Sunday, October 30, 2016

भगत सिंह:(समाज शास्त्रिक विशलेषण)

भगतसिंह जिज्ञासु विचारक थे, क्लासिकल नहीं. 23 साल की उम्र का एक नौजवान स्थापनाएं करके चला जाये-ऐसी संभावना भी नहीं हो सकती. भगतसिंह तो विकासशील थे. बन रहे थे. उभर रहे थे. अपने अंतत: तक नहीं पहुंचे थे. हिन्दुस्तान के इतिहास में भगतसिंह एक बहुत बड़ी घटना थे. भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के खांचे से निकलकर अगर हम मूल्यांकन करें और भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के संदर्भ में रखकर अगर हम विवेचित करें, तो दो अलग अलग निर्णय निकलते हैं. भगतसिंह 1907 में पैदा हुए और 1931 में हमारे बीच से चले गये. ऐसे भगतसिंह का मूल्यांकन कैसा होना चाहिए? लोग गांधीजी को अहिंसा का पुतला कहते हैं और भगतसिंह को हिंसक कह देते हैं. भगतसिंह हिंसक नहीं थे. जो आदमी खुद किताबें पढ़ता था, उसको समझने के लिए अफवाहें गढ़ने की जरूरत नहीं है. उसको समझने के लिए अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, स्तुति और निंदा की जरूरत नहीं है. भगतंसिंह ने 'मैं नास्तिक क्यों हूं' लेख लिखा है. भगतंसिंह ने नौजवान सभा का घोषणा पत्र लिखा जो कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के समानांतर है. भगतसिंह ने अपनी जेल डायरी लिखी है, जो आधी अधूरी हमारे पास आई है. भगतसिंह ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी एसोसिएशन का घोषणा पत्र, उसका संविधान बनाया. पहली बार भगतसिंह ने कुछ ऐसे बुनियादी मौलिक प्रयोग हिन्दुस्तान की राजनीतिक प्रयोगशाला में किए हैं जिसकी जानकारी तक लोगों को नहीं है. भगतंसिंहके मित्र कॉमरेड सोहन सिंह जो उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी में ले जाना चाहते थे, लेकिन भगतंसिंह ने मना कर दिया. जो आदमी कट्टर मार्क्सवादी था, जो रूस के तमाम विद्वानों की पुस्तकों को चाटता था. फांसी के फंदे पर चढ़ने का फरमान पहुंचने के बाद जब जल्लाद उनके पास आया तब बिना सिर उठाए भगतसिंह ने उससे कहा 'ठहरो भाई, मैं लेनिन की जीवनी पढ़ रहा हूं. एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है.थोड़ा रुको.' 
आप कल्पना करेंगे कि जिस आदमी को कुछ हफ्ता पहले, कुछ दिनों पहले, यह मालूम पड़े कि उसको फांसी होने वाली है. उसके बाद भी रोज किताबें पढ़ रहा है?
कम से कम दुनिया के 35 ऐसे बड़े लेखक थे जिनको भगतसिंह ने ठीक से पढ़ रखा था. बेहद सचेत दिमाग के 23 साल के नौजवान के प्रति मेरा सिर श्रद्धा से इसलिए भी झुकता है कि समाजवाद के रास्ते पर हिन्दुस्तान के जो और लोग उनके साथ सोच रहे थे, भगतसिंह ने उनके समानांतर एक लकीर खींची लेकिन प्रयोजन से भटककर उनसे विवाद उत्पन्न नहीं किया जिससे अंगरेजी सल्तनत को फायदा हो. मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में कुछ लोगों को मिलकर काम करना चाहिए था. मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि महात्मा गांधी और विवेकानंद मिलकर हिन्दुस्तान की राजनीतिक दिशा पर बात क्यों नहीं कर पाये. गांधीजी उनसे मिलने बेलूर मठ गए थे लेकिन विवेकानंद की बीमारी की वजह से सिस्टर निवेदिता ने उनसे मिलने नहीं दिया था. भगतसिंह समाजवाद और धर्म को अलग अलग समझते थे. विवेकानंद समाजवाद और धर्म को सम्पृक्त करते थे. विवेकानंद समझते थे कि हिन्दुस्तान की धार्मिक जनता को धर्म के आधार पर समाजवाद की घुट्टी अगर पिलायी जाए तो शायद ठीक से समझ में बात आएगी. गांधीजी भी लगभग इसी रास्ते पर चलनेकी कोशिश करते थे.
यह तार्किक विचारशीलता भगतसिंह की है. उस नए हिन्दुस्तान में वे 1931 के पहले कह रहे थे जिसमें हिन्दुस्तान के गरीब आदमी, इंकलाब और आर्थिक बराबरी के लिए, समाजवाद को पाने के लिए, देश और चरित्र को बनाने के लिए, दुनिया में हिन्दुस्तान का झंडा बुलंद करने के लिए धर्म जैसी चीज की हमको जरूरत नहीं होनी चाहिए. आज हम उसी में फंसे हुए हैं. क्या सबूत है कि अयोध्या में मस्जिद थी? क्या सबूत है कि मंदिर बन जाने पर रामचंद्र जी वहां आकर विराजेंगे? 
एक बिंदु की तरफ अक्सर ध्यान खींचा जाता है अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए कि महात्मा गांधी और भगतसिंह को एक दूसरे का दुश्मन बता दिया जाए. भगतसिंह को गांधी जी का धीरे धीरे चलने वाला रास्ता पसंद नहीं था. लेकिन भगतसिंह हिंसा के रास्ते पर नहीं थे. उन्होंने जो बयान दिया है उस मुकदमे में जिसमें उनको फांसी की सजा मिली है, उतना बेहतर बयान आज तक किसी भी राजनीतिक कैदी ने वैधानिक इतिहास में नहीं दिया.
हमारे यहाँ संविधान तो किताब मात्र बनकर रह गया है, जब हम गीता, कुरान शरीफ, बाइबिल और गुरु ग्रंथ साहब की आयातों और श्लोकों पर बहस कर सकते हैं कि इनके सच्चे अर्थ क्या होने चाहिए? तो हमको हिन्दुस्तान की उस पोथी (संविधान) की जिसकी वजह से सारा देश चल रहा है, को पढ़ने, समझने और उसके मर्म को बहस के केन्द्र में डालने का भी अधिकार मिलना चाहिए. यही भगतसिंह का रास्ता है. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि किसी की बात को तर्क के बिना मानो. खुद उनसे भी. जब मैं भगतसिंह से तर्क करता हूं. बहस करता हूं. तब मैं पाता हूं कि भगतसिंह के तर्क में भावुकता है और भावना में तर्क है.
अंत में अभी सोचा हुआ एक सवाल आपके लिए छोडकर जा रहा हूं, मान लें भगतसिंह 1980 में पैदा हुए होते और 20 वर्ष में बीसवीं सदी चली जाती. उसके बाद 2003 में उनकी हत्या कर दी गई होती. उन्हें शहादत मिल गई होती. तो भगतसिंह का कैसा मूल्यांकन होता? सोचकर देखिए?

Thursday, October 27, 2016

सहानुभूति की लहर पर सवार अखिलेश

एक समाजवादी मित्र ने एक वीडियो भेजा है, अखिलेश कहते हैं ”हर दिन मैं खुद से उत्‍तर प्रदेश का भविष्‍य बनाने का वादा करता हूं।” इसके बाद ब्रेकफास्ट टेबल पर अखिलेश, उनकी पत्‍नी डिंपल और बच्‍चे नजर आते हैं। वीडियो में परिवार, जनता और विकास की थीम नजर आती है। आखिर में संदेश दिया गया है कि ‘उत्‍तर प्रदेश, भारत…मेरा परिवार” 
कल से चार वीडियो व्हाट्सएप पर मिल चुके हैं, जिसमें दो अखिलेश और दो शिवपाल ग्रुप से मिले हैं. 
2. इसके जवाब में शिवपाल सिंह यादव पूरे हुए वादे अब हैं नए इरादे टाइप एक जोरदार वीडियो में अनुभव की बात करते हुए किसानों को लुभाते नज़र आते हैं.
3. इस वीडियो में अखिलेश का एक गाना है, यूपी अपनी माँ है, इसकी ज़िम्मेदारी है,........अखिलेश यादव बोल रहा हूँ,....... इसमें खास बात है कि युवाओं से संवाद करने की कोशिश है.
4. अखिलेश के जवाब में इस वीडियो में सीधे मुलायम सिंह के समाजवादी और लोहियावादी विचारों को खड़ा किया गया है. 
देखते हैं ये लड़ाई अभी और कहाँ तक जाएगी. 
खास बात यह है इस वीडियो की जिसमे से पूरा यादव परिवार गायब है. कम से कम 40-50 लोगों से फोन और व्हाट्सएप पर 400-500 लोगों से बात कर चुका हूं सबकी सहानुभूति अखिलेश के साथ उस माइक छीनने के बाद वाले इमोशनल भाषण के बाद है। आज के 4 महीने पहले और आज के अखिलेश में फर्क है, लोग पहले भी कहते थे भइया ने काम किया है लेकिन यादव परिवार गुंडागर्दी करता है। मुलायम समर्थक लोगों को शायद उनके साथ हुए व्यवहार से दुख हुआ है। तभी वो रणनीति बदलकर पार्टी में रहकर ही खुद के दम पर चुनाव लडना चाहते हैं, शायद दो महीने में अकेले सब खडा करना आसान नहीं होगा। इसलिए वे खुद सहानुभूति के नाम पर चुनाव लडकर खुद ही हीरो बनना चाहते हैं। उनको पता है कि बहुमत आएगा नही तो अगर 130-150 सीटें भी आ जाती है तो गठबंधन की सरकार उनके नाम पर ही बनेगी। बाकी सब तो साइड में होगे। कल की पीसी में मुलायम की बात "शिवपाल की वापसी अखिलेश का अधिकार है" कहते ही शिवपाल के चेहरे पर खामोशी छा गई थी। शायद बेटे का कनेक्शन हो? वैसे मंत्री पद 15 दिन का बचा है इसके बाद कुछ होगा नहीं आचार संहिता लागू होने के कारण। लेकिन अखिलेश ने खडा होने और अकेले फैसला लेने का साहस दिखाया है, अब विरोधी उनपर जितना ज्यादा हमला करेगे वो मजबूत होगे। 

Wednesday, October 26, 2016

चाइना के सामान पर देशभक्ति का पाठ

चीन के एक्सपोर्टर्स की लिस्ट में हम 15वें स्थान पर हैं, भारत का हिस्सा उसके टोटल एक्सपोर्ट में से 1.5% ही है. क्योंकि हमारे यहाँ जो छोटी छोटी चीज़ें हैं वही चाइना से आती हैं, अगर आप स्वदेशी के नाम पर उसका समान रोकना चाहते हैं, तो सभी विदेशी समान को रोकिए. चाइना का सब प्रोडक्ट्स का इम्पोर्ट किसी और सेक्टर के एक प्रोडक्ट से भी कम होता होगा. अगर पाकिस्तान या आतंकवादियों का साथ देने के कारण उसका समान रोका जा रहा है तो बहुत सारी बाते हैं, उसके सभी संबंधों को रोकना चाहिए. और पाकिस्तान के एकटर्स के साथ साथ सभी बिजनेस बंद करना चाहिए. ग्लोबलाइजेशन के दौर में हम किसी से मुकाबला नहीं कर पाएँगे. अगर इंटरनेशन मार्केट में भारत को कुछ जगह बनानी है तो मेक इन इंडिया को बढ़ावा देकर पहले भारत में चीन के प्रोडक्ट्स को हराकर वापस भेजना होगा उसके बाद इंटरनेशनल मार्केट में यही करना होगा. ऐसा नहीं है क़ि यह असंभव है. मेरा सवाल केवल सरकार और उसके समर्थित लोगों के डबल स्टॅंडर्ड से है. 
मतलब हम उसके माल को रोककर कितना असर डाल लेंगे या अपने आर्थिक आधार को कितना मजबूत कर रहे हैं. जबकि कहीं ना कहीं से वो चल वैसा ही रहा है. चीन के एक्सपोर्टर्स की लिस्ट में हम 15वें स्थान पर हैं, भारत का हिस्सा उसके टोटल एक्सपोर्ट में से 1.5% ही है. क्योंकि हमारे यहाँ जो छोटी छोटी चीज़ें हैं वही चाइना से आती हैं,  अगर आप स्वदेशी के नाम पर उसका समान रोकना चाहते हैं, तो सभी विदेशी समान को रोकिए. चाइना का सब प्रोडक्ट्स का इम्पोर्ट किसी और सेक्टर के एक प्रोडक्ट से भी कम होता होगा. अगर पाकिस्तान या आतंकवादियों का साथ देने के कारण उसका समान रोका जा रहा है तो बहुत सारी बाते हैं, उसके सभी संबंधों को रोकना चाहिए. मतलब हम उसके माल को रोककर कितना असर डाल लेंगे या अपने आर्थिक आधार को कितना मजबूत कर रहे हैं. जबकि कहीं ना कहीं से वो चल वैसा ही रहा है. 
और पाकिस्तान के एकटर्स के साथ साथ सभी बिजनेस बंद करना चाहिए. ग्लोबलाइजेशन के दौर में हम किसी से मुकाबला नहीं कर पाएँगे. अगर इंटरनेशन मार्केट में भारत को कुछ जगह बनानी है तो मेक इन इंडिया को बढ़ावा देकर पहले भारत में चीन के प्रोडक्ट्स को हराकर वापस भेजना होगा उसके बाद इंटरनेशनल मार्केट में यही करना होगा. ऐसा नहीं है क़ि यह असंभव है. मेरा सवाल केवल सरकार और उसके समर्थित लोगों के डबल स्टॅंडर्ड से है. आप स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीस को बढ़ाने के लिए देश में क्या कर रहे हो? आप कौन सी योजनाएँ लाए हो, दूर की छोड़ो बनारस (पीएम का संसदीय क्षेत्र) के बुनकर अपने बिजनेस के लिए जूझ रहे हैं वहाँ क्या हुआ? कूई आर्थिक या टेक्निकल मदद की? स्मॉल स्केलस को डिजिटल इंडिया के वो जाल में फँसा दिया है क़ि पहले से अधिक भ्रष्टाचार होता है, कोई बनवा के दिखाए ऐसे फूड लाइसेंस? कुछ तो सरकार को भी करके दिखाने की ज़रूरत है? बातों और नारों से देश नहीं बदलेगा. 

Monday, October 24, 2016

समाजवादी पार्टी का महाभारत

मुलायम घराने के सियासी ड्रामे से मुझे कुछ नहीं लेकिन अखिलेश यादव को मायूस देखकर एक राजनीतिक छात्र होने के नाते थोड़ा सा खराब ज़रूर लगा. एक ऐसा समय जब देश में राजनीतिक विरासतों का दौर है, यूपी में मुलायम, राष्ट्रीय लोकदल के अजीत सिंह, अपना दल की अनुप्रिया पटेल, बिहार में पासवान और लालू, पंजाब में बादल, तमिलनाडु में करुणानिधि, महाराष्ट्र में ठाकरे और सबसे पुरानी और पूर्व में सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस में गाँधी परिवार ने कार्यकर्ताओं की मेहनत से खड़ी पार्टियों पर परिवार के लोगों को जबरजस्ती थोपा है तो अखिलेश के रूप में यह बग़ावत कुछ ना कुछ संकेत है. अगर अखिलेश इसमें सफल हो जाते तो अन्य दलों में भी हो रही परिवारिक मनमर्ज़ी को चैलेंज मिलता था. मैं मानता हूँ कि वो चार साल तक हिम्मत नहीं कर सके, लेकिन अंतिम समय में कुछ करने की ठान ली जब उनको लगा क़ि अब हारना तय है. ऐसा होता तो बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, जयललिता की पार्टी में भी एक बग़ावत के संकेत दिखते. 
हालाँकि मुझे इस मामले में अखिलेश के अलावा राहुल गाँधी में वो माद्दा दिखता है, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं दिखाई. उनको कई मौके मिले लेकिन नहीं कर पाए. एक तो वो दगी नेताओं को बचाने का बिल फाड़ने वाला एपीसोड याद होगा. इसमें वो कभी कोशिश करते नहीं दिखे शायद कार्यकर्ताओं की जगह हवाई चॅमचे टाइप नेताओं से घिरे थे, अखिलेश और नीतीश इसी में उनसे आगे निकल गए. नीतीश कुमार ने यह हिम्मत 2013 में भाजपा से गठबंधन के समय दिखाई थी, फिर मोदी से हारे और मांझी को सब देकर निकल पड़े नई रणनीति पर फिर सब वापस मिल गया. मोदी भी भाजपा में बहुत बड़ी लड़ाई जीतकर आए हैं. ऐसा नहीं है क़ि उनको संघ का पूरा समर्थन था. संघ उनके गुजरात के कार्यकाल में अपने खुद के अविकसित होने के डर से वाकिफ़ था, लेकिन मोदी ने 2 साल पहले से जो लहर बनाई थी, वो पहले भाजपा में उनको विजयी करती है. फिर देश में.
समाजवादी पार्टी का अब हारना तय है, मुश्किल से 80 सीटें आएँगी, अब उनका मुस्लिम वोट बीएसपी और यादव वोट भाजपा के साथ जाएगा. मुस्लिम को लगता है जो भाजपा को हाराए उसे वोट दो, तो अब बीएसपी ही उसे टक्कर देगी. दूसरी तरफ यादवों को लगता है क़ि अगर मायावती जीत गईं तो यादवों पर एससी एस टी के झूठे केश पूर्व की तरह लगाएँगी, तो वो उसके साथ जाएँगे जो बीएसपी को हराएगा।
अखिलेश यादव की टीम में लगातार काम कर रहे लोग बता रहे थे क़ि अखिलेश जी का राजनीतिक गुरुओं के आधार पर अनुमान और रणनीति है क़ि अगर समाजवादी पार्टी से अलग दल बनाकर वो मैदान में उतरेंगे तो फिर वो सबसे बड़े दल (150-170 सीट) बनकर उभर सकते हैं. ऐसा होगा जनता के बीच इमोशनल कार्ड खेलकर. उत्तर प्रदेश में जनता अखिलेश के बहुत करीब है ये तो मैं जानता हूँ. ख़ासकर ओबीसी. आप देखेंगे क़ि युवा उनको भईया और डिंपल को भाभी, बुजुर्ग डिंपल को बहू कहते हैं. लोग जो विरोधी हैं वो भी कहते हैं वो लड़का तो ठीक है लेकिन शिवपाल के गुंडे प्रदेश को लूट रहे हैं. काम भी हुआ है, जिसको कोई नकार नहीं सकता है, मीडिया और इंडस्ट्रलीस्ट के बीच में उनकी छवि अच्छी है. लेकिन सब उनके परिवार और दबंग यादवों से डरते हैं. ऐसे में अगर अखिलेश ये कहकर क़ि ये धर्म युद्ध है, घर में बाप और चाचा ही साथ नहीं हैं, जनता के बीच जाएँगे तो लोगों की हमदर्दी होगी उनके साथ. क्योंकि पार्टी के बँटवारे में लगभग गुंडे तो शिवपाल चाचा के साथ चले जाएँगे. दूसरी तरफ अखिलेश को कांग्रेस का समर्थन मिल सकता है. कांग्रेस ने भले ही शीला दीक्षित को उम्मीदवार बना दिया है लेकिन अगर उनको हटाकर अभी भी अखिलेश से गठबंधन हो जाए तो कोई दिक्कत  नहीं होगी. ऐसे में उत्तर प्रदेश में 100 ऐसी सीटें तो हैं ही जहाँ पर कांगेस को 20000 वोट से अधिक मिलता है. जो अखिलेश के साथ जुड़ने से जीत में तब्दील हो सकता है. और अखिलेश के पास अकेले 60-70 सीटों पर जीतने के दम तो बिना मुलायम सिंह के है. फिर इस स्थिति में उनका MY (मुस्लिम-यादव) वोट नहीं बिखरेगा, क्योंकि उनको जीत दिखेगी. मुझे लगता है क़ि अब अखिलेश यादव पर मुलायम सिंह यादव ने इमोशनल कार्ड खेलकर सब गेम बेकार कर दिया है. अब जो टकराव हो चुके हैं वो साथ आने से मिट नहीं सकते हैं, बल्कि अभी और भी चालें चली जाएँगी जिससे नुकसान होगा.

Thursday, October 20, 2016

घटती नौकरियों के आकड़े हमें चिंतित क्यों नहीं करते?

पिछले चार साल से हर दिन 550 नौकरियां ग़ायब होती चली जा रही हैं.
किसान,छोटे खुदरा वेंडर, दिहाड़ी मज़दूर और इमारती मज़दूरों के सामने जीनव का संकट खड़ा होता जा रहा है.
इस हिसाब से 2050 तक भारत में 70 लाख नौकरियों की कमी हो जाएगी.
बहरहाल प्रहार ने अपने सर्वे में लेबर ब्यूरो के एक आंकड़ों का बारीक अध्ययन करने का दावा किया है, जिसके अनुसार...
2015 में सिर्फ 1 लाख 35 हज़ार नौकरियों का ही सृजन किया गया.
2013 में 4 लाख 19 हज़ार नौकरियां पैदा हुई थीं.
2013 से 2015 के बीच भारी गिरावट आई है.
अप्रैल 2015 में केयर रेटिंग्स के चीफ इकोनोमिस्ट मदन सबनविस और अनुजा शाह ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. कंपनियां अपनी बैलेंस शीट में नौकरियां का जो आंकड़ा पेश करती हैं, इन दोनों ने पिछले चार साल में 1072 कंपनियों का अध्ययन कर बताया कि...
2014 में 11 लाख 88 हज़ार से अधिक नौकरियां जोड़ी गई हैं.
2015 में सिर्फ 12,760 नई नौकरियां ही जोड़ी गई हैं.
1000 से अधिक कंपनियों में नौकरियों में इतनी तेज़ी से गिरावट से किसी को फिक्र नहीं है और लोग इस बात में उलझे हैं कि मंदिर के सामने से ताजिये का जुलूस कैसे निकलेगा और मस्जिद के सामने से प्रतिमा विसर्जन का जुलूस. मदन सबनविस और अनुजा शाह की रिपोर्ट में सेक्टर के हिसाब से नौकरियां का विश्लेषण है...
2015 के साल में कंस्ट्रक्शन सेक्टर में -43.7 फीसदी नौकरियां घटी हैं.
2015 के साल में केबल में -20.6 फीसदी.
डायमंड और जुलरी में -28.4 फीसदी.
इंजीनियरिंग में -26.4 फीसदी नौकरियों में गिरावट आई है.
अस्‍पताल और हेल्थकेयर सेवाओं में -20.5 फीसदी.
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, आई टी सेक्टर में पिछले साल के मुकाबले इस साल कैंपस की नौकरियों में 20 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. आईटी सेक्टर में पिछले छह साल से बेसिक ऑफर 3 से साढ़े तीन लाख प्रति वर्ष ही बना हुआ है.
मिड लेवल के इंजीनियरिंग कालेजों में इसी सैलरी पर ज़्यादातर को नौकरी मिलती है.
इस हिसाब से देखें तो सैलरी में निगेटिव ग्रोथ हो जाती है.
एक कारण यह भी है कि बाज़ार में बहुत बड़ी तादाद में इंजीनियर हो गए हैं. इसलिए भी उनकी शुरुआती सैलरी में पिछले छह साल में कोई वृद्धि नहीं है. यानी छह साल पहले कोई इंजीनियर तीन लाख पर नौकरी पाता है, छह साल बाद का बैच भी इसी वेतन पर ज्वाइन करता है, जबकि इन छह सालों में कॉलेजों की फीस और पढ़ाई का ख़र्चा कितना गुना बढ़ गया होगा. बिजनेस स्टैंडर्ड ने कई कॉलेजों के प्लेसमेंट सेल से बात कर लिखा है कि कैंपस आने वाली कंपनियों की संख्या में तो कमी नहीं है, मगर नौकरियों की संख्या कम रहने के अनुमान हैं. 
पहले कंपनियां चार लोगों को नौकरी पर रखती थीं, तो अब दो लोगों को रख रही हैं.
90 प्रतिशत कंपनियां पिछले साल की ही सैलरी दे रही हैं.
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट में हेड हंटर इंडिया के चेयरमैन क्रिस लक्ष्मीकांत का बयान छपा है कि इंफोसिस, विप्रो और टीसीएस जैसी चोटी की तीन कंपनियां हर साल दो लाख नए इंजीनियरों को नौकरी पर रखती थीं, लेकिन अब यह संख्या घटकर 70 से 80 हज़ार हो गई है. इसका कारण यह भी है कि बैंकिंग, फाइनांस सेक्टर और बीमा क्षेत्र में ठहराव आया है. वहां से इन आईटी कंपनियों को बिजनेस नहीं मिल रहा है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में नौकरियां बढ़ सकती हैं. अगर आप केयर रेटिंग्स के आंकड़े देखेंगे तो...
2015 में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों में वृद्धि दर -5.2 प्रतिशत दर्ज हुई है.
बैंकिंग सेक्टर में पिछले साल मात्र 2.1 फीसदी रही है.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों में वृद्धि की किसी भी संख्या को हमें -5.2 प्रतिशत के अनुपात में ही देखना होगा. एक और बात का ध्यान रखियेगा कि ये सारे आंकड़े सरकारी नहीं हैं. अलग-अलग रिसर्च एजेंसियों के हैं. अच्छा होता है कि इस तरह के आंकड़े सरकार जारी करती, लेकिन लेबर ब्यूरो के आंकड़े को क्या सरकार भी स्वीकार करेगी कि 2015 में एक लाख पैंतीस हज़ार से ज्यादा नौकरियां नहीं बढ़ी हैं.
15 साल से अधिक उम्र के लोगों में बेरोज़गारी पिछले पांच साल में सबसे अधिक है.
काम कर सकने वाली आबादी का एक तिहाई बेकार है.
68 फीसदी कामगार परिवारों की मासिक कमाई 10,000 से अधिक नहीं है.
अप्रैल से लेकर दिसंबर 2015 के बीच एक लाख साठ हज़ार परिवारों में सात लाख अस्सी हज़ार से अधिक लोगों को शामिल किया है.
भारत में 15 साल से अधिक उम्र के कामगारों की आबादी 45 करोड़ के करीब बैठती है.
इस 45 करोड़ में से दो करोड़ तीस लाख लोग बेरोज़गार हैं.
जिन्हें काम मिल रहा है, उन्हें साल भर काम नहीं मिलता है.
इसे अंडर एम्लॉयपेंट की कैटगरी में रखा गया है, इसकी संख्या 16 करोड़ है.
16 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें पूरे साल काम नहीं मिलता है. क्या वाकई इतनी गंभीर स्थिति है. क्या आज का नौजवान जिसे नौकरी चाहिए वो इन आश्वासनों पर घर बैठ सकता है कि 2025 या 30 तक नौकरियां बढ़ने लगेंगी.

सांप्रदायिकता की आग में जलता उत्तर प्रदेश

कल के हिन्दुस्तान टाइम्स में एक रिपोर्ट पढ़ी मैने. जिसमें कुछ  आकड़े सामने आएँ जो बहुत चौकाने वाले थे. 
यूपी में जनवरी 2010 से 2016 के बीच सांप्रदायिक हिंसा की 12,000 घटनाएं हुई हैं.
साल के हिसाब से हर साल 2,000 सांप्रदायिक घटनाएं.
दिन के हिसाब से हर दिन पांच से अधिक सांप्रदायिक घटनाएं.
सिर्फ एक दिन कोई सांप्रदायिक हिंसा दर्ज नहीं हुई है और वो है 25 दिसंबर 2014.
साल 2016 में जनवरी से अप्रैल के बीच 1,262 सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज हुई हैं.
2015 में 3,708 मामले दर्ज हुए हैं और 2014 में 2,884.
बीफ या गोहत्या को लेकर होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या कैसे बढ़ रही है..
2010 में इन कारणों से सिर्फ 130 मामले दर्ज होते हैं, जो 2014 में 458 हो जाते हैं.
2015 में दर्ज 3,708 घटनाओं में से 696 घटनाएं बीफ या गोहत्या को लेकर होती हैं.
उसी तरह से क़ब्रिस्तान को लेकर झगड़ा, मंदिर-मस्जिद और धार्मिक आयोजनों की भी भूमिका रही है. अप्पू ने इस सबको धार्मिक असहिष्णुता के मद में जोड़ दिया है.
2010 में धार्मिक असहिष्णुता के कारण 592 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में से 98 घटनाएं होती हैं.
2014 में 2,884 में से 715 घटनाएं धार्मिक असहिष्णुता के कारण होती हैं.
2015 में 3,708 घटनाओं में से 905 घटनाएं धार्मिक असहिष्णुता के कारण होती हैं.

गोंडा में दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन के दौरान पथराव का आरोप लगा. तनाव बढ़ा तो ताज़िया कमेटी ने ताज़िया नहीं निकाला.
मऊ में भी प्रतिमा विसर्जन और ताज़िया तोड़े जाने को लेकर तनाव हुआ.
अलीगढ़ में कब्रिस्तान की ज़मीन पर रावण जलाने को लेकर तनाव फैला.
मुरादाबाद में बिलारी इलाके में मुहर्रम के दौरान एक जुलूस निकालने को लेकर तनाव हो गया.
13, 14 और 15 अक्तूबर को गोंडा के मोतीगंज, बहराइच के फख़रपुर में तनाव हुआ. बहराइच में कई जगहों पर ऐसी घटनाएं हुई हैं. नासिर ने लिखा है कि महाराजगंज, कुशीनगर, बलिया, बलरामपुर, बरेली, सीतापुर और रायबरेली में भी जुलूस के रास्ते को लेकर तनाव हुआ है. बिहार में तो चुनाव भी नहीं होने वाले हैं, लेकिन वहां ये तनाव क्यों हो रहे हैं.
बिहार के पूर्वी चंपारण के तुरकौलिया में भी सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया.
यहीं के सुगौली में भी इसी तरह का मामला हुआ.
पश्चिम चंपारण के बेतिया के एक मोहल्ले में भी तनाव हो गया.
गया, मधेपुरा, भोजपुर, पीरो, गोपालगंज, सीतामढ़ी से भी ऐसी ख़बरें आईं हैं.

Wednesday, October 19, 2016

मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाम स्त्री अधिकार

हैदराबाद लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर मुस्तफ़ा हैदर की एक किताब में सरला मुदगल का एक महत्वपूर्ण केश पढ़ने का मौका मिला. उसमें उन सभी महिलाओं के मामले थे जिनके पति ने दूसरी शादी करने के लिए इस्लाम अपना लिया था. ऐसा धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के केश में भी हो चुका है. मतलब लोग धर्म और पर्सनल लॉ की आड़ में दूसरी शादी करते हैं. 
दूसरी बात उसमें सबसे क्लियर पता चली क़ि 1937 के शरियत एक्ट का क़ुरान या इस्लामिल लॉ से बहुत ज़्यादा मतलब नहीं है. बहुत छोटा सा शरीयत एक्ट है जिसमें 6 धाराएँ हैं उसमें कहीं भी तीन तलाक़ या पॉलिगेमी का ज़िक्र तक नहीं है. कुछ लोग बड़ी चालाकी से मेरे साथ बहस में भी पर्सनल लॉ को शरीयत, क़ुरान या इस्लाम के साथ जोड़कर बहस को धार्मिक या भावनात्मक करके हमारी आवाज़ों को कम्युनल घोषित करने में लगे थे. तो मैंने आज मुस्तफ़ा साहब की ही किताब में पढ़ा क़ि भारत में लगने वाला मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरानिक या इस्लामिक नहीं है. ये एक फिक है. फिक का अर्थ होता है ह्यूमन एलिमेंट. ये हनफी विद्वानों द्वारा लिखा गया क़ानून है, इसलिए इसे हनफी लॉ भी कहा जाता है. अर्थात क़ुरान से मात्र 20-25% चीज़ें ही ली गई हैं, कस्टम्स ज़्यादा हैं. आज भी मुस्लिमों में ख्वाजा या मेमन लोग हैं जो हिंदुओं के 1955 के रिफ़ॉर्म हो चुके क़ानून के पुराने वर्ज़न से चल रहे हैं. ह्यूमन एलिमेंट के आधार पर ना जाने कितने सुप्रीम कोर्ट और प्रिवी कौंसिल के फ़ैसले हैं. ऐसे में कोई ट्रिपल तलाक़ या 4 शादी जैसे महिला विरोधी कार्यों को कैसे समर्थन कर सकते हैं.  
अभी की बात करें तो जो ट्रिपल तलाक़ का मामला है उसका सरकार से अभी तक  तो कोई लेना देना नहीं है. अभी तक वो लड़ाई मुस्लिम महिलाएँ ही सुप्रीम कोर्ट में लड़ रही हैं. लेकिन सरकार इसी दौर में एक साथ कॉमन सिविल कोड पर भी चर्चा करना चाहती है. जबकि मुझे नहीं लगता है क़ि बहुसंख्यक समाज भी अभी कॉमन सिविल कोड के लिए राज़ी होगा. सबसे बड़ी बात है इसमें लोगों को इनकम टैक्स में मिलने वाला हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली के अंडर मिलने वाला लाभ. इसके बाद हिंदुओं में भी हिंदू मैरिज एक्ट पूरी तरह से लागू नहीं हो पाता है, गोवा में एक अलग स्पेशल मैरिज एक्ट है, फिर पॉंडिचेरी में तो फ्रेंच लॉ लगता है. ऐसे में अगर सरकार या सुप्रीम कोर्ट एक रणनीति के तहत छोटे छोटे रिफ़ोर्मस या एमएण्डमेंट करके पर्सनल लॉ को कमजोर करे तो काफ़ी अच्छा होगा. उदाहरण के तौर पर सबसे पहले ट्रिपल तलाक़ में ही महिला और पुरुष दोनों को तलाक़ का अधिकार होना चाहिए. तलाक़ 3 बार में हो या एक बार में ये महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण ये है क़ि बिना किसी गुंजाइश या कोशिश के किसी शादी का ना टूटना. कम से कम एक समय मिलना चाहिए दोनों को सोचने के लिए, और अगर औरत चाहे तो वो भी तलाक़ दे सकती है. दूसरी बात क़ि तलाक़ के बाद महिला के अधिकार क्या होंगे? उसके अधिकारों को पूरी तरह से सुरक्षित कर दिया जाए, मेनटीनेंस, भरण पोषण और बच्चों के भविष्य को लेकर एक एग्रीमेंट के तहत अदालतें फ़ैसला करेंगी? इसमें काजी अदालतें जो पहले से गैर क़ानूनी हैं उनको समाप्त करने की ज़रूरत है. और महिला पक्ष को सरकार की तरफ से फ्री में सरकारी वकील मिलना चाहिए. 
अब इसका दूसरा पहलू ये हो सकता है दो-तीन या चार शादी वाली. तो पहली बात ये होनी चाहिए क़ि जबतक पहली बीवी की मर्ज़ी क़ानूनी रूप से लिखित ना मिले तबतक कोई दूसरी शादी नहीं कर सकता है. क़ुरान कहता है क़ि आप दो औरतों के साथ जस्टिस नहीं कर सकते हैं चाहे कितनी भी कोशिश क्यों ना कर लें. इसलिए पहली बीवी के अधिकार सुरक्षित कर दिए जाने चाहिए. उसके बच्चों का प्रॉपर्टी में हिस्सा, भविष्य का भरण पोषण आदि. 
इससे जो पर्सनल लॉ के मिस्यूज होते हैं उनके आधे हाथ तो काट जाएँगे. फिर जब सरकार को समय या इच्छाशक्ति हो तो कॉमन सिविल कोड लागू कर दें. अब मेरे हिसाब से यहाँ पर युनिफ़ॉर्म सिविल कोड काफ़ी टफ चीज़ होने वाली है सरकार के लिए, टेक्निकल एंड पॉलिटिकल भी. फिर जब मैं फेडरलिज़्म पर पढ़ रहा था तो पता चला क़ि देश में संविधान से पहले का कोई भी क़ानून जो मूल अधिकारों के हनन करता है वो ऑटोमैटिक नल एंड वाइड हो जाता है. और शरीयत एक्ट संविधान के अनुच्छेद 13 (i) (जेंडर इक्वालिटी) मौलिक अधिकार के खिलाफ है. संविधान के अनुसार बहुत सी जगहों पर राज्य और केंद्र की सरकारों के टकराव मुझे अभी से राजनीतिक माहौल को देखकर नज़र आती है. केंद्र के पास 66-67 विषय और राज्य के पास 44 मतलब कम से कम 100 विषयों पर राज्य और केंद्र अलग अलग अधिकार रखते हैं क़ानून बनाने के. हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार जो शादी के प्रावधान हैं कन्यादान या वरमाल ये ब्रम्‍हनाइज़ेशन ऑफ मैरिज है आदिवासियों और दलितों के सिस्टम अलग हैं. हिंदू मैरिज एक्ट में लड़का और लड़की आपस में बाप की तरफ से 7 और माँ की तरफ से 5 पीढ़ी तक रिश्तेदार नहीं होने चाहिए लेकिन महाराष्ट्र में मराठी लोगों में मैने कजिन्स या मामा के साथ शादी होते देखा है. ऐसे बहुत से विषय हैं जिन्हें देखकर शायद सरकार कॉमन सिविल कोड पर आगे नहीं बढ़ेगी. इसलिए हमें मुस्लिम पर्सनल लॉ में रिफ़ॉर्म के लिए लड़ना चाहिए. सबसे पहले तो ट्रिपल तलाक़ का ख़ात्मा, तलाक में महिला की हिस्सेदारी, तलाक़ के बाद महिला का मेनटीनेंस और पहली बीवी की बिना लिखित क़ानूनी इजाज़त और सुरक्षित अधिकारों के एग्रीमेंट के दूसरी शादी न करना.

Saturday, October 15, 2016

युनिफ़ॉर्म सिविल कोड

जैसा क़ि मैने कल ही क्लियर कर दिया था क़ि कॉमन सिविल कोड और ट्रिपल तलाक़ दो अलग अलग मुद्दे हैं, इनको एक साथ नहीं देखना चाहिए. इसलिए मैने आज केवल कॉमन सिविल कोड पर लिखने को सोचा है. ट्रिपल तलाक़ पर कल अपनी राय रख चुका हूँ. सबसे पहले तो आपको यह बताना चाहता हूँ क़ि असल में ये कॉमन सिविल कोड है क्या? 
भारत के संविधान के आर्टिकल 44 में दिया हुआ है, भारत सरकार सबके लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का पूरा प्रयास करेगी. आर्टिकल 44 ‘डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पालिसी’ में आता है. मतलब इसको लागू करने के लिए आप कोर्ट में नहीं जा सकते. पर सरकार को धीरे-धीरे समय से लागू कर देना चाहिए.
अब ऐसा क्यों हैं कि सरकार लागू नहीं कर पा रही? और जब लॉ मिनिस्टर सदानंद गौड़ा ने लॉ कमीशन के पास ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ लागू करने से जुड़ी दिक्कतों के बारे में पूछा है तो बवाल क्यों मचा हुआ है?
सबसे बड़ी बात कि संविधान लागू हुआ था 1950 में तो फिर इतना वक़्त कैसे लग गया? इसके सीधे से कारण हैं धर्म की आड़ में छुपे राजनीतिक लोग. कुछ लोगों या ख़ासकर मुस्लिम धर्म गुरुओं का मानना है क़ि कॉमन सिविल कोड लागू होते ही मुस्लिमों को हिंदू जैसे ट्रीट किया जाएगा, उनका धर्म ख़तरे में आ जाएगा. तो मैं उनको बता देना चाहता हूँ क़ि ये बिल्कुल बकवास बात है. दुनिया के बहुत से मुल्कों में सिंघल सिविल सिस्टम है. अमेरिका में तो इस्लाम काफ़ी फल फूल रहा है. उसे कुछ नहीं होगा इस्लाम को. लेकिन लोगों को डरा कर उसे लागू नहीं करने दिया जा रहा है. यूनिफॉर्म सिविल कोड सीधा-सीधा जुड़ा है देश के हर नागरिक के अधिकारों से. नागरिक बोले तो हिन्दू, मुसलमान, सिख, ट्रांसजेंडर, गे, लेस्बियन सब. पर इसमें पेच है. धार्मिक पेच. हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन धर्म के लोग शादी-विवाह , तलाक, मां-बाप की जायदाद में हिस्सा के लिए कानून का सहारा ले सकते हैं. पर इस्लाम माननेवालों के लिए कानून थोड़ा सा अलग है. इससे हिन्दू-मुसलमान या किसी और धर्म को दिक्कत नहीं है. दिक्कत है तो सिर्फ औरतों को. इस्लाम में औरतों की शादी, तलाक और फिर शादी को लेकर बड़े पुराने किस्म के कानून हैं. वैसे कानून को आज के ज़माने में लागू करना औरतों की तौहीन है. हुआ क्या था कि पहले हिंदुस्तान में कोई लिखित कानून नहीं था. सब बड़े-बुजुर्गों से पूछकर चलता था. तभी ये सारी चीजें आ गयीं थीं कि ‘गोत्र’ में शादी नहीं करनी है. अपने गांव में शादी नहीं करनी है. इत्यादि-इत्यादि. मुस्लिम समाज में अपने कुछ अलग उसूल थे. सब चल रहां था. पर सबमें एक बात कॉमन थी: औरतों को कोई अधिकार नहीं था. कन्यादान हुआ, बात ख़त्म. तलाक नहीं होगा. जिस घर में बियाह  के गईं, अब वहां से अर्थी निकलेगी. अगर जिन्दगी नरक हो गई तो भगवान का दिया मान के निभा जाओ.
फिर आये अंग्रेज. उनको कानूनों से बड़ा प्यार था. हर चीज का सिस्टम लगाया. फिर हिन्दू-मुस्लमान के शादी-विवाह के कानूनों की भी स्टडी करने लगे. बड़ा ही जटिल था. हर एक किलोमीटर पर कानून ही बदल जाता था. ‘हमारे यहां ऐसे नहीं, ऐसे शादी होती है. बेटी ससुराल गई अब मायके से कोई रिश्ता नहीं. बस तीज-त्यौहार जायेगा’. अब अंग्रेजों को ये समझ ना आये. भाई ये क्या बात है? बेटी को हिस्सा नहीं दोगे प्रॉपर्टी में से? 
तब तक एक गड़बड़ हो गई. 1857 की क्रांति. वजह हुई कि सैनिकों के बैरक में एक अफवाह फैल गई. कि हिन्दुओं का धर्म भ्रष्ट करने के लिए कारतूस में गाय की चर्बी और मुसलमानों का धर्म भ्रष्ट करने के लिए सूअर की चर्बी मिलाई गई है. अंग्रेजों को समझ में आ गया कि कुछ भी करो यहां, इस मामले में दखल मत दो. फिर उन्होंने इसी हिसाब से सबको उनके अपने ही तरीके से रहने दिया. पर ये करने लगे कि जो कानून जुबानी चलते थे उनको लिखना शुरू कर दिया.
फिर कुछ-कुछ कानून तो उन्होंने जबरदस्ती पास करा लिए थे. जैसे सती-प्रथा को ख़त्म करना, विधवा-विवाह. धीरे-धीरे शादी के लिए लड़का-लड़की की उम्र भी तय कर दी. बाल-विवाह के सख्त खिलाफ थे अंग्रेज. वही लोग 1929 में शारदा एक्ट लाये विवाह की मिनिमम उम्र के लिए. वहीं मुहम्मद अली जिन्ना की मांग पर मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अप्लिकेशन आक्ट, 1937 पास कर दिया गया. ये कानून ‘शरीयत’ के हिसाब हैं. तब से मुस्लिम समाज में शादी-विवाह और तलाक सम्बन्धी केस इसी के अंडर आते हैं. इसमें अंग्रेज एक जगह चूक गए उनको लगा क़ि पूरे देश के हिंदू और मुस्लिम एक जैसे होंगे, तो उन्होने एक जैसा क़ानून लागू कर दिया, लेकिन ये बहुत बड़ी भूल थी. उन्होने मुस्लिम लॉ को क़ुरान नहीं हनफी क़ानून से लिया था, फिर विलियम जोन्स ने अरबी से उसका अनुवाद पारसी में कराया फिर इंग्लिश में, जिससे बहुत सी ग़लतियाँ रह गईं. आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरु और भीमराव अम्बेडकर ने 1956 में ‘हिन्दू धर्म’ के पंडों के ‘शास्त्र-सम्मत विधियों’ की ऐसी-तैसी करते हुए तलाक, एलिमोनी यानी तलाक के बाद का भत्ता, पिताजी की संपत्ति में बेटे-बेटियों को बराबर हिस्सा और बच्चा गोद लेने की सुविधा हर चीज के लिए हिन्दू कोड बिल लेकर आये. उस समय देश आज़ादी के वक़्त हुए क़त्ल-ए-आम से गुजरा था. इसके चलते बाकी धर्मों के लिए कानून नहीं लाए गए. कहा गया कि वक़्त आएगा तो फिर सब हो जायेगा. पर तत्काल सहूलियत के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 लाया गया. अगर कोई अपने धर्म की रीति-रिवाजों से शादी नहीं करना चाहता तो इस एक्ट के अंतर्गत शादी कर सकता था. पर ‘धर्म के माफिया’ इस एक्ट को ‘अधर्मी’ बताते रहते हैं. सब ठीक हो जाने वाला वक़्त आया नहीं. वक़्त तो लाना पड़ता है. चीन से, पाकिस्तान से लड़ाई, सूखा, इमरजेंसी, गिरती-पड़ती सरकारें, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या. सब कुछ रुक सा गया था. फिर एक दौर आया. राजीव गांधी भारत के इतिहास के सबसे बड़े जनादेश के साथ प्रधानमंत्री बने.
उसी समय एक घटना हुई. 1986 में एक 73 साल की बूढ़ी औरत शाह बानो कोर्ट पहुंची. उसके पति ने ‘तीन बार’ तलाक कहकर उसको तलाक दे दिया था! बरसों पहले हुई शादी में ‘मेहर’ की रकम तय की थी पति ने. वो उसने वापस कर दी शाह बानो को. पर वो रकम 50-60 साल बाद पेट भरने लायक तो नहीं थी.मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार: ‘इद्दत’ के मुताबिक शाह बानो को सिर्फ तीन महीने के लिए भत्ता मिलना चाहिए’.
CरPC की धारा 125, जो सारे भारतीयों पर लागू है, के अनुसार: मेंटेनेंस हमेशा देना पड़ेगा. मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया. 5 जजों की बेंच ने कड़े शब्दों में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को फटकार लगाई और कहा कि देश के कानून का पालन करना पड़ेगा. भत्ता तो देना पड़ेगा. साथ ही ये भी कह दिया कि यूनिफॉर्म सिविल कोड जल्दी लागू किया जाये. 1984 के दंगों के बाद देश अभी संभल रहा था. अब सिविल कोड को लेकर बवाल कट गया. कहा जाने लगा कि सरकार और कोर्ट सब मिलकर देश के ‘माइनॉरिटीज’ पर हिन्दू कानून लागू करना चाहते हैं. माइनॉरिटीज की अपनी पहचान ही ख़त्म करना चाहते हैं. राजीव गांधी के एक मंत्री ने आत्मदाह करने की धमकी दी. राजीव प्रेशर में आ गए. उनके पास पार्लियामेंट में बहुत बड़ा बहुमत था. चाहते तो क्या नहीं कर सकते थे. एक मंत्री की धमकी और लाखों-करोड़ों औरतों का हक़. पर उन्होंने चुना सेफ रास्ता. तुरंत मुस्लिम विमन’स (प्रोटेक्षन ऑफ राइट्स ओं डाइवोर्स) आक्ट 1986 पास किया गया. एक्ट ने कहा कि CरPC की ‘धारा 125’ मुस्लिम औरतों पर लागू नहीं होगी. इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में ही याचिका दायर की गई. कहा गया कि नया कानून संविधान के आर्टिकल 14, 15 और 21 को तोड़ता है. सही में तोड़ता है. इन आर्टिकल्स में ‘सबको एक सामान अधिकार’ और ‘जीने का हक़’ जैसे चीजें कही गई हैं. सुप्रीम कोर्ट पार्लियामेंट के फैसले को बदल तो नहीं सकता था. इसलिए बीच का रास्ता निकाला गया. कहा गया कि ऐसा नहीं है कि ये संविधान के खिलाफ है. तीन महीनों में इतना पैसा मिल जाएगा कि काम चलता रहेगा. यहां से भारत की राजनीति बदल गई. 1956 में कांग्रेस की सरकार ‘हिन्दू कोड बिल’ लाई थी. लेफ्ट सहित कई सारे दलों ने इसका समर्थन किया था. पर जनसंघ और आरएसएस ने इसका भयानक विरोध किया था. 1986 के ‘शाह बानो’ मुद्दे के बाद मामला उलट गया. जनसंघ से चलकर बनी पार्टी बीजेपी ने अपने राजनीति तीन मुद्दों पर डिक्लेयर की: 1. राम जन्मभूमि 2. धारा 370 3. यूनिफॉर्म सिविल कोड.
बीजेपी ने हिंदुत्व का मुद्दा उठाते हुए यूनिफॉर्म सिविल कोड को ‘मुसलमान तुष्टिकरण’ के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू किया. और आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस और लेफ्ट ने यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करना शुरू कर दिया! पिछले 25 सालों से यही चल रहा है. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने भी ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ का राग अलापा था पर किया कुछ नहीं. 2014 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने क्लियर किया था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड उनके मुद्दे में है. 2015 में लॉ मिनिस्टर सदानंद गौड़ा ने कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने में दिक्कतें तो हैं पर धीरे-धीरे देखेंगे. 2016 में उन्होंने पहला कदम उठा लिया है. अभी उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं. कहा जा रहा है कि बीजेपी की सरकार ने ‘चुनावी फायदा’ उठाने के लिए अभी यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात कही है. जो भी हो, यूनिफॉर्म सिविल कोड किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है. 
अब सवाल उठता है सरकार की मंशा पर. चलो मान लेते हैं कि औरतों के हक़ में आपकी आवाज उठी है. आप कुछ करना चाह रहे हैं. पर ट्रांसजेंडर, गे, लेस्बियन लोगों का क्या? क्या उनके लिए फिर से कोई राजनीतिक पार्टी बनानी पड़ेगी? जब आप कानून बना ही रहे हैं तो फिर ये क्यों नहीं बोलते कि इस बार सबका ख्याल रखा जायेगा? यूएन की मीटिंग में लगबत के मुद्दे पर आपने वोट क्यों नहीं किया? यूनिफॉर्म सिविल कोड ‘पूरी जनता’ के लिए है. जब तक आप सबके हकों की बात नहीं करेंगे हमें यकीन नहीं आएगा. और तब तक आपको भी अपने कानून पर यकीन नहीं करना चाहिए.
मुझे अभी भी ये राजनीतिक मुद्दा क्यों लगता है, इसके कई कारण हैं. क्या कॉमन सिविल कोड से पूरे देश पर मुसलमानों को छोड़ भी दिया जाए तो एक क़ानून  लागू किया जा सकता है? संविधान के अनुच्छेद 14 में जो समानता का अधिकार है उसमें कहा गया है क़ि जो लोग आसमान हैं उनपर ये क़ानून लागू नहीं होगा तो टेक्निकली इसमें भी दिक्कत आएगी.
आईपीसी, सीपीसी, सीआरपीसी, Transfer of Property Act, Indian Contract Act, Sale of Goods, एक है, तो 90% सिविल मैटर्स में तो एक ही क़ानून लागू होते हैं. मतलब पहले से ही सिविल कोड है.   अब बात रह जाती है केवल उनके निजी जिंदगी से जुडे पर्सनल लॉ हैं वो अलग है, वो ऐसे राजनीतिक माहौल में एक साथ सुधर सकते हैं मुझे नहीं लगता। 
युनिफ़ॉर्म सिविल कोड मौलिक अधिकारों का हिस्सा बने या नीति निदेशक तत्वो का इसमें 5-4 के बहुत कम मार्जिन से फ़ैसला हो पाया था. इसके अध्यक्ष बल्लभ भाई पटेल थे. संविधान सभा में जब बहस हुई तो डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था क़ि धर्म को निजी मामला रखो. किसी भी धर्म की प्रैक्टिस खुले तौर पर नहीं की जा सकती है. जिसको भी पूजा और नमाज़ पढ़नी है वो अपने घर मे करे सड़क पर आकर कोई जुलूस पोस्टर या कुछ नहीं होगा. लेकिन पटेल नहीं माने और कहा क़ि धर्म सामाजिक सच्चाई है इसलिए इसे सामाजिक रखना पड़ेगा. खैर ये एक अलग मुद्दा हो जाएगा फिर. 
अब अगर हिंदू कोड बिल की ही बात करें तो पता चलता है क़ि राजेंद्र प्रसाद जी खुद उसके खिलाफ क्यों हो गए? क्यों उस बिल के 3 टुकड़े करने पड़े? हिंदू कस्टम्स का अभी भी इसमे बहुत मुस्किल है. सरकार के पास ब्लू प्रिंट क्या है? हिंदू कोड बिल मिताक्षरा कानून के मुताबिक बना है तो इसको पूरा देश कैसे मानेगा? महाराष्ट्र और साउथ के ब्राह्मण ही नहीं मानते हैं। पूरे देश में हिन्दू एक जैसे नहीं होते हैं. मैरिज एक्ट्स में धर्म नहीं जितना मेरी रिसर्च में सामने आया वो केवल राज्यों के हिसाब से है. गोवा में रहने वाले हिंदू पर भी Hindu Marriage Act नहीं स्पेशल मैरिज एक्ट लागू होता है, पांडिचेरी में तो फ्रेंच law लागू होता है.  आदिवासी समाज में कुछ अलग है। मैं हिंदुओं में भी कितनों को जनता हूँ जो सगे मामा या किसी संबंधी से शादी कर रहे हैं, जबकि हिंदू मैरिज एक्ट कहता है क़ि लड़का और लड़की अपने पिता की तरफ से 7 और माँ की तरफ से 5 पीढ़ियों तक एक दूसरे के संबंधों में शामिल ना हों.  मुसलमानों में भी बहुत विभिन्नता है कशमीर, यूपी या हैदराबाद में। वोहरा अलग होते हैं, ख्वाजा और मेमन होते हैं जो अभी तक भगवान विष्णु के 10वें अवतार को मानते हैं.  जाहिर सी बात है कि वे शादी या तलाक भी हिंदू कोड बिल के आधार पर करते हैं। इसीलिए बार बार कह रहा हूँ कि दो विषय मिल  गए तो टफ हो सकता है। यह भी तय नहीं है कि वैकल्पिक कानून क्या होगा? अभी भी बहुत से मूसलमानो पर पुराना अनरिफ़ॉर्म हिंदू लॉ से चल रहे हैं. सिख और जैन अलग हैं. प्रकाश सिंह बादल के बारे में आज पता चला कि वे संविधान के अनुच्छेद 25 को जलाते रहे हैं क्योंकि उसमें हिंदू की परिभाषा में सिखों को भी जोड़ा जाता है. जैन समाज अलग से अल्पसंख्यक हो गया तो अब हिंदू क़ानून उसपर कैसे लगाए जाते हैं? और ये लोग हिंदू लॉ मानते हैं कस्टम्स की वजह से. पंजाब में एक कस्टम है करेवा की. जिसमें किसी औरत का पति मर जाता है तो जो आदमी उस औरत पर चादर डाळ देता है, उसे चूड़ी पहना देता है उससे उसकी शादी हो जाती है, बिना किसी शादी किए. इसपर एक फिल्म भी आई थी, "एक चादर मैली सी" शायद से नाम था.  यह किया जाता है क्योंकि उसमें जो प्रॉपर्टी का हिस्सा है वो दूसरे को ना चला जाए.  मतलब अभी भी काॅमन सिविल कोड पर बहुत ज्यादा रिसर्च की जरूरत है सरकार को भी। 
इसलिये सबसे खतरनाक तीन तलाक पर ही शुरू करते हैं, बाकी बातें बाद में। दरअसल हम लोग काॅमन सिविल कोड और तीन तलाक को मिसमैच कर रहे हैं? ये माइंडगेम है कुछ मौलानाओं का कि बहस बदलकर पूरे मुसलमानों को एक कर दिया जाए तो औरतें अपनी बराबरी की बात नहीं करेंगी, तब उनकी लडाई हिंदू या बीजेपी के नाम पर हो जाती है। उन्हें ऐसा करने से हमें रोकना होगा, क्योंकि ये लडाई अंत तक जा चुकी है अब छूट गया तो शुरुआत फिर से करनी पडेगी।

Friday, October 14, 2016

क्या ट्रिपल तलाक़ पर सवाल इस्लाम को ख़तरा है?

दशहरा को मोदी जी ने लखनऊ से कॉमन सिविल कोड पर बहुत अच्छे से बात की. वो इस बार एक माइंड गेम खेलने के चक्कर में दिख रहे हैं, मतलब मुस्लिम उलेमाओं और धर्म गुरुओं के सामने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लाकर खड़ा किया है, जिससे सब बौखला से गए हैं, आज उलेमा कौंसिल वाले लोग मुंबई यूनिवर्सिटी में लॉ स्टूडेंट्स कमेटी के साइन लेने आए थे, मैं तो हूँ नहीं उस कमेटी में लेकिन कमेटी ने साइन करने से मना कर दिया. एक जगह शहज़ाद पूनावाला को कहते सुना क़ि कॉमन सिविल कोड नहीं लगा सकते हैं, ट्रिपल तलाक़ हमारा घर का मुद्दा है बाहर से हस्तक्षेप मत करो. अरे भाई यही तो हाजी अली दरगाह में प्रवेश के समय कह रहे थे, आज भी यही कह रहे हैं, बात नहीं समझ में आती है क़ि महिलाओं के अधिकारों से इस्लाम कैसे ख़तरे में आ जाता है? जब कोई सच में इस्लाम पर ग़लत नज़र उठाता है तो हम जैसे लोग बीच  में खड़े होकर उन लोगों से लड़ते हैं. तो फिर महिलाओं  को अधिकार देने में क्यों डरते हैं ये लोग? शायद सबकी दुकाने बंद होने का डर नज़र आ रहा है. कोई भी सामाजिक बुराई किसी एक धर्म या समाज या किसी घर के अंदर की नहीं होती है, हम वैसे ही सवाल पूछेंगे और महिलाओं को अधिकार दिलाने के लिए बात करेंगे जैसे दहेज और हिंदू समाज की अन्य कमियों पर बोलते हैं. रही बात अन्य समानता की तो जाने कब से हम कहते रहे हैं क़ि इनकम टैक्स में धर्म के आधार पर अनडिवाइडेड फैमिली नही होनी चाहिए. उसमें मुस्लिम या क्रिस्चियंस को भी अधिकार होना चाहिए जैसे हिंदुओं को HUF का क़ानून के लाभ प्राप्त है. वैसे ये तर्क तो इस समय जैन समुदाय में भी सुनने को मिल रहे हैं. हैदराबाद की 13 साल की अराधना जैन परंपरा के अनुसार 68 दिनों का उपवास करती है. इसके नतीजे में वो इतनी कमज़ोर हो जाती है कि मौत हो जाती है. पुलिस इस मामले की जांच कर रही है कि कहीं मां बाप ने उकसाया तो नहीं. इसकी काफी आलोचना हो रही है. जैन समाज के संतों का कहना है कि उनकी परंपराओं के आगे लोग न आएं. लोग उनके समुदाय को बदनाम कर रहे हैं. यानी जैन संत मोक्ष प्राप्ति की दिशा में उपवास का समर्थन कर रहे हैं. अपनी धार्मिक परंपरा का बचाव कर रहे हैं. क्या सरकार इन परंपराओं पर रोक लगाने के बारे में विचार कर सकती है या 13 साल की लड़की 68 दिन का उपवास न करे इसे लेकर कोई कानून बना सकती है. संथारा पर रोक लगाने का मामला अभी भी अदालत में लंबित है. दूसरी तरफ मोदी जी से भी मेरा सवाल है क़ि आप धर्म के आधार पर असमानता तो दूर कर रहे हैं, मुस्लिम औरत या मर्द के बीच की. आप कहते हैं क़ि 21वीं सदी में हम धर्म के आधार पर क़ानून रखकर कैसे समाज को बाँट सकते हैं. फिर आप ये किसी धर्म को ध्यान में रखकर बीफ पर क़ानून बनाकर देश को कौन सी सदी या धर्म की सियासत से दूर कर रहे हैं? जब पुराने धार्मिक क़ानून ख़त्म कर रहे हैं तो नए बाहियात क़ानून क्यों बना रहे हैं?
मैं मुद्दे को ना भटकाते हुए फिर से ट्रिपल तलाक़ पर हुई बहस की शुरुआत में जाना चाहता हूँ. उत्तराखंड के काशीपुर की शायरा बानो. फरवरी 2016 में एक जनहित याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई कि तीन तलाक की प्रथा समाप्त हो. बल्कि इसके साथ साथ हलाला और बहुविवाह भी समाप्त हो जाए. शायरा बानो के साथ साथ जयपुर की आफ़रीन रहमान, हावड़ा की इशरत जहां भी महिलाओं के अधिकार को लेकर मैदान में आ गईं. सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी मामलों को एक साथ सुनना शुरू कर दिया. फरवरी से अक्टूबर तक आते आते इस मामले में पक्ष विपक्ष से कई पैरोकार जुड़ गए हैं. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन भी इस मामले में पक्षकार बन गया. आंदोलन ने 50000 मुस्लिम महिला और पुरुषों के दस्तख़त जुटाए. तीन तलाक की समाप्ति की याचिका पर सुनवाई जैसे जैसे आगे बढ़ी है वैसे वैसे इसे लेकर सार्वजनिक स्पेस में बहस भी बढ़ने लगी है.
जिस तरह से तमाम मुस्लिम संगठनों ने तीन तलाक के हक़ में सक्रियता दिखाई है, उससे लगता है कि मुस्लिम समाज की कोई बेचैनी बाहर आ रही है. समान आचार संहिता अलग मसला है लेकिन इसके सहारे तीन तलाक का समर्थन करना क्या वक्त की मांग को अनदेखा करना है या वाकई उनका इस बात में यकीन है कि तीन तलाक महिलाओं के लिए बेहतर व्यवस्था है. तमाम संस्थाओं, शहरों से लेकर लेकर तमाम दफ्तरों को महिलाओं के हिसाब से कानून बदलने पड़ रहे हैं. क्या मुस्लिम संगठन सिर्फ इस आधार पर इस आवाज़ को अनसुना कर सकते हैं कि तीन तलाक के ख़िलाफ़ तीन चार महिलाएं ही मैदान में हैं. दिल्ली में 13 अक्टूबर को दस मुस्लिम संगठनों के साथ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की प्रेस कांफ्रेंस हुई. कहा गया कि सभी प्रमुख मुस्लिम संगठन लॉ कमीशन की उस प्रश्नावली को खारिज करते हैं. लॉ कमिशन ने समान संहिता लागू करने की दिशा में अपनी वेबसाइट पर लोगों से कुछ सवाल पूछे हैं. सारे सवाल हां या ना में पूछे गए हैं और कारण बताने के लिए कुछ जगह भी छोड़ी गई है. भारत सरकार ने कहा है कि तीन तलाक की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने हलफनामे में कहा है कि तीन तलाक होना चाहिए.
अब मेरे इस विषय में 2-3 सवाल हैं, जो शायद कोई मुझे इस्लामिक रिसर्च स्कॉलर के मिलने पर ही पता चल पाएगा. 
1. क्या तलाक़ पर फ़ैसला करने वाली काजी अदालतों की कोई क़ानूनी हैसियत है? मैने तो अपने गाँव से देखा है क़ि ये अदालतें हमेशा ही पुरुषों के पक्ष में ही फ़ैसले देती हैं, जिसका पॉलिटिकल, सामाजिक आधार बड़ा है उसी को फ़ैसला देते हैं. महिलाओं को बहुत बुरी तरह से फँस कर रहना पड़ता है इसमे.
2. दिक्कत यह है कि हम जिस मसले पर बहस कर रहे हैं, उससे संबंधित ठीक आंकड़े नहीं हैं. जैसे हम नहीं जानते कि कितने पुरुष तीन तलाक का इस्तमाल करते हैं या कितनी महिलाएं तलाक़ के अपने अधिकारों का इस्तमाल करती हैं?
- फ़स्ख़ ए निकाह के तहत जब बीबी तलाक चाहती है और मियां नहीं देता है तो शादी ख़त्म कर दी जाती है. ऐसा कई लोग कहते हैं लेकिन मैने शीबा असलम फ़हमी से सुना क़ि अगर शौहर तलाक़ नामे को नामंज़ूर कर देता है तो तलाक़ नहीं होगा क्योंकि औरतों की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहती है अक्सर? कितने बेवकूफी से कारण बताते हैं ये लोग?
- तफ़़वीज़ ए तलाक़ के तहत बीबी को तलाक़ का हक़ दे दिया जाता है.
- क्या इन परंपराओं का इस्तमाल होता है?
क्या क़ुरआन में लिखा है कि तीन तलाक़ होना चाहिए. अगर नहीं लिखा है तो फिर इसका बचाव किसके लिए किया जा रहा है. क्या मुस्लिम संगठन दावा कर सकते हैं कि तीन तलाक से महिलाओं को नुकसान नहीं है. क्या मुस्लिम संगठनों की यह नाकामी नहीं है कि काशीपुर, जयपुर और हावड़ा की औरतों को सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा. अगर इसमें अच्छाई है तो वो बताया जाना चाहिए. 33 देशों में तीन तलाक बंद है. इनमें से 22 इस्लामिक मुल्क हैं. 2005 में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने मॉडल निकाहनामा बनाया था जिसके अंदर कहा गया था कि तीन की जगह एक ही तलाक काफी है. उसके बाद 90 दिनों का वक्त मिलेगा जिस दौरान तलाक देने वाला सोच सकता है, परिवार में लोग सुलह का प्रयास कर सकते हैं, तीन महीने बाद इसे वापस भी लिया जा सकता है. 15 साल बाद फिर से यह सवाल उठा है इसका मतलब यह है कि औरतों की आवाज़ को सुकून नहीं मिला है. मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तर्क बेहद हास्यास्पद है. एक तर्क यह है कि 'पुरुषों में बेहतर निर्णय क्षमता होती है, वह भावनाओं पर क़ाबू रख सकते हैं. पुरुष को तलाक़ का अधिकार देना एक प्रकार से परोक्ष रूप में महिला को सुरक्षा प्रदान करना है. पुरुष शक्तिशाली होता है और महिला निर्बल. पुरुष महिला पर निर्भर नहीं है, लेकिन अपनी रक्षा के लिए पुरुष पर निर्भर है.' बोर्ड का एक और तर्क देखिए. बोर्ड का कहना है कि महिला को मार डालने से अच्छा है कि उसे तलाक़ दे दो. मुसलिम पर्सनल बोर्ड किस हद तक पुरुष श्रेष्ठतावादी, पुरुष वर्चस्ववादी है और केवल पुरुष सत्तात्मक समाज की अवधारणा में ही विश्वास रखनेवाला है और वह महिलाओं को किस हद तक हेय, बुद्धि और विचार से हीन और अशक्त मानता है और उन्हें सदा ऐसा ही बनाये भी रखना चाहता है. बहुविवाह के मामले पर भी मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तर्क अजीब हैं. उसका कहना है कि 'बहुविवाह एक सामाजिक ज़रूरत है और महिलाओं के लिए वरदान है क्योंकि अवैध रखैल बने रहने के बजाय उन्हें वैध पत्नी का दर्जा मिल जाता है.' हलफ़नामे में कहा गया है कि पुरुषों की मृत्यु दर ज़्यादा होती है क्योंकि दुर्घटना आदि में उनके मरने की सम्भावनाएँ ज़्यादा होती हैं. इसलिए समाज में महिलाओं की संख्या बढ़ जाती है और ऐसे में बहुविवाह न करने देने से महिलाएँ बिन ब्याही रह जायेंगी.' बोर्ड का कहना है कि 'बहुविवाह से यौन शुचिता बनी रहती है और इतिहास बताता है कि जहाँ बहुविवाह पर रोक रही है, वहाँ अवैध यौन सम्बन्ध सामने आने लगते हैं.' अजीब तर्क हैं. अजीब सोच है. पता नहीं किन शोधों के जरिये बोर्ड इन बेहद बचकाना निष्कर्षोँ पर पहुँचा है! साफ़ है कि मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड उन सुधारों को भी लागू नहीं करना चाहता, जिन्हें बहुत-से मुसलिम देश बरसों पहले अपना चुके हैं. इतने बरसों में इन सुधारों का अगर कोई विपरीत प्रभाव इनमें से किसी देश में नहीं दिखा, तो फिर उनके अनुभवों से लाभ उठा कर उन्हें क्यों नहीं अपनाना चाहिए? हैरानी है कि ख़ुद मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के भीतर एक बड़ा वर्ग तीन तलाक़ को ख़ारिज किये जाने के पक्ष में है. पिछले साल बोर्ड के सम्मेलन के पहले ऐसी चर्चा चली भी थी कि तीन तलाक़ को इस सम्मेलन में ख़ारिज कर दिया जायेगा. लेकिन फिर जाने किस दबाव में मामला टल गया.
अभी 3-4 महीने पहले मेरे एक मारवाड़ी मुस्लिम मित्र ने अपनी बीबी को छोड़ दिया, मुझे बताया तो उसने अपने हिसाब से उसपर खूब आरोप लगा दिए, लड़की ने दहेज उत्पीड़न का केश कर दिया. वो गाँव गए, सरिया पंचायत बैठी लड़की के बाप नहीं था, तो कोई सामाजिक हैसियत भी नहीं थी, उसका केश भी वापस हो गया और तलाक़ भी मिल गया. बाद में वो बड़ा खुश मिला और बोला साली दिखने में अच्छी नही थी. मुझे बड़ा गुस्सा आया. मैने अपनी निजी जानकारी का उदाहरण इसलिए दिया क़ि मुस्लिम धर्म गुरु अक्सर यह कहते पाए जाते हैं क़ि मुसलमानों में तलाक़ बहुत कम होते हैं, बात संख्या की नहीं है. बात है क़ि जीतने भी तलाक़ होते हैं सबके सब मर्दों के अधिकार पर ही होते हैं. स्त्री की तरफ से एक भी तलाक़ नहीं होता है. जबकि तलाक़ का अधिकार क़ानूनी रूप से होता है तो बहुत अच्छा है. कोई भी शादी के बाद समस्याओं में फस सकता है, किसी का उत्पीड़न होता है, तो वो तलाक़ का अधिकार तो उसके जिंदगी जीने के अधिकार के बराबर है. ये इंसान की आज़ादी से जुड़ा अधिकार है. लेकिन तलाक़ का दुरुपयोग ना हो. मुस्लिम महिलाएँ भी बराबर प्रयोग करें इस क़ानून का और मर्द अपने फायदे के लिए इसका दुरुपयोग ना कर सकें. जो भी है कम से कम एक समाज के अंदर से किसी नाइंसाफी के खिलाफ आवाज़ उठी है, तो हम उसपर खूब चर्चा करके इंसाफ़ चाहते हैं जिससे मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार मिल सके. समय बदल गया है. मुसलमानों की पीढ़ियाँ बदल गयी हैं. उनकी आर्थिक-सामाजिक ज़रूरतें बदल चुकी हैं. मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड को यह बात समझनी चाहिए और सुधारों की तरफ़ बढ़ना चाहिए. न बढ़ने का सिर्फ़ एक कारण हो सकता है. वह यह कि कहीं सुधारों का यह रास्ता यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की तरफ़ तो नहीं जाता? यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड से उसके डरने का एक ही कारण है. वह यह कि ऐसा कोड आ जाने के बाद मुसलिम समाज पर मुल्ला-मौलवियों की पकड़ ढीली हो जायेगी. चूँकि बोर्ड पर इन्हीं लोगों का दबदबा है, इसलिए न उसे सुधार पसन्द हैं और न यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड. वह यथास्थिति चाहता है, भले ही इससे मुसलिम समाज के आगे बढ़ने के रास्ते बन्द होते हों.

Thursday, October 13, 2016

भूख से हारता हिन्दुस्तान

हो सकता है क़ि आप मेरे ब्लॉग के टाइटल को देखते ही मुझपर देश द्रोही का टैग लगा दें, गाली दे दें. लेकिन पहले थोड़ा सा पढ़ लो. ग्लोबल हॅंगर इंडेक्स की रिपोर्ट 2016 आ गई है. भारत 97 नंबर है. एसिया में नेपाल 72, श्रीलंका 84 और बांग्लादेश 90वें स्थान पर है. खुशी की बात यह है कि हम पाकिस्तान से आगे हैं. हम केवल तीन देशों को एशिया में हरा पाए हैं. 
मध्यप्रदेश में सबसे अधिक शिशु मृत्यु दर है. 118 BRICS देशों में भारत भुखमरी के देशों में सबसे पीछे है. भारत में 5 साल तक के हर 5 में से 2  यानी 38.7% बच्चे कुपोषित हैं. इंटरनैशनल फूड रिसोर्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में आस्ट्रेलिया में पैदा होने वाले गेंहूँ के बराबर बर्बाद हो जाता है. एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है क़ि हम आने वाले 6 साल में विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश बनने जा रहे हैं. ऐसे में हम इन्हीं बुनियादी सुविधाओं के ऊपर कैसे रहेंगे समझ में नहीं आता है? हम अभी अपने जीडीपी का मात्र 5% शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्चा कर पाते हैं, जबकि हमसे बहुत ग़रीब अफ़्रीकन देश भी 6-7% खर्चा करते हैं. चाइना  या अमेरिका के तो सपने देखें हम इस बारे में. बांग्ला देश में बाल मृत्यु दर 46 और भारत में 61  है, मतलब हमारे 1000 में से 61 बच्चे पैदा होते ही मर जाते हैं जबकि बांग्लादेश में 46. बांग्लादेश में लोगों की औसत आयु 64 और भारत में 58 साल ही है. भारत में 2015 में भुखमरी 15% है, जबकि 2010 में से केवल 1.6% ही सुधार हुआ है. हमारे पड़ोसी देश जो हमसे बहुत छोटे और ग़रीब हैं वो इस सबमें हमसे आगे निकल गए. अच्छा हो क़ि 2014 में फूड सिक्योरिटी बिल को एक क़ानून बना दिया गया था नहीं तो सरकार बदलती और उसका बजट कम ज़्यादा करके इससे भी ज़्यादा हालत खराब कर देती. फूड सिक्योरिटी बिल में मुख्य 3-4 चीज़ें हैं जो आज ही मुझे रिसर्च में पता चलीं, पीडीएस सिस्टम, आईसीडीएस, मिडडे मील चौथी जो नहीं पता थी मुझे मातृत्व (मैटरनिटी) लाभ, जिसपर सरकार ने बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जबकि सबसे ज़्यादा नुकसान इसी में होता है. जब मेनका गाँधी ने इस साल मैटरनिटी टाइटल बिल पास किया तो बड़ी वाहवाही लूटी लेकिन इसमें लाभ मिला केवल ॉर्गनाइज्ड सेक्टर को अनॉर्गनाइज्ड सेक्टर की महिलाओं को तो इससे बाहर ही रखा गया? जबकि कई राज्य सरकारों की योजनाओं में रूरल में हर गर्भ पर सरकार उनको 6000 रुपए देती है. दूसरा भारत में आँगन बाड़ी केंद्र इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जबकि इसके विस्तार के लिए कुछ ख़ास भारत सरकार द्वारा किया नहीं गया. जबकि ब्राज़ील जैसे देशों ने आँगनबाड़ी जैसे कार्यक्रमों से ही ग़रीबी दूर की है. वो अलग मत हो सकता है क़ि ब्राज़ील में ग़रीबी दूर हुई या नहीं? भारत में सरकारों ने इसमें बहुत ग़लतियाँ की. मध्यप्रदेश इसमें जो सबसे आगे है उसके बारे में एक बात मैने आज इंडियन एक्सप्रेस में रितिका खेड़ा के लेख में पढ़ी. 2015 में एक कमेटी ने मध्यप्रदेश सरकार को कहा क़ि आदिवासी इलाक़े के बच्चों को अंडा खाने के ळिए दिया जाना चाहिए, जो क़ि छोटे बच्चों के छोटे से पेट में वैल्यूम के हिसाब से बहुत पोषित तत्व रखता है, इससे कुपोषण और मृत्यु दर में कमी आएगी. ऐसे में आर एस एस ने मुख्यमंत्री को आदेश दे दिया क़ि अंडा तो नॉनवेज है, शिक्षा के मंदिर में कैसे दे सकते हैं? जबकि आदिवासियों के बच्चों को अंडा खाने में कोई दिक्कत ही नहीं थी. ऐसे भी लोग हैं देश के विकास को रोकने वाले. 
इसमें हमारे पीछे होने में एक और बात सामने आ रही है, वो है आधार कार्ड.................... सुप्रीम कोर्ट ने 6 बार सरकार को कहा है इसको अनिवार्य ना करने के लिए लेकिन सरकार है क़ि हर मंत्रालय से कोई न कोई आदेश निकलवा ही देती है. जबकि फायदा कोई नहीं हुआ है, ना कोई कालाबाज़ारी रोक पाए ना कोई चोरी. पहले राशन की दुकान वाला लोगों से रजिस्टर पर 35 किलो पर साइन करवाता था और देता 20 किलो था, आज भी वो मशीन पर अंगूठा 35 किलो पर लगवाता है और देता 15-20 किलो ही है. जनता तो नहीं जानती है क़ि मशीन पर वो कितना लिख रहा है, जबकि रजिस्टर पर लिखने में तो लोग समझ भी जाते थे. एक रिपोर्ट में पता चला क़ि पिछले तीन महीनें में राजस्थान में 19% लोग केवल आधार की वजह से राशन से वंचित रह गए हैं. महिलाओं के अंगूठे बरतन धोने या घर का काम करने में घिस जाते हैं तो निशान मिलना बहुत मुश्किल होता है. इसमें एक नहीं 6 चीज़ें होती हैं......... 1.आधार नंबर है कि नहीं? 2. वो मशीन में फ़ीड है कि नहीं? 3. फ़िंगर प्रिंट मिल रहे हैं या नहीं? 4. स्टैट सर्वर चल रहा है कि नहीं? 5. यूडीएआई (उदय) फिर अंत में 6. मोबाइल पर मैसेज आता है तब लोगों को राशन मिलता है. राशन की सबसे बड़ी कालाबाज़ारी तो ब्लॉक स्तर से होती है जिसके बारे में मैनें ज़मीनी स्तर पर बहुत कुछ देखा है. लेकर दबंगों की कालाबाज़ारी से बीपीएल लिस्ट के घोटाले तक. वहाँ पर किसी भी तरह से व्यवस्था परिवर्तन तो हुआ नहीं चल दिए डिजिटल इंडिया करने. देश बदल रहा है, डिजिटल हो रहा है पर 100 करोड़ के एडवरटाइजिंग करवा दिए, अमिताभ बच्चन की पूरी शक्ति लगवा दी बुढ़ापे में लेकिन जब हॅंगर रिपोर्ट आई तो हम कहीं नहीं दिख रहे हैं. डिजिटल करना है तो अपनी पोस्ट ओफिस करो, जहाँ आज भी भारतीय व्यवस्था के घटिए नमूने बैठे रहते हैं, पासबुक अपडेट करने के लिए प्रिंटर तक नहीं लगे हैं, सब मैनुअल हो रहा है. फिर ग़रीबों के पेट के अधिकार को डिजिटल करना . एक और मजेदार बात क़ि जैसे ही गूगल पर देखा कि हॅंगर के बारे में कितने लोगों ने सर्च किया होगा तो ना के बराबर लोग निकले. भारतीय मीडिया तो आइफोन के मुक़ाबले हॅंगर या ग़रीबी पर मात्र .07% की रिपोर्टिंग करता है. वैसे तो रोज चिल्ला चिल्ला बताते हैं लोगों को क़ि हमारे पास ब्रम्‍ह14 है, 250 टोपे हैं, लाहोर तक मार करेंगे, आज कोई नहीं बताएगा क़ि कितने खाने के पैकेट हैं और किसके पेट में जाएगा? अभी नहीं चेते हैं हो सकता है जब पाकिस्तान से हार जाएँगे तो हम उससे जीतने के चक्कर में कुछ आगे बढ़ सकें. वैसे याद आया क़ि यूएन ने 2030 तक विश्व से ग़रीबी ख़त्म करने की डेडलाइन दी है वो तो पाकिस्तान और इंडिया ही नहीं पूरी होने देंगे. 

Wednesday, October 12, 2016

अमेरिकी चुनाव में बहस (पार्ट-2)

जितना एनालिसिस अमेरिकी प्रेजिडेंसियल डिबेट का अमेरिकी मीडिया करता है  उतनी शायद कहीं नही। कपडे, खडे होने का तरीका, पुरुष है तो लडकी को देखने का तरीका, कितनी बार पानी पिया? सब कुछ नजर में रहता है जनता और मीडिया के राय बनाने के सवालों में। हिलेरी क्लिंटन के कोई 37000 पर्सनल इमेल लैपटॉप से डिलीट हुए उसका जवाब, ट्रम्प ने एक नौकरानी की कुछ सैलरी काट ली उसका जवाब? 
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों का परिवेश बदलनें में वहाँ की डिबेट्स को काफ़ी रोचक माना जाता है, वैसे सबसे ऐतिहासिक तो 1960 में कैनेडी और निक्सन के बीच की बहस सबसे तेज थी, फिर 1992 की बहस ऐसी थी जिसने जिसने मोमेंटम बदल दिया. एक तरफ थे रिपब्लिकन पार्टी के सिटिंग प्रेसीडेंट बुस, अनुभवी, पहले डिप्टी प्रेसीडेंट फिर प्रेसीडेंट. इराक़ में अमेरिका को युद्ध जितवाकर आए थे. दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी में कोई चुनाव लड़ने को तैयार नहीं था. तब आए जॉर्ज क्लिंटन, लोग उनमें निक्सन की झलक देखते थे, कहते हैं क़ि निक्सन की ताक़त उनकी खूबसूरत और स्मार्ट पत्नी जैक़लिन थी. यही बात क्लिंटन के साथ थी, उनके पास भी हिलेरी क्लिंटन के रूप में यंग, सक्सेसफुल प्रोफेशनल, मदर वाईफ मौजूद थी. बिल ने बाकी डेमोक्रेट दावेदारों को किनारे लगा पार्टी नॉमिनेशन हासिल किया. इस दौरान कई स्कैंडल सामने आए. एक औरत ने दावा किया, मैं 12 साल से बिल के साथ अफेयर में हूं. ये एक क्लब सिंगर थी. बिल का बचाव करने के लिए हिलेरी क्लिंटन आगे आईं. टीवी पर दोनों ने सब बातें रखीं और तूफान थम गया. उधर जॉर्ज बुश का वो वीडियो सामने आया, जिसमें वह सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान गोली खा जख्मी हुए थे. इस फुटेज ने बुश के कल्ट को और मजबूत कर दिया. 
डिबेट के दिन तक पलड़ा बराबर था. बल्कि बुश की तरफ हलका झुका था. उनकी टीम क्लिंटन के खिलाफ एग्रेसिव कैंपेन कर रही थी. अरकंसास के उनके कार्यकाल पर सवालिया निशान उठाए जा रहे थे. चाहे बेरोजगारी हो या टैक्स में बढ़ोतरी. मगर टीवी कैमरों के सामने सब बदल गया. क्लिंटन की टीम ने उनकी जोरदार तैयारी करवाई थी. यहां तक कि डिबेट शो के दौरान जो स्टूल रखे जाने थे बैठने के लिए, वे तक चुरा कर अपने हिसाब से दूसरे रखवा दिए. उन्होंने एक और चाल चली थी, जो सफल रही. बिल क्लिंटन ने कहा कि सिर्फ एंकर ही सवाल क्यों पूछें. टाउन हॉल स्टाइल में जनता भी पूछे. बुस की टीम इसके लिए  कैसे मान गई राम जाने? और यहीं वे चित्त हुए.
बुश की स्पीच हुई. क्लिंटन की स्पीच हुई. और फिर पब्लिक के सवाल. बुश पर इल्जाम था कि उन्होंने देश में टैक्स खूब बढ़ाए. एक अश्वेत महिला ने पूछा, इस टैक्स बढ़ोतरी से आप पर व्यक्तिगत रूप से क्या असर पड़ेगा. बुश ने जवाब दिया. महिला संतुष्ट नहीं हुईं उनके जार्गन से. उसने फिर सवाल पूछा. अब बुश ऑफेंसिव होने लगे. उनके भीतर का सिटिंग प्रेसिडेंट जाग गया. और यहीं पर क्लिंटन ने दखल दिया. वह स्टूल से उठे, महिला की तरफ बढ़े. और उसके सवालों को तारतम्यता देने लगे. वे उसके स्पोकपर्सन बन गए. और पांच मिनटों में वे उन तमाम अमेरिकियों के स्पोकपर्सन बन गए, जो नौकरी जाने से खफा थे. बुश हैरानी से भर गए. आगे की डिबेट में उनकी दिलचस्पी खत्म हो गई. उन्हें दरअसल क्लिंटन के अलावा एक और आदमी ने चरस बो रखी थी. जीरो से शुरूआत कर अरबपति बनने वाले कंप्यूटर प्रफेशनल पेरोट ने, जो निर्दलीय मुकाबले में दाखिल हुए थे. पेरोट को 20 फीसदी वोट मिले. इनसे सबसे बड़ा नुकसान बुश को पहुंचा. वह क्लिंटन के हाथों बुरी तरह चुनाव हारे.

Friday, October 7, 2016

यूपी में राहुल

राहुल गाँधी ने पिछले 40 दिन में प्रशांत किशोर की रणनीति के अनुसार उत्तर प्रदेश में जमकर मेहनत की है. कहते हैं क़ि नेता ज़मीन और जनता पर जाकर ही बनता है, शायद यही कोशिश राहुल गाँधी ने की. एक ऐसे प्रदेश में जहाँ एक नेता  और उसकी पार्टी बिल्कुल रसातल पर पहुँच गई है वहाँ पर किसी नेता की इतनी मेहनत कुछ तो उसके लिए नई उम्मीदें दिखाता है. लेकिन इतनी मेहनत के बाद भी असर पैदा न हो तो फिर मुश्किल है.
राहुल गांधी में दिलचस्पी इसलिए है कि लोकतंत्र में कभी भी विपक्ष कमज़ोर नहीं रहना चाहिए. इसी के साथ यह भी कहना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री मोदी को कमज़ोर विपक्ष का लाभ नहीं मिला है, बल्कि उन्होंने कई प्रकार के मज़बूत विपक्षों से लोहा लेते हुए अपनी जगह बनाई है. उन्होंने संसाधनों से लैस दस साल की सत्ताधारी कांग्रेस को हराया है. राहुल गांधी ने भी अपनी वापसी के लिए सुविधाजनक राज्य का चुनाव नहीं किया. वे चाहते तो कर्नाटक से अपनी वापसी का ज़ोर लगा सकते थे, उत्तराखंड या पंजाब या दिल्ली से लगा सकते थे, लेकिन राहुल ने उत्तर प्रदेश को चुना. जहां पहले की उनकी यात्राओं का कोई लाभ नहीं हुआ. जहां उनकी पार्टी सत्ताईस साल से शून्य की सी स्थिति में जीने की आदी हो चुकी है. ऐसी विपरीत परिस्थिति वाले जगह से कोई नेता अपनी और अपनी पार्टी की वापसी की यात्रा शुरू करे, तो मैं उसकी दाद देना चाहूंगा.
मेरे कई दोस्तों ने जो एनएसयूआई में हैं उन्होनें ये यात्रा कवर की. कुछ पत्रकारों की रिपोर्टों पढ़ी, कल रवीश कुमार की रिपोर्ट देखी जिसमें उनके जनता के बीच कनेक्शन को देखने का मौका मिला. राहुल गाँधी हर जगह जनता के बीच दो तीन मिनट ही बोल रहे थे, जिसमें हर बार लगभग वही भाषण क्योंकि जब रैली का स्वरूप और उद्देश्य वही है तो जाहिर सी बात है क़ि सब मुद्दे भी वही रहेंगे. राहुल गाँधी ने किसानों के एक मुद्दे को बहुत बेहतर तरीके से उठाया. बिजली बिल हाफ़ तो नहीं समझा लेकिन लोगों को कर्ज़ा माफी बहुत भाया. राहुल के भाषण में बिल्कुल भी युवा जोश नहीं दिखा वो कुछ थके थके से लग रहे थे. मीडिया से बात नहीं कर रहे थे. ऐसा तब है जब इस प्रोग्राम के मैनेजर प्रशांत किशोर हैं. बाकी नेता भी बस से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. कुछ पत्रकार कह रहे थे क़ि इस दौरान राहुल ने अपनी वीआई पी नेता की छवि को तोड़ने की कोशिश की है. 

Saturday, October 1, 2016

गांधी को देखने का द्रष्टिकोण

अक्सर मेरे दोस्त मुझे गाँधी जी और भगत सिंह दोनो के समर्थक होने पर आलोचनात्मक नज़रिए से देखते रहते हैं. असल में गाँधी जी को मैं एक मास लीडर के रूप में देखता हूँ, जो 1935 के बाद से आज तक पूरे विश्व में शीर्ष 10 नेताओं में शामिल हैं. जब मुझे आरएसएस के हिंदुत्व की विचारधारा को काउंटर करना होता है तो मैं हमेशा गाँधी के सर्वधर्म समभाग को सामने रखकर देखता हूँ, और जब हिंदू धर्म में फैली बुराइयों ख़ासकर वर्ण और जाति व्यवस्था का विरोध करना होता है तो मैं बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के सपनों के साथ खड़ा होता हूँ. और जब नियो लिबरल पॉलिसी के साथ गाँधी की सॉफ़टनेस को देखता हूँ तो मैं डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ खड़ा होता हूँ. और जब बात वीरता, प्रगतिशील विचारों, ग़रीबों, किसानों और मजदूरों के साथ खड़े होने की आती है तो हम भगत सिंह को आगे रखते हैं. मतलब इन सबको एक दूसरे के सामने खड़ा करने का कोई मतलब ही नहीं है. मैं पटेल और नेहरू को अपोजिट नहीं खड़ा करता हूँ ऐसा कम जानकारी वाले लोग ही करते हैं. नेहरू खुद 7 साल जेल में थे, और पूरे लोकतांत्रिक भविष्य के निर्माता थे, वो तो हिंदुत्ववादियों के पास कोई चेहरा नहीं है खुद का इसलिए दो मित्रों को एक दूसरे के सामने रख देते हैं. ठीक ऐसा वो लोग करते हैं गाँधी और भगत सिंह के साथ. ये सही है कि अगर गाँधी चाहते तो भगत सिंह को बचा सकते थे, लेकिन खुद भगत सिंह भी इस तरह के बचाव से पीछे हट चुके थे. उन्होंने जो असेंबली में बम फेका था उसकी खुद आलोचना कर रहे थे. अंतिम लेखों में खुद उन्होनें अपनी ग़लती मानी थी. वो समय ऐसा था जब भारत में गाँधी का उभार जोरो पर था, और अंग्रेज सरकार भी उनकी बात का वजन अंतराष्ट्रीय स्तर पर मानती थी. ऐसा था गाँधी जी की अपनी अहिंसावादी रणनीति की वजह से. पूरे विश्व में ब्रिटेन पर लोग थूक रहे थे, कि एक अहिंसक देश पर उन्होने कब्जा कर रखा है, गाँधी हर जगह जाकर ऐसा कहते थे कि हम हिंसा को बढ़ावा नहीं देते हैं. ऐसे में अगर गाँधी भगत सिंह को बचाने में मदद करते तो उनकी ये पॉलिसी कमजोर पड़ जाती अँग्रेज़ों के पास एक मुद्दा हो जाता उनके खिलाफ. इसलिए गाँधी ने भगत सिंह को नहीं बचाया. उनके नज़रिए से देखिए कि कोई अहिंसा का प्रतीक जो विश्व में जाना जाता था वो कैसे अपने उसूलों से हटकर हिंसा के लिए वकालत करता. हालाँकि लोगों का यह भी मानना है कि अगर भगतसिंह नहीं मरते तो नौजवानों में शायद आज़ादी के लिए इतना जोश नहीं आ पाता.  पहले तो उन्होने ऐसा करने से मना किया लेकिन जब उनके दादा जी अर्जुन सिंह ने गाँधी से अनुरोध किया तो गाँधी उन्हें बचाने को राज़ी हुए, लेकिन तब भगत सिंह खुद इससे मना कर चुके थे. गाँधी और भगत सिंह के विचार भी आपस में काफ़ी अलग थे. भगत सिंह कट्टर मार्क्सवादी थे. वो मार्क्स, लेनिन और माओत्से के विचारों से सहमत थे, जबकि ये सब हिंसात्मक कार्यवाही करने में सहमत थे. हालाँकि गाँधी भगत सिंह के नास्तिक होने  को छोड़कर कई विचारों से सहमत थे. जब हम भगत सिंह और गाँधी को भारत के तत्कालीन और वर्तमान के फ्रेम में देखते हैं, तो भगत सिंह को अपना हीरो मानते हैं. लेकिन गाँधी को कभी भी उनके विरोध में खड़ा करके नहीं देखते हैं, उनके कई विचारों से सहमत हैं तो कई में आलोचनात्मक चश्मा लगाकर देखते हैं. यही इतिहास को समझने का मेरा अपना बेहतर नज़रिया है.
जो लोग फोटो शॉप करके गाँधी पर ओछे आरोप लगाते हैं, उनको एक बात बताता हूँ वो उनकी किताब " माय एक्सपेरिमेंट विद ट्रूथ" पढ़ें. उसमें वो सत्य के साथ प्रयोग करते हुए बताते हैं कि गाँधी उनकी दो शिष्याओं मनु और आभा को छोटी बच्चियों के जैसे समझते थे, लेकिन कुछ लोग उनके चरित्र हनन पर लगे रहते थे. इसलिए गाँधी ने सत्य के साथ एक प्रयोग किया, वो रात को सोते थे, और दोनों शिष्याएँ (जो लगभत उस समय 20-25 साल की उम्र की थी) उनके साथ निर्वस्त्र सोते थे, फिर पूरी रात 4-5 लोग उन पर पहरा देते थे, चुपके से कि कहीं गाँधी अपने उसूलों से डोल जाएँ लेकिन सालों तक कभी ऐसा नहीं हुआ. क्या मज़ाल थी जो गाँधी का मन हिल जाए. कुछ कुतर्की लोग कह सकते हैं कि वो अधिक उम्र के होंगे या उस लायक नहीं होंगे तो उनको जानकारी दे दूं कि उस दौरान उनकी पत्नी से उनके बच्चे भी हुए थे. थोड़ा सा अजीब लग रहा था ये सब लिखने में लेकिन ये संसार का बहुत बड़ा सत्य है, बात ऐसे ही नहीं ख़त्म हो जाती है, एक बार सोंच कर देखिए क्या आज किसी में या आप (ख़ासकर पुरुष मित्रों) में इतना सत्य निभाने की दम है? मेरे पास कई उदाहरण थे इस किताब के लेकिन जानबूझ कर यही लिखा है, कि आप गाँधी को जाने कि ऐसे महान लोग पैदा नहीं होते बल्कि अवतरित होते हैं.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...