राहुल गाँधी अपने इस्तीफे पर अड़े हैं, किसी से मिल नहीं रहे है. लेकिन मैं उन कुछ लोगों में से हूँ जो मानता हूँ कि उनको अब इस्तीफा नहीं देना चाहिए. अब इस्तीफा देने का अर्थ है कि वो राजनीती छोड़ दें. और ऐसे में कांग्रेस को छोड़कर जाने का मतलब है कि वो अधूरे रस्ते में कांग्रेस को छोड़कर निकल रहे जब उनकी जरुरत है. उनके जाने के बाद साफ़ है कि कांग्रेस अध्यक्ष कोई गाँधी परिवार से बाहर का ही व्यक्ति होगा. गाँधी परिवार के बाहर से अध्यक्ष रहने में लोगों ने कांग्रेस का हाल सीताराम केसरी के ज़माने से देखा है. मुझे पता है कि लोकतंत्र के लिए ये खतरनाक है लेकिन सच भी है कि कांग्रेस गाँधी नेहरू परिवार की वजह से एकजुट होकर चलती है, भले वो डर हो उनका. और ये चीज हर राजनितिक पार्टी में है. यहाँ तक कि बीजेपी पर से भी संघ परिवार का डंडा हटा दीजिए फिर देखो क्या होता है.
राहुल को राजनीति तब छोड़ना था जब वो पप्पू थे, जब उनको राजनीती की समझ नहीं थी, हर महीने छुट्टी मनाने निकल जाते थे, मेहनत नहीं कर पाते थे. मुद्दे समझते नहीं थे. गलती करते थे. उनको कोई सीरीयस नहीं लेता था. लेकिन आज राहुल गाँधी को लोग नेता मानते हैं, इसमें बीजेपी के आईटी सेल और मोदी का भी हाथ है. आप सोच भी नहीं सकते क्या मानसिक स्थिति होगी उस आदमी की जिसपर इतने जमकर हमले किये जाते रहे हमेशा. जिसके परिवार से लेकर खुद का इतना चरित्र हनन हुआ, इतने आरोप लगे कि कोई दिल का कमजोर आदमी आत्महत्या करने को भागे. लेकिन वो उसने वो चीजे इग्नोर की, और आगे बढ़ा. जब उसको राजनीति छोड़ना था तो छोड़ा नहीं, अब जब लड़ना सीख गया तब मैदान छोड़कर भागने का क्या मतलब? उसने गुजरात, कर्णाटक, राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ के विधानसभा और इस लोकसभा चुनाव में जमकर मेहनत की. कांग्रेस की दिक्कत ये है कि राहुल उसके अकेले सेनापति थे, और सामने पूरी सेना हर सुविधा से लैस। प्रियंका बहुत बाद में आईं वो भी सिमित समय और क्षेत्र के लिए. राहुल ने चुनाव लड़ा अपनी दम पर और जितना वो बनाते थे, वहीं सैम पित्रौदा, सिब्बल,सलमान खुर्शीद, मणिशंकर अय्यर और सिद्धू उतना नुकसान पहुंचते गए.
हाँ राहुल चुनाव हारे हैं लेकिन चुनाव पूरा विपक्ष हारा है, अखिलेश तेजस्वी, माया, ममता, पवार, नायडू सबको इस्तीफा देना चाहिए फिर. जबकि इनमें से सबसे अधिक मेहनत भी राहुल ने ही की थी. अब उनका कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा मतलब बीजेपी के जला में आ फंसना होगा. वो चाहते हैं कि कैसे भी राहुल निकले यहाँ से. नहीं तो अगर राहुल गाँधी पप्पू ही थे, तो फिर बीजेपी इतना सीरियस क्यों लेती है उनको, क्यों उनके बयान पर पूरा मंत्रिमंडल आ जाता था, हमले करने. क्योंकि उनको पता है कि आज पुरे विपक्ष में अगर कोई नेता संघ की विचारधारा पर खुलकर बिना डरे हमला करता है तो वो राहुल गाँधी हैं.
आज की तारीख में चुनाव केवल मेहनत भर से नहीं हो जाता. उसके लिए पैसा भी बहुत लगता है. कांग्रेस ने जितना पैसा अपने पुरे चुनाव में नहीं लगाया उससे ज्यादा तो बीजेपी के नारे लिखने वाली और सोसल मिडिया टीम दो दिए गए. आंध्र में जीते जगन मोहन रेड्डी कोई अकेले मेहनत या यात्रा से नहीं चुनाव जीते हैं. उनकी जीतके लिए
प्रशांत किशोर की टीम ने एक साल से अधिक काम किया है. जिसका पूरा कॉन्ट्रैक्ट था 250 करोड़ का. उनके पूरे चुनाव में एक साल के दौरान 700-800 करोड़ से अधिक खर्च हो गया. इतना बजट तो कांग्रेस का पूरे देश के चुनाव में नहीं था. संसाधनों की कमी के चलते भी विपक्ष का मोदी- शाह के सामने टिकना संभव नहीं है. बीजेपी को 2018 में 990 करोड़ तो कांग्रेस को मात्र १४२ करोड़ ही कॉर्पोरेट चंदा मिला. रही बात लहर की तो आपके घर में कोई बच्चा हो और आप उसके सामने जो करेंगे, बोलेंगे वो भी वही सीखेगा. जब मीडिया ही मोदी मोदी चिल्लाता रहा तो पब्लिक के दिमाग में मोदी नहीं तो क्या मुलायम सिंह घुसेंगे? दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे अप्रैल में राहुल गाँधी को 241, प्रियंका और मायावती को लगभग 84-84 घंटे दिखाया गया वहीँ अमित शाह को 123 और नरेंद्र मोदी को 722 घंटे जगह मिली. मैं इन आकड़ो से किसी नेता की मेहनत, सफलता या गलती को नहीं छुपा रहा लेकिन कुछ तथ्य ये भी हैं इस चुनाव के.
हाँ राहुल चुनाव हारे हैं लेकिन चुनाव पूरा विपक्ष हारा है, अखिलेश तेजस्वी, माया, ममता, पवार, नायडू सबको इस्तीफा देना चाहिए फिर. जबकि इनमें से सबसे अधिक मेहनत भी राहुल ने ही की थी. अब उनका कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा मतलब बीजेपी के जला में आ फंसना होगा. वो चाहते हैं कि कैसे भी राहुल निकले यहाँ से. नहीं तो अगर राहुल गाँधी पप्पू ही थे, तो फिर बीजेपी इतना सीरियस क्यों लेती है उनको, क्यों उनके बयान पर पूरा मंत्रिमंडल आ जाता था, हमले करने. क्योंकि उनको पता है कि आज पुरे विपक्ष में अगर कोई नेता संघ की विचारधारा पर खुलकर बिना डरे हमला करता है तो वो राहुल गाँधी हैं.
आज की तारीख में चुनाव केवल मेहनत भर से नहीं हो जाता. उसके लिए पैसा भी बहुत लगता है. कांग्रेस ने जितना पैसा अपने पुरे चुनाव में नहीं लगाया उससे ज्यादा तो बीजेपी के नारे लिखने वाली और सोसल मिडिया टीम दो दिए गए. आंध्र में जीते जगन मोहन रेड्डी कोई अकेले मेहनत या यात्रा से नहीं चुनाव जीते हैं. उनकी जीतके लिए
प्रशांत किशोर की टीम ने एक साल से अधिक काम किया है. जिसका पूरा कॉन्ट्रैक्ट था 250 करोड़ का. उनके पूरे चुनाव में एक साल के दौरान 700-800 करोड़ से अधिक खर्च हो गया. इतना बजट तो कांग्रेस का पूरे देश के चुनाव में नहीं था. संसाधनों की कमी के चलते भी विपक्ष का मोदी- शाह के सामने टिकना संभव नहीं है. बीजेपी को 2018 में 990 करोड़ तो कांग्रेस को मात्र १४२ करोड़ ही कॉर्पोरेट चंदा मिला. रही बात लहर की तो आपके घर में कोई बच्चा हो और आप उसके सामने जो करेंगे, बोलेंगे वो भी वही सीखेगा. जब मीडिया ही मोदी मोदी चिल्लाता रहा तो पब्लिक के दिमाग में मोदी नहीं तो क्या मुलायम सिंह घुसेंगे? दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे अप्रैल में राहुल गाँधी को 241, प्रियंका और मायावती को लगभग 84-84 घंटे दिखाया गया वहीँ अमित शाह को 123 और नरेंद्र मोदी को 722 घंटे जगह मिली. मैं इन आकड़ो से किसी नेता की मेहनत, सफलता या गलती को नहीं छुपा रहा लेकिन कुछ तथ्य ये भी हैं इस चुनाव के.
No comments:
Post a Comment