Monday, November 30, 2015

कैसे देश में रहते हैं हम?


बहुत पहले मैने indian Express में एक रिपोर्ट पढी थी, और इस लिखा था तो जाहिद भाई अचंभित थे। आज भी वही बात एक मराठी अखबार में पढ कर बडा दुख हुआ।
एक ऐसा गांव जहां लोग पानी के लिए कई लड़कियों से शादियां करते हैं। इस प्रथा पर हाल ही में एक शॉर्ट फिल्म भी बनी है, जिसे यू-ट्यूब पर महज तीन दिन में 41 हजार से ज्यादा लोगों ने देख लिया है। यह फिल्म भारत में एंटी पोवर्टी एजेंसी 'एक्शनएड इंडिया' ने बनाया है। फिल्म की कहानी महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित इलाके विदर्भ के गांव देंगमाल की है। यहां के घरों में पिछले कई सालों से ऐसा प्रचलन चल रहा है। यहां लोग कई शादियां मुख्‍य रूप से पानी लाने के लिए ही करते हैं। रोचक बात यह है कि पंचायत ने भी इस चलन को मान्यता दे रखी है। 25 नवंबर को यू-ट्यूब पर इस शॉर्ट फिल्म को जारी किया गया।
एक आदमी अपनी तीन पत्नियों के साथ रहता है। एक को पत्नी का आधिकारिक दर्जा हासिल है, जबकि बाकी दो कहलाती हैं पानी वाली बाई।
गांव में 'पानी वाली बाई' रखने का चलन पानी की समस्या के चलते बढ़ा है। गांव में नल नहीं हैं। इसलिए ये पत्नियां तीन किमी दूर घंटों पैदल चलकर पानी लेने जाती हैं। इसीलिए इन्हें पानीवाली बाई के नाम से जाना जाता है। दूसरी या तीसरी पत्नी वही बनती हैं, जिनके पति की या तो मौत हो चुकी हो या फिर उनके पहले पति ने उन्हें छोड़ दिया हो।
गांव में लड़की के जन्म पर खुशी मनाई जाती है, क्योंकि माना जाता है कि पानी भरने के लिए परिवार में एक और सदस्य आ गया। हालांकि, ये औरतें उम्मीद करती हैं कि जब उनकी बेटियां बड़ी होंगी तो उनके गांव में भी नल होंगे। किसान के घर में हर दिन लगभग 100 लीटर पानी खर्च होता है। कई चक्कर लगाने पर ये जरूरत पूरी होती है। एक आदमी की पहली पत्नी शादी के तुरंत बाद गर्भवती हो गई। पानी भरकर नहीं ला सकती थी। इसलिए दूसरी पत्नी आई। उसकी उम्र थोड़ी ज्यादा थी।
कुछ दिन बाद उसके लिए भी पानी भरकर लाना मुश्किल होने लगा। इसके बाद तीसरी शादी की। तीसरी सिर्फ 26 साल की थी। उसके पति की मौत हो चुकी थी। अब पहली बच्चों को संभालती है, दूसरी घर के बाकी काम करती है। उस आदमी की तीनों पत्नियां एक ही घर में रहती हैं। पहली की जिम्मेदारी है कि वह बाकी दोनों की जरूरतों का ख्याल रखे। इनमें कई बार झगड़े भी होते हैं। फिर भी ये औरतें दूसरी और तीसरी बीवी बनकर खुश हैं। करीब-करीब पूरे गांव में इस तरह की परंपरा दिखाई देती है। 
एक अन्य घटना ऐसे ही किसी गांव की क्राइम पेट्रोल के एपिसोड में देखी थी। जहाँ मराठवाडा के एक गांव में लड़कियों को बेचने के लिए हर चार महीने में मंडी लगती है। लड़कियों की बोली लगाई जाती है फिर रसीद के साथ 50-80 तक में एक साल के लिए बेच दिया जाता है। फिर शुरू होता है उनपर जुर्म का सिलसिला। 
एक और बेहद डरावनी खबर है। मुंबई से करीब तीन सौ किलोमीटर दूर शनि शिंगणापुर के शनि मंदिर में महिला श्रद्धालु के दर्शन के बाद से विवाद हो गया है. कल दोपहर एक महिला श्रद्धालु मंदिर में पहुंच गई. जिसके बाद आज मंदिर का शुद्धिकरण किया जा रहा है. एबीपी न्यूज़ पर देखा कि सीसीटीवी की तस्वीरों में महिला श्रद्धालु हाथ में बर्तन लेकर शनि महाराज की मूर्ति तक पहुंचती है और फिर तेल चढ़ाकर तेजी में लौट आती है. बताया जा रहा है कि चार सौ साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. भला इससे बुरी खबर और क्या हो सकती है? भगवान खुद स्त्री की इस दशा में भागीदार हैं। सबसे पहले तो मुझे पहली बार यह बात सुनकर बहुत गुस्सा आया था कि अपने कठिन दिनों में महिलाओं को भगवान की पूजा करना मना है। मैं अगर कुछ बडा बना तो इसके खिलाफ एक कानून बना दूगा। आखिर भगवान ने ही तो महिलाओं की ऐसी शारीरिक बनावट की जिससे उन्हें 9 महीने पेट में बच्चा रखने से लेकर लेडीज प्रोब्लम तक कष्ट सहन करना पडता है। इतिहास के भगवान से लेकर राजा महाराजा तक इसके लिए दोषी हैं। सबने अपने अपने हिसाब से और मतलब के लिए स्त्री का प्रयोग किया है।
कई बार लगता है कि भगवान, कानून और सरकार सब किस लिए है? आंसू आ गए आज ये सब पढते और लिखते हुए। बदलाव और सुधार के लिए हमें खुद आगे आना होगा। जब तक राजनीति नहीं बदलेगी, तबतक अच्छे कानून नहीं बनेगे। इसके बाद ही महिलाओं की स्थिति में सुधार ला सकते हैं। मुंबई दिल्ली के बाहर की ओर इशारा है मेरा। बात केवल भारत की ही नहीं है मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर देखा की आर्थिक मंदी के कारण ग्रीस की महिलाओ को एक एक सैंडविच के लिए जिस्मफरोशी करना पड रहा है। आपको भी मेरी तरह ही गुस्सा आया होगा पढकर लेकिन कभी अपने अंदर झाँक कर देखा है? जी हां, काॅलेज में, सिनेमा हॉल में या पब्लिक प्लेस पर किसी लड़की को जाते हुए देखकर "माल, आइटम जैसे बाजारू शब्दों" का प्रयोग आपको भी उन बेचने वालों की श्रेणी में ले जाता है। शायद कुछ राष्ट्रवादी मुझे आज भी गाली देगे क्योंकि मैंने देश, भगवान और मर्दो के खिलाफ सच्चाई लिख दी है। मैं देशद्रोही हो सकता हूं क्योंकि बाहर के लोगों को यह बात पता चली तो देश की बदनामी होगी। सरकार को मैरिटल रेप(शादी के बाद यौन संबंधो में बराबरी) और हिंदू कोड बिल जैसे कानून लाना चाहिए।

नार्वे के कुछ अजीब क़ानून

आज एक जगह नार्वे के बारे में पढने का मौका मिला।1994 में नॉर्वे ने यूरोपीय संघ की सदस्यता लेने के विरोध में जनमत-संग्रह में अपना मत दिया था। ये मतदान प्रधानमंत्री ग्रो हारलेम ब्रंटलैंड के लिए एक झटका साबित हुआ था, जिनका एक अहम लक्ष्य था नॉर्वे को यूरोपीय संघ का सदस्य बनाना। इससे पहले 1972 में भी नॉर्वे ने इसके विरोध में ही मत दिया था। इसके बाद तत्कालीन सरकार को हटना पड़ा था। यहां के कुछ कानून ऐसे हैं जो बहुत ही अजीबोगरीब हैं।
यहाँ पर लोगों को टीवी-वीसीआर खरीदने के लिए लाइसेंस की जरूरत होती है। लाइसेंस मिलने के बाद ही वे अपने घरों में टीवी-वीसीआर ले जा सकते हैं।
यहाँ पर एक कानून है कि वेश्यावृत्ति गैरकानूनी है, लेकिन वेश्या नहीं। ऐसा करने वाले को कड़ी सजा का प्रावधान है। लेकिन आपको जानकर हैरत होगी कि भले ही वेश्यावृत्ति यहां पर गैरकानूनी है, लेकिन अगर कोई लड़की इसे अपनाती है तो ऐसा करना अवैध माना जाता है।
दुनियाभर के कई देशों में लोग अपने पालतू जानवरों को नपुंसक (बधिया) बनवा देते हैं, लेकिन नॉर्वे में ऐसा नहीं किया जा सकता है। अगर कोई ऐसा करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है।
इस देश में ऐसा ही एक और कानून है जिसके अनुसार कोई व्यक्ति एक साथ 4 बोतल से ज्यादा शराब नहीं खरीद सकता है। अगर ऐसा कोई करता है तो वह और दुकानदार दोनों पर ही कार्रवाई का प्रावधान है। बताया जाता है कि सन् 1900 के आसपास लोग अत्यधिक शराब पीने की वजह से वोटिंग जैसी प्रक्रिया में भी हिस्सा नहीं ले पाते थे। ऐसे में सरकार ने इस कानून को बना दिया।

Saturday, November 28, 2015

डॉ. आंबेडकर को सुविधानुसार चुनते हैं नेता

आज संविधान दिवस पर संसद के दोनो हाउसेस में जबरजस्ट बहस देखने को मिली।  इसलिए लगातार दोनों सदनो के भाषण मैं बारी बारी से सुनता रहा।  वैसे आज प्रधानमंत्री भी प्रधानमंत्री की तरह बोले।  आज के उनके भाषण की मैं तारीफ़ करता हूँ।  प्रधानमंत्री ने भी आज कहा कि अल्पमत पर बहुमत नहीं थोपा जाएगा। सेकुलर शब्द शायद इसी भाव की तलाश का एक मार्ग है। कई बार यह बहस डॉक्टर आंबेडकर पर दावेदारी की होड़ में बदलती रही । सबने अपने अपने हिसाब से डॉक्टर आंबेडकर के कथनों का चुनाव किया, और ज्यादातर मौके पर उनका इस्तेमाल दूसरे पर हमला करने में किया गया। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने कभी नहीं सोचा कि भारत में हमारी उपेक्षा हुई है, भारत में मुझे समय समय पर अपमान झेलना पड़ा है, तिरस्कार झेलना पड़ा है, मैं भारत छोड़कर दुनिया के कहीं दूसरे देशों में चला जाऊंगा। शायद गृहमंत्री आमिर खान के संदर्भ में कह रहे थे। पर क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने कभी सोचा होगा कि उनके बनाए संविधान के तहत चुनकर आने वाले सांसद अपने विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की बात करेंगे। आप इन चेहरों को जानते होंगे जिन्होंने कभी राजनीतिक विरोध तो कभी खान पान के आधार पर विरोधी से लेकर समुदाय विशेष को पाकिस्तान भेजने की बात करते रहे हैं।
(यह लाइन रविश कुमार के प्राइमटाइम से ली गई है। ) 
क्या डॉक्टर आंबेडकर कभी ऐसा कहते। सोशल मीडिया में तो लोग अभियान चलाने लगे कि आमिर ख़ान की फिल्में नहीं देखेंगे और वे जिस कंपनी के ब्रांड अंबेसडर हैं उसका मोबाइल ऐप अपने फोन से हटा देंगे। यह वही छूआछूत है जो समाज में दलितों को चलने के लिए अलग रास्ता तय करता है और दलित दुल्हे को घोड़ी से उतार देता है। क्या डॉक्टर आंबेडकर छूआछूत की इस नई प्रवृत्ति का कभी समर्थन करते। डॉक्टर आंबेडकर को पढ़ना चाहिए। वे भावुकता, व्यक्ति पूजा से ऊपर उठकर तार्किकता पर ज़ोर देते थे। उनकी यही खूबी थी जिसके कारण उन्होंने हिन्दू धर्म तो छोड़ दिया मगर देश नहीं छोड़ा। डॉक्टर आंबेडकर को समझना और उनका नाम लेकर राजनीतिक नारे लगाना दोनों दो चीज़ें हैं। अगर आंबेडकर के रास्ते पर चलने का दावा सब कर ही रहे हैं, तो फिर ऐसा क्यों हैं कि एक साल में दलितों के प्रति हिंसा 19 फीसदी बढ़ जाती है। दलित हिंसा के मूल में जातिगत प्रभुत्व और नफरत की बड़ी भूमिका है। जिन वक्ताओं ने यह कहा कि डॉक्टर आंबेडकर ने बहुत अपमान झेले उन्होंने यह सवाल क्यों नहीं उठाए कि आज भी दलितों को इस तरह से अपमान क्यों झेलने पड़ते हैं। क्या किसी बड़े वक्ता ने जातिवाद पर हमला बोला। प्रधानमंत्री ने सही कहा कि किसी को आरोप लगाना हो तो डॉक्टर आंबेडकर की बातों का इस्तेमाल कर रहा है और किसी को बचाव करना हो तो डॉक्टर आंबेडकर की बातों का सहारा लेता है। राजनीति में भक्ति को लेकर डॉक्टर आंबेडकर ने कहा था कि भारत में, भक्ति या जिसे हम समर्पण का मार्ग या नायक पूजा कहते हैं का राजनीति में रोल होता है। दुनिया के किसी हिस्से में इस कदर नहीं होता जितना भारत में होता है। धर्म में भक्ति हो सकता है आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और तानाशाही की ओर ले जाती है।  
राजनाथ सिंह जी ने कहा क़ि शायद  बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने इसलिए सोशलिज्म और सैकुलरिज्म, इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया था कि वे मानकर चलते थे कि यह भारत की जो मूल प्रकृति में निहित है, भारत का जो मूल स्वभाव है, उसमें ही यह समाहित है, अलग से इसका उल्लेख करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आज की राजनीति में सर्वाधिक दुरुपयोग यदि किसी शब्द का हो रहा है। यह दुरुपयोग रुकना चाहिए।  सेक्युलर शब्द का जो औपचारिक अनुवाद है वह है पंथनिरपेक्ष,धर्मनिरपेक्ष नहीं। इस हकीकत को भी वह समझते थे। आप ही बतायें बिहार के चुनाव में बीजेपी का गौ मांस का मुद्दा उठाना या मतदान से एक दिन पहले अखबारों में गाय का विज्ञापन देना सेकुलरिज्म है या सिकुलर कामा है। यह तस्वीर बंगाल की है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जमीयत उलेमा हिंद की रैली में हिस्सा लेना सेकुलरिज्म है या सिकुरज़्म है। टोपी उतार देना सेकुलर है या मंदिर में जाकर चंदन दान कर देना। हमारे नेता धर्म और राजनीतिक को मिक्स करते रहे हैं। कोई भी नेता आज जातिवाद पर बोलता हुआ बिल्कुल नहीं दिखाई दिया, सिवाय शरद यादव के।  शरद यादव ने जातिवाद के उपर जिस तरह से आज के दौर को लेकर बहुत अच्छी बातें कहीं।  लेकिन मुझे दुख इस बात को लेकर है क़ि लोग अंबेडकर साहब के सेकुलर शब्द ना प्रयोग करने को लेकर तो बातें कर रहे हैं, लेकिन उसकी व्याख्या अपने अपने तरीके से कर रहे हैं।  कोई भी उनके विचारों पर नहीं जाने की कोशिश करता है।  तभी मैं कहता हूँ कि अंबेडकर को सही से पढ़ना चाहिए इन नेताओं को भी।  उन्होने कितना कुछ लिखा है सेकूलरिज़्म के बारे में मुझे ताज्जुब होता है।  डॉ अंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिए अपने भाषण में भारतीय लोकतंत्र के लिए तीन बड़े खतरे बताए थे और ताज्जुब की बात है कि ये सभी परिस्थितियां अतीत में देश देख चुका है।  वर्तमान में भी इसके छिटपुट उदाहरण मौजूद हैं।  उनकी पहली चेतावनी जनता द्वारा सामाजिक-आर्थिक लक्ष्य हासिल करने के लिए अपनाई जाने वाली गैरसंवैधानिक प्रक्रियाओं पर थी।  पने भाषण में अंबेडकर सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों की प्राप्ति में संविधान प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग जरूरी बताते हुए कहते हैं, ‘इसका मतलब है कि हमें खूनी क्रांतियों का तरीका छोड़ना होगा, अवज्ञा का रास्ता छोड़ना होगा, असहयोग और सत्याग्रह का रास्ता छोड़ना होगा। ’ यहां अंबेडकर यह भी कहते हैं कि लक्ष्य हासिल करने के कोई संवैधानिक तरीके न हों तब तो इस तरह के रास्ते पर चलना ठीक है लेकिन संविधान के रहते हुए ये काम अराजकता की श्रेणी में आते हैं और इन्हें हम जितनी जल्दी छोड़ दें, हमारे लिए बेहतर होगा। 
इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपने एक आलेख में कहते हैं कि अंबेडकर ने उस समय गांधी, नेहरू और सरदार पटेल के लिए जनता में अंधश्रद्धा देखी थी।  इस स्थिति में ये नायक किसी सकारात्मक आलोचना से भी परे हो जाते हैं और शायद यही समझते हुए अंबेडकर ने अपने भाषण में राजनीतिक भक्ति को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था।  बदकिस्मती से भारतीय राजनीति में यह बीमारी काफी गहरी है।  क्षेत्रीय स्तर की राजनीति में तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन और वर्तमान मुख्यमंत्री जयललिता इसके सबसे बड़े प्रतीकों में गिने जा सकते हैं तो वहीं बिना किसी संवैधानिक पद पर रहते हुए बाल ठाकरे का भी रुतबा भी अपने भक्तों की बदौलत किसी राजनीतिक भगवान से कम नहीं था।  राष्ट्रीय स्तर पर इंदिरा गांधी इस बीमारी का सबसे सटीक उदाहरण मानी जा सकती हैं।  1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और पाकिस्तान की पराजय ने उन्हें समर्थकों के बीच अंधश्रद्धा का विषय बना दिया था।  हैरानी की बात नहीं है कि उनके शासनकाल में उन्हें तानाशाही प्रवृत्ति का राजनेता माना जाता था और आखिरकार उन्होंने ही देश में आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को स्थगित किया था।  इंदिरा गांधी के समय सोशल मीडिया नहीं था और यह भी साफ है कि उनके कट्टर समर्थकों को ‘भक्त’ नहीं कहा जाता था।  यहां हम कोई नतीजा नहीं निकाल रहे, लेकिन वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थकों के लिए सोशल मीडिया पर प्रचलित ‘भक्त’ शब्द अब आम बोलचाल की भाषा में भी इस्तेमाल होने लगा है।  सोशल मीडिया में यह स्थिति है कि प्रधानमंत्री की आलोचना पर किसी को भी हजारों गालियां पड़ने की पूरी गारंटी ली जा सकती है।  तानाशाही प्रवृत्ति का आरोप उनके ऊपर भी लगता है।  ये ठीक वही स्थितियां हैं जिनके बारे में डॉ अंबेडकर ने अपने भाषण में जिक्र किया था और जिन्हें लोकतंत्र के लिए खतरा माना जाता है। 

Friday, November 27, 2015

राज्यसभा पर सवाल उठना कितना जायज़?

आज संविधान के ऊपर संसद की दोनो सदनों मे बहस देखकर बड़ा अच्छा लगा। शरद यादव ने राज्य सभा के अधिकारों को लेकर अच्छा भाषण दिया। हमारा संविधान कई चुनौतियों से गुजरा है।आपातकाल और आधी रात को राज्य सरकारों को बर्खास्त कर देने से लेकर संघीय ढांचे पर तरह-तरह से हमले हुए हैं। इसके बाद भी हमारा लोकतंत्र चुनौतियों का सामना करता रहा और संविधान बना रहा, लेकिन इस मौक पर जब एक सासंद ये लेख लिखे कि राज्यसभा के अधिकारों में कटौती करने की जरूरत है, तो सवाल उठता है कि यह वक्त की जरूरत है या संविधान को अपने अनुकूल बनाने का राजनीतिक प्रयास है।आख़िर क्यों सरकार और सरकार के मंत्री ही राज्यसभा के उपर सवाल उठा रहे हैं। जबकि सरकार में दो नंबर के मंत्री अरुण जेटली, स्मृति ईरानी सहित कई तो राज्यसभा से ही चुनकर आते हैं, और लोकसभा के चुनाव हारे भी थे। अरुण जेटली राज्यसभा को नॉनइलेक्टेड कहते हैं, जो खुद जनता के द्वारा नॉनइलेक्टेड हैं।  दरअसल संविधान निर्माताओं ने राज्यसभा का निर्माण भविष्य में बहुत कुछ सोंच समझकर ही लिया था। उनको पता था क़ि कोई भी चुनी हुई सरकार अपने मन माने तरीके से काम कर सकती है। अगर मैं इसके इतिहास पर जाकर बात करना चाहूं तो बहुत पीछे लौटना पड़ेगा। संविधान सभा, जिसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई थी, ने भी 1950 तक केन्द्रीय विधानमंडल के रूप में कार्य किया, फिर इसे 'अनंतिम संसद' के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। इस अवधि के दौरान, केन्द्रीय विधानमंडल जिसे 'संविधान सभा' (विधायी) और आगे चलकर 'अंतिम  संसद' कहा गया, 1952 में पहले चुनाव कराए जाने तक, एक-सदनी रहा। फिर  भारत में दूसरे सदन की उपयोगिता को लेकर संविधान सभा में काफी बहस हुई थी। आखिरकार दो सदन वाली विधायिका का फैसला इसलिए किया गया क्योंकि इतने बड़े और विविधता वाले देश के लिए संघीय प्रणाली में ऐसा सदन जरूरी था। धारणा यह भी थी कि सीधे चुनाव के आधार पर बनी एकल सभा देश के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए नाकाफी होगी। इसका चुनाव राज्यों की विधान सभाओं के सदस्य करते हैं। चुनाव के अलावा राष्ट्रपति द्वारा सभा के लिए 12 सदस्यों के नामांकन की भी व्यवस्था की गई है। असल में राज्यसभा, संतुलन बनाने वाला या विधेयकों पर फिर से ग़ौर करने वाला पुनरीक्षण सदन है। उसका काम है लोकसभा से पास हुए प्रस्तावों की समीक्षा करना। सरकार मे विशेषज्ञों की कमी भी यह पूरी करता है, क्योंकि साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा से जुड़े कम से कम 12 विशेषज्ञ इसमें मनोनीत होते ही हैं। जवाहर लाल नेहरू ने सदन की ज़रूरत को बताते हुए लिखा है, "निचली सदन से जल्दबाजी में पास हुए विधेयकों की तेजी, उच्च सदन की ठंडी समझदारी से दुरुस्त हो जाएगी।"  काउंसिल ऑफ स्टेट्स, जिसे राज्य सभा भी कहा जाता है, एक ऐसा नाम है जिसकी घोषणा सभापीठ द्वारा सभा में 23 अगस्त, 1954 को की गई थी। इसकी अपनी खास विशेषताएं हैं। भारत में द्वितीय सदन का प्रारम्भ 1918 के मोन्टेग-चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन से हुआ। भारत सरकार अधिनियम, 1919 में तत्कालीन विधानमंडल के द्वितीय सदन के तौर पर काउंसिल ऑफ स्टेट्स का सृजन करने का उपबंध किया गया जिसका विशेषाधिकार सीमित था और जो वस्तुत: 1921 में अस्तित्व में आया। गवर्नर-जनरल तत्कालीन काउंसिल ऑफ स्टेट्स का पदेन अध्यक्ष होता था। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के माध्यम से इसके गठन में शायद ही कोई परिवर्तन किए गए। इसकी सदस्यता के लिए न्यूनतम आयु तीस साल है, जबकि लोकसभा के लिए पच्चीस साल।  देश के उपराष्ट्रपति को इसका सभापति बनाया गया है।  राज्यसभा सरकार को बना या गिरा नहीं सकती। फिर भी वह सरकार पर लगाम रख सकती है। यह काम खासतौर से उस समय बहुत महत्वपूर्ण होता है जब सरकार को राज्यसभा में बहुमत हासिल न हो। दोनों सभाओं के बीच गतिरोध को दूर करने के लिए संविधान में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने की व्यवस्था है। वित्तीय मामलों में लोकसभा को राज्यसभा की तुलना में प्रमुखता हासिल है। संविधान संशोधन विधेयक को पास करने के लिए दोनों सदनों में अलग-अलग बहुमत ज़रूरी है। इस मामले में दोनों सदनों के बीच गतिरोध को दूर करने की कोई व्यवस्था नहीं है। मोटे तौर पर मंत्रिपरिषद् की सामूहिक ज़िम्मेदारी और कुछ ऐसे वित्तीय मामलों को छोड़कर जो सिर्फ लोकसभा के क्षेत्राधिकार में आते हैं, दोनों सदनों को समान शक्तियां प्राप्त हैं।
कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं क़ि चुनी हुई सरकार को अपने वादे पूरे करने का मौका नहीं मिल पाता है, उसको उपरी सदन में रोंका जाता है। इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है क़ि जब राज्यसभा ने सरकार के विधेयकों को रोंका है। इसको यूके के हाउस ऑफ लॉर्ड्स पर मॉडल किया गया था। लेकिन 1911 और 1949 में हाउस ऑफ लॉर्ड्स की बहुत सारी शक्तियों में कमी की गई थी। यहाँ तक कि उसके सदस्यों की संख्या भी कम की गई थी। पहले उसके किसी बिल को रोंकने के अधिकार को 2 साल तक किया गया बाद में इसको कुछ अपवादों को छोड़कर एकदम से ख़त्म कर दिया गया। अब एक साल के लिए टालने की शक्ति है। इटली के अपर हाउस में भी बिल रोंकने को सीधे तौर पर इलेक्टेड सदञ के पास कर दिया गया। अगर बात सीधे तौर पर ही इलेक्टेड सदञ की है, तो सरकार किसी भी तरह से मनमानी कर सकती है। यहाँ तक क़ि 1975 में इमरजेंसी लगाने के लिए राज्यसभा का बहुमत था। इसके बारे में जेडीयू सांसद केसी त्यागी ने बहुत अच्छी जानकारी दी क़ि हाउस ऑफ लॉर्ड्स में एक बहुमत वाला दल, दूसरे अल्पमत दल के खिलाफ मतदान में अपने सांसदों को गैर हाजिर करवा सकता है। आप भारत में ऐसी उम्मीद कर सकते हैं? भाजपा के लोग कहते हैं क़ि राज्यसभा जनता से इलेक्शन मेनीफेस्टो में किए गए वादों को पूरा करने में अड़चन डालती है। मैं तो खुद कहता हूँ क़ि इलेक्शन मेनीफेस्टो को क़ानूनी दर्जा मिलना चाहिए। जो वादे इलेक्शन मेनीफेस्टो में किए गए हैं, उन्हें राज्यसभा ना रोंक सके, ऐसा प्रावधान किया जाए। लेकिन इलेक्शन मेनीफेस्टो के जो वादे छूट जाएँ, उसके लिए सरकार के खिलाफ कार्यवाही भी की जानी चाहिए। एक बड़ा उदाहरण भाजपा के प्रवक्ता देते हैं क़ि 1945 में यूके में  लेबर पार्टी बहुमत में थी। एटले वहाँ के पीएम थे। तब उन्होंने विपक्ष से बात करके कहा क़ि जो क़ानून इलेक्शन मेनीफेस्ट में है, वो आप मत रोंके, तो विपक्ष मान गया। यह एक शिष्टाचार की बात थी। लेकिन जैसा पिछले समय में भाजपा ने विपक्ष में रहकर किया है, वही अब कांग्रेस भी करती है। अगर कोई सांसद अपनी मर्ज़ी से किसी क़ानून के पक्ष में हो तो भी पार्टी उसपर विप लगा देती है। अब दिक्कत यह है क़ि हर दल अपनी अपनी सुविधनुसार राज्यसभा के उपर टिप्पणी करता रहता है, लेकिन क्या भारत जैसे विषमता भरे देश में बिना राज्यों के रिप्रजंटेटिव्स के लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है। एक ऐसा देश जहाँ पर बहुदलीय चुनाव सिस्टम है। वहाँ ऐसा कैसे हो सकता है। इसपर बहस करना है तो करिए, लेकिन एकदम से नकारने की कोशिश भविष्य में देश के लिए मंहगी पड़ सकती है। 
(नोट: सभी संवैधानिक तथ्य संविधान की मूल पुस्तक से पढ़कर लिखे गए हैं, फिर भी आप ग़लती होने पर मुझे सही कर सकते हैं। )

Wednesday, November 25, 2015

मैं आमिर के साथ खड़ा हूँ...

कल से आमिर ख़ान को लेकर दक्षिणपंथी सोसल मीडियावीर पूरी तरह से पिले पड़े हैं। किसी को समझ में क्यों नहीं रहा है क़ि असल में आमिर ख़ान ने क्या कहा है?
आमिर ने कहा क़ि देश में माहौल खराब हो रहा है, कई बार मेरी पत्नी बच्चों को लेकर डरी हुई रहती हैं, और दूसरे देश में बस जाने को लेकर कहा। आमिर ने यह भी कहा क़ि आई एस आई एस या अन्य आतंकवादी लोग इस्लाम को जानने वाले कभी नही हो सकते हैं। आमिर ने 1984 के दंगो पर भी टिप्पणी की। सहीद कर्नल को लेकर भी बातें कहीं थी। लेकिन किसी ने भी पूरा भाषण नहीं सुना और लग गए उनको गाली देने में। क्या अपराध था, देश से बाहर जाने की बात कहने पर? क्या जो लोग एन आर आई बनकर विदेशों में रहते हैं, वो लोग देश की इज़्ज़त कम कर रहे हैं? क्या जो लोग विदेशों में सरकारी सब्सिडी से पढ़ने जाते हैं, और फिर वहीं डॉक्टर वैज्ञानिक बनकर कहते हैं क़ि भारत में हमारी कदर नहीं है, वो लोग देश की इज़्ज़त नहीं कम करवा रहे हैं? जब हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं क़ि भारत में पैदा होने पर मैं सर्मिन्दा हूँ तो बेइज़्ज़ती नहीं होती है? क्या आमिर ख़ान जाने की तैयारी कर रहे थे, या किसी ख़ास देश का नाम बता दिया था? यह कहना क़ि मेरे गाँव का माहौल खराब है, या शहर का वातावरण खराब है, वहाँ की बेइज़्ज़ती हो जाती है? हद है किसी बहस में उपजी असहिष्णुता का।
अब हम आते हैं इसको होने वाले तर्को को लेकर तो भाजपा, संघ, हिंदुत्ववादी संगठनों की तरफ से आमिर पर हमला बोल दिया गया है। अभी सिन्हा या सामना में उद्धव कुछ बोल देते हैं, तो उनपर कोई नहीं बहस करता है। कोई भी उस इंसान के योगदान को नहीं देखता है, बस लग गए गाली देने। आमीर ख़ान ने जो बदलाव सत्य मेव जयते के ज़रिए समाज में लाए हैं, उतना किसी भी एन जी या सामाजिक कार्यकर्ता के बस की बात नहीं है। उनकी फिल्में जिनके बहुत योगदान रहे हैं समाज में। बेशक पैसा भी कमाया लेकिन अगर समाज में उसके ज़रिए कुछ अच्छा किया तो क्या बुराई है? आप ऐसे आदमी की राष्ट्रीयता पर सवाल उठा रहे हैं, जिसने अपने शरीर का एक एक अंग दान कर दिया है। उसने कितने सारे एन जी को निजी डोनेशन दिया है। आमिर पर अंगुली उठाने वालों को एक बार अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए।
आख़िर आमिर ख़ान को ऐसा कहने की ज़रूरत क्यों पड़ी? इसके लिए कुछ दिनों में ऐसा कुछ नहीं हो गया है जिसके ज़रिए आप उनपर  आरोप लगाने लगे। क्या सच में देश में असहिष्णुता नहीं बढ़ी है। जो लोग उन्हें कांग्रेस का एजेंट कहते हैं, उनको याद करना चाहिए, क़ि कांग्रेस के खिलाफ अन्ना आंदोलन में आमिर ख़ान खुले मंच से शामिल हुए थे। आज तक 1984 की आलोचना करते हैं। क्या आप देश के 200 से अधिक लेखकों और साहित्यकारों के पुरस्कार वापसी को भूल जाएँगे? क्या आप देश वैज्ञानिकों, फिल्मकारों, कलाकारो, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों के बयानों, एफटीआई के छात्रों और अन्य बुद्धिजीवियों की देश के माहौल के प्रति चिंता को नकार सकते हैं? क्या ये सब के सब कांग्रेस या पाकिस्तान के एजेंट हो गए। लेकिन सवाल आप केवल आमिर ख़ान और शाहरुख ख़ान पर ही उठाएँगे?
क्या सच में देश में सबकुछ बड़ा अच्छा ही चल रहा है? कालबर्गी, पंसारे जैसे दर्जनों सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या किन संगठनों ने की? मैं इसमें से राज्य और केंद्र सरकार की भूमिका को अलग नहीं कर रहा हूँ, बल्कि विचारधारात्मक आलोचना कर रहा हूँ। क्या सब के सब संगठन उग्र हिंदूवादी नहीं थे? क्या ये वही लोग नहीं हैं, जो देश के पहले आतंकवादी गोडसे के मंदिर और उसके बलिदान दिवस पर बातें करके मना भी लेते हैं? सरकार देखते ही रह जाती है। देश में कई जगह अल्पसंख्यकों को बीफ के शक के आधार पर, लवजिहाद पर, घर वापसी पर मार दिया जाता है। जबकि ये सबके सब मुद्दे खोखले साबित हुए। उपर्युक्त संगठनों को समर्थन किससे मिलता है। असल में संघ और भाजपा की बी टीम हैं ये लोग। पश्चिमी उत्तरप्रदेश, मुज़फ़्फ़र नगर में पिछले 3 सालों से क्या माहौल बनाया गया? और उसमें कौन लोग शामिल थे? भाजपा के विधायक संगीत सोम(बीफ कंपनी के मालिक), योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज जैसे माफ़िया जो सरकार में शामिल हैं। भाजपा के मुख्यमत्रियों, मंत्रियों के बयान देख लो, जो देश को तोड़ने वाले हैं। किसी में भी किसी भी तरह की आलोचना बर्दास्त करने की क्षमता नहीं है। अरुण शौरी के अपाहिज बेटे को निशाना बनाया जाता है। बिहार में भाजपा को वोट ना देने वाले लोगों की तुलना पाकिस्तानियों से की जाती है। क्या यह सहिष्णुता है? मुंबई में जैन पर्व के समय क्या हुआ उसपर कोई क्यों नहीं बोला? हरियाणा में दलितों पर एक के बाद एक हत्या, बलात्कार के मामले रहे हैं, क्या यह बड़ी सहिष्णुता है? ये कोई नई बात नहीं है या पहली बार नहीं हो रहा है। पुरस्कार वापसी पर विरोध और पक्ष में रैली निकाली गई। प्रधानमंत्री तक से मुलाकात हुई। सुधीन्द्र कुलकर्णी पर स्याही फेंकी गई। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड और बीसीसीआई की मीटिंग में हंगामा किया गया। अगर आपको किसी खास देश या इलाके में डर लग रहा है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप ढोंग कर रहे हैं या आपको उस जगह से प्यार नहीं है।
कश्मीर जब कश्मीरी पंडितों के लिए महफूज नहीं रहा तो उन्होंने पलायन किया, देश में जब सिख विरोधी दंगे भड़के तो बहुत से सिखों ने कुछ समय के लिए पगड़ी पहनना बंद कर दिया, शेव करा लिया (ऐसे कुछ लोगों को मैं खुद जानती हूं) कुछ साल पहले जब दक्षिण भारत में नॉर्थ-ईस्ट के लोगों के खिलाफ हिंसा होने लगी तो वह अपना रोजगार और पढ़ाई छोड़कर वापस अपने घर भागने लगे। इसका क्या मतलब हुआ, जो पंडित घाटी छोड़कर भागे, उन्हें अपनी जमीन से प्यार नहीं था? जिन सिखों ने पगड़ी पहनना बंद कर दिया उन्हें अपने मजहब और उसूलों से कोई लगाव नहीं था? जब जान पर बन आती है तो इंसान बस किसी तरह खुद को बचाने की कोशिश करता है।
 आख़िर ये सोसल मीडियावीर व्हाट्स, फेसबुक से बाहर निकलते ही कब हैं, जो इनको देश की खबर होगी? बस बहस किए जा रहे हैं, थोड़ा सा इमोशनल या भड़काऊ मैसेज आया नहीं कि सब लग जाते हैं गाली देने में। मुझे भी कल रात में कई लोगों ने गलियों के साथ साथ, गद्दार, कटुवा जैसे शब्दों के साथ बुरा भला कहा। जबकि मैने केवल इतना ही लिखा था, कि मोदी जी को जर्मन देश और भाषा काफ़ी पसंद होगी? किसी में आलोचना बर्दास्त करने की हिम्मत क्यों नहीं है। लेकिन हम भी ऐसे तो चुप नहीं बैठने वाले हैं, जिसको जो करना है कर ले।
जो सच है वो बात बोलेंगे, पूरी हिम्मत के साथ बोलेंगे,
साहीबों हम कलम के बेटे हैं, कैसे हम दिन को रात बोलेंगे?

आमिर और देश का हर नागरिक इस भारत नामक स्कूल का छात्र है। और यदि किसी छात्र को किसी अन्य छात्र या छात्रों से डर लगता है तो यह चिंता की बात है और हमारे अभिभावकों यानी सरकार का फ़र्ज़ यह बनता है कि वह उसका साथ दे कि उसे दुत्कार दे।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...