कल से आमिर
ख़ान को लेकर
दक्षिणपंथी सोसल मीडियावीर
पूरी तरह से
पिले पड़े हैं।
किसी को समझ
में क्यों नहीं
आ रहा है
क़ि असल में
आमिर ख़ान ने
क्या कहा है?
आमिर ने कहा
क़ि देश में
माहौल खराब हो
रहा है, कई
बार मेरी पत्नी
बच्चों को लेकर
डरी हुई रहती
हैं, और दूसरे
देश में बस
जाने को लेकर
कहा। आमिर ने
यह भी कहा
क़ि आई एस
आई एस या
अन्य आतंकवादी लोग
इस्लाम को जानने
वाले कभी नही
हो सकते हैं।
आमिर ने 1984 के
दंगो पर भी
टिप्पणी की। सहीद
कर्नल को लेकर
भी बातें कहीं
थी। लेकिन किसी
ने भी पूरा
भाषण नहीं सुना
और लग गए
उनको गाली देने
में। क्या अपराध
था, देश से
बाहर जाने की
बात कहने पर?
क्या जो लोग
एन आर आई
बनकर विदेशों में
रहते हैं, वो
लोग देश की
इज़्ज़त कम कर
रहे हैं? क्या
जो लोग विदेशों
में सरकारी सब्सिडी
से पढ़ने जाते
हैं, और फिर
वहीं डॉक्टर वैज्ञानिक
बनकर कहते हैं
क़ि भारत में
हमारी कदर नहीं
है, वो लोग
देश की इज़्ज़त
नहीं कम करवा
रहे हैं? जब
हमारे प्रधानमंत्री कहते
हैं क़ि भारत
में पैदा होने
पर मैं सर्मिन्दा
हूँ तो बेइज़्ज़ती
नहीं होती है?
क्या आमिर ख़ान
जाने की तैयारी
कर रहे थे,
या किसी ख़ास
देश का नाम
बता दिया था?
यह कहना क़ि
मेरे गाँव का
माहौल खराब है,
या शहर का
वातावरण खराब है,
वहाँ की बेइज़्ज़ती
हो जाती है?
हद है किसी
बहस में उपजी
असहिष्णुता का।
अब हम आते
हैं इसको होने
वाले तर्को को
लेकर तो भाजपा,
संघ, हिंदुत्ववादी संगठनों
की तरफ से
आमिर पर हमला
बोल दिया गया
है। अभी सिन्हा
या सामना में
उद्धव कुछ बोल
देते हैं, तो
उनपर कोई नहीं
बहस करता है।
कोई भी उस
इंसान के योगदान
को नहीं देखता
है, बस लग
गए गाली देने।
आमीर ख़ान ने
जो बदलाव सत्य
मेव जयते के
ज़रिए समाज में
लाए हैं, उतना
किसी भी एन
जी ओ या
सामाजिक कार्यकर्ता के बस
की बात नहीं
है। उनकी फिल्में
जिनके बहुत योगदान
रहे हैं समाज
में। बेशक पैसा
भी कमाया लेकिन
अगर समाज में
उसके ज़रिए कुछ
अच्छा किया तो
क्या बुराई है?
आप ऐसे आदमी
की राष्ट्रीयता पर
सवाल उठा रहे
हैं, जिसने अपने
शरीर का एक
एक अंग दान
कर दिया है।
उसने कितने सारे
एन जी ओ
को निजी डोनेशन
दिया है। आमिर
पर अंगुली उठाने
वालों को एक
बार अपने गिरेबान
में झाँकना चाहिए।
आख़िर आमिर ख़ान
को ऐसा कहने
की ज़रूरत क्यों
पड़ी? इसके लिए
कुछ दिनों में
ऐसा कुछ नहीं
हो गया है
जिसके ज़रिए आप
उनपर आरोप
लगाने लगे। क्या
सच में देश
में असहिष्णुता नहीं
बढ़ी है। जो
लोग उन्हें कांग्रेस
का एजेंट कहते
हैं, उनको याद
करना चाहिए, क़ि
कांग्रेस के खिलाफ
अन्ना आंदोलन में
आमिर ख़ान खुले
मंच से शामिल
हुए थे। आज
तक 1984 की आलोचना
करते हैं। क्या
आप देश के
200 से अधिक लेखकों
और साहित्यकारों के
पुरस्कार वापसी को भूल
जाएँगे? क्या आप
देश वैज्ञानिकों, फिल्मकारों,
कलाकारो, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों
के बयानों, एफटीआई
के छात्रों और
अन्य बुद्धिजीवियों की
देश के माहौल
के प्रति चिंता
को नकार सकते
हैं? क्या ये
सब के सब
कांग्रेस या पाकिस्तान
के एजेंट हो
गए। लेकिन सवाल
आप केवल आमिर
ख़ान और शाहरुख
ख़ान पर ही
उठाएँगे?
क्या सच में
देश में सबकुछ
बड़ा अच्छा ही
चल रहा है?
कालबर्गी, पंसारे जैसे दर्जनों
सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या
किन संगठनों ने
की? मैं इसमें
से राज्य और
केंद्र सरकार की भूमिका
को अलग नहीं
कर रहा हूँ,
बल्कि विचारधारात्मक आलोचना
कर रहा हूँ।
क्या सब के
सब संगठन उग्र
हिंदूवादी नहीं थे?
क्या ये वही
लोग नहीं हैं,
जो देश के
पहले आतंकवादी गोडसे
के मंदिर और
उसके बलिदान दिवस
पर बातें करके
मना भी लेते
हैं? सरकार देखते
ही रह जाती
है। देश में
कई जगह अल्पसंख्यकों
को बीफ के
शक के आधार
पर, लवजिहाद पर,
घर वापसी पर
मार दिया जाता
है। जबकि ये
सबके सब मुद्दे
खोखले साबित हुए।
उपर्युक्त संगठनों को समर्थन
किससे मिलता है।
असल में संघ
और भाजपा की
बी टीम हैं
ये लोग। पश्चिमी
उत्तरप्रदेश, मुज़फ़्फ़र नगर में
पिछले 3 सालों से क्या
माहौल बनाया गया?
और उसमें कौन
लोग शामिल थे?
भाजपा के विधायक
संगीत सोम(बीफ
कंपनी के मालिक),
योगी आदित्यनाथ, साक्षी
महाराज जैसे माफ़िया
जो सरकार में
शामिल हैं। भाजपा
के मुख्यमत्रियों, मंत्रियों
के बयान देख
लो, जो देश
को तोड़ने वाले
हैं। किसी में
भी किसी भी
तरह की आलोचना
बर्दास्त करने की
क्षमता नहीं है।
अरुण शौरी के
अपाहिज बेटे को
निशाना बनाया जाता है।
बिहार में भाजपा
को वोट ना
देने वाले लोगों
की तुलना पाकिस्तानियों
से की जाती
है। क्या यह
सहिष्णुता है? मुंबई
में जैन पर्व
के समय क्या
हुआ उसपर कोई
क्यों नहीं बोला?
हरियाणा में दलितों
पर एक के
बाद एक हत्या,
बलात्कार के मामले
आ रहे हैं,
क्या यह बड़ी
सहिष्णुता है? ये
कोई नई बात
नहीं है या
पहली बार नहीं
हो रहा है।
पुरस्कार वापसी पर विरोध
और पक्ष में
रैली निकाली गई।
प्रधानमंत्री तक से
मुलाकात हुई। सुधीन्द्र
कुलकर्णी पर स्याही
फेंकी गई। पाकिस्तान
क्रिकेट बोर्ड और बीसीसीआई
की मीटिंग में
हंगामा किया गया।
अगर आपको किसी
खास देश या
इलाके में डर
लग रहा है
तो इसका मतलब
यह नहीं कि
आप ढोंग कर
रहे हैं या
आपको उस जगह
से प्यार नहीं
है।
कश्मीर जब कश्मीरी
पंडितों के लिए
महफूज नहीं रहा
तो उन्होंने पलायन
किया, देश में
जब सिख विरोधी
दंगे भड़के तो
बहुत से सिखों
ने कुछ समय
के लिए पगड़ी
पहनना बंद कर
दिया, शेव करा
लिया (ऐसे कुछ
लोगों को मैं
खुद जानती हूं)। कुछ
साल पहले जब
दक्षिण भारत में
नॉर्थ-ईस्ट के
लोगों के खिलाफ
हिंसा होने लगी
तो वह अपना
रोजगार और पढ़ाई
छोड़कर वापस अपने
घर भागने लगे।
इसका क्या मतलब
हुआ, जो पंडित
घाटी छोड़कर भागे,
उन्हें अपनी जमीन
से प्यार नहीं
था? जिन सिखों
ने पगड़ी पहनना
बंद कर दिया
उन्हें अपने मजहब
और उसूलों से
कोई लगाव नहीं
था? जब जान
पर बन आती
है तो इंसान
बस किसी तरह
खुद को बचाने
की कोशिश करता
है।
आख़िर ये सोसल
मीडियावीर व्हाट्स, फेसबुक से
बाहर निकलते ही
कब हैं, जो
इनको देश की
खबर होगी? बस
बहस किए जा
रहे हैं, थोड़ा
सा इमोशनल या
भड़काऊ मैसेज आया नहीं
कि सब लग
जाते हैं गाली
देने में। मुझे
भी कल रात
में कई लोगों
ने गलियों के
साथ साथ, गद्दार,
कटुवा जैसे शब्दों
के साथ बुरा
भला कहा। जबकि
मैने केवल इतना
ही लिखा था,
कि मोदी जी
को जर्मन देश
और भाषा काफ़ी
पसंद होगी? किसी
में आलोचना बर्दास्त
करने की हिम्मत
क्यों नहीं है।
लेकिन हम भी
ऐसे तो चुप
नहीं बैठने वाले
हैं, जिसको जो
करना है कर
ले।
जो सच है
वो बात बोलेंगे,
पूरी हिम्मत के
साथ बोलेंगे,
साहीबों हम कलम
के बेटे हैं,
कैसे हम दिन
को रात बोलेंगे?
आमिर और देश
का हर नागरिक
इस भारत नामक
स्कूल का छात्र
है। और यदि
किसी छात्र को
किसी अन्य छात्र
या छात्रों से
डर लगता है
तो यह चिंता
की बात है
और हमारे अभिभावकों
यानी सरकार का
फ़र्ज़ यह बनता
है कि वह
उसका साथ दे
न कि उसे
दुत्कार दे।
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