राहुल गाँधी ने पिछले 40 दिन में प्रशांत किशोर की रणनीति के अनुसार उत्तर प्रदेश में जमकर मेहनत की है. कहते हैं क़ि नेता ज़मीन और जनता पर जाकर ही बनता है, शायद यही कोशिश राहुल गाँधी ने की. एक ऐसे प्रदेश में जहाँ एक नेता और उसकी पार्टी बिल्कुल रसातल पर पहुँच गई है वहाँ पर किसी नेता की इतनी मेहनत कुछ तो उसके लिए नई उम्मीदें दिखाता है. लेकिन इतनी मेहनत के बाद भी असर पैदा न हो तो फिर मुश्किल है.
राहुल गांधी में दिलचस्पी इसलिए है कि लोकतंत्र में कभी भी विपक्ष कमज़ोर नहीं रहना चाहिए. इसी के साथ यह भी कहना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री मोदी को कमज़ोर विपक्ष का लाभ नहीं मिला है, बल्कि उन्होंने कई प्रकार के मज़बूत विपक्षों से लोहा लेते हुए अपनी जगह बनाई है. उन्होंने संसाधनों से लैस दस साल की सत्ताधारी कांग्रेस को हराया है. राहुल गांधी ने भी अपनी वापसी के लिए सुविधाजनक राज्य का चुनाव नहीं किया. वे चाहते तो कर्नाटक से अपनी वापसी का ज़ोर लगा सकते थे, उत्तराखंड या पंजाब या दिल्ली से लगा सकते थे, लेकिन राहुल ने उत्तर प्रदेश को चुना. जहां पहले की उनकी यात्राओं का कोई लाभ नहीं हुआ. जहां उनकी पार्टी सत्ताईस साल से शून्य की सी स्थिति में जीने की आदी हो चुकी है. ऐसी विपरीत परिस्थिति वाले जगह से कोई नेता अपनी और अपनी पार्टी की वापसी की यात्रा शुरू करे, तो मैं उसकी दाद देना चाहूंगा.
मेरे कई दोस्तों ने जो एनएसयूआई में हैं उन्होनें ये यात्रा कवर की. कुछ पत्रकारों की रिपोर्टों पढ़ी, कल रवीश कुमार की रिपोर्ट देखी जिसमें उनके जनता के बीच कनेक्शन को देखने का मौका मिला. राहुल गाँधी हर जगह जनता के बीच दो तीन मिनट ही बोल रहे थे, जिसमें हर बार लगभग वही भाषण क्योंकि जब रैली का स्वरूप और उद्देश्य वही है तो जाहिर सी बात है क़ि सब मुद्दे भी वही रहेंगे. राहुल गाँधी ने किसानों के एक मुद्दे को बहुत बेहतर तरीके से उठाया. बिजली बिल हाफ़ तो नहीं समझा लेकिन लोगों को कर्ज़ा माफी बहुत भाया. राहुल के भाषण में बिल्कुल भी युवा जोश नहीं दिखा वो कुछ थके थके से लग रहे थे. मीडिया से बात नहीं कर रहे थे. ऐसा तब है जब इस प्रोग्राम के मैनेजर प्रशांत किशोर हैं. बाकी नेता भी बस से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. कुछ पत्रकार कह रहे थे क़ि इस दौरान राहुल ने अपनी वीआई पी नेता की छवि को तोड़ने की कोशिश की है.
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