दशहरा को मोदी जी ने लखनऊ से कॉमन सिविल कोड पर बहुत अच्छे से बात की. वो इस बार एक माइंड गेम खेलने के चक्कर में दिख रहे हैं, मतलब मुस्लिम उलेमाओं और धर्म गुरुओं के सामने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लाकर खड़ा किया है, जिससे सब बौखला से गए हैं, आज उलेमा कौंसिल वाले लोग मुंबई यूनिवर्सिटी में लॉ स्टूडेंट्स कमेटी के साइन लेने आए थे, मैं तो हूँ नहीं उस कमेटी में लेकिन कमेटी ने साइन करने से मना कर दिया. एक जगह शहज़ाद पूनावाला को कहते सुना क़ि कॉमन सिविल कोड नहीं लगा सकते हैं, ट्रिपल तलाक़ हमारा घर का मुद्दा है बाहर से हस्तक्षेप मत करो. अरे भाई यही तो हाजी अली दरगाह में प्रवेश के समय कह रहे थे, आज भी यही कह रहे हैं, बात नहीं समझ में आती है क़ि महिलाओं के अधिकारों से इस्लाम कैसे ख़तरे में आ जाता है? जब कोई सच में इस्लाम पर ग़लत नज़र उठाता है तो हम जैसे लोग बीच में खड़े होकर उन लोगों से लड़ते हैं. तो फिर महिलाओं को अधिकार देने में क्यों डरते हैं ये लोग? शायद सबकी दुकाने बंद होने का डर नज़र आ रहा है. कोई भी सामाजिक बुराई किसी एक धर्म या समाज या किसी घर के अंदर की नहीं होती है, हम वैसे ही सवाल पूछेंगे और महिलाओं को अधिकार दिलाने के लिए बात करेंगे जैसे दहेज और हिंदू समाज की अन्य कमियों पर बोलते हैं. रही बात अन्य समानता की तो जाने कब से हम कहते रहे हैं क़ि इनकम टैक्स में धर्म के आधार पर अनडिवाइडेड फैमिली नही होनी चाहिए. उसमें मुस्लिम या क्रिस्चियंस को भी अधिकार होना चाहिए जैसे हिंदुओं को HUF का क़ानून के लाभ प्राप्त है. वैसे ये तर्क तो इस समय जैन समुदाय में भी सुनने को मिल रहे हैं. हैदराबाद की 13 साल की अराधना जैन परंपरा के अनुसार 68 दिनों का उपवास करती है. इसके नतीजे में वो इतनी कमज़ोर हो जाती है कि मौत हो जाती है. पुलिस इस मामले की जांच कर रही है कि कहीं मां बाप ने उकसाया तो नहीं. इसकी काफी आलोचना हो रही है. जैन समाज के संतों का कहना है कि उनकी परंपराओं के आगे लोग न आएं. लोग उनके समुदाय को बदनाम कर रहे हैं. यानी जैन संत मोक्ष प्राप्ति की दिशा में उपवास का समर्थन कर रहे हैं. अपनी धार्मिक परंपरा का बचाव कर रहे हैं. क्या सरकार इन परंपराओं पर रोक लगाने के बारे में विचार कर सकती है या 13 साल की लड़की 68 दिन का उपवास न करे इसे लेकर कोई कानून बना सकती है. संथारा पर रोक लगाने का मामला अभी भी अदालत में लंबित है. दूसरी तरफ मोदी जी से भी मेरा सवाल है क़ि आप धर्म के आधार पर असमानता तो दूर कर रहे हैं, मुस्लिम औरत या मर्द के बीच की. आप कहते हैं क़ि 21वीं सदी में हम धर्म के आधार पर क़ानून रखकर कैसे समाज को बाँट सकते हैं. फिर आप ये किसी धर्म को ध्यान में रखकर बीफ पर क़ानून बनाकर देश को कौन सी सदी या धर्म की सियासत से दूर कर रहे हैं? जब पुराने धार्मिक क़ानून ख़त्म कर रहे हैं तो नए बाहियात क़ानून क्यों बना रहे हैं?
मैं मुद्दे को ना भटकाते हुए फिर से ट्रिपल तलाक़ पर हुई बहस की शुरुआत में जाना चाहता हूँ. उत्तराखंड के काशीपुर की शायरा बानो. फरवरी 2016 में एक जनहित याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई कि तीन तलाक की प्रथा समाप्त हो. बल्कि इसके साथ साथ हलाला और बहुविवाह भी समाप्त हो जाए. शायरा बानो के साथ साथ जयपुर की आफ़रीन रहमान, हावड़ा की इशरत जहां भी महिलाओं के अधिकार को लेकर मैदान में आ गईं. सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी मामलों को एक साथ सुनना शुरू कर दिया. फरवरी से अक्टूबर तक आते आते इस मामले में पक्ष विपक्ष से कई पैरोकार जुड़ गए हैं. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन भी इस मामले में पक्षकार बन गया. आंदोलन ने 50000 मुस्लिम महिला और पुरुषों के दस्तख़त जुटाए. तीन तलाक की समाप्ति की याचिका पर सुनवाई जैसे जैसे आगे बढ़ी है वैसे वैसे इसे लेकर सार्वजनिक स्पेस में बहस भी बढ़ने लगी है.
जिस तरह से तमाम मुस्लिम संगठनों ने तीन तलाक के हक़ में सक्रियता दिखाई है, उससे लगता है कि मुस्लिम समाज की कोई बेचैनी बाहर आ रही है. समान आचार संहिता अलग मसला है लेकिन इसके सहारे तीन तलाक का समर्थन करना क्या वक्त की मांग को अनदेखा करना है या वाकई उनका इस बात में यकीन है कि तीन तलाक महिलाओं के लिए बेहतर व्यवस्था है. तमाम संस्थाओं, शहरों से लेकर लेकर तमाम दफ्तरों को महिलाओं के हिसाब से कानून बदलने पड़ रहे हैं. क्या मुस्लिम संगठन सिर्फ इस आधार पर इस आवाज़ को अनसुना कर सकते हैं कि तीन तलाक के ख़िलाफ़ तीन चार महिलाएं ही मैदान में हैं. दिल्ली में 13 अक्टूबर को दस मुस्लिम संगठनों के साथ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की प्रेस कांफ्रेंस हुई. कहा गया कि सभी प्रमुख मुस्लिम संगठन लॉ कमीशन की उस प्रश्नावली को खारिज करते हैं. लॉ कमिशन ने समान संहिता लागू करने की दिशा में अपनी वेबसाइट पर लोगों से कुछ सवाल पूछे हैं. सारे सवाल हां या ना में पूछे गए हैं और कारण बताने के लिए कुछ जगह भी छोड़ी गई है. भारत सरकार ने कहा है कि तीन तलाक की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने हलफनामे में कहा है कि तीन तलाक होना चाहिए.
अब मेरे इस विषय में 2-3 सवाल हैं, जो शायद कोई मुझे इस्लामिक रिसर्च स्कॉलर के मिलने पर ही पता चल पाएगा.
1. क्या तलाक़ पर फ़ैसला करने वाली काजी अदालतों की कोई क़ानूनी हैसियत है? मैने तो अपने गाँव से देखा है क़ि ये अदालतें हमेशा ही पुरुषों के पक्ष में ही फ़ैसले देती हैं, जिसका पॉलिटिकल, सामाजिक आधार बड़ा है उसी को फ़ैसला देते हैं. महिलाओं को बहुत बुरी तरह से फँस कर रहना पड़ता है इसमे.
2. दिक्कत यह है कि हम जिस मसले पर बहस कर रहे हैं, उससे संबंधित ठीक आंकड़े नहीं हैं. जैसे हम नहीं जानते कि कितने पुरुष तीन तलाक का इस्तमाल करते हैं या कितनी महिलाएं तलाक़ के अपने अधिकारों का इस्तमाल करती हैं?
- फ़स्ख़ ए निकाह के तहत जब बीबी तलाक चाहती है और मियां नहीं देता है तो शादी ख़त्म कर दी जाती है. ऐसा कई लोग कहते हैं लेकिन मैने शीबा असलम फ़हमी से सुना क़ि अगर शौहर तलाक़ नामे को नामंज़ूर कर देता है तो तलाक़ नहीं होगा क्योंकि औरतों की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहती है अक्सर? कितने बेवकूफी से कारण बताते हैं ये लोग?
- तफ़़वीज़ ए तलाक़ के तहत बीबी को तलाक़ का हक़ दे दिया जाता है.
- क्या इन परंपराओं का इस्तमाल होता है?
क्या क़ुरआन में लिखा है कि तीन तलाक़ होना चाहिए. अगर नहीं लिखा है तो फिर इसका बचाव किसके लिए किया जा रहा है. क्या मुस्लिम संगठन दावा कर सकते हैं कि तीन तलाक से महिलाओं को नुकसान नहीं है. क्या मुस्लिम संगठनों की यह नाकामी नहीं है कि काशीपुर, जयपुर और हावड़ा की औरतों को सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा. अगर इसमें अच्छाई है तो वो बताया जाना चाहिए. 33 देशों में तीन तलाक बंद है. इनमें से 22 इस्लामिक मुल्क हैं. 2005 में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने मॉडल निकाहनामा बनाया था जिसके अंदर कहा गया था कि तीन की जगह एक ही तलाक काफी है. उसके बाद 90 दिनों का वक्त मिलेगा जिस दौरान तलाक देने वाला सोच सकता है, परिवार में लोग सुलह का प्रयास कर सकते हैं, तीन महीने बाद इसे वापस भी लिया जा सकता है. 15 साल बाद फिर से यह सवाल उठा है इसका मतलब यह है कि औरतों की आवाज़ को सुकून नहीं मिला है. मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तर्क बेहद हास्यास्पद है. एक तर्क यह है कि 'पुरुषों में बेहतर निर्णय क्षमता होती है, वह भावनाओं पर क़ाबू रख सकते हैं. पुरुष को तलाक़ का अधिकार देना एक प्रकार से परोक्ष रूप में महिला को सुरक्षा प्रदान करना है. पुरुष शक्तिशाली होता है और महिला निर्बल. पुरुष महिला पर निर्भर नहीं है, लेकिन अपनी रक्षा के लिए पुरुष पर निर्भर है.' बोर्ड का एक और तर्क देखिए. बोर्ड का कहना है कि महिला को मार डालने से अच्छा है कि उसे तलाक़ दे दो. मुसलिम पर्सनल बोर्ड किस हद तक पुरुष श्रेष्ठतावादी, पुरुष वर्चस्ववादी है और केवल पुरुष सत्तात्मक समाज की अवधारणा में ही विश्वास रखनेवाला है और वह महिलाओं को किस हद तक हेय, बुद्धि और विचार से हीन और अशक्त मानता है और उन्हें सदा ऐसा ही बनाये भी रखना चाहता है. बहुविवाह के मामले पर भी मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तर्क अजीब हैं. उसका कहना है कि 'बहुविवाह एक सामाजिक ज़रूरत है और महिलाओं के लिए वरदान है क्योंकि अवैध रखैल बने रहने के बजाय उन्हें वैध पत्नी का दर्जा मिल जाता है.' हलफ़नामे में कहा गया है कि पुरुषों की मृत्यु दर ज़्यादा होती है क्योंकि दुर्घटना आदि में उनके मरने की सम्भावनाएँ ज़्यादा होती हैं. इसलिए समाज में महिलाओं की संख्या बढ़ जाती है और ऐसे में बहुविवाह न करने देने से महिलाएँ बिन ब्याही रह जायेंगी.' बोर्ड का कहना है कि 'बहुविवाह से यौन शुचिता बनी रहती है और इतिहास बताता है कि जहाँ बहुविवाह पर रोक रही है, वहाँ अवैध यौन सम्बन्ध सामने आने लगते हैं.' अजीब तर्क हैं. अजीब सोच है. पता नहीं किन शोधों के जरिये बोर्ड इन बेहद बचकाना निष्कर्षोँ पर पहुँचा है! साफ़ है कि मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड उन सुधारों को भी लागू नहीं करना चाहता, जिन्हें बहुत-से मुसलिम देश बरसों पहले अपना चुके हैं. इतने बरसों में इन सुधारों का अगर कोई विपरीत प्रभाव इनमें से किसी देश में नहीं दिखा, तो फिर उनके अनुभवों से लाभ उठा कर उन्हें क्यों नहीं अपनाना चाहिए? हैरानी है कि ख़ुद मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के भीतर एक बड़ा वर्ग तीन तलाक़ को ख़ारिज किये जाने के पक्ष में है. पिछले साल बोर्ड के सम्मेलन के पहले ऐसी चर्चा चली भी थी कि तीन तलाक़ को इस सम्मेलन में ख़ारिज कर दिया जायेगा. लेकिन फिर जाने किस दबाव में मामला टल गया.
अभी 3-4 महीने पहले मेरे एक मारवाड़ी मुस्लिम मित्र ने अपनी बीबी को छोड़ दिया, मुझे बताया तो उसने अपने हिसाब से उसपर खूब आरोप लगा दिए, लड़की ने दहेज उत्पीड़न का केश कर दिया. वो गाँव गए, सरिया पंचायत बैठी लड़की के बाप नहीं था, तो कोई सामाजिक हैसियत भी नहीं थी, उसका केश भी वापस हो गया और तलाक़ भी मिल गया. बाद में वो बड़ा खुश मिला और बोला साली दिखने में अच्छी नही थी. मुझे बड़ा गुस्सा आया. मैने अपनी निजी जानकारी का उदाहरण इसलिए दिया क़ि मुस्लिम धर्म गुरु अक्सर यह कहते पाए जाते हैं क़ि मुसलमानों में तलाक़ बहुत कम होते हैं, बात संख्या की नहीं है. बात है क़ि जीतने भी तलाक़ होते हैं सबके सब मर्दों के अधिकार पर ही होते हैं. स्त्री की तरफ से एक भी तलाक़ नहीं होता है. जबकि तलाक़ का अधिकार क़ानूनी रूप से होता है तो बहुत अच्छा है. कोई भी शादी के बाद समस्याओं में फस सकता है, किसी का उत्पीड़न होता है, तो वो तलाक़ का अधिकार तो उसके जिंदगी जीने के अधिकार के बराबर है. ये इंसान की आज़ादी से जुड़ा अधिकार है. लेकिन तलाक़ का दुरुपयोग ना हो. मुस्लिम महिलाएँ भी बराबर प्रयोग करें इस क़ानून का और मर्द अपने फायदे के लिए इसका दुरुपयोग ना कर सकें. जो भी है कम से कम एक समाज के अंदर से किसी नाइंसाफी के खिलाफ आवाज़ उठी है, तो हम उसपर खूब चर्चा करके इंसाफ़ चाहते हैं जिससे मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार मिल सके. समय बदल गया है. मुसलमानों की पीढ़ियाँ बदल गयी हैं. उनकी आर्थिक-सामाजिक ज़रूरतें बदल चुकी हैं. मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड को यह बात समझनी चाहिए और सुधारों की तरफ़ बढ़ना चाहिए. न बढ़ने का सिर्फ़ एक कारण हो सकता है. वह यह कि कहीं सुधारों का यह रास्ता यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की तरफ़ तो नहीं जाता? यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड से उसके डरने का एक ही कारण है. वह यह कि ऐसा कोड आ जाने के बाद मुसलिम समाज पर मुल्ला-मौलवियों की पकड़ ढीली हो जायेगी. चूँकि बोर्ड पर इन्हीं लोगों का दबदबा है, इसलिए न उसे सुधार पसन्द हैं और न यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड. वह यथास्थिति चाहता है, भले ही इससे मुसलिम समाज के आगे बढ़ने के रास्ते बन्द होते हों.
अभी 3-4 महीने पहले मेरे एक मारवाड़ी मुस्लिम मित्र ने अपनी बीबी को छोड़ दिया, मुझे बताया तो उसने अपने हिसाब से उसपर खूब आरोप लगा दिए, लड़की ने दहेज उत्पीड़न का केश कर दिया. वो गाँव गए, सरिया पंचायत बैठी लड़की के बाप नहीं था, तो कोई सामाजिक हैसियत भी नहीं थी, उसका केश भी वापस हो गया और तलाक़ भी मिल गया. बाद में वो बड़ा खुश मिला और बोला साली दिखने में अच्छी नही थी. मुझे बड़ा गुस्सा आया. मैने अपनी निजी जानकारी का उदाहरण इसलिए दिया क़ि मुस्लिम धर्म गुरु अक्सर यह कहते पाए जाते हैं क़ि मुसलमानों में तलाक़ बहुत कम होते हैं, बात संख्या की नहीं है. बात है क़ि जीतने भी तलाक़ होते हैं सबके सब मर्दों के अधिकार पर ही होते हैं. स्त्री की तरफ से एक भी तलाक़ नहीं होता है. जबकि तलाक़ का अधिकार क़ानूनी रूप से होता है तो बहुत अच्छा है. कोई भी शादी के बाद समस्याओं में फस सकता है, किसी का उत्पीड़न होता है, तो वो तलाक़ का अधिकार तो उसके जिंदगी जीने के अधिकार के बराबर है. ये इंसान की आज़ादी से जुड़ा अधिकार है. लेकिन तलाक़ का दुरुपयोग ना हो. मुस्लिम महिलाएँ भी बराबर प्रयोग करें इस क़ानून का और मर्द अपने फायदे के लिए इसका दुरुपयोग ना कर सकें. जो भी है कम से कम एक समाज के अंदर से किसी नाइंसाफी के खिलाफ आवाज़ उठी है, तो हम उसपर खूब चर्चा करके इंसाफ़ चाहते हैं जिससे मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार मिल सके. समय बदल गया है. मुसलमानों की पीढ़ियाँ बदल गयी हैं. उनकी आर्थिक-सामाजिक ज़रूरतें बदल चुकी हैं. मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड को यह बात समझनी चाहिए और सुधारों की तरफ़ बढ़ना चाहिए. न बढ़ने का सिर्फ़ एक कारण हो सकता है. वह यह कि कहीं सुधारों का यह रास्ता यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की तरफ़ तो नहीं जाता? यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड से उसके डरने का एक ही कारण है. वह यह कि ऐसा कोड आ जाने के बाद मुसलिम समाज पर मुल्ला-मौलवियों की पकड़ ढीली हो जायेगी. चूँकि बोर्ड पर इन्हीं लोगों का दबदबा है, इसलिए न उसे सुधार पसन्द हैं और न यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड. वह यथास्थिति चाहता है, भले ही इससे मुसलिम समाज के आगे बढ़ने के रास्ते बन्द होते हों.
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