Saturday, October 1, 2016

गांधी को देखने का द्रष्टिकोण

अक्सर मेरे दोस्त मुझे गाँधी जी और भगत सिंह दोनो के समर्थक होने पर आलोचनात्मक नज़रिए से देखते रहते हैं. असल में गाँधी जी को मैं एक मास लीडर के रूप में देखता हूँ, जो 1935 के बाद से आज तक पूरे विश्व में शीर्ष 10 नेताओं में शामिल हैं. जब मुझे आरएसएस के हिंदुत्व की विचारधारा को काउंटर करना होता है तो मैं हमेशा गाँधी के सर्वधर्म समभाग को सामने रखकर देखता हूँ, और जब हिंदू धर्म में फैली बुराइयों ख़ासकर वर्ण और जाति व्यवस्था का विरोध करना होता है तो मैं बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के सपनों के साथ खड़ा होता हूँ. और जब नियो लिबरल पॉलिसी के साथ गाँधी की सॉफ़टनेस को देखता हूँ तो मैं डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ खड़ा होता हूँ. और जब बात वीरता, प्रगतिशील विचारों, ग़रीबों, किसानों और मजदूरों के साथ खड़े होने की आती है तो हम भगत सिंह को आगे रखते हैं. मतलब इन सबको एक दूसरे के सामने खड़ा करने का कोई मतलब ही नहीं है. मैं पटेल और नेहरू को अपोजिट नहीं खड़ा करता हूँ ऐसा कम जानकारी वाले लोग ही करते हैं. नेहरू खुद 7 साल जेल में थे, और पूरे लोकतांत्रिक भविष्य के निर्माता थे, वो तो हिंदुत्ववादियों के पास कोई चेहरा नहीं है खुद का इसलिए दो मित्रों को एक दूसरे के सामने रख देते हैं. ठीक ऐसा वो लोग करते हैं गाँधी और भगत सिंह के साथ. ये सही है कि अगर गाँधी चाहते तो भगत सिंह को बचा सकते थे, लेकिन खुद भगत सिंह भी इस तरह के बचाव से पीछे हट चुके थे. उन्होंने जो असेंबली में बम फेका था उसकी खुद आलोचना कर रहे थे. अंतिम लेखों में खुद उन्होनें अपनी ग़लती मानी थी. वो समय ऐसा था जब भारत में गाँधी का उभार जोरो पर था, और अंग्रेज सरकार भी उनकी बात का वजन अंतराष्ट्रीय स्तर पर मानती थी. ऐसा था गाँधी जी की अपनी अहिंसावादी रणनीति की वजह से. पूरे विश्व में ब्रिटेन पर लोग थूक रहे थे, कि एक अहिंसक देश पर उन्होने कब्जा कर रखा है, गाँधी हर जगह जाकर ऐसा कहते थे कि हम हिंसा को बढ़ावा नहीं देते हैं. ऐसे में अगर गाँधी भगत सिंह को बचाने में मदद करते तो उनकी ये पॉलिसी कमजोर पड़ जाती अँग्रेज़ों के पास एक मुद्दा हो जाता उनके खिलाफ. इसलिए गाँधी ने भगत सिंह को नहीं बचाया. उनके नज़रिए से देखिए कि कोई अहिंसा का प्रतीक जो विश्व में जाना जाता था वो कैसे अपने उसूलों से हटकर हिंसा के लिए वकालत करता. हालाँकि लोगों का यह भी मानना है कि अगर भगतसिंह नहीं मरते तो नौजवानों में शायद आज़ादी के लिए इतना जोश नहीं आ पाता.  पहले तो उन्होने ऐसा करने से मना किया लेकिन जब उनके दादा जी अर्जुन सिंह ने गाँधी से अनुरोध किया तो गाँधी उन्हें बचाने को राज़ी हुए, लेकिन तब भगत सिंह खुद इससे मना कर चुके थे. गाँधी और भगत सिंह के विचार भी आपस में काफ़ी अलग थे. भगत सिंह कट्टर मार्क्सवादी थे. वो मार्क्स, लेनिन और माओत्से के विचारों से सहमत थे, जबकि ये सब हिंसात्मक कार्यवाही करने में सहमत थे. हालाँकि गाँधी भगत सिंह के नास्तिक होने  को छोड़कर कई विचारों से सहमत थे. जब हम भगत सिंह और गाँधी को भारत के तत्कालीन और वर्तमान के फ्रेम में देखते हैं, तो भगत सिंह को अपना हीरो मानते हैं. लेकिन गाँधी को कभी भी उनके विरोध में खड़ा करके नहीं देखते हैं, उनके कई विचारों से सहमत हैं तो कई में आलोचनात्मक चश्मा लगाकर देखते हैं. यही इतिहास को समझने का मेरा अपना बेहतर नज़रिया है.
जो लोग फोटो शॉप करके गाँधी पर ओछे आरोप लगाते हैं, उनको एक बात बताता हूँ वो उनकी किताब " माय एक्सपेरिमेंट विद ट्रूथ" पढ़ें. उसमें वो सत्य के साथ प्रयोग करते हुए बताते हैं कि गाँधी उनकी दो शिष्याओं मनु और आभा को छोटी बच्चियों के जैसे समझते थे, लेकिन कुछ लोग उनके चरित्र हनन पर लगे रहते थे. इसलिए गाँधी ने सत्य के साथ एक प्रयोग किया, वो रात को सोते थे, और दोनों शिष्याएँ (जो लगभत उस समय 20-25 साल की उम्र की थी) उनके साथ निर्वस्त्र सोते थे, फिर पूरी रात 4-5 लोग उन पर पहरा देते थे, चुपके से कि कहीं गाँधी अपने उसूलों से डोल जाएँ लेकिन सालों तक कभी ऐसा नहीं हुआ. क्या मज़ाल थी जो गाँधी का मन हिल जाए. कुछ कुतर्की लोग कह सकते हैं कि वो अधिक उम्र के होंगे या उस लायक नहीं होंगे तो उनको जानकारी दे दूं कि उस दौरान उनकी पत्नी से उनके बच्चे भी हुए थे. थोड़ा सा अजीब लग रहा था ये सब लिखने में लेकिन ये संसार का बहुत बड़ा सत्य है, बात ऐसे ही नहीं ख़त्म हो जाती है, एक बार सोंच कर देखिए क्या आज किसी में या आप (ख़ासकर पुरुष मित्रों) में इतना सत्य निभाने की दम है? मेरे पास कई उदाहरण थे इस किताब के लेकिन जानबूझ कर यही लिखा है, कि आप गाँधी को जाने कि ऐसे महान लोग पैदा नहीं होते बल्कि अवतरित होते हैं.

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