Thursday, May 30, 2019
भविष्य में पानी का संकट
Monday, May 27, 2019
नेहरू जी को मेरा खत.................
बहुत दिन बाद आज मन हुआ क़ि इस मुश्किल से दौर में आपको याद कर लिया जाना चाहिए. हम नहीं मोदी जी आपको याद तो रोज करते हैं लेकिन हर बात के लिए आपको ज़िम्मेदार ठहराने के लिए. पता नहीं ये सब देखकर आपकी आत्मा क्या सोच रही होगी? आप क्या सोचते होंगे जब आपके बारे में इतना कचरा फैलाया जाता है. कभी आपको मुसलमान कहा जाता है तो कभी अँग्रेज़ों का चमचा, कभी आपको अय्याश कहा जाता है तो कभी देश का लुटेरा. आपकी भांजी, बहन या मित्रों के साथ तस्वीरों को सोसल मीडिया पर शेयर करके आपके चरित्र पर सवाल खड़े किए जाते हैं. आख़िर कैसे आप इतना बर्दाश्त करते होंगे? आपके इतिहास और योगदान को पूरी तरह मिटाया जा रहा है. जिन बच्चों से आप इतना प्रेम करते थे उनको आपके बारे में पढ़ने और जानने से रोका जा रहा है. हो सकता है अगले कुछ सालों में बच्चों की किताबों में भी आपको विलेन बनाकर दिखाया जाए. आपके 10 साल से अधिक जेल में बिताने और संघर्ष को नकारा जा रहा है. क्या आप उस समय जेल में सुख सुविधाओं के साथ रहते थे, जो आज़ादी में आपका कोई योगदान ही नहीं मान रहे हैं लोग. बात बात पर आपको हिंदू राष्ट्र का दुश्मन कहा जाता है. आपके मित्र सरदार पटेल को आपका कट्टर दुश्मन बताया जाता है? आप ही बताइए आपके और उनके बीच में क्या सच्चाई थी? आपने कितने करोड़ रुपए दिए थे गाँधी जी को खुद का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे करने को? संविधान में जो महिला अधिकार, बोलने की आज़ादी, प्रेस की आज़ादी, सेकूलरिज़्म, संघीय ढाँचे, लोकतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों में आपके योगदान को नकारा जा रहा है. पता नहीं आपका दिल क्या कहता होगा ये सब देखकर लेकिन हमारा तो बड़ा दुखी होता है.
खैर अब भी आप भारतीय राजनीति में खूब प्रयोग किए जा रहे हैं कभी आपके वंशज अपने फायदे के लिए तो कभी आपके विरोधी उनपर अटैक के लिए करते हैं.
धन्यवाद.......
आपका फ़ैन,
कमलेश कुमार ❤
क्या राहुल को इस्तीफा देना चाहिए?
हाँ राहुल चुनाव हारे हैं लेकिन चुनाव पूरा विपक्ष हारा है, अखिलेश तेजस्वी, माया, ममता, पवार, नायडू सबको इस्तीफा देना चाहिए फिर. जबकि इनमें से सबसे अधिक मेहनत भी राहुल ने ही की थी. अब उनका कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा मतलब बीजेपी के जला में आ फंसना होगा. वो चाहते हैं कि कैसे भी राहुल निकले यहाँ से. नहीं तो अगर राहुल गाँधी पप्पू ही थे, तो फिर बीजेपी इतना सीरियस क्यों लेती है उनको, क्यों उनके बयान पर पूरा मंत्रिमंडल आ जाता था, हमले करने. क्योंकि उनको पता है कि आज पुरे विपक्ष में अगर कोई नेता संघ की विचारधारा पर खुलकर बिना डरे हमला करता है तो वो राहुल गाँधी हैं.
आज की तारीख में चुनाव केवल मेहनत भर से नहीं हो जाता. उसके लिए पैसा भी बहुत लगता है. कांग्रेस ने जितना पैसा अपने पुरे चुनाव में नहीं लगाया उससे ज्यादा तो बीजेपी के नारे लिखने वाली और सोसल मिडिया टीम दो दिए गए. आंध्र में जीते जगन मोहन रेड्डी कोई अकेले मेहनत या यात्रा से नहीं चुनाव जीते हैं. उनकी जीतके लिए
प्रशांत किशोर की टीम ने एक साल से अधिक काम किया है. जिसका पूरा कॉन्ट्रैक्ट था 250 करोड़ का. उनके पूरे चुनाव में एक साल के दौरान 700-800 करोड़ से अधिक खर्च हो गया. इतना बजट तो कांग्रेस का पूरे देश के चुनाव में नहीं था. संसाधनों की कमी के चलते भी विपक्ष का मोदी- शाह के सामने टिकना संभव नहीं है. बीजेपी को 2018 में 990 करोड़ तो कांग्रेस को मात्र १४२ करोड़ ही कॉर्पोरेट चंदा मिला. रही बात लहर की तो आपके घर में कोई बच्चा हो और आप उसके सामने जो करेंगे, बोलेंगे वो भी वही सीखेगा. जब मीडिया ही मोदी मोदी चिल्लाता रहा तो पब्लिक के दिमाग में मोदी नहीं तो क्या मुलायम सिंह घुसेंगे? दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे अप्रैल में राहुल गाँधी को 241, प्रियंका और मायावती को लगभग 84-84 घंटे दिखाया गया वहीँ अमित शाह को 123 और नरेंद्र मोदी को 722 घंटे जगह मिली. मैं इन आकड़ो से किसी नेता की मेहनत, सफलता या गलती को नहीं छुपा रहा लेकिन कुछ तथ्य ये भी हैं इस चुनाव के.
Sunday, May 26, 2019
चंद्रबाबू नायडू इतना बुरी तरह क्यों हारे?
कांग्रेस में अब क्या होगा?
इकोनॉमी को कैसे सही करेंगे मोदी?
सपा के कार्यकर्ताओं की मज़बूरी
अखिलेश जब मायावती से मिल सकते हैं तो शिवपाल सिंह यादव को क्यों नहीं वापस ला पाए? क्या शिवपाल सिंह का अधिकार था मुलायम सिंह की विरासत पर. उन्होंने मेहनत की थी, अखिलेश का हक़ बाद में था. फिर भी बाद में शिवपाल सिंह तो पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष के पद पर ही मान रहे थे, लेकिन अखिलेश को पार्टी किसी प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी जैसे चलाना है कि मैं डायरेक्टर हूँ तो मेरी ही चले. जो प्रदेश अध्यक्ष और पदाधिकारी हैं वो उनके ऑर्डर के बिना हिलें तक नहीं ऐसे लोग चाहिए.
मैं समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं को बहुत करीब से जनता हूँ, इसलिए कह सकता हूँ कि आज भी उनसे ज्यादा जुझारू किसी पार्टी का कैडर नहीं है. संघ या बीजेपी के कार्यकर्त्ता उनके आगे कहीं ठहरते नहीं हैं. उनकी पहले मुलायम सिंह और अब अखिलेश के लिए जो दीवानगी है वो इसी नारे में है, " ये जवानी है कुर्बान, अखिलेश भैया तेरे नाम".........
लेकिन आज हालत क्या हैं? उनके अखिलेश भैया एसी के बंद कमरे वाले नेता बनकर रह गए हैं. कार्यकर्ताओ पर यूपी भर में जुल्म हो रहा तो कोई है ही नहीं जो उनके लिए खड़ा हो. जिला स्तरीय नेताओ पर भी पुलिस की करवाई हो तो कोई बोलने वाला नहीं है. कार्यकर्त्ता कबतक लड़ते रहें इनके लिए, जब लीड करने वाला ही घर से नहीं निकलता? उसको पता ही नहीं है कि यूपी में आजकल लोकल मुद्दे क्या हैं? इसी चुनाव में सबसे बाद अपना हेलीकॉप्टर निकाला. वो भी रैली में केवल वही हाइवे और बेरोजगारी पर तोते जैसे बोल जाते हैं. कार्यकर्ताओं को संघ से वैचारिक तौर पर लड़ने या काउंटर करने के लिए कोई प्लान बनाया? वो युवा कबतक अकेले लड़ें? उनका नेता तो लखनऊ में पड़ा है. कुछ न हो तो कम से कम राहुल गाँधी या तेजस्वी से ही सीख लें कि जमीन पर कैसे रहते हैं? अखिलेश यादव अभी तक अपने मुख्यमंत्री वाले अहंकार से नहीं निकले हैं. उनको लगता ही नहीं कि वो 2017 में ही बुरी तरह हार गए हैं. अगर स्थिति यही रही तो इनके जो बचे खुचे यादव कार्यकर्त्ता भी हैं वो भी किसी दल में शिफ्ट कर जाएंगे, बेचारे कबतक तुम्हारी मक्कारी का नुकसान झेलें.
जिन राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हुआ
इसलिए कांग्रेसी हार का ठीकरा ईवीएम के सिर नहीं बल्कि खुद पर फोड़ें.
हाँ राहुल गांधी का प्रयास सराहनीय था।
२०१९ के नतीजों पर त्वरित टिप्पणी
मोदी ने जाति तोड़कर लोगों को अपनी ओर खींचा है, वो यूपी और बिहार में एक नई तरह की राजनीती है. केवल यादव, जाटव और मुस्लिम ही खुलकर मोदी के विरोध में रह गए हैं. यहाँ तक कि यादवों के परिवार से भी कोई व्हाट्सएप यूज करने वाला लड़का चुपचाप बीजेपी को वोट दे आता है.
अमेठी से राहुल गाँधी, कन्नौज से डिम्पल, गुना से सिंधिया, भोपाल से दिग्विजय सिंह, हरियाणा में रोहतक और सोनीपत से हुड्डा पिता -पुत्र, राजस्थान से सचिन पायलट की सीट (प्रत्याशी उनका कोई समर्थक है), कन्हैया, अजय माकन, शीला दीक्षित, देवेगौड़ा, रघुवंश प्रसाद, शत्रुघ्न सिन्हा, शरद यादव, अजित चौधरी,बदायूं से धर्मेंद्र यादव, मुनमुन सेन, प्रकाश अम्बेडकर, सुशील कुमार शिंदे, जितिन प्रसाद, मल्लिकार्जुन खड़गे लगातार बीजेपी उम्मीदवारों से पीछे चल रहे हैं, और जहाँ जहाँ विपक्ष लीड भी कर रहा तो बहुत कम अंतर से। इसका मतलब साफ़ है कि इस चुनाव में न नेता चला, न साख चली, न जाति चली, न कोई और मुद्दा. बस चला तो अकेले मोदी. अगर इन सबको मोदी का मुकाबला करना है तो सब एक होकर, किसी नेता के चहरे और विजन के साथ सामने आएं.
Friday, May 24, 2019
हम हमेशा लडेंगे
चुनाव में जीत हासिल करने पर मोदी जी को दिल से शुभकामनाएं। उम्मीद है कि वो जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेंगे। सरकार अगर कांग्रेस की भी बनती हम तो विपक्ष में ही रहते। अपना नेचर है किसी गलत का सपोर्ट न करना और सरकारें अक्सर अपना रंग दिखाती हैं। 2011 में कांग्रेस के खिलाफ ही अन्ना आंदोलन में हिस्सा लिया था। आगे भी विपक्ष में ही रहेंगे। सत्ता के साथ चलना मतलब मुर्दे की तरह लहर में बह जाना है। जब तक जिंदा हैं पैर टिकाए रहेंगे। हवा के विपरीत चलने का अपना मजा है।
हमारी जो विपक्ष की राजनीति है वो खत्म नहीं होगी। चाहे मोदी, योगी, राहुल या कोई भी पीएम बने। जब जब कोई नेता हवा में उडेगा और जनता को कीडा मकोडा समझेगा तो हम उसे कंकड़ मारकर नीचे नजर डालने को मजबूर करते रहेंगे। चुनाव पूरी राजनीति नहीं बल्कि उसका एक हिस्सा मात्र है। जब तक इस देश में लोग रोजगार के लिए भटकेंगे, शिक्षा के लिए बडे शहर और काॅलेजों में जाएंगे और एडमिशन नहीं मिलेगा, जब तक मजदूर का शोषण होगा, जब भी दलितों को उनकी जाति के कारण घोडी पर बारात निकालने से रोका जाएगा, जब जब मुसलमानों के खिलाफ नफरत और हिंसा होगी और जबतक अन्न दाता किसान आत्महत्या करेगा और जब जब गरीब अस्पतालों के बाहर बिना इलाज के मरेगा, तब तक हम राजनीति करेंगे और तुमको मजबूर करेंगे वो काम करने को जो सरकार को करना चाहिए। जब जब तुम हिंदू- मुस्लिम, पाकिस्तान में जनता को उलझाओगे हम तुम असली मुद्दों पर लाने के लिए लडेंगे संविधान की प्रस्तावना के एक एक शब्द की रक्षा करने के लिए संघर्ष करेंगे।
इंकबाल जिंदाबाद।
Sunday, May 19, 2019
बंगाल में बीजेपी के पनपने में लेफ्ट का हाथ
२०१९ के चुनावों में ५ अहम राज्य
भारतीय बनाम हॉलीवुड सिनेमा
लेकिन उस वेब सीरीज में लेकर कहानी से, उसके रोल, एक्टिंग सब दिलचस्प थे. रोमांस भी है जो आप सबके साथ आसानी से देख सकते हैं. सबसे अच्छी बात मुझे वहां ये लगी जिस वजह से मैंने इतना लम्बा लिखा वो ये कि अगर कोई विलेन भी है तो उसको सजा कोई हीरो अराजकता के साथ खुद ही नहीं देने पहुँच जाता. यहाँ के जैसे नहीं कि अमरीश पूरी के घर पर धर्मेंद्र अकेले पहुँच गए और 200-300 बन्दुकधारियों से अकेले लड़कर किडनैप्ड महबूबा या माँ को छुड़ा लाए. पहली बात तो उसमें अधिकतर ये किडनैपिंग वाले तो ड्रामे ही नहीं होते. यहाँ तो हर फिल्म में ३-४ गाड़ियों का ब्रेक फेल होता है. जबकि उसमें फाइट भी ऐसी हुई जो रिएलिस्टिक लगे. विलेन के गुनाह भी वैसे होते हैं, जैसे हो सकते हैं, और उसको सजा भी हीरो देता है तो कानूनी ढंग से. खून के बदले कोई को जस्टिफाई नहीं करते। उसके लिए प्रॉपर क़ानूनी लड़ाई लड़कर उसको सजा दिलाते हैं जो वहां के कानून में हो. यहाँ तो गरीब हीरो अपने जमींदार विलेन ससुर से बदले के चक्कर में 50-60 लोगों को मार कर भी बाद में माफ़ कर दिया जाता क्योंकि उसने सब न्याय के लिए किया था. उनकी कहानी में एक्स्ट्रा मौत किसी की नहीं होती जैसे यहाँ तो 8-10 ऐसे ही बिना वजह बिच में आकर मर जाएं जिनका किसी को ध्यान ही नहीं? वहां गलती से एक नौकर भी मरा तो स्किप नहीं हो सकता. पूरा केश चलता है.
Sunday, May 5, 2019
चुनाव आयोग की निष्पक्षता?
चुनाव आयोग के सामने प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ आचार संहिता के उल्लंघन के पांच मामले आए. यह भी शर्मनाक मामला है कि भारत के प्रधानमंत्री आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं. आयोग ने चेतावनी दी थी कि सेना के नाम पर वोट नहीं मांगा जाएगा. धार्मिक पहचान और उन्माद के नाम पर वोट नहीं मांगा जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के दबाव में शुरू में तीन चार नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई तो हुई लेकिन जब अमित शाह और नरेंद्र मोदी का नाम आया तो आयोग के हाथ कांपते से लगते हैं.
9 अप्रैल को लातूर में प्रधानमंत्री मोदी ने पुलवामा और बालाकोट के नाम पर वोट मांगा. 20 दिन लग गए फैसला लेने में. जब फैसले का वक्त आया तो दो आयुक्तों ने प्रधानमंत्री को क्लिन चिट दी. एक आयुक्त ने विरोध किया. विरोध करने वाले आयुक्त का नाम है अशोक ल्वासा. मोदी के ख़िलाफ़ 5 शिकायतें थीं. एक भी शिकायत पर पूर्ण बहुमत से क्लीनचिट नहीं मिली है. नियम तो एक ही होता है. उल्लंघन भी कोई ऐसा जटिल नहीं है मगर फैसला संदिग्ध है.
9 अप्रैल को अमित शाह ने केरल के वायनाड की तुलना पाकिस्तान से कर दी थी. अमित शाह के दिल में यही भारत है. उनसे सहमति न हो तो वे भारत के एक हिस्से को ही पाकिस्तान घोषित कर दें. इसके बाद भी चुनाव आयोग उन्हें क्लीनचिट देता है. इसे धार्मिक उन्माद और धार्मिकता का इस्तेमाल करने का आरोपी नहीं मानता है.
इन सबके बीच चुनाव आयुक्त अशोक ल्वासा भी हैं. लगातार पांच शिकायतों में वे असहमति दर्ज करते हैं. कोई आयुक्त पांच बार लगातार विरोध दर्ज करे यह सामान्य बात नहीं है. प्रधानमंत्री को जो क्लीनचिट मिल रहा है उसे आयुक्त अशोक ल्वासा की असहमतियों की नज़र से देखिए. आपकी रुह कांप जानी चाहिए कि क्या कोई है जो प्रधानमंत्री को बचाने के लिए वहां मौजूद है. भरोसा होना चाहिए कि कोई अशोक ल्वासा है जो अपने नैतिक बल पर टिका है. संवैधानिक दायित्व के बोध पर अडिग है. फिर ऐसे देखिए कि आयोग में एक के सामने दो ऐसे हैं जो लगातार प्रधानमंत्री को पांच मामलों में क्लीनचिट देते हैं. क्या चुनाव आयोग प्रधानमंत्री मोदी आयोग बन गया है?
2014 के बाद से चुनाव आयोग के भीतर बहुत कुछ ऐसा हुआ है जिससे भरोसा बनता नहीं है. प्रधानमंत्री को पहले भी कई तरह की रियायतें मिली हैं. वो रैली कर सकें इसलिए आयोग की प्रेस कांफ्रेंस टाली गई. लोकसभा का चुनाव लंबा किया गया. किसी किसी राज्य में एक चरण में चार सीटों पर मतदान हो रहा है. ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के नाम पर आम आदमी पार्टी के विधायकों की मान्यता रदद् करने का विवाद पलट कर देखिए. दिल्ली में चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने की साज़िश नज़र आएगी. कितनी बहसें होती थीं उस वक्त चैनल में, जिन्हें ये करना था वो करके वापस जा चुके हैं. आप किसी भी दल के समर्थक हों. इतिहास में आयोग की जो भी कहानी हो. यह काफी नहीं है. क्या हमने इस वर्तमान को इसलिए चुना है कि वह इतिहास के जैसा हो. 2014 के पहले के पूर्व चुनाव आयुक्त मुखर होकर बोलते थे. अब प्रतिक्रिया के लिए पूर्व आयुक्तों से संपर्क किया जाता है तो टाल जाते हैं. जो बोलते हैं वो भी खुलकर नहीं बोलते हैं. उनके वाक्यों को ध्यान से देखिए. क्या डर इतना बड़ा हो गया है कोई इस एक संस्था के लिए भी नहीं बोल पा रहा है? क्या आप डरने के लिए 2019 के चुनाव में हैं? क्या आप आयोग को ख़त्म होते देखने के लिए 2019 के चुनाव में हैं?
Wednesday, May 1, 2019
क्यों जरूरी है आरक्षण?
न्यूनतम आय योजना (न्याय) की घोषणा करके कांग्रेस ने भारत में अमीरों और ग़रीबों के बीच तेज़ी से बढ़ रही असमानता की खाई को चुनावी बहस में शामिल करने की कोशिश की है, जो एक सराहनीय क़दम है. समाजवादी पार्टी ने भी अपने चुनावी घोषणा-पत्र में इस मुद्दे को जितनी शिद्दत से शामिल किया है, वह क़ाबिले तारीफ़ है.
दरअसल इस समय बढ़ती आर्थिक असमानता पर दुनिया भर में शोध चल रहे हैं. भारत पर हुआ शोध बताता है कि पिछले तीन दशक से देश के 10 प्रतिशत लोग, जो कि मूलतः उच्च जाति से हैं, की आय और सम्पत्ति में अकूत इज़ाफ़ा हुआ है, जबकि शेष 90 प्रतिशत लोगों की आय में कोई ख़ास इज़ाफ़ा नहीं हुआ है. इस 90 प्रतिशत में भी नीचे के 50 प्रतिशत लोग जो कि मुख्यतः अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज से हैं, की हालत दिन-ब-दिन ख़राब होती जा रही है.
कुल मिलाकर भारत में बढ़ रही आर्थिक असमानता का जातीय चरित्र भी है, जिस पर अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में ख़तरनाक परिणाम हो सकते है.
अब सवाल उठता है कि बढ़ती असमानता का समाधान क्या है, जिसको भारत में लागू किया जा सके? बढ़ती असमानता के समाधान पर दुनियाभर में जो बहस चल रही है, उसके आधार पर इसके दो तरीक़े के समाधान हैं- नीतिगत और सैद्धान्तिक.
बढ़ती आर्थिक असमानता और उससे पैदा हो रही ग़रीबी को मिटाने के लिए भारत के चुनाव में इस समय जो बहस चल रही है, वह मुख्यतः नीतियों से सम्बंधित है, जिनको आने वाली संभावित सरकारें लागू करने का वादा कर रही हैं. यहां नीतिगत फ़ैसले का पहले मुख्य मतलब यह है कि आने वाली सरकार धन और संपदा को ख़र्च करने में अमीर लोगों के बजाय ग़रीबों, वंचितों और असहायों को वरीयता देगी. इन तबकों के लिए सरकारें विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, पेंशन, भोजन, आवास, रोज़गार आदि के जरिए ख़र्च करती हैं. इसके अलावा सरकारें कृषि, खाद, पानी, बिजली आदि पर सब्सिडी देकर भी इन्हें राहत देती हैं.
ऐसी सभी योजनओं को चलाने के लिए सरकारों को धन की ज़रूरत होती है, जिसके लिए वो विभिन्न प्रकार के टैक्स लगाती हैं, लोन लेती हैं, या फिर देश की कोई धन-सम्पदा बेचती हैं. आजकल सरकारें सूचना और तकनीकी क्रांति की वजह से पैदा हुए संसाधन जैसे स्पेक्ट्रम वग़ैरह को बेचकर भी काफ़ी संसाधन जुटा लेती हैं. चूंकि पिछले तीन दशक से सरकार की नीतियों की वजह से देश में एक सुपर अमीर वर्ग पैदा हो गया, इसलिए सरकार उन पर कुछ ज़्यादा टैक्स लगा सकती है, जैसा कि अखिलेश यादव कह रहे हैं. इस सुपर अमीर वर्ग को टॉप 10 प्रतिशत या फिर टॉप का एक प्रतिशत भी कहा जा रहा है.
अगर कोई सरकार ग़रीबों, वंचितों और असहायों के लिए बनी सेवाओं में कटौती करती है, तो इसका मतलब साफ़ होता है कि वह अपने ख़र्चों में कटौती कर रही है. ऐसे समय में यह देखना ज़रूरी हो जाता है कि कटौती से सरकार जो पैसा बचा रही है, वो किसे दे रही है? ज़्यादातर समय ऐसा देखा जाता है कि जब सरकारें अपनी सेवाओं में कटौती करती हैं तो वह अमीर लोगों के हित में होता है. इसलिए सरकारों की ऐसी नीतियां तेज़ी से असमानता बढ़ाती है.
अगर इन सेवाओं पर कोई सरकार अपना ख़र्च बढ़ाने का वादा करती है तो उसका साफ़ मतलब होता है कि वह असमानता को कम करने जा रही है. असमानता के इस तरह के समाधान को नीतिगत समाधान कहा जाता है. आज के परिप्रेक्ष्य में बढ़ती असमानता का नीतिगत समाधान ज़रूरी है, लेकिन काफ़ी नहीं है. इसके लिए हमें सैद्धांतिक समाधान की तरफ़ देखना होगा.
आधुनिक लोकतंत्र में संसाधन, सेवाएं, अवसरों का वितरण कुछ सिद्धांतों के आधार पर किया जाता है, जिससे समतामूलक समाज का निर्माण हो सके. ऐसे में जब दुनियाभर में असमानता बढ़ रही है तो उन सैद्धांतिक समाधानों पर शोध होना शुरू हो गया है, जिनको आधुनिक लोकतंत्र ने धन, संपदा, सेवा और अवसर के बंटवारे के लिए अपनाया है. ऐसे समाधानों में सबसे प्रमुख है ‘अवसर की समानता की अवधारणा’ जिसको आधुनिक लोकतंत्र की नींव समझा जाता है. जब असमानता बढ़ रही है तो यह कहा जा रहा है कि दरअसल यह समान अवसर की अवधारणा की असफलता है.
प्रसिद्ध फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वे न्यूनतम आय की न्याय योजना बनाने में कांग्रेस की मदद कर रहे हैं, ने अपनी किताब ‘कैपिटल इन ट्वेंटी फ़र्स्ट सेंचुरी’ में फ्रांस और अमेरिका के बीच तुलनात्मक अध्ययन करके यह साबित करने की कोशिश की है कि यह अवधारणा सभी देशों में ठीक ढंग से काम नहीं कर रही है. उनका सुझाव है कि आर्थिक असमानता को कम करने के लिए पुनर्वितरण के सिद्धान्त की तरफ वापस जाना चाहिए.
विदित हो कि भारत में संविधान निर्माण के समय इस बात पर काफी मंथन हुआ था कि क्या समान अवसर की अवधारणा को ही आने वाली सरकारों के लिए नीति निर्धारण का सबसे कारगर हथियार बनाया जाये. तब भी हमारे संविधान सभा के कुछ सदस्य खासकर समाजवादियों ने इस सिद्धांत की प्रभावशीलता पर आशंका जताते हुए आपत्ति जताई थी. जिसके बाद संविधान में अनुच्छेद-16 में अवसर की समानता को रखने के साथ-साथ विशेष अवसर का सिद्धांत भी जोड़ा गया था.
जिस तरह इस समय देश की उच्च न्यायपालिका में कुछ एक परिवारों से ही जज नियुक्त हो रहे हैं वह चिंता का विषय है. इसके अलावा लम्बे समय तक बिजनेस घरानों के पारिवारिक वक़ील के तौर पर काम किए लोगों का जज नियुक्त होना भी बढ़ती असमानता की दृष्टि से चिंता का विषय होना चाहिए.
असमानता को कम करने का जो सबसे मज़बूत सिद्धांत है, उसे पुनर्वितरण कहते हैं. असमानता कम करने में समान अवसर की अवधारणा की सीमित असर को देखते हुए इस बात पर बहस चल रही है कि पुनर्वितरण की अवधारणा पर फ़ोकस किया जाए.
क्यों नहीं है संसद में दलितों का प्रतिनिधित्व
भारत की संसदीय प्रणाली में एक चिंताजनक ट्रेंड दिख रहा है. वह है, लोकसभा में दलित समाज के तेज़-तर्रार नेताओं की अनुपस्थिति का. कहने को तो हर आम चुनाव में अनुसूचित जाति के 84 और अनुसूचित जनजाति के 47 सांसद लोकसभा में चुनकर आते हैं, लेकिन पिछले एक दशक में लोकसभा की संरचना और कार्य प्रणाली पर नज़र दौड़ाने पर ऐसे सांसदों की सक्रियता में कमी साफ़-साफ़ दिखती है. खासकर अपने समाज से जुड़े मुद्दों पर वे आमतौर पर खामोश ही रहते हैं या फिर उनमें उस कौशल का अभाव है, जिसके बिना संसद में आवश्यक हस्तक्षेप करना मुमकिन नहीं हो पाता.
इस आम चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों ने दलित समाज से जिस तरह के उम्मीदवार उतारे हैं, उन पर नज़र दौड़ाने पर बालासाहेब प्रकाश अम्बेडकर के सिवाय ऐसा कोई उम्मीदवार नज़र नहीं आता है, जिसको सामाजिक न्याय से जुड़े जटिल मुद्दों की समझ हो या जो ऐसे सवालों पर मुखर रहा है. अगर प्रकाश अम्बेडकर इस आम चुनाव में जीत कर नहीं आते हैं, तो आने वाली लोकसभा में भी दलित समाज के सांसदों की ख़ामोशी ही दिखाई देगी.
अब सवाल उठता है कि लोकसभा में दलित समाज के सांसदों की ख़ामोशी की वजह क्या है? दलित समाज के अच्छे और तेज़ तर्रार लोग चुनकर क्यों नहीं आ रहे हैं? इस सवाल का सीधा जवाब है कि विभिन्न राजनीतिक दलों का दलित समाज के वरिष्ठ और तेज़ तर्रार लोगों को टिकट न देना, और इस समाज के वरिष्ठ नेताओं का लोकसभा की बजाय राज्यसभा के माध्यम से संसद पहुंचना.
मिसाल के तौर पर राम विलास पासवान इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं और उनकी योजना बीजेपी के समर्थन से राज्यसभा में आने की है. मायावती लंबे समय से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रही हैं. इस बार भी वे मैदान में नहीं हैं. मुमकिन है कि वे भी राज्य सभा में आएं. सीपीआई के नेता डी राजा भी राज्यसभा में ही होते हैं. रामदास आठवले भी राज्यसभा के रास्ते से संसद पहुंचे हैं.
इसको हम अगर विभिन्न राजनीतिक दलों में सक्रिय दलित समाज से आने वाले वरिष्ठ नेताओं के नाम से समझें तो उसमें कांग्रेस से मल्लिकार्जुन खड़गे, मीरा कुमार, कुमारी शैलेजा, सुशील कुमार शिंदे, मुकुल वासनिक, पीएल पुनिया, प्रो भालचन्द्र मुंगेकर; बीजेपी से थावरचंद्र गहलौत, प्रो नरेंद्र जाधव, विजय सोनकर शास्त्री, डॉ संजय पासवान, विजय सांपला, रमा शंकर कठेरिया; बसपा से मायावती, अम्बेथ राजन, डॉ बलिराम, वीर सिंह, राजाराम; डीएमके से ए राजा; और सीपीआई से डी राजा का नाम प्रमुखता से शामिल किया जा सकता है.
इस लिस्ट को बनाने के समय मुझे सपा, आरजेडी, जेडीयू, सीपीएम, टीएमसी, जेडेएस, टीडीपी, टीआरएस, एनसीपी, अकाली दल, आप और एआइडीएमके में दलित समाज का ऐसा कोई भी नेता दिखाई नहीं देता, जो कि संसदीय राजनीति में थोड़ा बहुत सक्रिय रहा हो या जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर कोई चर्चा होती हो. हो सकता है कि इनमें कोई अच्छा दलित नेता हो, लेकिन मीडिया की साइलेंसिंग का शिकार हो.
बहरहाल, इस लिस्ट में से भी अगर दलित समाज के मुद्दों पर संसद के अंदर सक्रियता के आधार पर बात की जाय तो पीएल पुनिया, प्रो भालचन्द्र मुंगेकर, मायावती, डॉ बलिराम, अम्बेथ राजन, और डी राजा का ही नाम लिखा जा सकता है. बाक़ी ज़्यादातर दलित नेता यदा-कदा ही दलितों के मुद्दे पर कुछ बोलते हैं. डॉ संजय पासवान दलित मुद्दों पर सक्रिय तो हैं, लेकिन 13वीं लोकसभा में सांसद और बाजपेयी सरकार में मंत्री रहने के बाद भी पिछले कई चुनावों में उनको टिकट ही नहीं दिया गया. इसके अलावा, निवर्तमान लोकसभा में बीजेपी सांसदों में डॉ उदित राज काफ़ी सक्रिय रहे, लेकिन अंत समय में उनका टिकट कट गया.
मायावती का ख़ुद लोकसभा चुनाव न लड़ना और अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉ बलिराम और वीर सिंह को भी न लड़वाना, लोकसभा में दलित सांसदों की ख़ामोशी को और बढ़ाएगा.
अब सवाल उठता है कि लोकसभा में दलित समाज के वरिष्ठ नेताओं का चुनकर जाना ज़रूरी क्यों है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें लोकसभा और राज्य सभा की शक्तियों में अंतर को समझना ज़रूरी है.
संसदीय लोकतंत्र में लोकसभा (निचला सदन) का महत्व राज्यसभा (उच्च सदन) से ज़्यादा होता है, क्योंकि लोकसभा के सदस्यों का चुनाव सीधे-सीधे जनता द्वारा होता है, जबकि राज्यसभा का चुनाव अप्रत्यक्ष तरीक़े से राज्यों की विधानसभाओं द्वारा और राष्ट्रपति के मनोनयन के आधार पर होता है. लोकसभा को राज्यसभा की तुलना में ज़्यादा शक्तियां प्राप्त हैं.
भारत में राज्यसभा को केवल किसी विषय को राज्य सूची से हटाने-जोड़ने के मामले में ही लोकसभा से ज़्यादा शक्ति प्राप्त है. लोकसभा में बहुमत हासिल करने वाला ही व्यक्ति प्रधानमंत्री बनता है. सीधे-सीधे कहें तो लोकसभा में सदस्यों की संख्या से ही सरकार बनती-बिगड़ती है, इसलिए सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही रखा जा सकता है. इसके अलावा भारत की संचित निधि यानी रुपया, पैसा, संसाधन पर नियंत्रण भी लोकसभा का ही होता है, जिसकी वजह से सरकार को पैसा ख़र्च करने के लिए हर साल लोकसभा में बजट प्रस्तुत करना होता है.
लोकसभा देश के वित्तीय संसाधनों पर अपना नियंत्रण वित्तीय समितियों के माध्यम से करती है, जो कि तीन प्रकार की होती हैं- प्राक्कलन समिति, लोक लेखा समिति और सार्वजनिक उपक्रम समिति. इनमें से प्राक्कलन समिति लोकसभा की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण समिति होती है. इसके कुल 30 सदस्य होते हैं, और ये सभी लोकसभा के सांसद होते हैं.
प्राक्कलन समिति यानी एस्टिमेट कमेटी देश की अर्थव्यवस्था को सही ढंग से चलाने वाली नीतियों समेत सरकार को ख़र्चों के पूर्वानुमान पर अपना सुझाव देती है. समिति के सभी सदस्यों का चुनाव विभिन्न राजनीतिक दलों को लोकसभा में मिली सदस्य संख्या के हिसाब से हर साल होता है. पिछले साल में इस समिति के अध्यक्ष बीजेपी नेता डॉ मुरली मनोहर जोशी थे, और जहां तक इस समिति के सदस्यों की बात है तो मध्य प्रदेश के भिंड से बीजेपी के सांसद डॉ भागीरथ प्रसाद इस कमेटी में अनुसूचित जाति के एकमात्र सांसद थे. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है, देश की अर्थव्यवस्था से संबंधित निर्णयों में दलित समाज के सांसदों की सहभगिता बहुत ही कम है.
यह एक आम धारणा है कि संसद केवल क़ानून बनाती है, जबकि संसद क़ानूनों को लागू भी कराती है. क़ानून को लागू कराने के लिए सांसद के अंदर ही अलग-अलग प्रकार की समितियां होती हैं जो कि समय-समय पर जांच करती रहती हैं कि सम्बंधित विभागों ने किसी क़ानून को ठीक से लागू किया कि नहीं.
1993 से भारत के संसद की कार्यप्रणाली में बहुत कुछ बदलाव आ गया है, क्योंकि इसी साल डिपार्टमेंट रिलेटेड स्टैंडिंग कमेटी का गठन हुआ. आजकल कुल ऐसी 24 कमेटियां हैं जिसमें 16 लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय के अधीन और 8 राज्यसभा अध्यक्ष के कार्यालय के अधीन कार्य करती हैं. ये कमेटियां अपने विभाग से जुड़े क़ानून एवं बजट तक के निर्धारण में बड़ी भूमिका निभाती हैं, इसलिए इनको ‘मिनी संसद’ भी कहा जाने लगा है. पूर्व सांसद बीएल शंकर और प्रो वेलेरियन रोड्रिग्स ने अपनी किताब इंडियन पार्लियामेंट- डेमोक्रेसी ऐट वर्क में संसदीय कमेटियों की कार्यप्रणाली को बहुत विस्तार से लिखा है.
संसद की समितियों के ज़्यादातर सदस्य लोकसभा से ही चुनकर आते हैं, क्योंकि लोकसभा के सदस्यों की संख्या ज़्यादा है, और ज़्यादातर समितियां भी लोकसभा अध्यक्ष के तहत आती हैं, इसलिए समितियों में लोकसभा के सदस्यों का बोलबाला रहता है. संसद की ऐसी समितियों में वरिष्ठ सांसदों या फिर विषय विशेषज्ञता रखने वाले सांसदों का भी बोल बाला रहता है, इसलिए आजकल ऐसा अक्सर सुनने में आ रहा है कि दलित समाज के सांसद इन समितियों की मीटिंगों में जाने से ही कतराते हैं, और अगर जाते भी हैं, तो बोलने से कतराते हैं.
उक्त परिपेक्ष्य को ध्यान में रखकर अब इस बात की समीक्षा शुरू होनी चाहिए क़ि दलित समाज के वरिष्ठ राजनेता क्यों नहीं सीधे लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं? सामाजिक न्याय की लड़ाई का दावा करने वाली राजनैतिक पार्टियां विभिन्न विषयों की समझ रखने वालों को क्यों नहीं लोकसभा चुनाव लड़वा रही हैं?
मजदूर दिवस पर बाबा साहब को क्यों याद करें?
कभी-कभी कम उपलब्धियों वाले लोग इतिहास के नायक बना दिए जाते हैं और महानायकों को उनकी वास्तविक जगह मिलने में सदियां लग जाती हैं. ऐसे महानायकों में डॉ. आंबेडकर भी शामिल हैं. भारत में 21 वीं सदी आंबेडकर की सदी के रूप में अपनी पहचान धीरे-धीरे कायम कर रही हैं. उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के नए-नए आयाम सामने आ रहे हैं. उनके व्यक्तित्व का एक बड़ा आयाम मजदूर एवं किसान नेता का है.
बहुत कम लोग इस तथ्य से परिचित हैं कि उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की थी, उसके टिकट पर वे निर्वाचित हुए थे और 7 नवंबर 1938 को एक लाख से ज्यादा मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व भी डॉ. आंबेडकर ने किया था. इस हड़ताल के बाद सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मजदूरों का आह्वान किया कि मजदूर मौजूदा लेजिस्लेटिव काउंसिल में अपने प्रतिनिधियों को चुनकर सत्ता अपने हाथों में ले लें.
इस हड़ताल का आह्वान उनके द्वारा स्थापित इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी ने किया था, जिसकी स्थापना 15 अगस्त 1936 को डॉ. आंबेडकर ने की थी.
7 नवंबर की हड़ताल से पहले 6 नवंबर 1938 को लेबर पार्टी द्वारा बुलाई गई मीटिंग में बड़ी संख्या में मजदूरों ने हिस्सा लिया. आंबेडकर स्वयं खुली कार से श्रमिक क्षेत्रों का भ्रमण कर हड़ताल सफल बनाने की अपील कर रहे थे. जुलूस के दौरान ब्रिटिश पुलिस ने गोली चलाई जिसमें दो लोग घायल हुए. मुंबई में हड़ताल पूरी तरह सफल रही. इसके साथ अहमदाबाद, अमंलनेर, चालीसगांव, पूना, धुलिया में हड़ताल आंशिक तौर पर सफल रही.
यह हड़ताल डॉ. आंबेडकर ने मजदूरों के हड़ताल करने के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए बुलाई थी. सितंबर 1938 में बम्बई विधानमंडल में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने औद्योगिक विवाद विधेयक प्रस्तुत किया था. इस विधेयक के तहत कांग्रेसी सरकार ने हड़ताल को आपराधिक कार्रवाई की श्रेणी में डालने का प्रस्ताव किया था.
डॉ. आंबेडकर ने विधानमंडल में इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि ‘हड़ताल करना सिविल अपराध है, फौजदारी गुनाह नहीं. किसी भी आदमी से उसकी इच्छा के विरूद्ध काम लेना किसी भी दृष्टि से उसे दास बनाने से कम नहीं माना जा सकता है, श्रमिक को हड़ताल के लिए दंड देना उसे गुलाम बनाने जैसा है.’
उन्होंने कहा कि यह (हड़ताल) एक मौलिक स्वतंत्रता है जिस पर वह किसी भी सूरत में अंकुश नहीं लगने देंगे. उन्होंने कांग्रेसी सरकार से कहा कि यदि स्वतंत्रता कांग्रेसी नेताओं का अधिकार है, तो हड़ताल भी श्रमिकों का पवित्र अधिकार है. डॉ. आंबेडकर के विरोध के बावजूद कांग्रेस ने बहुमत का फायदा उठाकर इस बिल को पास करा लिया. इसे ‘काले विधेयक’ के नाम से पुकारा गया. इसी विधेयक के विरोध में डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने 7 नवंबर 1938 की हड़ताल बुलाई थी.
इसके पहले 12 जनवरी 1938 को इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के बैनर तले ही डॉ. आंबेडकर ने किसानों के संघर्ष का नेतृत्व किया. इस दिन ठाणे, कोलाबा, रत्नागीरि, सातारा और नासिक जिलों के 20,000 किसान प्रदर्शन के लिए बम्बई में जमा हुए थे. जुलूस का नेतृत्व डॉ. आंबेडकर ने खुद संभाला. किसानों के इस जुलूस की मुख्य मांग वतन प्रथा और खोटी प्रथाओं का खात्मा था. 17 सितम्बर, 1937 को उन्होंने महारों को अधीनता की स्थिति में रखने के लिए चली आ रही ‘वतन प्रथा’ खत्म करने के लिए एक विधेयक पेश किया था. वतन प्रथा के तहत थोड़ी सी जमीन के बदले महारों को पूरे गांव के लिए श्रम करना पड़ता था और अन्य सेवा देनी पड़ती थी. एक तरह से वे पूरे गांव के बंधुआ मजदूर होते थे.
इस विधेयक में यह भी प्रावधान था कि महारों को उस जमीन से बेदखल न किया जाए, जो गांव की सेवा के बदले में भुगतान के तौर पर उन्हें मिली हुई थी. शाहू जी महराज ने अपने कोल्हापुर राज्य में 1918 में ही कानून बनाकर ‘वतनदारी’ प्रथा का अंत कर दिया था तथा भूमि सुधार लागू कर महारों को भू-स्वामी बनने का हक़ दिलाया. इस आदेश से महारों की आर्थिक गुलामी काफी हद तक दूर हो गई.
डॉ. आंबेडकर ने खोटी व्यवस्था खत्म करने के लिए भी एक विधेयक प्रस्तुत किया था. इस व्यवस्था के तहत एक बिचौलिया अधिकारी लगान वसूल करता था. इसी बिचौलिए को खोट कहा जाता था. ये खोट स्थानीय राजा की तरह व्यवहार करने लगे थे. राजस्व का एक बड़ा हिस्सा ये अपने पास रख लेते थे. ये खोट अक्सर सवर्ण जातियों के ही होते थे.
बाम्बे प्रेसीडेंसी के लेजिस्लेटिव काउंसिल में कांग्रेस पार्टी के पास भारी बहुमत था. उसने आंबेडकर की वतन व्यवस्था और खोट व्यवस्था के खात्मे के विधेयकों को पास नहीं होने दिया. इसका कारण यह था कि कांग्रेस के नेतृत्व पर पूरी तरह उन ब्राह्मणों या मराठों का नेतृत्व था, जिन्हें वतन प्रथा और खोट व्यवस्था का सबसे अधिका फायदा मिलता था. वे किसी भी तरह से अपने इस वर्चस्व और शोषण-उत्पीड़न के अधिकार को छोड़ने को तैयार नहीं थे. किसानों के इस संघर्ष में अस्पृश्यों के साथ मराठी कुनबी समुदाय भी शामिल था.
मजदूरों और किसानों के इस संघर्ष का नेतृत्व करते हुए डॉ. आंबेडकर ने सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों का भी सहयोग लिया. लेकिन यह सहयोग ज्यादा दिन नहीं चल पाया, क्योंकि कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पूंजीवाद को तो दुश्मन मानते थे. लेकिन वे ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष करने को बिल्कुल ही तैयार नहीं थे. जबकि डॉ. आंबेडकर ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद दोनों को भारत के मेहनतकशों का दुश्मन मानते थे. 12-23 फरवरी 1938 को मनमाड में अस्पृश्य रेलवे कामगार परिषद की सभी की अध्यक्षता करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा कि “भारतीय मजदूर वर्ग ब्राह्णणवाद और पूंजीवाद दोनों का शिकार है और इन दोनों व्यवस्थाओं पर एक ही सामाजिक समूह का वर्चस्व है.”
उन्होंने सभा में उपस्थित अस्पृश्य कामगारों से कहा कि कांग्रेस, सोशलिस्ट और वामपंथी तीनों अस्पृश्य कामगारों के विशेष दुश्मन ब्राह्मणवाद से संघर्ष करने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने अस्पृश्यों के कामगार यूनियन से अपनी पार्टी इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का समर्थन करने का आह्वान किया.
ब्रिटिश संसद द्वारा अगस्त 1935 में पारित भारत सरकार अधिनियम के तहत विभिन्न प्रांतों और केंद्र में भारतीयों के स्वायत्त शासन का प्रावधान किया गया था. इसी अधिनिय के तहत 1937 में चुनाव हुए. इन्हीं चुनावों में भाग लेने के लिए डॉ. आंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन किया था. बाम्बे प्रेसीडेंसी में इस पार्टी ने 17 उम्मीदवार मैदान उतारे, जिसमें 13 उम्मीदवार अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीटों पर खड़े किए गए थे, जिनमें 11 सीटों पर उन्हें विजय मिली, जिसमें खुद डॉ. आंबेडकर भी शामिल थे. बाकी चार उम्मीदवार अनारक्षित सामान्य सीट पर खड़े किए गए थे, जिसमें तीन पर विजयी मिली. मध्यप्रांत और बिहार में पार्टी को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 20 सीटों में से तीन पर विजय मिली. इस चुनाव मे बाम्बे प्रेसीडेंसी में कांग्रेस पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था. मुस्लिम लीग के बाद बाम्बे प्रेसीडेंसी में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी थी.
बाबा साहेब के मजदूरों और किसानों के लिए किए गए कार्यों का समग्र मूल्यांकन अभी बाकी है.
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
-
इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत प...
-
मुलायम घराने के सियासी ड्रामे से मुझे कुछ नहीं लेकिन अखिलेश यादव को मायूस देखकर एक राजनीतिक छात्र होने के नाते थोड़ा सा खराब ज़रूर लगा. ...
-
पुणे ज़िले में भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200वीं सालगिरह पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सोमवार को हुई हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई है. इ...