Sunday, May 26, 2019

सपा के कार्यकर्ताओं की मज़बूरी

अगर यूपी में बीजेपी फिर से जीत रही है तो इसका सेहरा सीधे सीधे अखिलेश यादव के सर बांधना चाहिए. जब वो 2017 का चुनाव जीते थे तब से अगर ठीक से मेहनत की होती, कार्यकर्ताओं को एकजुट किया होता. जमीन पर गए होते तो शायद अकेले ही 20-25 सीटें जीत लेते. लेकिन उनको केवल गठबंधन पर भरोसा था. और अगर गठबंधन के सहारे ही लड़ना था तो कांग्रेस को भी मिला लेते. अब क्या 2022 में मायावती इनको मुख्यमंत्री बनाने के लिए राजी हो जाएँगी?
अखिलेश जब मायावती से मिल सकते हैं तो शिवपाल सिंह यादव को क्यों नहीं वापस ला पाए? क्या शिवपाल सिंह का अधिकार था मुलायम सिंह की विरासत पर. उन्होंने मेहनत की थी, अखिलेश का हक़ बाद में था. फिर भी बाद में शिवपाल सिंह तो पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष के पद पर ही मान रहे थे, लेकिन अखिलेश को पार्टी किसी प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी जैसे चलाना है कि मैं डायरेक्टर हूँ तो मेरी ही चले. जो प्रदेश अध्यक्ष और पदाधिकारी हैं वो उनके ऑर्डर के बिना हिलें तक नहीं ऐसे लोग चाहिए.
मैं समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं को बहुत करीब से जनता हूँ, इसलिए कह सकता हूँ कि आज भी उनसे ज्यादा जुझारू किसी पार्टी का कैडर नहीं है. संघ या बीजेपी के कार्यकर्त्ता उनके आगे कहीं ठहरते नहीं हैं. उनकी पहले मुलायम सिंह और अब अखिलेश के लिए जो दीवानगी है वो इसी नारे में है, " ये जवानी है कुर्बान, अखिलेश भैया तेरे नाम".........
लेकिन आज हालत क्या हैं? उनके अखिलेश भैया एसी के बंद कमरे वाले नेता बनकर रह गए हैं. कार्यकर्ताओ पर यूपी भर में जुल्म हो रहा तो कोई है ही नहीं जो उनके लिए खड़ा हो. जिला स्तरीय नेताओ पर भी पुलिस की करवाई हो तो कोई बोलने वाला नहीं है. कार्यकर्त्ता कबतक लड़ते रहें इनके लिए, जब लीड करने वाला ही घर से नहीं निकलता? उसको पता ही नहीं है कि यूपी में आजकल लोकल मुद्दे क्या हैं? इसी चुनाव में सबसे बाद अपना हेलीकॉप्टर निकाला. वो भी रैली में केवल वही हाइवे और बेरोजगारी पर तोते जैसे बोल जाते हैं. कार्यकर्ताओं को संघ से वैचारिक तौर पर लड़ने या काउंटर करने के लिए कोई प्लान बनाया? वो युवा कबतक अकेले लड़ें? उनका नेता तो लखनऊ में पड़ा है. कुछ न हो तो कम से कम राहुल गाँधी या तेजस्वी से ही सीख लें कि जमीन पर कैसे रहते हैं? अखिलेश यादव अभी तक अपने मुख्यमंत्री वाले अहंकार से नहीं निकले हैं. उनको लगता ही नहीं कि वो 2017 में ही बुरी तरह हार गए हैं. अगर स्थिति यही रही तो इनके जो बचे खुचे यादव कार्यकर्त्ता भी हैं वो भी किसी दल में शिफ्ट कर जाएंगे, बेचारे कबतक तुम्हारी मक्कारी का नुकसान झेलें.

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