Sunday, May 26, 2019

जिन राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हुआ

राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस का इन राज्यों में घटिया प्रदर्शन दिखा रहा है कि उनकी आपसी लड़ाई कितने अंदर तक घुसी है. राजस्थान में सचिन पायलट सीएम नहीं बने, डिप्टी सीएम बने तो अपनी शर्त के अनुसार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद भी नहीं छोड़ा। जब बारी लोकसभा चुनाव लड़ने की थी तो अपने सरकारी कार्यालय से निकले भी नहीं. रही बात अशोक गहलोत की तो उनपर करवाई उसी समय होनी चाहिए थी जब कांग्रेस शुरुआत में इतना लीड करने के बाद भी जैसे तैसे सरकार बना पाई. बेशक उनका हाथ था उसमें. उसके बाद जब सीएम बने तो गहलोत और पायलट दोनों अपनी अपनी कुर्सी के लिए लड़ते रहे, न कि लोकसभा चुनाव जितने के लिए. वहीँ मध्यप्रदेश में सिंधिया को सीएम न बनाने से जनता और खासकर कार्यकर्ताओं का एक बड़ा तबका नाराज था. फिर उनको प्रभारी बनाकर यूपी भेज दिया गया. वहां वैसे भी कुछ होने वाला नहीं था. फिर जब वो अपना चुनाव लड़ने लौटे तबतक बहुत देर हो चुकी थी. सिंधिया की कांग्रेस आलाकमान पर नाराजगी इतनी अधिक थी की वो राहुल गाँधी की कई रैलियों में सिंधिया गए ही नहीं. अब जब कांग्रेस का प्रदर्शन ख़राब हुआ है तो वो दबाव बनाएँगे सीएम बदलने का. हो सकता है सरकार ही गिर जाए जो बीजेपी दावा कर रही. एक और राज्य छत्तीसगढ़ जहाँ कांग्रेस ने इतनी शानदार जीत दर्ज की थी, तब वहां पीएल पुनिया प्रभारी रहते हुए कांग्रेस में एकजुटता लाए थे, जैसे ही वो लौटे सिरफुटौव्वल फिर से चालू हो गई. बघेल और ताम्रध्वज साहू का खेमा लड़ने लगा. वही हाल गुजरात में हुआ था, विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद कई विधायक पार्टी छोड़ गए, आपसी मतभेद इतने हो गए कि अल्पेश ठाकोर भी कई समर्थक विधायकों के साथ पार्टी छोड़ गए. हरियाणा और दिल्ली में भी कांग्रेस की यही अंदरूनी स्थिति है.
इसलिए कांग्रेसी हार का ठीकरा ईवीएम के सिर नहीं बल्कि खुद पर फोड़ें.
हाँ राहुल गांधी का प्रयास सराहनीय था।

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