चंद्रबाबू नायडू 1995 में जब पहली बार आंध्र प्रदेश
(अविभाजित) के मुख्यमंत्री बने तो वे देश के संभवत: पहले नेता थे जो
कॉरपोरेट प्रबंधन की शैली में सरकार चलाया करते थे. वैसी ही जिसके लिए
वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाना जाता है. उस वक़्त नायडू ने
कहा भी था कि वे मुख्यमंत्री के बज़ाय ख़ुद को सीईओ कहलाना ज़्यादा पसंद करेंगे. वे सूचना-तकनीक का बेहतरीन इस्तेमाल
करते थे. दूरदर्शी मुख्यमंत्री कहे जाते थे. उन्होंने तब एक दृष्टिपत्र
जारी किया था. इसके मुताबिक ही हैदराबाद को सूचना-तकनीक क्षेत्र के मुख्य
केंद्र के रूप में विकसित किया गया. साथ ही इसी सूचना-तकनीक के बलबूते 2020
तक आंध्र प्रदेश को पूरी तरह बदला हुआ, देश का अग्रणी राज्य बनाए जाने की
तैयारी शुरू की गई. अपनी इस शैली और दूरदर्शिता की वज़ह से चंद्रबाबू नायडू
ने सिर्फ़ आंध्र प्रदेश में ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय
मंचों पर भी ख़ूब लोकप्रियता बटोरी.
लेकिन आज? साल 2020 आने
को है. आंध्र प्रदेश दो हिस्सों (आंध्र और तेलंगाना) में बंट चुका है. इन
दोनों ही राज्याें में चंद्रबाबू नायडू की दूरदृष्टि चूकती दिख रही है.
लोकप्रियता घटती लग रही है. उस शैशव से आंध्र में भी, जो तेलंगाना के अलग
होने के बाद अस्तित्व में आया और जिसने अपनी तक़दीर को नए सिरे से लिखने की
ज़िम्मेदारी सबसे पहले 2014 में चंद्रबाबू नायडू काे ही दी थी. लेकिन आज उसी
आंध्र ने नायडू को उनकी तक़दीर बांचने पर मज़बूर कर दिया है. ताज़ा चुनाव
नतीज़े प्रमाण हैं. अभी 23 मई को लोक सभा के साथ-साथ आंध्र विधानसभा चुनाव
के नतीज़े भी घोषित हुए. वहां 175 विधानसभा सीटाें में से नायडू की तेलुगु
देशम पार्टी (टीडीपी) को सिर्फ़ 23 पर जीत हासिल हुई. एक सीट अभिनेता से
नेता बने पवन कल्याण की जन सेना पार्टी को मिली. जबकि 151 सीटों के बहुमत के साथ नायडू के धुर विरोधी वाईएसआर कांग्रेस के जगनमोहन रेड्डी सरकार बना रहे हैं.राज्य
की 25 लोक सभा सीटों में से भी टीडीपी को सिर्फ़ तीन मिली हैं. जबकि 22
सीटें वाईएसआर कांग्रेस को गई हैं. और सियासी जानकारों की मानें तो टीडीपी
की इस गति के लिए सबसे ज़्यादा अगर कोई ज़िम्मेदार है तो वे ख़ुद चंद्रबाबू
नायडू हैं. इस आकलन के पांच प्रमुख पहलू बताए जाते हैं, जिन पर इस समय नज़र
डालना एकदम प्रासंगिक होगा.
चंद्रबाबू
नायडू की अगर कोई सबसे बड़ी ग़लती थी तो शायद यह थी कि वे चार साल तक भारतीय
जनता पार्टी के साथ गठबंधन चलाते रहे. केंद्र में उसकी सरकार में शामिल
रहे और राज्य में उसे अपना सत्ता साझीदार बनाए रखा. हालांकि 2014 के
नतीज़ाें के लिहाज़ देखें तो भाजपा के साथ गठबंधन करने का उनका फ़ैसला ग़लत
नहीं कहा जा सकता. क्योंकि भाजपा के साथ उन्होंने तब राज्य की 25 में से 15
लोक सभा सीटें जीती थीं. तब भाजपा को भी प्रदेश के लोगों का साथ मिला था.
उसे दो सीटों पर जीत हासिल हुई थी. राज्य विधानसभा की 106 सीटें जीतकर
नायडू ने सरकार भी बनाई थी. लेकिन यह निश्चित तौर पर उम्मीदों-आकांक्षाओं से उपजी सफलता थी. उम्मीदें-आकांक्षाएं
दो स्तरों पर थीं. जनता को नायडू से कि वे कोई करिश्मा करेंगे और राज्य को
जल्द ही विभाजन के झटके से बाहर ले आएंगे. वहीं नायडू को केंद्र में सरकार
बनाने वाली भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कि वे आंध्र को विशेष
दर्ज़ा देंगे जिसके बलबूते वे जनता की आकांक्षाएं पूरी कर सकेंगे. और फिर
2014 के चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी ने ही वादा भी तो किया था
कि उनकी सरकार बनी तो वे आंध्र को 10 साल के लिए विशेष राज्य का दर्ज़ा
देंगे. लेकिन ये वादा उन्होंने पूरा नहीं किया. केंद्र में मोदी सरकार का
आधा कार्यकाल गुजरने तक नायडू को निश्चित ही इसका भान हो गया होगा लेकिन
फिर भी वे मार्च-2018 तक गठबंधन चलाते रहे. नायडू
की शायद मज़बूरी रही हो क्योंकि उन्हें नए राज्य, उसकी राजधानी और सरकारी
आधारभूत ढांचा आदि के निर्माण के लिए केंद्र सरकार की मदद की ज़रूरत थी.
लेकिन लगता है कि जनता ने उनकी इस मज़बूरी को ज़्यादा अहमियत नहीं दी. और
वादाख़िलाफ़ी करने वाली दोनों पार्टियों (टीडीपी-भाजपा) काे 2019 में उनकी
ज़मीन दिखा दी. इस चुनाव में आंध्र में भाजपा का ख़ाता तक नहीं खुला है.
चंद्रबाबू
नायडू ने भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद अमरावती (आंध्र की राजधानी) से
दिल्ली तक सड़कों पर धरना-प्रदर्शन की राजनीति का तरीका चुना. कभी आंध्र
प्रदेश को विशेष राज्य के दर्ज़े के मसले को लेकर. कभी सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) की कथित पक्षपाती कार्रवाई के ख़िलाफ़. तो कभी ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) से छेड़छाड़ के मुद्दे
को उठाते हुए. इस दौरान उन्होंने कई बार अपनी इस सियासत को ‘तेलुगु
अस्मिता की रक्षा’ से जोड़ा. लेकिन जनता शायद समझ गई कि वे ‘तेलुगु अस्मिता’
नहीं बल्कि ‘अपने और टीडीपी के अस्तित्व की रक्षा’ के लिए यह सब कर रहे
हैं. और तिस पर तथ्य ये भी कि नायडू ने ख़ुद अपनी जो ‘कॉरपोरेट सीईओ’ की छवि
गढ़ी थी उस पर ख़ास ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं की
धरना-प्रदर्शन वाली शैली की राजनीति फिट नहीं बैठ पाई. चंद्रबाबू
नायडू भाजपा से अलग होने के बाद कांग्रेस से गठबंधन के लालायित दिखे. वह
भी तब जबकि उनकी पार्टी का गठन कांग्रेस विरोध की नींव पर ही हुआ था. साढ़े
तीन दशक तक टीडीपी वास्तव में कांग्रेस के विकल्प के तौर पर ही तेलुगु भाषी
राज्य में अपने आप को स्थापित करती रही. लेकिन नायडू ने एक झटके में इस
धारणा काे तोड़ दिया. हालांकि उनके ऐसा करने के पीछे संभवत: उनकी पृष्ठभूमि
का भी योगदान रहा हो. क्योंकि असल में नायडू ने सियासत की शुरुआत ही
कांग्रेस कार्यकर्ता के तौर पर की थी. वे 1978 में पहली बार महज 28 साल की
उम्र में कांग्रेस विधायक के तौर पर आंध्र प्रदेश की विधानसभा में पहुंचे थे और मंत्री भी बने.
हालांकि
बाद में चंद्रबाबू नायडू टीडीपी के संस्थापक नंदमूरि तारक रामाराव के
दामाद बन गए और फिर उन्हें हटाकर पार्टी के सर्वेसर्वा भी. लेकिन तब शायद
राज्य की जनता और टीडीपी समर्थक वर्ग को उनके उस कृत्य पर उतना ऐतराज़ नहीं
हुआ होगा जितना कांग्रेस के साथ जुड़ने की उनकी छटपटाहट देखकर हुआ. इससे
नाराज़ कई बड़े नेता टीडीपी छोड़कर चले गए. तेलंगाना विधानसभा चुनाव के दौरान भी टीडीपी को कांग्रेस के संग-साथ से नुकसान उठाना पड़ा. लेकिन नायडू नहीं माने. वे चुनाव नतीज़ों की पूर्व संध्या तक राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन को मज़बूत करने की कोशिश करते नज़र आए और नतीज़ा भुगता.
भाजपा
से अलग होने के बाद चंद्रबाबू नायडू पर एक ही धुन सवार दिखी. भाजपा और
उसके नेता नरेंद्र मोदी को सबक सिखाना. इस चक्कर में वे अपनी सरकार के
आख़िरी साल में भी जो कर सकते थे, नहीं कर पाए. अभी इसी अप्रैल में एडीआर
(एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) की एक रिपोर्ट आई थी. इसमें बताया
गया था कि नायडू की सरकार ने आंध्र में आम जनता से जुड़े तीन-चार प्रमुख
मुद्दों की बुरी तरह अनदेखी की है. ये हैं- रोज़ग़ार, स्वास्थ्य, पीने के
पानी की समस्या और खेती-बाड़ी के लिए मूलभूत सुविधाएं. इन सभी मोर्चों पर
नायडू सरकार का प्रदर्शन औसत से भी कमतर रहा है. एडीआर ने यह सर्वे जनता के
बीच ही अक्टूबर से दिसंबर 2018 के बीच कराया था. इस सर्वे में वायु-ध्वनि
प्रदूषण, यातायात व्यवस्था आदि पर भी सरकार का प्रदर्शन बेहद ख़राब आंका गया. सो, इसका ख़मियाज़ा तो होना ही था.
इसमें आख़िरी और सबसे बड़ी बात. खांटी राजनेता चंद्रबाबू अपने ही पुराने अनुभवों के बावज़ूद जगन मोहन रेड्डी की चुनौती
की गंभीरता को शायद समझ नहीं पाए. या शायद जब तक समझे तब तक बहुत देर हो
चुकी थी. जगन ने एक साल दो महीने (429 दिन) से ज़्यादा का समय सड़कों पर
बिताया. क़रीब 3,648 किलोमीटर की दूरी तय की. गांव-गांव, नगर-शहर, पांव-पांव घूमे. आम जनता से सीधे मिले. उसकी नब्ज़ पर हाथ धरा और सीधे राज्य के सत्ता शीर्ष पर पहुंचकर नायडू को हटाकर ही रुके. जगन के पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी ने भी 2004 में ठीक यही किया था. वे भी राज्य के गांव-शहरों में क़रीब 1,450 किलोमीटर पैदल घूमे थे. उन्होंने ‘प्रजा प्रस्थानम पदयात्रा’
का नाम दिया था उसे. और उस पदयात्रा के बाद राज्य की सत्ता से जिस सरकार
का प्रस्थान हुआ था वह किसी और की नहीं, चंद्रबाबू नायडू की ही थी. शायद
इसीलिए कहा जाता है कि वक़्त हमेशा ख़ुद को दोहराता है.
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