Friday, November 27, 2015

राज्यसभा पर सवाल उठना कितना जायज़?

आज संविधान के ऊपर संसद की दोनो सदनों मे बहस देखकर बड़ा अच्छा लगा। शरद यादव ने राज्य सभा के अधिकारों को लेकर अच्छा भाषण दिया। हमारा संविधान कई चुनौतियों से गुजरा है।आपातकाल और आधी रात को राज्य सरकारों को बर्खास्त कर देने से लेकर संघीय ढांचे पर तरह-तरह से हमले हुए हैं। इसके बाद भी हमारा लोकतंत्र चुनौतियों का सामना करता रहा और संविधान बना रहा, लेकिन इस मौक पर जब एक सासंद ये लेख लिखे कि राज्यसभा के अधिकारों में कटौती करने की जरूरत है, तो सवाल उठता है कि यह वक्त की जरूरत है या संविधान को अपने अनुकूल बनाने का राजनीतिक प्रयास है।आख़िर क्यों सरकार और सरकार के मंत्री ही राज्यसभा के उपर सवाल उठा रहे हैं। जबकि सरकार में दो नंबर के मंत्री अरुण जेटली, स्मृति ईरानी सहित कई तो राज्यसभा से ही चुनकर आते हैं, और लोकसभा के चुनाव हारे भी थे। अरुण जेटली राज्यसभा को नॉनइलेक्टेड कहते हैं, जो खुद जनता के द्वारा नॉनइलेक्टेड हैं।  दरअसल संविधान निर्माताओं ने राज्यसभा का निर्माण भविष्य में बहुत कुछ सोंच समझकर ही लिया था। उनको पता था क़ि कोई भी चुनी हुई सरकार अपने मन माने तरीके से काम कर सकती है। अगर मैं इसके इतिहास पर जाकर बात करना चाहूं तो बहुत पीछे लौटना पड़ेगा। संविधान सभा, जिसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई थी, ने भी 1950 तक केन्द्रीय विधानमंडल के रूप में कार्य किया, फिर इसे 'अनंतिम संसद' के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। इस अवधि के दौरान, केन्द्रीय विधानमंडल जिसे 'संविधान सभा' (विधायी) और आगे चलकर 'अंतिम  संसद' कहा गया, 1952 में पहले चुनाव कराए जाने तक, एक-सदनी रहा। फिर  भारत में दूसरे सदन की उपयोगिता को लेकर संविधान सभा में काफी बहस हुई थी। आखिरकार दो सदन वाली विधायिका का फैसला इसलिए किया गया क्योंकि इतने बड़े और विविधता वाले देश के लिए संघीय प्रणाली में ऐसा सदन जरूरी था। धारणा यह भी थी कि सीधे चुनाव के आधार पर बनी एकल सभा देश के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए नाकाफी होगी। इसका चुनाव राज्यों की विधान सभाओं के सदस्य करते हैं। चुनाव के अलावा राष्ट्रपति द्वारा सभा के लिए 12 सदस्यों के नामांकन की भी व्यवस्था की गई है। असल में राज्यसभा, संतुलन बनाने वाला या विधेयकों पर फिर से ग़ौर करने वाला पुनरीक्षण सदन है। उसका काम है लोकसभा से पास हुए प्रस्तावों की समीक्षा करना। सरकार मे विशेषज्ञों की कमी भी यह पूरी करता है, क्योंकि साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा से जुड़े कम से कम 12 विशेषज्ञ इसमें मनोनीत होते ही हैं। जवाहर लाल नेहरू ने सदन की ज़रूरत को बताते हुए लिखा है, "निचली सदन से जल्दबाजी में पास हुए विधेयकों की तेजी, उच्च सदन की ठंडी समझदारी से दुरुस्त हो जाएगी।"  काउंसिल ऑफ स्टेट्स, जिसे राज्य सभा भी कहा जाता है, एक ऐसा नाम है जिसकी घोषणा सभापीठ द्वारा सभा में 23 अगस्त, 1954 को की गई थी। इसकी अपनी खास विशेषताएं हैं। भारत में द्वितीय सदन का प्रारम्भ 1918 के मोन्टेग-चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन से हुआ। भारत सरकार अधिनियम, 1919 में तत्कालीन विधानमंडल के द्वितीय सदन के तौर पर काउंसिल ऑफ स्टेट्स का सृजन करने का उपबंध किया गया जिसका विशेषाधिकार सीमित था और जो वस्तुत: 1921 में अस्तित्व में आया। गवर्नर-जनरल तत्कालीन काउंसिल ऑफ स्टेट्स का पदेन अध्यक्ष होता था। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के माध्यम से इसके गठन में शायद ही कोई परिवर्तन किए गए। इसकी सदस्यता के लिए न्यूनतम आयु तीस साल है, जबकि लोकसभा के लिए पच्चीस साल।  देश के उपराष्ट्रपति को इसका सभापति बनाया गया है।  राज्यसभा सरकार को बना या गिरा नहीं सकती। फिर भी वह सरकार पर लगाम रख सकती है। यह काम खासतौर से उस समय बहुत महत्वपूर्ण होता है जब सरकार को राज्यसभा में बहुमत हासिल न हो। दोनों सभाओं के बीच गतिरोध को दूर करने के लिए संविधान में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने की व्यवस्था है। वित्तीय मामलों में लोकसभा को राज्यसभा की तुलना में प्रमुखता हासिल है। संविधान संशोधन विधेयक को पास करने के लिए दोनों सदनों में अलग-अलग बहुमत ज़रूरी है। इस मामले में दोनों सदनों के बीच गतिरोध को दूर करने की कोई व्यवस्था नहीं है। मोटे तौर पर मंत्रिपरिषद् की सामूहिक ज़िम्मेदारी और कुछ ऐसे वित्तीय मामलों को छोड़कर जो सिर्फ लोकसभा के क्षेत्राधिकार में आते हैं, दोनों सदनों को समान शक्तियां प्राप्त हैं।
कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं क़ि चुनी हुई सरकार को अपने वादे पूरे करने का मौका नहीं मिल पाता है, उसको उपरी सदन में रोंका जाता है। इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है क़ि जब राज्यसभा ने सरकार के विधेयकों को रोंका है। इसको यूके के हाउस ऑफ लॉर्ड्स पर मॉडल किया गया था। लेकिन 1911 और 1949 में हाउस ऑफ लॉर्ड्स की बहुत सारी शक्तियों में कमी की गई थी। यहाँ तक कि उसके सदस्यों की संख्या भी कम की गई थी। पहले उसके किसी बिल को रोंकने के अधिकार को 2 साल तक किया गया बाद में इसको कुछ अपवादों को छोड़कर एकदम से ख़त्म कर दिया गया। अब एक साल के लिए टालने की शक्ति है। इटली के अपर हाउस में भी बिल रोंकने को सीधे तौर पर इलेक्टेड सदञ के पास कर दिया गया। अगर बात सीधे तौर पर ही इलेक्टेड सदञ की है, तो सरकार किसी भी तरह से मनमानी कर सकती है। यहाँ तक क़ि 1975 में इमरजेंसी लगाने के लिए राज्यसभा का बहुमत था। इसके बारे में जेडीयू सांसद केसी त्यागी ने बहुत अच्छी जानकारी दी क़ि हाउस ऑफ लॉर्ड्स में एक बहुमत वाला दल, दूसरे अल्पमत दल के खिलाफ मतदान में अपने सांसदों को गैर हाजिर करवा सकता है। आप भारत में ऐसी उम्मीद कर सकते हैं? भाजपा के लोग कहते हैं क़ि राज्यसभा जनता से इलेक्शन मेनीफेस्टो में किए गए वादों को पूरा करने में अड़चन डालती है। मैं तो खुद कहता हूँ क़ि इलेक्शन मेनीफेस्टो को क़ानूनी दर्जा मिलना चाहिए। जो वादे इलेक्शन मेनीफेस्टो में किए गए हैं, उन्हें राज्यसभा ना रोंक सके, ऐसा प्रावधान किया जाए। लेकिन इलेक्शन मेनीफेस्टो के जो वादे छूट जाएँ, उसके लिए सरकार के खिलाफ कार्यवाही भी की जानी चाहिए। एक बड़ा उदाहरण भाजपा के प्रवक्ता देते हैं क़ि 1945 में यूके में  लेबर पार्टी बहुमत में थी। एटले वहाँ के पीएम थे। तब उन्होंने विपक्ष से बात करके कहा क़ि जो क़ानून इलेक्शन मेनीफेस्ट में है, वो आप मत रोंके, तो विपक्ष मान गया। यह एक शिष्टाचार की बात थी। लेकिन जैसा पिछले समय में भाजपा ने विपक्ष में रहकर किया है, वही अब कांग्रेस भी करती है। अगर कोई सांसद अपनी मर्ज़ी से किसी क़ानून के पक्ष में हो तो भी पार्टी उसपर विप लगा देती है। अब दिक्कत यह है क़ि हर दल अपनी अपनी सुविधनुसार राज्यसभा के उपर टिप्पणी करता रहता है, लेकिन क्या भारत जैसे विषमता भरे देश में बिना राज्यों के रिप्रजंटेटिव्स के लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है। एक ऐसा देश जहाँ पर बहुदलीय चुनाव सिस्टम है। वहाँ ऐसा कैसे हो सकता है। इसपर बहस करना है तो करिए, लेकिन एकदम से नकारने की कोशिश भविष्य में देश के लिए मंहगी पड़ सकती है। 
(नोट: सभी संवैधानिक तथ्य संविधान की मूल पुस्तक से पढ़कर लिखे गए हैं, फिर भी आप ग़लती होने पर मुझे सही कर सकते हैं। )

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