Sunday, May 19, 2019

भारतीय बनाम हॉलीवुड सिनेमा

एक बार मैंने ANUJ को बताया की मैंने पहली बार थिएटर में फिल्म शायद बीए फर्स्ट ईयर में देखी थी. तो वो बोले तुम करते क्या रहे फिर? और हिंदी फ़िल्में भी जैसे उत्तर भारत के गावों में ट्रेंड होता है वैसे ही सीडी प्लेयर के ज़माने से मिथुन दा टाइप देखीं। जब से मुंबई आया तब से जितना भी समय काम और राजनीती से मिला उतने में लेटेस्ट सिनेमा को कवर करने की कोशिश की. हिंदी मराठी थिएटर और नाटक भी देखे. टीवी पर कई बार सूर्यवंशम के दर्शन हुए, साउथ की हिंदी डब फ़िल्में भी बहुत देखीं। फिर एक प्रोजेक्ट के लिए मैंने मराठी, पंजाबी, मलयालम, मणिपुरी, बंगाली और अरुणांचली फिल्मे उनकी लोकल लैंग्वेज में ट्रांसलेशन के साथ देखीं। पिछले एक दो साल में जब से नेटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम वगैरह आया तब से वेब सीरीज का भी शौक बहुत बढ़ गया. हिंदी की लगभग हर वेब सीरीज देख डाली। मुझे हॉलीवुड फिल्मों का बिलकुल शौक नहीं था. वही टाइटैनिक देखी थी. फिर ऑस्कर के बारे में बीबीसी पर एक रिपोर्ट पढ़ी, जिसमें बॉलीवुड और सिनेमा के बारे में बताया था तो बात बात में सूरज ने हॉलीवुड की कुछ बेहतरीन फिल्मों (The Beautiful Life, Avtar, The Sawshank Redemption, Definitely May be etc.) के बारे में बताया तो कुछ फ़िल्में देखी और अभी भी कुछ देखना बाकी है. उसी दौरान मुझे एक टर्किस वेब सीरीज मिली। पहले सीन से इतनी अच्छी लगी कि 50 एपिसोड का पूरा पहला सीजन देख डाला. ये सब देखते हुए मुझे महसूस हुआ कि सच में अभी भारतीय सिनेमा फॉरेन से कई दशक पीछे पड़ा है. एक्टिंग में हमारे यहाँ नवाज, मनोज बाजपाई या इरफ़ान खान को इतना बेहतर समझते हैं, लेकिन जब उनकी एक्टिंग देखी  तो ये नौसिखिए लगते हैं. यहाँ सब टिपिकल लाइन पर चलते हैं. मैं म्यूजिक की बात नहीं कह सकता क्योंकि उसकी इतनी समझ नहीं है. लेकिन बॉलीवुड में लेकर डायरेक्शन से कैमरा, सिनेमैटोग्राफी और टेक्नोलॉजी भी बहुत पीछे है. हमारे यहाँ आप वेब सीरीज के ट्रेलर ही देखिए पहले ही सीन से गालियां, गोलियां या अँधा-धुंध रोमांस की शुरुआत कर देते हैं. हर वेब सीरीज यहाँ तक कि टीन एजर्स की (पंच बीट या आई एम् मच्योर) में भी इतने किस सीन कि पूरी कहानी का उद्देश्य ही किस करना लगता है. रोमांस का मतलब ही सेक्स समझते हैं. और उसकी शूटिंग जो एक खास दायरे में होती है वो डायरेक्टर की क्रिएटिविटी पर भी सवाल खड़े करती है. वही सब देखना होगा तो आदमी पोर्न ही नहीं देख लेगा?
लेकिन उस वेब सीरीज में लेकर कहानी से, उसके रोल, एक्टिंग सब दिलचस्प थे. रोमांस भी है जो आप सबके साथ आसानी से देख सकते हैं. सबसे अच्छी बात मुझे वहां ये लगी जिस वजह से मैंने इतना लम्बा लिखा वो ये कि अगर कोई विलेन भी है तो उसको सजा कोई हीरो अराजकता के साथ खुद ही नहीं देने पहुँच जाता. यहाँ के जैसे नहीं कि अमरीश पूरी के घर पर धर्मेंद्र अकेले पहुँच गए और 200-300 बन्दुकधारियों से अकेले लड़कर किडनैप्ड महबूबा या माँ को छुड़ा लाए. पहली बात तो उसमें अधिकतर ये किडनैपिंग वाले तो ड्रामे ही नहीं होते. यहाँ तो हर फिल्म में ३-४ गाड़ियों का ब्रेक फेल होता है. जबकि उसमें फाइट भी ऐसी हुई जो रिएलिस्टिक लगे. विलेन के गुनाह भी वैसे होते हैं, जैसे हो सकते हैं, और उसको सजा भी हीरो देता है तो कानूनी ढंग से. खून के बदले कोई को जस्टिफाई  नहीं करते। उसके लिए प्रॉपर क़ानूनी लड़ाई लड़कर उसको सजा दिलाते हैं जो वहां के कानून में हो. यहाँ तो गरीब हीरो अपने जमींदार विलेन ससुर से बदले के चक्कर में 50-60 लोगों को मार कर भी बाद में माफ़ कर दिया जाता क्योंकि उसने सब न्याय के लिए किया था. उनकी कहानी में एक्स्ट्रा मौत किसी की नहीं होती जैसे यहाँ तो 8-10 ऐसे ही बिना वजह बिच में आकर मर जाएं जिनका किसी को ध्यान ही नहीं? वहां गलती से एक नौकर भी मरा तो स्किप नहीं हो सकता. पूरा केश चलता है.
इन सब चीजों का बहुत फर्क पड़ता है लोगों खासकर युवाओं के चरित्र पर भी. पुलिस, सरकार, नेता, राजनीती और अदालतों के प्रति जो लोगों का निगेटिव परसेप्शन है उसमें सिनेमा का भी रोल है. अगर वहां पॉजिटिव दिखाया जाता कि जो सही नहीं है उसको सही कैसे किया जाए तो बात और होती. हो सकता है अधिकतर अपराधों का ये भी कारण हो. अगर ये सिनेमा से ये सन्देश भेजा जाए की आपके साथ गलत हुआ तो आप क़ानूनी लड़ाई लडिए न कि आपको जो सही लगे वो कर दो, तो शायद अपराधों में कुछ कमी आए. इसका मतलब होगा कि लोग अपने अधिकार भी समझेंगे तब इस व्यवस्था को सुधारने के लिए भी लड़ेंगे. यहाँ सामाजिक सरोकार पर तो बहुत ही कम फ़िल्में बनती हैं, वो भी अधिकतर डॉक्यूमेंट्री. बलराज साहनी ने गरीबी और आर्थिक असमानता पर फ़िल्में बनाएं, बहुत लोगों ने जातिवाद पर भी बनाई लेकिन वो उद्देश्य नहीं पूरा हो पाया जो होना चाहिए था. यहाँ खासकर जातिवाद, रंगभेद, लैंगिग, सामाजिक और आर्थिक असमानता को उस तरह से नहीं प्रजेंट किया गया जो सबतक पहुंचे और असर करे. और मनोरंजन के हिसाब से भी आजकल की कॉमेडी ही देख लो. जो कॉमेडियन बनकर बैठे हैं वो अपना काम ठीक से नहीं कर पा रहे तो यूट्यूब पर स्टैंडअप कॉमेडियन मशहूर हो रहे.  कहने का मतलब अभी भी यहाँ के सिनेमा खासकर हिंदी में सुधार की बहुत गुंजाइशें हैं.

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