Saturday, October 15, 2016

युनिफ़ॉर्म सिविल कोड

जैसा क़ि मैने कल ही क्लियर कर दिया था क़ि कॉमन सिविल कोड और ट्रिपल तलाक़ दो अलग अलग मुद्दे हैं, इनको एक साथ नहीं देखना चाहिए. इसलिए मैने आज केवल कॉमन सिविल कोड पर लिखने को सोचा है. ट्रिपल तलाक़ पर कल अपनी राय रख चुका हूँ. सबसे पहले तो आपको यह बताना चाहता हूँ क़ि असल में ये कॉमन सिविल कोड है क्या? 
भारत के संविधान के आर्टिकल 44 में दिया हुआ है, भारत सरकार सबके लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का पूरा प्रयास करेगी. आर्टिकल 44 ‘डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पालिसी’ में आता है. मतलब इसको लागू करने के लिए आप कोर्ट में नहीं जा सकते. पर सरकार को धीरे-धीरे समय से लागू कर देना चाहिए.
अब ऐसा क्यों हैं कि सरकार लागू नहीं कर पा रही? और जब लॉ मिनिस्टर सदानंद गौड़ा ने लॉ कमीशन के पास ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ लागू करने से जुड़ी दिक्कतों के बारे में पूछा है तो बवाल क्यों मचा हुआ है?
सबसे बड़ी बात कि संविधान लागू हुआ था 1950 में तो फिर इतना वक़्त कैसे लग गया? इसके सीधे से कारण हैं धर्म की आड़ में छुपे राजनीतिक लोग. कुछ लोगों या ख़ासकर मुस्लिम धर्म गुरुओं का मानना है क़ि कॉमन सिविल कोड लागू होते ही मुस्लिमों को हिंदू जैसे ट्रीट किया जाएगा, उनका धर्म ख़तरे में आ जाएगा. तो मैं उनको बता देना चाहता हूँ क़ि ये बिल्कुल बकवास बात है. दुनिया के बहुत से मुल्कों में सिंघल सिविल सिस्टम है. अमेरिका में तो इस्लाम काफ़ी फल फूल रहा है. उसे कुछ नहीं होगा इस्लाम को. लेकिन लोगों को डरा कर उसे लागू नहीं करने दिया जा रहा है. यूनिफॉर्म सिविल कोड सीधा-सीधा जुड़ा है देश के हर नागरिक के अधिकारों से. नागरिक बोले तो हिन्दू, मुसलमान, सिख, ट्रांसजेंडर, गे, लेस्बियन सब. पर इसमें पेच है. धार्मिक पेच. हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन धर्म के लोग शादी-विवाह , तलाक, मां-बाप की जायदाद में हिस्सा के लिए कानून का सहारा ले सकते हैं. पर इस्लाम माननेवालों के लिए कानून थोड़ा सा अलग है. इससे हिन्दू-मुसलमान या किसी और धर्म को दिक्कत नहीं है. दिक्कत है तो सिर्फ औरतों को. इस्लाम में औरतों की शादी, तलाक और फिर शादी को लेकर बड़े पुराने किस्म के कानून हैं. वैसे कानून को आज के ज़माने में लागू करना औरतों की तौहीन है. हुआ क्या था कि पहले हिंदुस्तान में कोई लिखित कानून नहीं था. सब बड़े-बुजुर्गों से पूछकर चलता था. तभी ये सारी चीजें आ गयीं थीं कि ‘गोत्र’ में शादी नहीं करनी है. अपने गांव में शादी नहीं करनी है. इत्यादि-इत्यादि. मुस्लिम समाज में अपने कुछ अलग उसूल थे. सब चल रहां था. पर सबमें एक बात कॉमन थी: औरतों को कोई अधिकार नहीं था. कन्यादान हुआ, बात ख़त्म. तलाक नहीं होगा. जिस घर में बियाह  के गईं, अब वहां से अर्थी निकलेगी. अगर जिन्दगी नरक हो गई तो भगवान का दिया मान के निभा जाओ.
फिर आये अंग्रेज. उनको कानूनों से बड़ा प्यार था. हर चीज का सिस्टम लगाया. फिर हिन्दू-मुस्लमान के शादी-विवाह के कानूनों की भी स्टडी करने लगे. बड़ा ही जटिल था. हर एक किलोमीटर पर कानून ही बदल जाता था. ‘हमारे यहां ऐसे नहीं, ऐसे शादी होती है. बेटी ससुराल गई अब मायके से कोई रिश्ता नहीं. बस तीज-त्यौहार जायेगा’. अब अंग्रेजों को ये समझ ना आये. भाई ये क्या बात है? बेटी को हिस्सा नहीं दोगे प्रॉपर्टी में से? 
तब तक एक गड़बड़ हो गई. 1857 की क्रांति. वजह हुई कि सैनिकों के बैरक में एक अफवाह फैल गई. कि हिन्दुओं का धर्म भ्रष्ट करने के लिए कारतूस में गाय की चर्बी और मुसलमानों का धर्म भ्रष्ट करने के लिए सूअर की चर्बी मिलाई गई है. अंग्रेजों को समझ में आ गया कि कुछ भी करो यहां, इस मामले में दखल मत दो. फिर उन्होंने इसी हिसाब से सबको उनके अपने ही तरीके से रहने दिया. पर ये करने लगे कि जो कानून जुबानी चलते थे उनको लिखना शुरू कर दिया.
फिर कुछ-कुछ कानून तो उन्होंने जबरदस्ती पास करा लिए थे. जैसे सती-प्रथा को ख़त्म करना, विधवा-विवाह. धीरे-धीरे शादी के लिए लड़का-लड़की की उम्र भी तय कर दी. बाल-विवाह के सख्त खिलाफ थे अंग्रेज. वही लोग 1929 में शारदा एक्ट लाये विवाह की मिनिमम उम्र के लिए. वहीं मुहम्मद अली जिन्ना की मांग पर मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अप्लिकेशन आक्ट, 1937 पास कर दिया गया. ये कानून ‘शरीयत’ के हिसाब हैं. तब से मुस्लिम समाज में शादी-विवाह और तलाक सम्बन्धी केस इसी के अंडर आते हैं. इसमें अंग्रेज एक जगह चूक गए उनको लगा क़ि पूरे देश के हिंदू और मुस्लिम एक जैसे होंगे, तो उन्होने एक जैसा क़ानून लागू कर दिया, लेकिन ये बहुत बड़ी भूल थी. उन्होने मुस्लिम लॉ को क़ुरान नहीं हनफी क़ानून से लिया था, फिर विलियम जोन्स ने अरबी से उसका अनुवाद पारसी में कराया फिर इंग्लिश में, जिससे बहुत सी ग़लतियाँ रह गईं. आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरु और भीमराव अम्बेडकर ने 1956 में ‘हिन्दू धर्म’ के पंडों के ‘शास्त्र-सम्मत विधियों’ की ऐसी-तैसी करते हुए तलाक, एलिमोनी यानी तलाक के बाद का भत्ता, पिताजी की संपत्ति में बेटे-बेटियों को बराबर हिस्सा और बच्चा गोद लेने की सुविधा हर चीज के लिए हिन्दू कोड बिल लेकर आये. उस समय देश आज़ादी के वक़्त हुए क़त्ल-ए-आम से गुजरा था. इसके चलते बाकी धर्मों के लिए कानून नहीं लाए गए. कहा गया कि वक़्त आएगा तो फिर सब हो जायेगा. पर तत्काल सहूलियत के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 लाया गया. अगर कोई अपने धर्म की रीति-रिवाजों से शादी नहीं करना चाहता तो इस एक्ट के अंतर्गत शादी कर सकता था. पर ‘धर्म के माफिया’ इस एक्ट को ‘अधर्मी’ बताते रहते हैं. सब ठीक हो जाने वाला वक़्त आया नहीं. वक़्त तो लाना पड़ता है. चीन से, पाकिस्तान से लड़ाई, सूखा, इमरजेंसी, गिरती-पड़ती सरकारें, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या. सब कुछ रुक सा गया था. फिर एक दौर आया. राजीव गांधी भारत के इतिहास के सबसे बड़े जनादेश के साथ प्रधानमंत्री बने.
उसी समय एक घटना हुई. 1986 में एक 73 साल की बूढ़ी औरत शाह बानो कोर्ट पहुंची. उसके पति ने ‘तीन बार’ तलाक कहकर उसको तलाक दे दिया था! बरसों पहले हुई शादी में ‘मेहर’ की रकम तय की थी पति ने. वो उसने वापस कर दी शाह बानो को. पर वो रकम 50-60 साल बाद पेट भरने लायक तो नहीं थी.मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार: ‘इद्दत’ के मुताबिक शाह बानो को सिर्फ तीन महीने के लिए भत्ता मिलना चाहिए’.
CरPC की धारा 125, जो सारे भारतीयों पर लागू है, के अनुसार: मेंटेनेंस हमेशा देना पड़ेगा. मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया. 5 जजों की बेंच ने कड़े शब्दों में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को फटकार लगाई और कहा कि देश के कानून का पालन करना पड़ेगा. भत्ता तो देना पड़ेगा. साथ ही ये भी कह दिया कि यूनिफॉर्म सिविल कोड जल्दी लागू किया जाये. 1984 के दंगों के बाद देश अभी संभल रहा था. अब सिविल कोड को लेकर बवाल कट गया. कहा जाने लगा कि सरकार और कोर्ट सब मिलकर देश के ‘माइनॉरिटीज’ पर हिन्दू कानून लागू करना चाहते हैं. माइनॉरिटीज की अपनी पहचान ही ख़त्म करना चाहते हैं. राजीव गांधी के एक मंत्री ने आत्मदाह करने की धमकी दी. राजीव प्रेशर में आ गए. उनके पास पार्लियामेंट में बहुत बड़ा बहुमत था. चाहते तो क्या नहीं कर सकते थे. एक मंत्री की धमकी और लाखों-करोड़ों औरतों का हक़. पर उन्होंने चुना सेफ रास्ता. तुरंत मुस्लिम विमन’स (प्रोटेक्षन ऑफ राइट्स ओं डाइवोर्स) आक्ट 1986 पास किया गया. एक्ट ने कहा कि CरPC की ‘धारा 125’ मुस्लिम औरतों पर लागू नहीं होगी. इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में ही याचिका दायर की गई. कहा गया कि नया कानून संविधान के आर्टिकल 14, 15 और 21 को तोड़ता है. सही में तोड़ता है. इन आर्टिकल्स में ‘सबको एक सामान अधिकार’ और ‘जीने का हक़’ जैसे चीजें कही गई हैं. सुप्रीम कोर्ट पार्लियामेंट के फैसले को बदल तो नहीं सकता था. इसलिए बीच का रास्ता निकाला गया. कहा गया कि ऐसा नहीं है कि ये संविधान के खिलाफ है. तीन महीनों में इतना पैसा मिल जाएगा कि काम चलता रहेगा. यहां से भारत की राजनीति बदल गई. 1956 में कांग्रेस की सरकार ‘हिन्दू कोड बिल’ लाई थी. लेफ्ट सहित कई सारे दलों ने इसका समर्थन किया था. पर जनसंघ और आरएसएस ने इसका भयानक विरोध किया था. 1986 के ‘शाह बानो’ मुद्दे के बाद मामला उलट गया. जनसंघ से चलकर बनी पार्टी बीजेपी ने अपने राजनीति तीन मुद्दों पर डिक्लेयर की: 1. राम जन्मभूमि 2. धारा 370 3. यूनिफॉर्म सिविल कोड.
बीजेपी ने हिंदुत्व का मुद्दा उठाते हुए यूनिफॉर्म सिविल कोड को ‘मुसलमान तुष्टिकरण’ के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू किया. और आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस और लेफ्ट ने यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करना शुरू कर दिया! पिछले 25 सालों से यही चल रहा है. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने भी ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ का राग अलापा था पर किया कुछ नहीं. 2014 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने क्लियर किया था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड उनके मुद्दे में है. 2015 में लॉ मिनिस्टर सदानंद गौड़ा ने कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने में दिक्कतें तो हैं पर धीरे-धीरे देखेंगे. 2016 में उन्होंने पहला कदम उठा लिया है. अभी उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं. कहा जा रहा है कि बीजेपी की सरकार ने ‘चुनावी फायदा’ उठाने के लिए अभी यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात कही है. जो भी हो, यूनिफॉर्म सिविल कोड किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है. 
अब सवाल उठता है सरकार की मंशा पर. चलो मान लेते हैं कि औरतों के हक़ में आपकी आवाज उठी है. आप कुछ करना चाह रहे हैं. पर ट्रांसजेंडर, गे, लेस्बियन लोगों का क्या? क्या उनके लिए फिर से कोई राजनीतिक पार्टी बनानी पड़ेगी? जब आप कानून बना ही रहे हैं तो फिर ये क्यों नहीं बोलते कि इस बार सबका ख्याल रखा जायेगा? यूएन की मीटिंग में लगबत के मुद्दे पर आपने वोट क्यों नहीं किया? यूनिफॉर्म सिविल कोड ‘पूरी जनता’ के लिए है. जब तक आप सबके हकों की बात नहीं करेंगे हमें यकीन नहीं आएगा. और तब तक आपको भी अपने कानून पर यकीन नहीं करना चाहिए.
मुझे अभी भी ये राजनीतिक मुद्दा क्यों लगता है, इसके कई कारण हैं. क्या कॉमन सिविल कोड से पूरे देश पर मुसलमानों को छोड़ भी दिया जाए तो एक क़ानून  लागू किया जा सकता है? संविधान के अनुच्छेद 14 में जो समानता का अधिकार है उसमें कहा गया है क़ि जो लोग आसमान हैं उनपर ये क़ानून लागू नहीं होगा तो टेक्निकली इसमें भी दिक्कत आएगी.
आईपीसी, सीपीसी, सीआरपीसी, Transfer of Property Act, Indian Contract Act, Sale of Goods, एक है, तो 90% सिविल मैटर्स में तो एक ही क़ानून लागू होते हैं. मतलब पहले से ही सिविल कोड है.   अब बात रह जाती है केवल उनके निजी जिंदगी से जुडे पर्सनल लॉ हैं वो अलग है, वो ऐसे राजनीतिक माहौल में एक साथ सुधर सकते हैं मुझे नहीं लगता। 
युनिफ़ॉर्म सिविल कोड मौलिक अधिकारों का हिस्सा बने या नीति निदेशक तत्वो का इसमें 5-4 के बहुत कम मार्जिन से फ़ैसला हो पाया था. इसके अध्यक्ष बल्लभ भाई पटेल थे. संविधान सभा में जब बहस हुई तो डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था क़ि धर्म को निजी मामला रखो. किसी भी धर्म की प्रैक्टिस खुले तौर पर नहीं की जा सकती है. जिसको भी पूजा और नमाज़ पढ़नी है वो अपने घर मे करे सड़क पर आकर कोई जुलूस पोस्टर या कुछ नहीं होगा. लेकिन पटेल नहीं माने और कहा क़ि धर्म सामाजिक सच्चाई है इसलिए इसे सामाजिक रखना पड़ेगा. खैर ये एक अलग मुद्दा हो जाएगा फिर. 
अब अगर हिंदू कोड बिल की ही बात करें तो पता चलता है क़ि राजेंद्र प्रसाद जी खुद उसके खिलाफ क्यों हो गए? क्यों उस बिल के 3 टुकड़े करने पड़े? हिंदू कस्टम्स का अभी भी इसमे बहुत मुस्किल है. सरकार के पास ब्लू प्रिंट क्या है? हिंदू कोड बिल मिताक्षरा कानून के मुताबिक बना है तो इसको पूरा देश कैसे मानेगा? महाराष्ट्र और साउथ के ब्राह्मण ही नहीं मानते हैं। पूरे देश में हिन्दू एक जैसे नहीं होते हैं. मैरिज एक्ट्स में धर्म नहीं जितना मेरी रिसर्च में सामने आया वो केवल राज्यों के हिसाब से है. गोवा में रहने वाले हिंदू पर भी Hindu Marriage Act नहीं स्पेशल मैरिज एक्ट लागू होता है, पांडिचेरी में तो फ्रेंच law लागू होता है.  आदिवासी समाज में कुछ अलग है। मैं हिंदुओं में भी कितनों को जनता हूँ जो सगे मामा या किसी संबंधी से शादी कर रहे हैं, जबकि हिंदू मैरिज एक्ट कहता है क़ि लड़का और लड़की अपने पिता की तरफ से 7 और माँ की तरफ से 5 पीढ़ियों तक एक दूसरे के संबंधों में शामिल ना हों.  मुसलमानों में भी बहुत विभिन्नता है कशमीर, यूपी या हैदराबाद में। वोहरा अलग होते हैं, ख्वाजा और मेमन होते हैं जो अभी तक भगवान विष्णु के 10वें अवतार को मानते हैं.  जाहिर सी बात है कि वे शादी या तलाक भी हिंदू कोड बिल के आधार पर करते हैं। इसीलिए बार बार कह रहा हूँ कि दो विषय मिल  गए तो टफ हो सकता है। यह भी तय नहीं है कि वैकल्पिक कानून क्या होगा? अभी भी बहुत से मूसलमानो पर पुराना अनरिफ़ॉर्म हिंदू लॉ से चल रहे हैं. सिख और जैन अलग हैं. प्रकाश सिंह बादल के बारे में आज पता चला कि वे संविधान के अनुच्छेद 25 को जलाते रहे हैं क्योंकि उसमें हिंदू की परिभाषा में सिखों को भी जोड़ा जाता है. जैन समाज अलग से अल्पसंख्यक हो गया तो अब हिंदू क़ानून उसपर कैसे लगाए जाते हैं? और ये लोग हिंदू लॉ मानते हैं कस्टम्स की वजह से. पंजाब में एक कस्टम है करेवा की. जिसमें किसी औरत का पति मर जाता है तो जो आदमी उस औरत पर चादर डाळ देता है, उसे चूड़ी पहना देता है उससे उसकी शादी हो जाती है, बिना किसी शादी किए. इसपर एक फिल्म भी आई थी, "एक चादर मैली सी" शायद से नाम था.  यह किया जाता है क्योंकि उसमें जो प्रॉपर्टी का हिस्सा है वो दूसरे को ना चला जाए.  मतलब अभी भी काॅमन सिविल कोड पर बहुत ज्यादा रिसर्च की जरूरत है सरकार को भी। 
इसलिये सबसे खतरनाक तीन तलाक पर ही शुरू करते हैं, बाकी बातें बाद में। दरअसल हम लोग काॅमन सिविल कोड और तीन तलाक को मिसमैच कर रहे हैं? ये माइंडगेम है कुछ मौलानाओं का कि बहस बदलकर पूरे मुसलमानों को एक कर दिया जाए तो औरतें अपनी बराबरी की बात नहीं करेंगी, तब उनकी लडाई हिंदू या बीजेपी के नाम पर हो जाती है। उन्हें ऐसा करने से हमें रोकना होगा, क्योंकि ये लडाई अंत तक जा चुकी है अब छूट गया तो शुरुआत फिर से करनी पडेगी।

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