अब मैं ये बात मान चुका हूँ कि देश में राजनीति का तरीका बदल गया है.
पब्लिक जाति में पढ़कर वोट नहीं देती ये इस चुनाव की खासियत रही. धर्म पर
वोट दे आएं तो वो अलग बात है. २०१४,२०१७ और अब २०१९ के चुनावों के नतीजों
से साफ़ हो चूका है कि पूरी राजनीती नरेंद्र मोदी पर केंद्रित हो गई है.
राजनीति का पूरा पैटर्न ही टू पार्टी थ्योरी पर आधारित हो चुका है. पाले के
एक तरफ नरेंद्र मोदी और बीजेपी हैं, तो दूसरी तरफ अन्य पार्टियां. अब समय आ
चुका है कि इनका गठबंधन नहीं बल्कि विलय हो जाना चाहिए. जैसे
७७ में जनता पार्टी में सबका मिलान हुआ था और किसी एक बड़े सर्वसम्मति के
नेता के चहरे पर चुना हो जो मोदी को सीधे टक्कर दे सकता हो. अलग अलग या
गठबंधन से बात नहीं बनेगी। सपा बसपा भी मिल गए लेकिन मुझे ये उप चुनाव के
समय ही पता था और मित्र सूरज से कहा था कि आज सब मिलकर भी बीजेपी से १० -२०
हजार ही वोट ज्यादा हैं जो बहुत बड़ी लीड नहीं है. पुरे यूपी में अब सपा,
बसपा, कांग्रेस के समर्थक अलग अलग बहुत कम बचे हैं. अब वोटर दो तरह के
हैं, एक मोदी समर्थक दूसरे मोदी विरोधी.
मोदी ने जाति तोड़कर लोगों को अपनी ओर खींचा है, वो यूपी और बिहार में एक नई तरह की राजनीती है. केवल यादव, जाटव और मुस्लिम ही खुलकर मोदी के विरोध में रह गए हैं. यहाँ तक कि यादवों के परिवार से भी कोई व्हाट्सएप यूज करने वाला लड़का चुपचाप बीजेपी को वोट दे आता है.
अमेठी से राहुल गाँधी, कन्नौज से डिम्पल, गुना से सिंधिया, भोपाल से दिग्विजय सिंह, हरियाणा में रोहतक और सोनीपत से हुड्डा पिता -पुत्र, राजस्थान से सचिन पायलट की सीट (प्रत्याशी उनका कोई समर्थक है), कन्हैया, अजय माकन, शीला दीक्षित, देवेगौड़ा, रघुवंश प्रसाद, शत्रुघ्न सिन्हा, शरद यादव, अजित चौधरी,बदायूं से धर्मेंद्र यादव, मुनमुन सेन, प्रकाश अम्बेडकर, सुशील कुमार शिंदे, जितिन प्रसाद, मल्लिकार्जुन खड़गे लगातार बीजेपी उम्मीदवारों से पीछे चल रहे हैं, और जहाँ जहाँ विपक्ष लीड भी कर रहा तो बहुत कम अंतर से। इसका मतलब साफ़ है कि इस चुनाव में न नेता चला, न साख चली, न जाति चली, न कोई और मुद्दा. बस चला तो अकेले मोदी. अगर इन सबको मोदी का मुकाबला करना है तो सब एक होकर, किसी नेता के चहरे और विजन के साथ सामने आएं.
मोदी ने जाति तोड़कर लोगों को अपनी ओर खींचा है, वो यूपी और बिहार में एक नई तरह की राजनीती है. केवल यादव, जाटव और मुस्लिम ही खुलकर मोदी के विरोध में रह गए हैं. यहाँ तक कि यादवों के परिवार से भी कोई व्हाट्सएप यूज करने वाला लड़का चुपचाप बीजेपी को वोट दे आता है.
अमेठी से राहुल गाँधी, कन्नौज से डिम्पल, गुना से सिंधिया, भोपाल से दिग्विजय सिंह, हरियाणा में रोहतक और सोनीपत से हुड्डा पिता -पुत्र, राजस्थान से सचिन पायलट की सीट (प्रत्याशी उनका कोई समर्थक है), कन्हैया, अजय माकन, शीला दीक्षित, देवेगौड़ा, रघुवंश प्रसाद, शत्रुघ्न सिन्हा, शरद यादव, अजित चौधरी,बदायूं से धर्मेंद्र यादव, मुनमुन सेन, प्रकाश अम्बेडकर, सुशील कुमार शिंदे, जितिन प्रसाद, मल्लिकार्जुन खड़गे लगातार बीजेपी उम्मीदवारों से पीछे चल रहे हैं, और जहाँ जहाँ विपक्ष लीड भी कर रहा तो बहुत कम अंतर से। इसका मतलब साफ़ है कि इस चुनाव में न नेता चला, न साख चली, न जाति चली, न कोई और मुद्दा. बस चला तो अकेले मोदी. अगर इन सबको मोदी का मुकाबला करना है तो सब एक होकर, किसी नेता के चहरे और विजन के साथ सामने आएं.
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