Thursday, May 30, 2019

भविष्य में पानी का संकट

आने वाले समय में भारत में पानी का संकट बहुत बढ़ने वाला है. बिहार के कुछ जिलों में इसकी शुरुआत हो चुकी है. हालत बुरी है। महाराष्ट्र, बुंदेलखंड, राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात के कुछ हिस्सों में तो हालत वैसे भी बहुत पहले से ख़राब हैं. कुछ राज्यों में तो खैर सरकार ने काफी हद तक बारिश  का पानी बचाकर डिस्ट्रीब्यूट करने का काम किया है. बाकी जगहों पर टैंकर से ही पानी आता है. 
आज के दस साल पहले हमारे गांव में वाटर लेवल 70-80 फ़ीट था, ट्यूबवेल, बोरिंग और हैंडपाइप सब जगह पर्याप्त पानी था. अब हालत ये हो गए हैं कि 120-130 फ़ीट तक पानी मिलता है वो भी बहुत जगहों पर तो बोरिंग फेल हो जाती है, पानी ही नहीं निकलता है. सबमर्सिबल बोरिंग गावों में इतनी ज्यादा संख्या में हो गई कि बहुत से हैंडपाईप्स का पानी ही निकलना बंद हो गया. हर घर में मोटर लगाकर इतना पानी खींचा गया कि सब्मर्सिबल्स में से भी पानी कम आना शुरू हो गया है. इतना फ़ालतू पानी बहाया जाता है कि पूछिए मत. उनको हम मुंबई दिल्ली में रहने वालों से पानी की कीमत पूछनी चाहिए. हमको छोड़िये, ऐसी ऐसी जगहें हैं जहाँ लोग नदियों के छोटे छोटे गढ्ढो में कीचड़ जैसा बचा हुआ पानी प्रयोग करते हैं. सरकारी हैंडपाइप कोई प्रयोग नहीं करता. बहुत से पुराने ट्यूबवेल रहे ही नहीं, कुँए सब सूख गए. पहले मनरेगा के तहत तालाबों की खुदाई होती थी, उनमें पानी भी भरवाते थे. लेकिन अब  गर्मियों में भी  कोई जानवर तालाब में नहीं ले जाता सब अपने घर में सबमर्सिबल में ही रबर लगाकर जानवरों को पानी पिला या नहला लेते हैं, तो उसमें भी पानी भरवाने की जरुरत नहीं है. एक बम्बा है कुछ साल पहले उसमें पानी आया था, वो भी सूखा पड़ा है कई साल से. ३-४ किलोमीटर दूर एक नदी थी, वो भी सूखे नाले में बदल गई. गंगा जी में पानी केवल बारिश के समय ही होता है. बाकि समय जो पानी बचा भी वो बहुत प्रदूषित होता है. पेड़ बचे नहीं, नए पेड लगाए नहीं जा रहे, बारिश बहुत कम होती है. लेकिन लोगों को प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के नुकसान अभी नजर नहीं आ रहे हैं. आने वाले समय में हालत इतने ख़राब हो जायेगे कि सन 2030 तक या उससे पहले ही सभी बोरिंग्स का पानी भी सूख जायेगा. कुछ भी नहीं बचेगा. फिर सबको समझ आएगा कि पानी बचाना कितना जरूरी होता है. और ऐसा होने के बाद कम से कम 4-5 साल तक तो सरकार पानी डिस्ट्रीब्यूशन, टंकी और उस पानी के श्रोत की व्यवस्था नहीं करवा पायेगी.  ऐसे समय में सरकार को चाहिए कि शिक्षा, स्वास्थ्य के पहले ही पर्यावरण और जल संशाधन सबसे अधिक ध्यान दे. स्वीडेन, नीदरलैंड जैसे देशों में हाल ही में पर्यावरण को मुद्दा बनाकर कुछ नेताओं ने चुनाव जीते हैं. यूरोप में हाल ही में एक ग्रीन लेफ्ट नाम की पार्टी का उदय हुआ है. लेकिन हमारे यहाँ इनको कोई पार्टी या सरकार अपने घोषणा पत्र में भी नहीं शामिल करती हैं. ये कोई मुद्दा ही नहीं होता है. जबकि इसके उलट 15-20 सालों में खनन के जरिए देश के प्राकृतिक संसाधनों की ऐसी लूट मचाई कि सब ख़त्म हो गया. जंगल, जमीन और जल सब खा गए. 
अभी भी समय है, सरकार को इसपर कदम उठाने चाहिए. सबमर्सिबल पर रोक या टैक्स लगाए और जमीन से एक लिमिट से बाहर पानी निकालने पर रोक लगे. पेय जल के लिए सब गावों में पानी की टंकी से पानी जाये, सिचाई के लिए नहरों पर जोर दिया जाए. जंगल और पेड़ काटने तो बंद ही हों बल्कि और बढ़ाए जाएं. बारिश के एक एक बून्द पानी को एकत्रित करके प्रयोग में लाया जाए. नहीं तो हमारी आने वाली पीढ़ी को पीने का पानी मिलना भी  मुश्किल हो जायेगा. लेकिन शायद ये सब तो हम ही सोच रहे, जिसको सोचना और कुछ कदम उठाना चाहिए, वो सरकारें तो सो रही. पार्टी और राजनीति से उठकर ये चीज है, कांग्रेस बीजेपी, सपा बसपा कोई भी हो.

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