगा रहता था। फिर यह सिलसिला नेट से लेकर जमीनी तौर पर भी जारी रहा। अखिलेश का बहुत प्रचार किया था। तब मैने कोई सपा की सदस्यता नहीं ग्रहण की थे। बस लूटते हुए उत्तरप्रदेश को नहीं देखा जा रहा था। ऐसा भी नहीं था कि मैं सपा की गुंडागर्दी से वाकिफ नहीं था। लेकिन एक युवा चेहरा देखा तो फिर से उम्मीद जाग गई थी। हालांकि मुलायम भी वर्तमान देश के सबसे बड़े किसान नेता हैं, लेकिन उनके चमचों और भाइयों की वजह से सब गुंडागर्दी चल रही है। जरा सी बात हुई नहीं कि यादव सरनेम का फायदा उठाना शुरु। एक साल तक तो यही लगा कि शायद हमें युवा मुख्यमंत्री को कुछ समय देना चाहिए। लेकिन समय के साथ-साथ अपराध और कुशासन बढ़ता ही गया। अखिलेश बेचारे मूक-बधिर और अपंग होकर देखते रहे। कोई भी काम की योजना नहीं लाई गई है। कल ही  अखिलेश यादव के फ़ेसबुक पेज पर एडमिन ने 100 पुलों का निर्माण पूर्ण बताया था। मेरे बिठूर में 2007 में मुलायम् सिंह ने पुल का उद्घाटन किया था। आज तक पुल चालू नहीं हुआ है। बोले थे, केन्द्र से बात करेंगे बिठूर रेलवे को फिर से चालू करने की, कुछ नहीं हुआ। सूबे के 30% गावों में बिजली के खम्भे तक नहीं गड़े हैं। जहाँ हैं, भी वहाँ महींनो लाइट नहीं आती है (रामपुर, कन्नौज, सैफई, रायबरेली और अमेठी को छोड़कर)। लैपटाप तो दे दिए, सब विद्यार्थी उन्हें बेंच रहे हैं। चार्जिंग से लेकर कम्प्यूटर समझने तक की समस्या। लैपटाप दिया तो साथ में यह निर्देश भी देते कि सब कॉलेजों में कम्प्यूटर पढ़ाना अनिवार्य होगा। बेरोजगार भत्ता किसी भी लायक को नहीं मिल रहा है। जरूरतमंदों फार्म कचरे में होगे। ओ. बी. सी. की स्कॉलरसिप पिछले वर्ष से नहीं मिली है। अस्पतालों की हालत पहले से खराब। बसपा सरकार से दुगुना भ्रष्टाचार, पहले तो मायावती के डर से अधिकारी भी टाइम पर आते थे, अब तो वो भी नहीं। मेरे गाँव में कुछ दलितों की जमीन पर यादवों के कब्जे को लेकर मुकदमा था। कब्जा 50 साल पहले से दलितों के पास था, जैसे सपा सरकार बनी उस जमीन पर कब्जा यादवों का हो गया। जबकि सारे गाँव को पता है, जमीन किसकी है, लेकिन डर की वजह से कोई बोलता नहीं है। विधायकों और छुटभैये नेताओं की जमकर चल रही है। कौन कहता है, कि सपा सरकार मुसलमानो की हमदर्द है, वो केवल रामपुर, और आजमगढ में ही ऐसा  होगा। मेरे यहाँ तो मुस्लिम और दलितों की स्थिति समान है। जो यादव चाहे मार-पीट लेता है, और रिपोर्ट लिखना भी मुस्किल। हम लोगों और  मीडिया  के दबाव से  अखिलेश ने कुछ सख्त कार्यवाही के ओर्डर दिए, जब पुलिस कुछ कारवाही करे तो जाति का वोट मोदी न ले जाए इस डर से शिवपाल ने फिर से वही स्थिति कर दी। पुलिस की भर्ती हो रही है। पिछली सरकार में 35 हजार सिपाही भर्ती हुए थे, मैने भी टेस्ट दिया था। फेल हो गया था। कम से कम 40-50 मित्र आज पुलिस में हैं, किसी ने नहीं बताया कि उसके 100 रुपए भी घूस में खर्च हुए। लेकिन इसबार तो बहुत मित्र कहते हैं, "यार मेरी सेटिंग 4.5 लाख में है। तो कोई कहता है, कि मेरे मामा अमिताभ बाजपाई के खास हैं।" पूरी 41 हजार की लिस्ट पहले से ही तैयार है। बस 2014 के चुनाव की औपचारिकता बाकी है। सारा का सारा युवा नेतृत्व फेल हो गया। जितना हम मायावती के शासन काल में 5 साल में छके (परेशान) थे, उतना ही आज सपा की सरकार ने 18 महीने में कर दिया है। अब  लगता है कि इससे अच्छी तो मायावती की सरकार ही थी। अब मेरी इस बात को कुछ लोग राजनैतिक महत्वाकांक्षा और दलबदलू नीति से जोड़ सकते हैं। लेकिन मैं आम आदमी हूँ, तो आम आदमी का ही दर्द बता रहा हूँ। जब एक सरकार बुरा करती है, तो दूसरे से उम्मीद और जब दूसरी सरकार गलत करे तो फिर पहले या तीसरे से उम्मीद। आखिर आम आदमी कर भी क्या सकता है, सिवाय उम्मीद के। जब पूरे देश की सरकार (केन्द्र) से ऊभ गए तो दूसरे की तरफ देखने लगे। लेकिन मेरी दिक्कत यह है, कि दूसरे विकल्प (मोदी) की विचारधारा को भी देखना पड़ेगा। क्योंकि किसी भी देश के लिए पैसे का घोटाला, खून की नदियाँ बहने से थोड़ा सा ठीक होगा। अब हमे तीसरे विकल्प की उम्मीद है, लेकिन तीसरे मोर्चे की अगुवाई तो खुद मुलायम ही कर रहे हैं। तो हमसे समर्थन की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। राहुल गाँधी भी दो बार मीडिया मार्केटिंग दौरा करके बैठ गए। अखिलेश को निर्देश देते हैं। अगर वो कुछ नहीं कर रहे हैं, तो कम से कम अपनी केन्द्र सरकार से ही कुछ मदद करा देते। मदद तो छोडो, बेचारे पीड़ित युवाओं का नाम ISI से जोड़ दिया।लेकिन जो जनता 225 सीटें दिलाना जानती है, वो 45 सीटों पर भी सीमित रखने का माद्दा रखती है। अगर 2017 तक सरकार चली(राष्ट्रपति शासन लगने का डर है।) तो चुनाव में सपा की भी हालत दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस जैसी होगी।
(ब्लॉग में किसी पर भी जातिगत टिप्पणी नहीं की गई है, बस उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत बताई है। )

Tuesday, December 24, 2013

क्या आप और साँप का गठबंधन है?

दिल्ली में सरकार बनाने का दावा पेश करने के बाद से आम आदमी पार्टी (आप) सीधे तौर पर बीजेपी के निशाने पर है। मंगलवार को बीजेपी ने आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल पर तीखा हमला करते हुए सत्ता के लिए अपने बच्चों की कसम तोड़ने का आरोप लगाया है। आज हमारे मन में कई सवाल उठ रहे हैं।
1). क्या केजरीवाल ने सरकार  बनाकर गलत किया है?
2). क्या कांग्रेस ने आप को चापलूसी के तहत समर्थन दिया है?
3). क्या केजरीवाल की सरकार 6 महीने से अधिक चलेगी?
4). क्या दुबारा चुनाव में आप को बहुमत मिलेगा?
5). भाजपा की क्या दिक्कत है?
इन सवालों पर मैंने रातभर आत्म-मंथन किया। तब जाकर कुछ निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। पहली बात यह कि आज केजरीवाल को बच्चों की कसम याद दिलाने वाले अपनी कसम क्यों भूल जाते हैं, जो उन्होने लाखों बार खाई होगी "कसम राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएँगे"। वो स्वयम् बड़ा दल होकर सरकार नहीं बना रहे हैं. जब दूसरा बनाने से माना करे तो भाजपा कहती है, अपने वादों से डर गए, जब सरकार बना ली तो नैतिकता सीखा रहे हैं। अगर आप पूंछे कि क्या सरकार बनाकर अरविन्द ने कुछ गलत किया है? तो मुझे नहीं लगता है क़ि यह कोई गठबंधन की सरकार है। अगर राजनीतिशास्त्र की भाषा में कहें तो यह केवल अल्पमत+बाहरी समर्थन की सरकार है। यह वह समर्थन है जो लेने वाले ने मांगा नहीं है, और देने वाला देने को तैयार है। इनके बीच ना कोई लिखित या मौखिक समझौता हुआ ना ही कोई लेन-देन की बात हुई। फिर भी समर्थन पर सरकार बन रही है। पहली बार हो रहा है, जब समर्थन देने वाले को लेने वाला गाली दे रहा है। अरविन्द ने दिल्ली के उपराज्यपाल को जो चिट्ठी दी है, उसमें यह कहीं नहीं लिखा है कि हम कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना रहे हैं। उसमें लिखा है कि हम अल्पमत की सरकार बना रहे हैं, अगर वो हमारी सरकार को गिराएँगे तो हम दोबारा चुनाव में जा सकते हैं। असल में अब तो सब (भाजपा, आप और कांग्रेस) यही चाहते हैं कि यह सरकार जल्दी से गिर जाए।
अगर हम कांग्रेस के समर्थन की बात करें तो पार्टी में दो तरह के नज़रिए हैं। एक तो स्थानीय (दिल्ली) का नेतृत्व जो गुस्से में है, और आम आदमी पार्टी की पोल खोलना चाहता है। दूसरा केन्द्रीय नेतागण जिनका मानना है कि कांग्रेस का नुकसान जो होना था, वो तो हो चुका है. अब भाजपा को रोंकने के लिए वो केजरीवाल का साथ दे रहे हैं। उन्हें लगता है अब केजरीवाल के निशाने पर राहुल की जगह मोदी होंगे।
कांग्रेस की मंशा छ्ह महीने बाद सरकार गिरने की है। वहीं यह भी पक्का माना जा रहा है क़ि यह सरकार छ्ह महीने (आम चुनाव 2014) के बाद नहीं चलेगी। यही बात आम आदमी पार्टी को भी पता है कि अगर वो समर्थन खींच लेगे तो हम दुबारा चुनाव में जीत जाएंगे। अब अगर बात फिर से चुनाव (6 महीने बाद) की बात की जाए तो केजरीवाल भी कोई कच्चे खिलाडी नहीं हैं। पहले उन्हें लगा क़ि शायद सब बोलेंगे कि आप वादे पूरे करने से डरते हैं तो सरकार बनाने के लिए भी जनता से राय मांगी। 80% जनता नें हाँ में जवाब दिया। उन्होनें यह तय किया कि कहीं भाजपा उन्हें इस मुद्दे पर घेर ना ले, तो जनता से पूंछ कर पक्का भी कर लिया। कि अगर फिर से चुनाव हुए तो जनता उनकी सरकर बनाने की मंशा पर सवाल ना उठा सके।
केजरीवाल को डर था क़ि कहीं सरकार नहीं बनाई तो अगर चुनाव 2014 के लोकसभा के साथ दिल्ली में भी चुनाव हुए तो मोदी फैक्टर ना काम कर जाए तो क्या होगा? फिर उन्हें लगा जनता से पूछकर सरकार 6 महीने तक तो चला लेंगे फिर सरकार गिरी भी तो हम जीत जाएँगे।
अब अगर बात भाजपा की करें तो यह सॉफ पता चलता है कि भाजपा के नेताओ को छोड़कर कोई भी इसतरह से बयान नहीं कर रही है। यहाँ पर अभय दुबे जी की एक कहावत सही दिख रही है, "धरा लौट गई"। देश के सभी बड़े दल चिंता में पड गए हैं, कि यह नई शक्ति कहाँ तक जाएगी? पहली बार भाजपा भी आप के डर से जोड़-तोड करने में चूक गई। अब नुकसान की बारी भी भाजपा की ही है। केजरीवाल की यह आलोचना भाजपा की बौखलाहट दिखा रही है। इस आलोचना को भाजपा के अलावा कोई सुन भी नहीं रहा है। यह बात और है कि अरविन्द की पार्टी और समर्थकों में भी इसके प्रति एक बहस है, लेकिन वो एक अलग किस्म की रचनात्मक बहस है। भाजपा को खुद नहीं समझ में आ रहा है, कि 2014 और उसके बाद के डैमेज-कण्ट्रोल कैसे रोका जाए?
दिल्ली में राजनीतिक परिवर्तन तो नहीं हुआ क्योंकि आप के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है मगर आप के प्रभाव से राजनीतिक परिवर्तन ज़रूर हुआ। चंदों की पारदर्शिता की बात हुई। बीजेपी को अपना उम्मीदवार बदलना पड़ा और तोड़ फोड़ से तौबा करना पड़ा। अब बीजेपी नैतिक होने का दावा कर रही है। इस चुनाव से एक बात तो सॉफ हो गई है, कि अब राजनीति बदल रही है। पहली बार हुआ जब किसी दल ने जनता से सरकार बनाने की बात पूंछी। पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया। पहली बार किसी दल के नेता वी. आई. पी. कल्चर से बाहर होंगे। पहली बार कोई दल ईमानदारी से चुनाव लड़ा।  अब इन्ही की नैतिकता के डर से बाकी दलों के ए.सी. में बैठे नेताओं की नींद उड़ रही है, कि कहीं जनता उन्हें नकार ना दे? हार के बाद पहली बार किसी पार्टी ने कहा कि हमे विरोधी दल से सीखने की जरूरत है। इसी के डर से दागी नेताओं को बचाने का बिल, लोकपाल बिल जैसे बदलाव राहुल को करने पड़े। पहली बार राहुल गाँधी मेंहनत करते हुए (मुज़फ़्फरनगर दौरा, फिक्की में भाषण, घोषणा पत्र पर जनता की राय) दिखाई दिए। अब सभी नेताओं को इस तरह के डर सताने लगे हैं। बाकी सब तो होगा ही लोकतंत्र है। अगर रवीश कुमार की भाषा में कहें तो और जो है सो हइये है। 

Monday, December 23, 2013

मजबूर किसान

किसान हर देश की प्रगति में विशेष सहायक होते हैं। एक किसान ही है जिसके बल पर देश अपने खाद्यान्नों की खुशहाली को समृद्ध कर सकता है। देश मे राष्ट्रपिता गांधी जी ने भी किसानों को ही देश का सरताज माना था। लेकिन देश की आजादी के बाद ऐसे नेता कम ही देखने में आए जिन्होंने किसानों के विकास के लिए निष्पक्ष रूप में काम किया। ऐसे नेताओं में सबसे अग़्रणी थे, देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह। आज उन्ही की याद में हमारे देश में किसान दिवस मनाया जाता है। किसान ही वो है, जो हमारे देश को जीवित रखता है। लेकिन आज यह विडंबना ही है कि सबसे ज्यादा किसान ही संघर्ष कर रहे हैं. ज्यादा तर किसान खेती छोड़ कर बाहर शहरों की ओर जा रहे हैं। कोई भी किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनाना चाहता है। आप सर्वे करवाकर देख लीजिए शायद 0.0% युवा भी अपने भविष्य को किसान के रूप में देखेंगे? अगर ऐसे ही रहा तो क्या होगा, हमारे देश का? गावों में जमीनें बच हीं नहीं रही हैं। सब शहरों के अमीर लोग खरीद रहे हैं। और उस जमीन पर उद्योग, फैक्ट्रियाँ, कारखानें, फार्महाउस आदि बना रहे हैं। मेरे गाँव में भी संघर्ष करते किसानों के बीच कानपुर के उद्योगपतियों ने उन्हें पैसे का लालच देकर जमीन खरीदनी शुरु कर दी है। सड़क के किनारे शायद ही किसी किसान की जमीन बची है। सब कहते हैं क़ि हम पैसे तो देते ही हैं, लेकिन परेशान किसान के पास और कोई चारा भी तो नहीं है। यह बात तो ज़मीदारी या गैर-समाजवादी हो गई है। हमारे देश की मीडिया भी पूरा दिन सचिन के सन्यास, सौवें शतक पर, सनी लियोन, कपिल की कमेडी या मोदी बनाम राहुल को ही दिखती रहती है। वहाँ नजर क्यों नहीं जाती है, जहाँ रोज 48 किसान आत्महत्या कर लेते हैं। उसके कारण सीधे तौर पर सरकार से जुड़े होते हैं। मेरे गाँव की ही बात है, अखिलेश सरकार ने गरीब किसान का लोन माफ किया, एक अनपढ किसान से उस 15000/- के लोन खाते को बंद करवाने में 5-6 देर हो गई। बैंक ने कह दिया क़ि तुम्हारा लोन माफ नही होगा। उसके नरेगा में किए गए कार्य के 4000/- रुपए भी काट लिए और बोल बाकी लोन भी जमा करो। विजय माल्या और सुलज्जा मोटवानी जैसे लोग बैंको का हजारों करोड़ रुपए मार जाते हैं, तो भी कुछ नहीं होता है। उस बेचारे किसान को 10-15 हजार के लिए 10 दिन की मोहलत भी नहीं पकड कर बंद किया और संपत्ती कुर्क करवा लेते हैं। मेरे शहर में रहने वाले कई दोस्त कहते हैं यार गाँव में अच्छा है, बिना दिक्कत के रहो। उन्हें क्या पता की सबसे खतरे का इन्वेस्टमेंट हम किसानों का ही होता है। किसी से पैसे उधार लेकर आलू लगाई, पाला, पानी, या बर्फ गिर गई तो सब गया। बेचारा किसान कहाँ से उधार दे? आपका शेयर बाजार कितना भी गिरेगा, पूरा पैसा नहीं डूबेगा. गेंहू और चावल जैसी फसल में क्या फायदा है? हमसे पूछों। बच्चों की फीस भी नहीं दे पाते हैं। सर्दी, गर्मी, बारिश सब मुसीबतों में बेचारा किसान अपने बिना बिजली के गाँव में सड़े, बच्चों को लगाकर खेती करे फिर भी आत्महत्या करने को मजबूर। जानवर पालना तो उसकी मजबूरी होती है। कोई भी सर उठा के कह देता है कि किसान खुश हैं, उनकी दिक्कतें इन शहरों में क्या पता? आज मैं आपको कुछ उदाहरण देता हूँ। बात 2003-04  की है. जब मेरे खेत में पानी लगाया (सिंचाई) जाता था, तो मैं साइकिल से डीजल लेने जाता था। तब डीजल 25 रुपए/ लीटर थी। यूरिया खाद 160 रुपए बोरी, डी. ए. पी. खाद 340-370 रुपए बोरी थी। तब गेहूँ 8 रुपए/ किलो में बिकता था। आज 2013 में डीजल 55, यूरिया 380-450 और डी. ए. पी. 1500-2000/- तक है। उसमें भी खाद तो किसान को समय पर मिलती ही नहीं है। ब्लैक करके खाद माफिया किसानों से भारी कीमतें वसूलते हैं। वहीं गेहूँ की कीमत भी 1200-1350/- प्रति क्विंटल ही रह गई है। लेकिन मुझे मुम्बई में 25/किलो आँटा मिलता है। आलू किसान से 4-5 रुपए में और शहरों में 25-30 रुपए में। अरहर, चना, मूंग, उड़द सब डालें 100-150 तक हैं, और किसान को इसका भाव 35-40 रुपए ही मिलता है। हमारे गाँव में 4-5 साल पहले लोगों ने मिर्ची की खेती शुरु की। पहले 2-3 साल तक तो काफी फायदा हुआ। बाद में तो मिर्ची को कोई 3-4 रुपए रुपए में भी नहीं पूंछता हैं। लागत एक बीघे में 25-30 हजार और सब काटकर फायदा केवल 10-15 हजार। 

फिर हिसाब किया तो अगर 3 महीने नरेगा में काम करता तो ज्यादा कमाता। ऐसे में  किसान कहाँ जाएगा? सब माफियाओं के बोछ तले दबे हैं। बस यही है कि बाल-बच्चे हैं तो दाल-रोटी चल रही है। उसमें भी सबसे ज्यादा गरीबी और बीमारी के मारे यही हैं। जहाँ तक इसके दोषी होने का सवाल है तो सरकार के साथ-साथ हमारा शहरी उद्योगपति भी जिम्मेदार हैं।जो गरीब किसानो की जमीन, खनिज, जंगल, पानी सब लूट रहे हैं। सरकार तो कुछ करती ही नहीं है। मुलायम सिंह यादव जैसे नेता किसान के नाम पर वोट तो ले लेते हैं. लेकिन उनके लिए करने को कुछ भी नहीं है. अभी हाल में यू. पी. में गन्ना किसानों की दशा एक छोटा सा उदाहरण है। शरद पवार जैसे लोग जो कृषि मंत्री हैं वो तो सबसे किसानों को दुश्मन समझते हैं। किसानों के नाम पर बने दल " भारतीय किसान यूनियन" सरीखे लोग तो केवल अपना काम निकालना जानते हैं। कभी किसान के असली दर्द को नहीं समझ पाए। शर्म की बात तो यह है क़ि चौधरी चरणसिंह के बेटे अजित सिंह सरकार में मंत्री हैं, और कभी किसानों का दर्द संसद में नहीं नहीं बोल पाए। देश का कोई भी नेता नहीं है, जो इस तरफ ध्यान दे। वोट लेने के लिए मोदी जी कांग्रेस पर तो हमला बोलते हैं। लेकिन गुजरात के मरते किसानों की तरफ कोई ध्यान नहीं है। आखिर यह नेता भी क्यों बोलें किसान का दूसरा नाम ही है संघर्ष? बची-खुची जान तो मौसम(सूखा, तूफान, ओले) निकाल देता है। मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों वाली दशा आज भी 100 साल बाद किसानों पर से हटी नहीं है। देखते हैं कौन सा मसीहा (चौधरी चरण सिंह का अवतार) आएगा। इनकी दशा में कुछ सुधार करेगा?
"जब तक दुखी किसान रहेगा। धरती पर तूफान रहेगा।। "

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...