हो सकता है क़ि आप मेरे ब्लॉग के टाइटल को देखते ही मुझपर देश द्रोही का टैग लगा दें, गाली दे दें. लेकिन पहले थोड़ा सा पढ़ लो. ग्लोबल हॅंगर इंडेक्स की रिपोर्ट 2016 आ गई है. भारत 97 नंबर है. एसिया में नेपाल 72, श्रीलंका 84 और बांग्लादेश 90वें स्थान पर है. खुशी की बात यह है कि हम पाकिस्तान से आगे हैं. हम केवल तीन देशों को एशिया में हरा पाए हैं.
मध्यप्रदेश में सबसे अधिक शिशु मृत्यु दर है. 118 BRICS देशों में भारत भुखमरी के देशों में सबसे पीछे है. भारत में 5 साल तक के हर 5 में से 2 यानी 38.7% बच्चे कुपोषित हैं. इंटरनैशनल फूड रिसोर्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में आस्ट्रेलिया में पैदा होने वाले गेंहूँ के बराबर बर्बाद हो जाता है. एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है क़ि हम आने वाले 6 साल में विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश बनने जा रहे हैं. ऐसे में हम इन्हीं बुनियादी सुविधाओं के ऊपर कैसे रहेंगे समझ में नहीं आता है? हम अभी अपने जीडीपी का मात्र 5% शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्चा कर पाते हैं, जबकि हमसे बहुत ग़रीब अफ़्रीकन देश भी 6-7% खर्चा करते हैं. चाइना या अमेरिका के तो सपने देखें हम इस बारे में. बांग्ला देश में बाल मृत्यु दर 46 और भारत में 61 है, मतलब हमारे 1000 में से 61 बच्चे पैदा होते ही मर जाते हैं जबकि बांग्लादेश में 46. बांग्लादेश में लोगों की औसत आयु 64 और भारत में 58 साल ही है. भारत में 2015 में भुखमरी 15% है, जबकि 2010 में से केवल 1.6% ही सुधार हुआ है. हमारे पड़ोसी देश जो हमसे बहुत छोटे और ग़रीब हैं वो इस सबमें हमसे आगे निकल गए. अच्छा हो क़ि 2014 में फूड सिक्योरिटी बिल को एक क़ानून बना दिया गया था नहीं तो सरकार बदलती और उसका बजट कम ज़्यादा करके इससे भी ज़्यादा हालत खराब कर देती. फूड सिक्योरिटी बिल में मुख्य 3-4 चीज़ें हैं जो आज ही मुझे रिसर्च में पता चलीं, पीडीएस सिस्टम, आईसीडीएस, मिडडे मील चौथी जो नहीं पता थी मुझे मातृत्व (मैटरनिटी) लाभ, जिसपर सरकार ने बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जबकि सबसे ज़्यादा नुकसान इसी में होता है. जब मेनका गाँधी ने इस साल मैटरनिटी टाइटल बिल पास किया तो बड़ी वाहवाही लूटी लेकिन इसमें लाभ मिला केवल ॉर्गनाइज्ड सेक्टर को अनॉर्गनाइज्ड सेक्टर की महिलाओं को तो इससे बाहर ही रखा गया? जबकि कई राज्य सरकारों की योजनाओं में रूरल में हर गर्भ पर सरकार उनको 6000 रुपए देती है. दूसरा भारत में आँगन बाड़ी केंद्र इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जबकि इसके विस्तार के लिए कुछ ख़ास भारत सरकार द्वारा किया नहीं गया. जबकि ब्राज़ील जैसे देशों ने आँगनबाड़ी जैसे कार्यक्रमों से ही ग़रीबी दूर की है. वो अलग मत हो सकता है क़ि ब्राज़ील में ग़रीबी दूर हुई या नहीं? भारत में सरकारों ने इसमें बहुत ग़लतियाँ की. मध्यप्रदेश इसमें जो सबसे आगे है उसके बारे में एक बात मैने आज इंडियन एक्सप्रेस में रितिका खेड़ा के लेख में पढ़ी. 2015 में एक कमेटी ने मध्यप्रदेश सरकार को कहा क़ि आदिवासी इलाक़े के बच्चों को अंडा खाने के ळिए दिया जाना चाहिए, जो क़ि छोटे बच्चों के छोटे से पेट में वैल्यूम के हिसाब से बहुत पोषित तत्व रखता है, इससे कुपोषण और मृत्यु दर में कमी आएगी. ऐसे में आर एस एस ने मुख्यमंत्री को आदेश दे दिया क़ि अंडा तो नॉनवेज है, शिक्षा के मंदिर में कैसे दे सकते हैं? जबकि आदिवासियों के बच्चों को अंडा खाने में कोई दिक्कत ही नहीं थी. ऐसे भी लोग हैं देश के विकास को रोकने वाले.
इसमें हमारे पीछे होने में एक और बात सामने आ रही है, वो है आधार कार्ड.................... सुप्रीम कोर्ट ने 6 बार सरकार को कहा है इसको अनिवार्य ना करने के लिए लेकिन सरकार है क़ि हर मंत्रालय से कोई न कोई आदेश निकलवा ही देती है. जबकि फायदा कोई नहीं हुआ है, ना कोई कालाबाज़ारी रोक पाए ना कोई चोरी. पहले राशन की दुकान वाला लोगों से रजिस्टर पर 35 किलो पर साइन करवाता था और देता 20 किलो था, आज भी वो मशीन पर अंगूठा 35 किलो पर लगवाता है और देता 15-20 किलो ही है. जनता तो नहीं जानती है क़ि मशीन पर वो कितना लिख रहा है, जबकि रजिस्टर पर लिखने में तो लोग समझ भी जाते थे. एक रिपोर्ट में पता चला क़ि पिछले तीन महीनें में राजस्थान में 19% लोग केवल आधार की वजह से राशन से वंचित रह गए हैं. महिलाओं के अंगूठे बरतन धोने या घर का काम करने में घिस जाते हैं तो निशान मिलना बहुत मुश्किल होता है. इसमें एक नहीं 6 चीज़ें होती हैं......... 1.आधार नंबर है कि नहीं? 2. वो मशीन में फ़ीड है कि नहीं? 3. फ़िंगर प्रिंट मिल रहे हैं या नहीं? 4. स्टैट सर्वर चल रहा है कि नहीं? 5. यूडीएआई (उदय) फिर अंत में 6. मोबाइल पर मैसेज आता है तब लोगों को राशन मिलता है. राशन की सबसे बड़ी कालाबाज़ारी तो ब्लॉक स्तर से होती है जिसके बारे में मैनें ज़मीनी स्तर पर बहुत कुछ देखा है. लेकर दबंगों की कालाबाज़ारी से बीपीएल लिस्ट के घोटाले तक. वहाँ पर किसी भी तरह से व्यवस्था परिवर्तन तो हुआ नहीं चल दिए डिजिटल इंडिया करने. देश बदल रहा है, डिजिटल हो रहा है पर 100 करोड़ के एडवरटाइजिंग करवा दिए, अमिताभ बच्चन की पूरी शक्ति लगवा दी बुढ़ापे में लेकिन जब हॅंगर रिपोर्ट आई तो हम कहीं नहीं दिख रहे हैं. डिजिटल करना है तो अपनी पोस्ट ओफिस करो, जहाँ आज भी भारतीय व्यवस्था के घटिए नमूने बैठे रहते हैं, पासबुक अपडेट करने के लिए प्रिंटर तक नहीं लगे हैं, सब मैनुअल हो रहा है. फिर ग़रीबों के पेट के अधिकार को डिजिटल करना . एक और मजेदार बात क़ि जैसे ही गूगल पर देखा कि हॅंगर के बारे में कितने लोगों ने सर्च किया होगा तो ना के बराबर लोग निकले. भारतीय मीडिया तो आइफोन के मुक़ाबले हॅंगर या ग़रीबी पर मात्र .07% की रिपोर्टिंग करता है. वैसे तो रोज चिल्ला चिल्ला बताते हैं लोगों को क़ि हमारे पास ब्रम्ह14 है, 250 टोपे हैं, लाहोर तक मार करेंगे, आज कोई नहीं बताएगा क़ि कितने खाने के पैकेट हैं और किसके पेट में जाएगा? अभी नहीं चेते हैं हो सकता है जब पाकिस्तान से हार जाएँगे तो हम उससे जीतने के चक्कर में कुछ आगे बढ़ सकें. वैसे याद आया क़ि यूएन ने 2030 तक विश्व से ग़रीबी ख़त्म करने की डेडलाइन दी है वो तो पाकिस्तान और इंडिया ही नहीं पूरी होने देंगे.
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