चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार को समय से पहले रोकने के फैसले
के बाद गुरुवार शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी आखिरी रैली दमदम
केंद्रीय जेल मैदान पर की. अपनी स्वाभाविक नाटकीय शैली में उन्होंने
‘दीदी’ को संबोधित करते हुए चेतावनी दी कि बंगाल में उनका समय ख़त्म हो गया
है. उन्होंने एक ही सांस में जय श्री राम के साथ ममता बनर्जी द्वारा बोले जाने वाले ‘जय मां काली’ का उद्घोष किया और कहा,
‘युवाओं को जय श्री राम और जय मां काली बोलने के लिए जेल में डाला जा रहा
है. ममता बनर्जी को जानने वाले जानते हैं कि वे देवी काली की अनन्य भक्त
हैं. फिर वहां उनकी रैली में ममता बनर्जी के खिलाफ कुछ पोस्ट कार्ड बांटे गए और फिर हिंसा हुई. इस हिंसा के लिए तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं
को जिम्मेदार ठहराते हुए मोदी ने- भव्यता के प्रति अपने अनुराग के चलते-
विद्यासागर की एक भव्य प्रतिमा बनवाने का वादा किया.
विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के बीच फंसा पूरा बंगाल तो नहीं,
लेकिन कोलकाता बदल रहा है. कभी वामपंथ के लाल रंग में रंगा ये शहर ममता
बनर्जी के आने के बाद सफेद और नीले रंग में नजर आया और अब बड़ी संख्या
में कई जगहें भगवा होती दिख रही हैं.
वाम/मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के समर्थक बड़ी संख्या में
भाजपा के साथ खड़े हैं, क्योंकि वे ममता बनर्जी को सबक सिखाना चाहते हैं.
माकपा बमुश्किल ही जमीन पर कहीं दिखाई देती है. अब इसकी जगह कभी यहां
अस्तित्वहीन रही और आज उभर रही भाजपा ने ले ली है.
मंगलवार को बसीरहाट लोकसभा सीट, जहां 19 मई को मतदान होना है- से भाजपा
उम्मीदवार सायंतन बसु ने कहा कि मतदान के दिन जो लोग बूथ कैप्चरिंग करने की
कोशिश करें, उन्हें गोली मार देनी चाहिए.
इस बीच, इसी दिन एक अलग रैली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा
कि ममता बनर्जी ने सोनार बांग्ला को कंगाल बांग्ला में बदल दिया है.
उन्होंने कहा, ‘वे (ममता) अपना वोट बैंक बचाने के लिए केवल घुसपैठियों को
बचाने में लगी हैं.’ दक्षिण कोलकाता के संतोषपुर की एक सड़क के कोने पर युवा और अधेड़ पुरुषों
का एक समूह राजनीति पर चर्चा कर रहा था. राज्य में चुनावी समीकरणें सामान्य
से उलट जाती दिख रही हैं. कोलकाता जैसे शहर में, जहां राजनीति लोगों के जीवन से इस कदर जुड़ी है,
जैसे मछली के लिए पानी, चुनावी चर्चाएं कभी ख़त्म नहीं होतीं. यह शहर सांस
रोके 23 मई का इंतज़ार कर रहा है. उमस भरी गर्मियों की शाम की गर्मी भी कभी कोलकाता के सड़क किनारे के ऐसे
अड्डों को प्रभावित नहीं कर पाती. किसी सामान्य समय में तो ऐसा नहीं हुआ, न
ही इस समय में, जिसे असाधारण कहा जा रहा है.
पिछले हफ्ते अपनी लंबी चुप्पी तोड़ते हुए बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और
माकपा नेता बुद्धदेब भट्टाचार्जी ने पार्टी के मुखपत्र गणशक्ति को दिए एक
साक्षात्कार में लोगों से भाजपा को वोट न देने की अपील की है. ये ‘आसमान से
गिरकर खजूर में न अटकने’ जैसी हिदायत देने उन्होंने काफी समय लगा दिया और
इसमें ऐसा कोई उत्साह भी नहीं दिखा जिससे प्रेरित होकर पार्टी समर्थक भाजपा
के खिलाफ वोट करें.
भाजपा को बंगाल में जितनी भी सीटें मिलें, इस बात में कोई संदेह नहीं है
कि राज्य में हाशिये पर पड़ी इस पार्टी को मुख्यधारा में लाने में माकपा का
बहुत बड़ा योगदान रहेगा. जैसा केरल में कम्युनिस्ट मार्क्सिस्ट पार्टी के
महासचिव सीपी जॉन ने सही ही कहा है कि यह पार्टी की दूसरी ऐतिहासिक गलती है. पहली गलती उन्होंने 1996 में की थी, जब माकपा ने तीसरे मोर्चे के
नेतृत्व में बन रही संयुक्त सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में पश्चिम बंगाल
में इसके तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बनाने से इनकार
किया था. बसु ने खुद कहा था कि पार्टी का यह निर्णय एक ‘ऐतिहासिक गलती’
करने के समान था. आज यह सोचा जा सकता है कि भले ही थोड़े समय के लिए ही सही, अगर
ज्योति बसु जैसा कोई प्रधानमंत्री होता तो वर्तमान भारत की तस्वीर क्या
होती. ऐसे में यह भी सोच सकते हैं कि 1996 में हुई इस गलती का खामियाजा
उसकी तुलना में कम होगा जो देश और जनता को 23 मई के बाद चुकाना पड़ सकता है.
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